भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 178

अध्याय बौद्धों द्वारा विकृत रामचरित १०१ रानी ने कहा—"मैं एक नीच की गुफा में रही थी तब भी मैं उसमें पङ्कज-पत्र की तरह निर्लेप रहो हूँ । यदि मुझमें सतीत्व है, तो पृथ्वी फट जाय ।" पृथ्वी फट गयी । रानी ने कहा, "मेरा सतीत्व प्रमाणित हुआ ।" राजा और रानी के प्रभाव से सब वर्ण अपने-अपने धर्म का पालन करने लगे । बुद्ध ने भिक्षुओं से कहा—"तब मैं राजा था, गोपा रानी थी, देवदत्त मामा था और मैत्रेय इन्द्र था । बोधिसत्त्व के आचरण में क्षान्ति की पारमिता असीम है ।" दशरथ-कथानक चीनी भाषा में अनूदित दशरथ-कथानक में कहा गया है कि प्राचीनकाल में, जब कि मनुष्य की आयु चार हजार वर्ष की होती थी, जम्बूद्वीप में एक दशरथ नाम के राजा राज्य करते थे । उनकी महिषी के राम नाम से एक पुत्र हुआ, दूसरी से लक्ष्मण पुत्र हुआ । राम में नारायणीय शक्ति थी । तीसरी रानी से भरत और चौथी रानी से शत्रुघ्न उत्पन्न हुए । तीसरी रानी पर राजा का अत्यधिक प्रेम था । एक दिन राजा ने कहा—"तुम्हारी किसी भी इच्छा की पूर्ति के लिए मैं अपना सम्पूर्ण धन और कोष देने में संकोच नहीं करूँगा ।" रानी ने कहा—"इस समय मुझे कोई आवश्यकता नहीं है ।" राजा बीमार पड़े और उन्होंने राम का अभिषेक कराया । छोटी रानी ने ईर्ष्या वश कहा—"मैं आपके दिये हुए वर की पूर्ति चाहती हूँ । मैंने दो वर पाये हैं । १ से राम गद्दी से उतार दिये जाएँ और रसरे से मेरे पुत्र का राज्याभिषेक किया जाए ।" यह सुनकर राजा दुःखित हुए । राजधर्म के अनुसार वे अपने वचन को तोड़ना नहीं चाहते थे । इस समय लक्ष्मण ने राम से अपनी शक्ति और साहस दिखाने की प्रार्थना की । राम ने कहा—"अपने पिता की आज्ञा भङ्ग कर पुत्र पितृभक्त नहीं कहला सकता ।" दशरथ ने दोनों पुत्रों को बनवास दिया । बारह वर्ष बाद लौटने की आज्ञा दी । भरत उस समय विदेश में थे । दशरथ की मृत्यु के बाद लौटे । उन्हें अपनी माता के कार्यों से घृणा हो गयी । वे सेना के साथ उस पर्वत पर गये, जहाँ राम निवास करते थे । भरत ने राम से कहा—"मैं आपसे लौटने और राज्य-भार ग्रहण करने की प्रार्थना करता हूँ ।" राम ने कहा, "वनवास के लिए पिता की आज्ञा हो चुकी है । उसे तोड़ने पर मैं आज्ञाकारी पुत्र नही कहलाऊँगा" तब भरत ने राम की खड़ाऊँ माँगीं और अयोध्या लौट गये । खड़ाऊओं को राज्य-सिंहासन पर रखकर भरत शासन की देखभाल करने लगे । प्रतिदिन प्रातः और सायंकाल पादुकाओं की पूजा करते थे और उनसे आज्ञा लेते थे । अवधि पूरी होने पर राम अपने देश को लौट आये । भरत के बहुत आग्रह करने पर उन्होंने राज्यसिंहासनाधिकार स्वीकार किया''''इत्यादि इत्यादि । वस्तुतः बौद्ध निरीश्वरवादी होते हैं । उनके यहाँ ईश्वर एवं वेद तथा वेदोक्त धर्म दोनों ही अमान्य हैं; परन्तु लोकप्रिय होने के कारण उनके अनुयायी भी रामचरित्र की ओर आकृष्ट होते थे । वाल्मीकिरामायण आदि में प्रवृत्ति होने से ईश्वर और वेद में उनकी प्रवृत्ति हो सकती थी । अतएव उन्होंने रामायण को ही विकृत करके किसी न किसी रूप में रामचरित्र अपने क्षेत्र में प्रचारित किया । साथ ही उसके माध्यम से सनातनियों और वैदिकों में राम के प्रति अश्रद्धा उत्पन्न करके अपने धर्म की ओर आकृष्ट करना भी उनका लक्ष्य था । अतः वाल्मीकिरामायण से विरुद्ध अंश अनादरणीय ही हैं । बौद्धों में वेदादि शास्त्र के प्रामाण्य की मान्यता नहीं थी । इसी लिए सीता को राम की भगिनी कहा गया है और भाई बहन के विवाह का समर्थन किया गया है ।