भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 183

१०६ रामायणमीमांसा पञ्चम करो, अन्नादि-दान करो, चान्द्रायणादि व्रत करो, संन्यास करो इत्यादि वैदिकाचार का प्रतिपादन करनेवाले वेदादि ग्रन्थों का निर्माण मेधावियों ने दानादि प्राप्त करने के लिए तथा देवताओं को वश में करने के लिए ही किया है। पामरों की प्रतारणा कर धनग्रहण करने का यह सब धन्धामात्र है। परलोक आदि कुछ भी नहीं है। प्रत्यक्ष को अपनाओ परोक्ष का त्याग करो।" तब ऐसी बातों को सुनकर राम ने कहा था—'आपका यह सब उपदेश कर्तव्य के तुल्य प्रतीत होनेवाला अकार्य ही है। पथ्य के तुल्य प्रतीत होने पर भी यह अपथ्य ही है। पापाचारसमन्वित निर्मर्याद पुरुष लोकायत उच्छृङ्खल आचार एवं उच्छृङ्खल दर्शन का अनुगामी होने के कारण सत्पुरुषों में संमान प्राप्त नहीं कर सकता है। वेदानुमत आचाररूप चरित्र ही प्राणी की कुलीनता या अकुलीनता, पवित्रता या अपवित्रता का प्रख्यापन करता है। जिसमें आचार होता है, वही कुलीन एवं पवित्र समझा जाता है। तद्विपरीत अकुलीन एवं अशुचि समझा जाता है। जो आपके उपदेश का अनुसरण करेगा वह आर्य के समान प्रतीत होनेपर भी अनार्य, पवित्रताहीन एवं दुःशील होने पर भी शुचि और शीलवान् जैसा प्रतीत होगा एवं अलक्षण होकर लक्षणवान् सा प्रतीत होगा। यदि मैं आपके द्वारा उपदिष्ट मार्ग का अनुसरण करूँगा एवं धर्मवेश से युक्त होकर शास्त्रोक्त शुभ कर्म को छोड़कर विधिवर्जित क्रिया करूँगा तो अशुभ स्थिति को ही प्राप्त होऊँगा। कार्य-अकार्य का विवेक रखनेवाला कौन समझदार लोकदूषण दुर्वृत्त का आदर करेगा। प्रतिज्ञाहीन वृत्ति का अनुसरण करने पर किस साधन से स्वर्गादि प्राप्त हो सकेगा। आपके द्वारा उपदिष्ट मार्ग का अनुसरण करने से मैं दुर्वृत्त बन जाऊँगा। राजा के दुर्वृत्त होने से प्रजा भी दुर्वृत्त हो ही जाती है। अतः सत्य और आनृशंस्य ही सनातन राजवृत्त है। सत्यात्मक राज्य सत्य में ही प्रतिष्ठित होता है। ऋषि एवं देवता सत्य का ही आदर करते हैं। सत्यवादी ही इस लोक और परलोक में अक्षय फल का भागी होता है। सत्य ही ईश्वर है, सत्य में ही धर्म प्रतिष्ठित है। सत्य से श्रेष्ठ कोई उत्कृष्ट पद नहीं है। सर्पतुल्य अनृतवादी से सबको उद्वेग होता है। दान, यज्ञ, तप, वेद सब सत्य में प्रतिष्ठित हैं। इसलिए सत्यपरायण होना चाहिये— “दत्तमिष्टं हुतं चैव तप्तानि च तपांसि च। वेदाः सत्यप्रतिष्ठानास्तस्मात् सत्यपरो भवेत् ॥” (वा० रा० २।१०९।१४) इस कर्मभूमि को प्राप्त कर शास्त्रोक्त कर्म ही करना चाहिये। सैकड़ों क्रतुओं, यज्ञों का अनुष्ठान करके ही शतक्रतु देवराज होकर त्रिदिव के आधिपत्य को प्राप्त हुए हैं। उग्र तप के द्वारा ही ऋषि लोग स्वर्ग गये हैं। सत्य, धर्म, भूतानुकम्पा एवं ब्राह्मण, देवता तथा अतिथियों की पूजा त्रिदिवप्राप्ति के मार्ग है।' अन्त में राम ने कहा—'मैं पिताजी के उस कर्म की निन्दा करता हूँ जिसमें उन्होंने धर्मविमुख विषम- बुद्धिवाले आप जैसे नास्तिक को अपना 'याजक' ऋत्विक् बनाया था। जैसे चोर दण्ड्य होता है वैसे ही बुद्ध आदि नास्तिक भी दण्ड्य हैं। आस्तिक ब्राह्मण को चाहिए कि ऐसे नास्तिकों के सम्मुख न हो, उनसे भाषणादि न करे। तथागत को नास्तिक ही समझना चाहिये। दण्ड देना शक्य हो तो नास्तिक को चोर के तुल्य दण्डित किया जाय, यदि ऐसा सम्भव न हो तो उससे भाषण आदि न किये जायें— “निन्दाम्यहं कर्म कृतं पितुस्तद् यस्त्वामगृह्लाद् विषमस्थबुद्धिम। बुद्धथानयेवंविधया चरन्तं सुनास्तिकं धर्मपथादपेतम् ॥