रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०८ रामायणमीमांसा पञ्चम उसका अनुसरण करता है। आनन्दकन्दतन्त्र में भी ऐसा उल्लेख है। वही पारद विभिन्न योगों से त्रपु, सीसक, सुवर्ण आदि रूप में परिणत होता है।' यद्यपि सामान्य स्त्री-पुरुषों के शुक्र, शोणित से धातुओं का निर्माण सम्भव नहीं है; तथापि शिव-पार्वती का चमत्कार पृथक् ही है। शिव-शक्ति या प्रकृति-पुरुष सम्पूर्ण विश्व के हेतु हैं, चेतन और अचेतन सम्पूर्ण विश्व के कारण वे ही हैं। विद्युत्-प्रकाश की भी ठण्डे और गरम तार के योग से ही अभिव्यक्ति होती है। प्रकाशस्वरूप शिव हैं और विमर्शस्वरूप शक्ति हैं। सम्पूर्ण विश्व अग्नीषोमात्मक है। पारद, सुवर्ण आदि भी सब उसी के परिणाम हैं। इसी वैज्ञानिक दृष्टि- कोण की अभिव्यक्ति के लिये परम कारण शिव और शक्ति के संयोग के अनन्तर ही अग्नि और सोम का संसर्ग हुआ है। गङ्गा सोम का ही प्रतीक हैं। देवताओं की प्रार्थना से भगवान् शिव ने अपना तेज पृथिवी में निक्षिप्त किया । उससे गिरि-काननपूर्ण सम्पूर्ण पृथिवी तप्त हो उठी । तदनन्तर देवताओं ने अग्नि से प्रार्थना की कि तुम वायुसमन्वित होकर रौद्र तेज में प्रवेश करो । वही अग्नि से व्याप्त होकर श्वेत पर्वत हो गया। अग्नि पृथिवी का अभिमानी देवता है, अतः तेज के धारणार्थ पृथिवी में अग्नि का प्रवेश उचित ही था । वायुयुक्त अग्नि के द्वारा चालनपूर्वक प्रवेश से बद्ध होकर शिवधातु का श्वेत पर्वत रूप होना सङ्गत ही है। तेजःप्रवेश से उसी की महिमा से पावक एवं आदित्य के समान बनकर वह सुवर्णमय हो गया। ‘मम योनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम् ।' (गी० १४।३ ) इस गीता वचन में भगवान् ने कहा है कि महत् ब्रह्म मेरी प्रकृति ( योनि ) है। उसमें मैं गर्भाधान करता हूँ और उसी से सम्पूर्ण प्रपञ्च की उत्पत्ति होती है । ईश्वर का प्रकृति में गर्भाधान सामान्य स्त्री-पुरुषों जैसा नहीं होता; किन्तु प्रकृति में पुरुष का प्रतिबिम्बित होना ही गर्भाधान है। उसी के प्रभाव से जड़ प्रकृति भी चेतनान्वित होकर महदादि प्रपञ्च के निर्माण में सक्षम होती हैं। इस तरह जब प्रकृति पुरुष या शिव शक्ति से ही सम्पूर्ण विश्व की सृष्टि होती है तब पारद, स्वर्ण, रजत आदि की उत्पत्ति भी उन्हीं से होती है, इसमें सन्देह का अवसर ही नहीं है । "ततो देवाः पुनरिदमूचुश्चापि हुताशनम् । आविश त्वं महातेजो रौद्रं वायुसमन्वितः ।।" ( वा० रा० १।३६।१७ ) राजा सगर की पत्नी सुमति के उदर से एक तुम्बा निकला। उससे साठ हजार पुत्र निकले । धात्रियों ने पुत्रों को घृतकुम्भ में रखकर सबका पोषण किया था। फिर जब आजकल टेस्ट ट्यूब से बच्चे होने लगे हैं तब इन बातों पर क्यों अविश्वास करें । कौसल्यायन के कल्पित राम कहते हैं- "हम सोचने लगे कि क्या स्वयं विश्वामित्र भी ऐसी बातों में विश्वास कर सकते हैं। अथवा हमारा ही मनोरञ्जन करने के लिए, रास्ता कटने के लिए ऐसी चण्डूखाने की गप्पें हाँक रहे हैं।" परन्तु यह भी उनका प्रमाद ही है, क्योंकि वहाँ कहा गया है कि महाराज सगर ने अपनी दो पत्नियों के साथ भृगुप्रस्रवण गिरि पर सौ वर्ष तक तपस्या की । तप से आराधित होकर महर्षि भृगु ने वर प्रदान किया । पहली पत्नी ने एक वंशकर पुत्र माँगा। दूसरी ने ६० हजार पुत्र माँगे । इस तरह महर्षि के वर के प्रभाव के कारण होनेवाली उक्त घटना सत्य ही है । असम्भव जैसी कोई वस्तु नहीं है । योगसिद्ध महर्षियों के सङ्कल्प के अनुसार प्रकृति नियन्त्रित होती है । जैसे शुक्र के सूक्ष्मकण गर्भस्थ होकर मनुष्यादि रूप में व्यक्त होते हैं । अनेक बार एक साथ ही चार चार, पाँच पाँच सन्तानें भी पैदा हो जाती हैं । शूकरादि प्राणियों की दर्जनों सन्तानें एक समय में ही