भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 184

अध्याय बौद्धों द्वारा विकृत रामचरित १०७ । यथाहि चोरः स तथाहि बुद्धस्तथागतं नास्तिकमत्र विद्धि । तस्माद्धियः शक्यतमः प्रजानां स नास्तिके नाभिमुखो बुधः स्यात् ॥” (वा० रा० २।१०९।३३,३४) श्रीराम की इन बातों को सुनकर जाबालि ने कहा—"मैं नास्तिक नहीं हूँ। आप को वन से लौटाने के लिये इस प्रकार की बातें मैंने की हैं।" वसिष्ठ ने भी श्रीराम से कहा—'जाबालि लोक की गति, अगति को जानते हैं। नास्तिक नहीं हैं। आप को वन से निवृत्त करने के लिये ही इन्होंने वैसा कहा है।' बुद्धादि नास्तिक भी प्राचीन हैं। कई लोग बुद्ध और तथागत का नाम देखकर वाल्मीकिरामायण का निर्माण गौतम बुद्ध के पश्चात्कालीन मानते हैं, पर यह ठीक नहीं है, क्योंकि अवतार बुद्ध गौतम बुद्ध से भिन्न ही हैं। जैसे मुख्यलक्ष्मी गृहलक्ष्मी से भिन्न होती हैं वैसे ही बुद्ध भी गौतम बुद्ध से भिन्न हैं। बौद्धों के जातकों का भी यही मत है। लङ्कावतारसूत्र में लङ्कापति रावण को उपदेश करनेवाले भी एक बुद्ध थे। उसी ग्रन्थ में बुद्ध ने अपने पूर्व के अनेक बुद्धों की चर्चा की है। अतएव “द्वे सत्त्वे समुपाश्रित्य बुद्धानां धर्मदेशना ।” के अनुसार परमार्थ एवं संवृत सत्त्व स्वीकार करके ही बुद्धों की धर्मदेशना सिद्ध होती है। यहाँ ‘बुद्धानाम्’ यह बहुवचन निर्देश भी सिद्ध करता है कि बुद्ध अनेक हुए हैं। उन्हीं बौद्ध सिद्धान्तों का पुराणों में भी खण्डन है। भगवान् व्यास के सूत्रों में भी बौद्धमत और जैनमत का खण्डन है। एतावता भी व्यास और गौतम बुद्ध तथा महावीर से प्राचीन हैं। पाणिनि के सूत्र ‘पाराशर्यशिलालिभ्याम्’ (पा० सू० ४।३।११०) में व्यास की चर्चा है। महाभारत, गीता, ब्रह्मसूत्र आदि के रचयिता व्यास पाँच हजार वर्ष से भी अधिक पुराने हैं, यह कहा गया है। इसी तरह कौसल्यायन ने गङ्गा के गर्भ से धातुओं की उत्पत्ति पर भी अपना कुतर्क श्रीराम के ब्याज से उपस्थित किया है। वे कहते हैं—"यह धातुओं का वर्णन यों ही लालबुझक्कड़ों का वर्णन होगा। क्या कभी किसी के गर्भमल से धातुओं की उत्पत्ति हो सकती है ?” “उत्ससर्ज महातेजाः स्रोतोभ्यो हि तदानघ । यदस्या निर्गतं तस्मात्तप्तजाम्बूनदप्रभम् ।। काञ्चनं धरणीं प्राप्तं हिरण्यमतुलप्रभम् । ताम्रं कार्ष्णायसं चैव तैक्ष्ण्यादेवाभिजायत ।। मलं तस्याभवत्तत्र त्रपु सीसकमेव च। तदेतद् धरणीं प्राप्य नानाधातुरवर्धत ।। निक्षिप्तमात्रे गर्भे तु तेजोभिरभिरञ्जितम् । सर्वपर्वतसन्नद्धं सौवर्णमभवद् वनम् ।। जातरूपमिति ख्यातं तदाप्रभृति राघव ॥” (वा० रा० १।३७।१८-२२) प्रसङ्गानुसार शैव तेज को अग्नि ने धारण किया था। अग्नि से गंगा ने उसी तेज को धारण किया था। असह्य होने के कारण गङ्गा के द्वारा त्यक्त वही तेज पारद आदि धातुओं के रूप में परिणत हुआ था। नागेशभट्ट के अनुसार 'ईश्वर का तेज ही पारद है। उत्तम स्त्री के दर्शन से रसेश्वर पारद दो योजन पर्यन्त उच्छलित होकर