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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

१०६ रामायणमीमांसा पञ्चम करो, अन्नादि-दान करो, चान्द्रायणादि व्रत करो, संन्यास करो इत्यादि वैदिकाचार का प्रतिपादन करनेवाले वेदादि ग्रन्थों का निर्माण मेधावियों ने दानादि प्राप्त करने के लिए तथा देवताओं को वश में करने के लिए ही किया है। पामरों की प्रतारणा कर धनग्रहण करने का यह सब धन्धामात्र है। परलोक आदि कुछ भी नहीं है। प्रत्यक्ष को अपनाओ परोक्ष का त्याग करो।" तब ऐसी बातों को सुनकर राम ने कहा था—'आपका यह सब उपदेश कर्तव्य के तुल्य प्रतीत होनेवाला अकार्य ही है। पथ्य के तुल्य प्रतीत होने पर भी यह अपथ्य ही है। पापाचारसमन्वित निर्मर्याद पुरुष लोकायत उच्छृङ्खल आचार एवं उच्छृङ्खल दर्शन का अनुगामी होने के कारण सत्पुरुषों में संमान प्राप्त नहीं कर सकता है। वेदानुमत आचाररूप चरित्र ही प्राणी की कुलीनता या अकुलीनता, पवित्रता या अपवित्रता का प्रख्यापन करता है। जिसमें आचार होता है, वही कुलीन एवं पवित्र समझा जाता है। तद्विपरीत अकुलीन एवं अशुचि समझा जाता है। जो आपके उपदेश का अनुसरण करेगा वह आर्य के समान प्रतीत होनेपर भी अनार्य, पवित्रताहीन एवं दुःशील होने पर भी शुचि और शीलवान् जैसा प्रतीत होगा एवं अलक्षण होकर लक्षणवान् सा प्रतीत होगा। यदि मैं आपके द्वारा उपदिष्ट मार्ग का अनुसरण करूँगा एवं धर्मवेश से युक्त होकर शास्त्रोक्त शुभ कर्म को छोड़कर विधिवर्जित क्रिया करूँगा तो अशुभ स्थिति को ही प्राप्त होऊँगा। कार्य-अकार्य का विवेक रखनेवाला कौन समझदार लोकदूषण दुर्वृत्त का आदर करेगा। प्रतिज्ञाहीन वृत्ति का अनुसरण करने पर किस साधन से स्वर्गादि प्राप्त हो सकेगा। आपके द्वारा उपदिष्ट मार्ग का अनुसरण करने से मैं दुर्वृत्त बन जाऊँगा। राजा के दुर्वृत्त होने से प्रजा भी दुर्वृत्त हो ही जाती है। अतः सत्य और आनृशंस्य ही सनातन राजवृत्त है। सत्यात्मक राज्य सत्य में ही प्रतिष्ठित होता है। ऋषि एवं देवता सत्य का ही आदर करते हैं। सत्यवादी ही इस लोक और परलोक में अक्षय फल का भागी होता है। सत्य ही ईश्वर है, सत्य में ही धर्म प्रतिष्ठित है। सत्य से श्रेष्ठ कोई उत्कृष्ट पद नहीं है। सर्पतुल्य अनृतवादी से सबको उद्वेग होता है। दान, यज्ञ, तप, वेद सब सत्य में प्रतिष्ठित हैं। इसलिए सत्यपरायण होना चाहिये— “दत्तमिष्टं हुतं चैव तप्तानि च तपांसि च। वेदाः सत्यप्रतिष्ठानास्तस्मात् सत्यपरो भवेत् ॥” (वा० रा० २।१०९।१४) इस कर्मभूमि को प्राप्त कर शास्त्रोक्त कर्म ही करना चाहिये। सैकड़ों क्रतुओं, यज्ञों का अनुष्ठान करके ही शतक्रतु देवराज होकर त्रिदिव के आधिपत्य को प्राप्त हुए हैं। उग्र तप के द्वारा ही ऋषि लोग स्वर्ग गये हैं। सत्य, धर्म, भूतानुकम्पा एवं ब्राह्मण, देवता तथा अतिथियों की पूजा त्रिदिवप्राप्ति के मार्ग है।' अन्त में राम ने कहा—'मैं पिताजी के उस कर्म की निन्दा करता हूँ जिसमें उन्होंने धर्मविमुख विषम- बुद्धिवाले आप जैसे नास्तिक को अपना 'याजक' ऋत्विक् बनाया था। जैसे चोर दण्ड्य होता है वैसे ही बुद्ध आदि नास्तिक भी दण्ड्य हैं। आस्तिक ब्राह्मण को चाहिए कि ऐसे नास्तिकों के सम्मुख न हो, उनसे भाषणादि न करे। तथागत को नास्तिक ही समझना चाहिये। दण्ड देना शक्य हो तो नास्तिक को चोर के तुल्य दण्डित किया जाय, यदि ऐसा सम्भव न हो तो उससे भाषण आदि न किये जायें— “निन्दाम्यहं कर्म कृतं पितुस्तद् यस्त्वामगृह्लाद् विषमस्थबुद्धिम। बुद्धथानयेवंविधया चरन्तं सुनास्तिकं धर्मपथादपेतम् ॥

अध्याय बौद्धों द्वारा विकृत रामचरित १०७ । यथाहि चोरः स तथाहि बुद्धस्तथागतं नास्तिकमत्र विद्धि । तस्माद्धियः शक्यतमः प्रजानां स नास्तिके नाभिमुखो बुधः स्यात् ॥” (वा० रा० २।१०९।३३,३४) श्रीराम की इन बातों को सुनकर जाबालि ने कहा—"मैं नास्तिक नहीं हूँ। आप को वन से लौटाने के लिये इस प्रकार की बातें मैंने की हैं।" वसिष्ठ ने भी श्रीराम से कहा—'जाबालि लोक की गति, अगति को जानते हैं। नास्तिक नहीं हैं। आप को वन से निवृत्त करने के लिये ही इन्होंने वैसा कहा है।' बुद्धादि नास्तिक भी प्राचीन हैं। कई लोग बुद्ध और तथागत का नाम देखकर वाल्मीकिरामायण का निर्माण गौतम बुद्ध के पश्चात्कालीन मानते हैं, पर यह ठीक नहीं है, क्योंकि अवतार बुद्ध गौतम बुद्ध से भिन्न ही हैं। जैसे मुख्यलक्ष्मी गृहलक्ष्मी से भिन्न होती हैं वैसे ही बुद्ध भी गौतम बुद्ध से भिन्न हैं। बौद्धों के जातकों का भी यही मत है। लङ्कावतारसूत्र में लङ्कापति रावण को उपदेश करनेवाले भी एक बुद्ध थे। उसी ग्रन्थ में बुद्ध ने अपने पूर्व के अनेक बुद्धों की चर्चा की है। अतएव “द्वे सत्त्वे समुपाश्रित्य बुद्धानां धर्मदेशना ।” के अनुसार परमार्थ एवं संवृत सत्त्व स्वीकार करके ही बुद्धों की धर्मदेशना सिद्ध होती है। यहाँ ‘बुद्धानाम्’ यह बहुवचन निर्देश भी सिद्ध करता है कि बुद्ध अनेक हुए हैं। उन्हीं बौद्ध सिद्धान्तों का पुराणों में भी खण्डन है। भगवान् व्यास के सूत्रों में भी बौद्धमत और जैनमत का खण्डन है। एतावता भी व्यास और गौतम बुद्ध तथा महावीर से प्राचीन हैं। पाणिनि के सूत्र ‘पाराशर्यशिलालिभ्याम्’ (पा० सू० ४।३।११०) में व्यास की चर्चा है। महाभारत, गीता, ब्रह्मसूत्र आदि के रचयिता व्यास पाँच हजार वर्ष से भी अधिक पुराने हैं, यह कहा गया है। इसी तरह कौसल्यायन ने गङ्गा के गर्भ से धातुओं की उत्पत्ति पर भी अपना कुतर्क श्रीराम के ब्याज से उपस्थित किया है। वे कहते हैं—"यह धातुओं का वर्णन यों ही लालबुझक्कड़ों का वर्णन होगा। क्या कभी किसी के गर्भमल से धातुओं की उत्पत्ति हो सकती है ?” “उत्ससर्ज महातेजाः स्रोतोभ्यो हि तदानघ । यदस्या निर्गतं तस्मात्तप्तजाम्बूनदप्रभम् ।। काञ्चनं धरणीं प्राप्तं हिरण्यमतुलप्रभम् । ताम्रं कार्ष्णायसं चैव तैक्ष्ण्यादेवाभिजायत ।। मलं तस्याभवत्तत्र त्रपु सीसकमेव च। तदेतद् धरणीं प्राप्य नानाधातुरवर्धत ।। निक्षिप्तमात्रे गर्भे तु तेजोभिरभिरञ्जितम् । सर्वपर्वतसन्नद्धं सौवर्णमभवद् वनम् ।। जातरूपमिति ख्यातं तदाप्रभृति राघव ॥” (वा० रा० १।३७।१८-२२) प्रसङ्गानुसार शैव तेज को अग्नि ने धारण किया था। अग्नि से गंगा ने उसी तेज को धारण किया था। असह्य होने के कारण गङ्गा के द्वारा त्यक्त वही तेज पारद आदि धातुओं के रूप में परिणत हुआ था। नागेशभट्ट के अनुसार 'ईश्वर का तेज ही पारद है। उत्तम स्त्री के दर्शन से रसेश्वर पारद दो योजन पर्यन्त उच्छलित होकर

१०८ रामायणमीमांसा पञ्चम उसका अनुसरण करता है। आनन्दकन्दतन्त्र में भी ऐसा उल्लेख है। वही पारद विभिन्न योगों से त्रपु, सीसक, सुवर्ण आदि रूप में परिणत होता है।' यद्यपि सामान्य स्त्री-पुरुषों के शुक्र, शोणित से धातुओं का निर्माण सम्भव नहीं है; तथापि शिव-पार्वती का चमत्कार पृथक् ही है। शिव-शक्ति या प्रकृति-पुरुष सम्पूर्ण विश्व के हेतु हैं, चेतन और अचेतन सम्पूर्ण विश्व के कारण वे ही हैं। विद्युत्-प्रकाश की भी ठण्डे और गरम तार के योग से ही अभिव्यक्ति होती है। प्रकाशस्वरूप शिव हैं और विमर्शस्वरूप शक्ति हैं। सम्पूर्ण विश्व अग्नीषोमात्मक है। पारद, सुवर्ण आदि भी सब उसी के परिणाम हैं। इसी वैज्ञानिक दृष्टि- कोण की अभिव्यक्ति के लिये परम कारण शिव और शक्ति के संयोग के अनन्तर ही अग्नि और सोम का संसर्ग हुआ है। गङ्गा सोम का ही प्रतीक हैं। देवताओं की प्रार्थना से भगवान् शिव ने अपना तेज पृथिवी में निक्षिप्त किया । उससे गिरि-काननपूर्ण सम्पूर्ण पृथिवी तप्त हो उठी । तदनन्तर देवताओं ने अग्नि से प्रार्थना की कि तुम वायुसमन्वित होकर रौद्र तेज में प्रवेश करो । वही अग्नि से व्याप्त होकर श्वेत पर्वत हो गया। अग्नि पृथिवी का अभिमानी देवता है, अतः तेज के धारणार्थ पृथिवी में अग्नि का प्रवेश उचित ही था । वायुयुक्त अग्नि के द्वारा चालनपूर्वक प्रवेश से बद्ध होकर शिवधातु का श्वेत पर्वत रूप होना सङ्गत ही है। तेजःप्रवेश से उसी की महिमा से पावक एवं आदित्य के समान बनकर वह सुवर्णमय हो गया। ‘मम योनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम् ।' (गी० १४।३ ) इस गीता वचन में भगवान् ने कहा है कि महत् ब्रह्म मेरी प्रकृति ( योनि ) है। उसमें मैं गर्भाधान करता हूँ और उसी से सम्पूर्ण प्रपञ्च की उत्पत्ति होती है । ईश्वर का प्रकृति में गर्भाधान सामान्य स्त्री-पुरुषों जैसा नहीं होता; किन्तु प्रकृति में पुरुष का प्रतिबिम्बित होना ही गर्भाधान है। उसी के प्रभाव से जड़ प्रकृति भी चेतनान्वित होकर महदादि प्रपञ्च के निर्माण में सक्षम होती हैं। इस तरह जब प्रकृति पुरुष या शिव शक्ति से ही सम्पूर्ण विश्व की सृष्टि होती है तब पारद, स्वर्ण, रजत आदि की उत्पत्ति भी उन्हीं से होती है, इसमें सन्देह का अवसर ही नहीं है । "ततो देवाः पुनरिदमूचुश्चापि हुताशनम् । आविश त्वं महातेजो रौद्रं वायुसमन्वितः ।।" ( वा० रा० १।३६।१७ ) राजा सगर की पत्नी सुमति के उदर से एक तुम्बा निकला। उससे साठ हजार पुत्र निकले । धात्रियों ने पुत्रों को घृतकुम्भ में रखकर सबका पोषण किया था। फिर जब आजकल टेस्ट ट्यूब से बच्चे होने लगे हैं तब इन बातों पर क्यों अविश्वास करें । कौसल्यायन के कल्पित राम कहते हैं- "हम सोचने लगे कि क्या स्वयं विश्वामित्र भी ऐसी बातों में विश्वास कर सकते हैं। अथवा हमारा ही मनोरञ्जन करने के लिए, रास्ता कटने के लिए ऐसी चण्डूखाने की गप्पें हाँक रहे हैं।" परन्तु यह भी उनका प्रमाद ही है, क्योंकि वहाँ कहा गया है कि महाराज सगर ने अपनी दो पत्नियों के साथ भृगुप्रस्रवण गिरि पर सौ वर्ष तक तपस्या की । तप से आराधित होकर महर्षि भृगु ने वर प्रदान किया । पहली पत्नी ने एक वंशकर पुत्र माँगा। दूसरी ने ६० हजार पुत्र माँगे । इस तरह महर्षि के वर के प्रभाव के कारण होनेवाली उक्त घटना सत्य ही है । असम्भव जैसी कोई वस्तु नहीं है । योगसिद्ध महर्षियों के सङ्कल्प के अनुसार प्रकृति नियन्त्रित होती है । जैसे शुक्र के सूक्ष्मकण गर्भस्थ होकर मनुष्यादि रूप में व्यक्त होते हैं । अनेक बार एक साथ ही चार चार, पाँच पाँच सन्तानें भी पैदा हो जाती हैं । शूकरादि प्राणियों की दर्जनों सन्तानें एक समय में ही

अध्याय बौद्धों द्वारा विकृत रामचरित १०९ उत्पन्न होती हैं । पक्षियों से अण्डों के रूप में बच्चे उत्पन्न होकर गर्भ से बाहर ही पालित पोषित होते हैं । फिर अगर ६० हजार सन्तानें भृगु जैसे महर्षि के सङ्कल्प से सुरक्षित हो जायें तो आश्चर्य की बात ही क्या है ? पुनश्च जब वैदिक सिद्धान्त में प्रत्यक्ष और अनुमान के समान ही शब्द भी स्वतन्त्ररूप से प्रमाण है तब शब्द प्रमाण से सिद्ध पदार्थ में किसी आस्तिक की विप्रतिपत्ति ही क्यों होगी ? आज के वैज्ञानिक युग में तो ऐसी शङ्का ही उपहासास्पद है । कृत्रिम गर्भाधान और पोषण भी असम्भव नहीं है । आगे कौसल्यायन के काल्पनिक मिथ्या वासुदेव राम कहते हैं—"हमें यह भी बताया गया कि पृथ्वी को खोदने पर सगर-पुत्रों की चार ऐसे गजराजों से भेंट हुई जो पृथ्वी को अपने सिर पर उठाये हुए थे । हमें समझाया गया कि जब गजराज सिर हिलाते हैं तभी भूकम्प होता है । हम सोचने लगे कि पृथिवी तो हाथियों के सिर पर स्थित है, किन्तु स्वयं हाथी किस पर स्थित हैं ? हमें अपनी किसी शङ्का का सन्तोषजनक समाधान मुनि विश्वामित्र से सुनने को नहीं मिला ।” "यदा पर्वणि काकुत्स्थ विश्रमार्थं महागजाः । खेदाच्चालयते शीर्षं भूमिकम्पस्तदा भवेत् ॥” ( वा० रा० १।४०।१५ ) परन्तु यह शङ्का अविवेकमूलक ही है; क्योंकि वहाँ पर आकर्षिणी, विकर्षिणी, धारिणी, पोषणी शक्ति- विशिष्ट चेतन ही गजेन्द्र के रूप में पृथिवी को धारण करते हैं और वे स्वयं स्वप्रकाश स्वप्रतिष्ठ भगवान् में ही प्रतिष्ठित होते हैं । परस्पर आकर्षण से स्थिति आधुनिक लोगों को भी मान्य है । गणपति भगवान् का भी गजानन प्रतीक गणपति अथर्वशीर्ष आदि में वर्णित है । भूमि के भी भीतर होनेवाली रासायनिक प्रक्रिया एवं तन्मूलक विस्फोट आदि भी उन्हीं शक्तियों के परिणाम हैं । प्रतिक्रिया के अनन्तर होनेवाली शान्ति ही उनका उद्देश्य है । इसी तरह कौसल्यायन के राम ने इन्द्र और अहल्या की चर्चा की है । उन्होंने कहा—"गौतम के शाप से अहल्या पत्थर की हो गयी थी । मेरे चरणस्पर्श से वह पूर्ववत् पुनः जीवित हो गयी । ऐसा कहनेवाले के मन में स्त्रीजाति के लिए तनिक भी आदर भाव नहीं रहा होगा । ऐसा कहनेवाले ने स्त्रीजाति के साथ मेरा भी निरादर किया है ।” परन्तु यह मिथ्या ही है । वाल्मीकिरामायण में राम ने वैसा कुछ भी नहीं कहा है । हाँ, वाल्मीकि के राम ने लक्ष्मण के साथ मुनि-पत्नी का चरणस्पर्श किया, यह ठीक है— "राघवौ तु तदा तस्याः पादौ जगृहतुर्मुदा ।” ( वा० रा० १।४९।१७ ) पर साथ ही राम के स्पर्श से वह शापमुक्त हुई और अनेक सहस्रवर्ष तक वायुभक्षण करती हुई निराहार और भस्मशायिनी होकर तप करती रही । यह सब साधारण लोक से विलक्षण बातें तो थीं ही— "इह वर्षसहस्राणि बहूनि निवसिष्यसि । वातभक्षा निराहारा तप्यन्ती भस्मशायिनी ॥” ( वा० रा० १।४८।२९,३० ) अहल्या ने समाहित होकर अर्घ्य, पाद्य आदि से श्रीराम का पूजन किया । महातेजा गौतम ने भी आकर राम की विधिवत् पूजा की— "गौतमोऽपि महातेजा अहल्यासहितः सुखी । रामं सम्पूज्य विधिवत्तपस्तेपे महातपाः ॥” ( वा० रा० १।४९।२१,२२ )

११० रामायणमीमांसा पञ्चम इससे राम की पूज्यता आदि विशेषताएँ स्पष्टतया विदित होती हैं। अतः किसी कल्प की कथा में अहल्या पाषाण भी हो गयी होगी। जब कि राम ईश्वरावतार हैं ही तब उनके चरणस्पर्श से पापयुक्त गौतमपत्नी का शाप- मुक्त होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। अतएव श्रीव्यासदेव के रामाश्रमेध आदि ग्रन्थों में अनेक ऋषियों ने राम को प्रणाम आदि किया ही है। आगे कौसल्यायन के राम वसिष्ठ और विश्वामित्र के सङ्घर्ष की चर्चा करते हुए कहते हैं—"जब विश्वामित्र द्वारा बलात् कामधेनु ले जाने के लिए सेना का प्रयोग किया गया तब वसिष्ठ ने कामधेनु से कहा कि ऐसी सेना उत्पन्न करो जो विश्वामित्र को परास्त कर सके । कामधेनु ने दिव्य शक्ति से पहले शक, काम्बोज तथा यवन आदि जातियों के सैनिकों को उत्पन्न किया। उनकी सहायता से पराजित होकर विश्वामित्र ने कहा कि ब्रह्मबल ही श्रेष्ठ बल है। उसके मुकाबले में क्षत्रियबल तुच्छ है। यदि आपस के कलह में विदेशियों की सहायता लेकर विजय प्राप्त करना ही ब्रह्मबल है, तो क्या ऐसे ब्रह्मबल को भी धिक्कार नहीं है ?" परन्तु यह भी कुचोद्य ही है, क्योंकि प्रकृत में विदेशी सहायता का कोई प्रसङ्ग ही नहीं है। वहाँ तो स्पष्ट है कि कामधेनु ने ही कहा था—"मुझे राजकर्मचारी दण्डित कर रहे हैं, मैंने क्या अपराध किया जो आपने मुझे त्याग दिया ।” ब्रह्मर्षि ने कहा—"मैं नही त्याग रहा हूँ। वह राजा है, उसके समान मेरे पास बल नहीं है।" कामधेनु ने कहा—"आपके बल के सामने उस राजा का कुछ भी बल नहीं है। ब्रह्मतेजसम्पन्न आप मुझे आज्ञा दें तो मैं विश्वामित्र के बल और दर्प को नष्ट कर सकती हूँ।" इस प्रकार कामधेनु की प्रार्थना पर ही वसिष्ठ ने उसे सेनानिर्माण का आदेश दिया था। सुरभि ने वसिष्ठ के ब्रह्मबल के सहारे अपनी शक्ति से पल्लव, शक आदि का निर्माण किया था। किसी विदेशी से सहायता प्राप्त नहीं की थी। विश्वामित्र के बल से उस बल के नष्ट हो जाने पर पुनः वसिष्ठ ने आज्ञा दी। तब पुनः सुरभि ने हुङ्कार से सूर्यतुल्य काम्बोजों का निर्माण किया, अपने ऊधस् से शस्त्रपाणि बर्बरों का निर्माण किया, योनिदेश से यवनों का निर्माण किया, गोमय के स्थान से शकों की उत्पत्ति की एवं रोमकूपों से म्लेच्छ आदि की उत्पत्ति कर विश्वामित्र के बल को नष्ट कर दिया— “तस्या हुङ्कारतो जाताः काम्बोजाः रविसन्निभाः । ऊधसश्चाथ सम्भूता बर्बराः शस्त्रपाणयः ॥ योनिदेशाच्च यवनाः शकृद्देशाच्छकाः स्मृताः । रोमकूपेषु म्लेच्छाश्च हारीताः सकिरातकाः ॥” (वा० रा० १।५५।२,३.) वस्तुतः कौसल्यायन वेदों, शास्त्रों तथा महर्षियों के यौगिक चमत्कारों में विश्वास नहीं रखते । अतएव- उन्हें विदेशी सहायता की बात ही सूझी। फिर, जब स्वयं विश्वामित्र ने ही अपने महान् बल को वसिष्ठ के ब्रह्मबल से तुच्छ समझा है, तब दूसरे की विपरीत कल्पना का मूल्य ही क्या है ? जनकसुता जानकी के सम्बन्ध में वे अपनी अटकल लगाते हैं—"वह राजा जनक को हल चलाते समय खेत में मिल गयी थी। पृथ्वीपुत्र तो हम सभी हैं, किन्तु क्या बिना माता-पिता के संयोग से मात्र पृथिवी से किसी की उत्पत्ति हुई है ? अतः उसके यथार्थ माता-पिता अज्ञात रहे होंगे।" यह भी कथन मिथ्या ही है; क्योंकि वाल्मीकिरामायण में राम ने ऐसा कोई विचार प्रकट नहीं किया है। श्रीराम परम आस्तिक थे। उन्हें शास्त्रों में विश्वास था। देवताधिकरण के अनुसार स्थूल पृथ्वी से अतिरिक्त उसकी एक दिव्य अधिष्ठात्री शक्ति देवता भी शास्त्रप्रमाण बल से सिद्ध है। सीता उसी की पुत्री थी।

अध्याय बौद्धों द्वारा विकृत रामचरित १११ सामान्य लोगों की उत्पत्ति में द्यौ, पर्जन्य, भूमि, पुरुष और स्त्री इन पाँच अग्नियों की अपेक्षा होती है। द्रोण स्त्रीनिरपेक्ष चार अग्नियों से ही उत्पन्न हुए थे। सीता, द्रौपदी, धृष्टद्युम्न आदि की उत्पत्ति माता-पिता की अपेक्षा न रखकर तीन ही अग्नियों से हुई थी। दृष्ट ही माननेवाला प्रत्यक्षप्रामाण्यवादी चार्वाक होता है। उसकी दृष्टि में प्रत्यक्ष से भिन्न कोई प्रमाण नहीं है। परन्तु बुद्ध ने अनुमान प्रमाण को भी स्वीकार किया है। बौद्ध तो बुद्ध को सर्वज्ञ मानकर उनके वचनों को भी प्रमाण मानते हैं। पर जब हम सब में कोई सर्वज्ञ नहीं होता तो बुद्ध को ही सर्वज्ञ क्यों माना जाय ? यदि बुद्ध में अन्य लोगों की अपेक्षा विलक्षणता मान्य है तो सीता और राम के सम्बन्ध में भी शास्त्रोक्त विलक्षणता क्यों न मान्य हो । कौसल्यायन के कल्पित राम कहते हैं—"मेरे सामर्थ्य को बढ़ा चढ़ा कर दिखाने के लिए उस धनुष का भी ऐसा वर्णन किया गया है कि पाँच हज़ार मनुष्यों द्वारा लायी गयी पेटिका में वह धनुष रखा था, यह वर्णन अयथार्थ है ।" पर वस्तुतः मिथ्या वासुदेव का यह कथन ही अयथार्थ है, क्योंकि लाखों वर्ष पुरानी घटना जानने में भी तो प्रमाण की अपेक्षा होती है। वाल्मीकि के राम ने ऐसा कुछ भी नहीं कहा है। उनके नाम पर मिथ्या कल्पना करनेवाले बौद्ध भिक्षु कौसल्यायन ने साधारण नैतिकता को भी तिलाञ्जलि दे दी है। शिव एवं विष्णु के धनुष को सर्वसाधारण धनुष जैसा नहीं कहा जा सकता । कौसल्यायन के अनुसार—"मेरा इरादा उसे तोड़ने का नहीं था, वह यूँ ही टूट ही गया ।” यह कथन भी निष्प्रमाण होने से मिथ्या है । अयोध्याकाण्ड में भी इसी तरह वाल्मीकिरामायण के नाम पर मिथ्या कल्पित कौसल्यायन के राम ने अनर्गल प्रलाप किया है। वे कहते हैं—"मेरे बारे में कहा गया है कि मैं साक्षात् विष्णु था और परम प्रचण्ड रावण के वध की अभिलाषा रखनेवाले देवताओं की प्रार्थना पर मनुष्यलोक में अवतीर्ण हुआ था। पर इस कथन से मेरा वास्तविक रूप प्रच्छन्न हो गया है। एक तरफ मुझे विष्णु कहा गया, दूसरी तरफ मैं स्वर्ग की आशा से धर्म का पालन करता हूँ ।" यह भी काल्पनिक ही राम का कहना है, वास्तविक राम का नहीं । अतएव ऐसी वस्तुओं को राम- कहानी का रूप देना पाखण्ड से सत्य को ढँकनामात्र है और पूर्वप्रतिज्ञा के विरुद्ध ही है । पीछे कहा गया है कि वाल्मीकि ने सत्य सत्य बातें कही हैं; पर अब वाल्मीकि की बातों को झुठलाने का निरर्थक यत्न किया जा रहा है— "स हि देवैरुदीर्णस्य रावणस्य वधार्थिभिः । अर्थितो मानुषे लोके जज्ञे विष्णुः सनातनः ॥" ( वा० रा० २।१।७ ) इस वाल्मीकिवचन से स्पष्ट ही राम का विष्णु होना सिद्ध है और यह श्लोक क्षेप भी नहीं है। तभी मिथ्या वासुदेव को इसका विरोध करना पड़ा । इसी प्रकार अनेक मिथ्या कल्पनाएँ जो वाल्मीकि के राम ने कभी भी नहीं सोची थीं उन्हीं के नाम से निर्लज्ज कौसल्यायन ने उठायी हैं । राजा दशरथ वेदादि शास्त्रों के अनुयायी एवं वेदोक्त धर्म के पालक थे । सत्यप्रतिज्ञ थे । कैकेयी को प्रदत्त दो वरदानों का पालन करना अपना कर्तव्य समझते थे । अतएव कौसल्यायन का यह प्रलाप निरर्थक ही है कि “यह कैसा धर्मबन्धन था। क्या यह सरासर मूर्खता का बन्धन नहीं था। कैकेयी के मोहपाश में बँधे हुए मेरे पिता धर्मबुद्धि से सर्वथा हाथ धो बैठे थे, क्योंकि बिना यह जाने कि वह क्या वर माँगेगी, दुष्टा कैकेयी को उन्होंने वरदान दे दिया था। उनकी दृष्टि में उस वरदान का तो मूल्य था, किन्तु अपनी सारी प्रजा को उन्होंने जो सूचना दी थी कि ज्येष्ठ पुत्र होने के कारण मैं राजगद्दी पर बैठाया जाऊँगा, उस बचन का कुछ भी मूल्य न था ।”

११२ रामायणमीमांसा पञ्चम वेदादिशास्त्रविमुख बौद्ध भिक्षु को यह नहीं विदित हो सका कि ज्ञानपूर्वक की गयी प्रथम प्रतिज्ञा के विरुद्ध होने से तदुत्तरकालीन विचारों का कोई मूल्य नहीं होता । इसके अतिरिक्त प्रजा के सामने कोई प्रतिज्ञा की बात भी नहीं थी । राम को राजगद्दी देने का विचार महाराज का ही था । उन्होंने उसी सम्बन्ध में प्रजा की सम्मति प्राप्त की थी । किं बहुना इस बौद्ध की रामकहानी में भूल से ही कोई एकाध बात सत्य होगी । प्रायः सबकी सब बातें मनगढन्त मिथ्या दुष्कल्पनाएँ ही प्रभूत हैं। जो वाल्मीकिरामायण में नहीं है, उसकी कल्पना की गयी है और रामायण में उक्त बातों को झुठलाया गया है। फिर भी झूठ के आधार पर कहा गया है कि यह वाल्मीकि के अनुसार है। मिथ्या वासुदेव के मुख से कहलाया गया है कि "मुझसे भी गलती हो गयी जो मेरे पिता ने की थी, बिना यह जाने कि पिता मुझे क्या कहना चाहते हैं और सचमुच कहना चाहते हैं या नहीं मैंने कैकेयी को कह दिया कि मैं प्रतिज्ञा करता हूँ राजा को जो अभीष्ट है उसे मैं पूर्ण करूँगा। राम एक ही बात कहनेवाला है इत्यादि ।" वस्तुतः इससे बढ़कर क्या दुष्टता होगी कि परम पितृभक्त एवं सत्यनिष्ठ राम के द्वारा अनार्य शब्द कहलवाया जाय क्या इसी तरह बुद्ध की कथाओं में भी मनमानी कल्पना करना इस नास्तिक को अभीष्ट होगा ? बुद्ध स्वयं अहिंसा एवं सत्य के पुजारी नहीं थे । वे एवं उनके प्रमुख शिष्य वाममार्गी थे, क्या इस कल्पना का प्रतिरोधक कोई प्रमाण उस नास्तिक के पास है ? वाल्मीकिरामायण के अनुसार जाबालि ने नास्तिकमत का आश्रयण कर राम को वनसे लौटाने का प्रयत्न किया था, किन्तु राम ने उसे धर्मविरुद्ध कहकर तथागत बुद्ध आदि नास्तिकों को चोर के समान दण्डनीय कहा, किन्तु वाल्मीकिरामायण में भी स्पष्ट उल्लेख रहने पर भी निन्दा करते हुए कौसल्यायन के कल्पित मिथ्या वासुदेव कहते हैं- "मैं उसके प्रस्ताव से क्यों सहमत न हो सका । इसका कारण मैंने न उसपर प्रकट किया, न किसी अन्य पर, किन्तु मैंने देखा जाबालि के तर्क बड़े जोरदार थे" पर यह निराधार ही है। जो बात राम ने जाबालि को नहीं बतायी, उसका ज्ञान कौसल्यायन को कैसे हो गया ? जाबालि ने बौद्ध मत का समर्थन किया था। इसी लिए बड़ी तत्परता से कौस- ल्पायन ने जाबालिप्रोक्त बौद्धमत का विवरण बड़े चाव से दिया है--"ऋतुमती माता के द्वारा गर्भ में धारण किया हुआ वीर्य और रज का परस्पर संयोग ही पुरुष के जन्म का वास्तविक कारण होता है। पिता तो एक निमित्त मात्र है। यदि यहाँ दूसरे का खाया हुआ अन्न दूसरे के शरीर में चला जाता हैं तो परदेश में जानेवालों के लिए श्राद्ध ही कर देना चाहिए। उन्हें मार्ग का भोजन (पाथेय) देना उचित नहीं। जाबालि की बातें काफी बुद्धिसङ्गत थीं, किन्तु मैं भरत या जाबालि के कहने से अयोध्या वापिस चलने की तैयारी कर लेता तो अभी तक मैंने जो सुयश कमाया था, वह सारा धूल में मिल जाता ।" पर यदि जाबालि की बातें काफी तर्कपूर्ण थीं तो बौद्ध मत भी टिक नहीं सकता; क्योंकि बौद्ध मत में भी इस लोक में किये गये शुभाशुभ कर्मों का फल जन्मान्तर में मान्य है। दूसरों की सेवा करने के लिए, दुःख दूर करने के लिए धन, सम्पत्ति तथा प्राण देनेवाले प्रशंसनीय होते हैं। अतः लङ्कावतारसूत्र आदि बौद्ध ग्रन्थकारों को परलोक मानना ही पड़ा था। यदि यह ठीक है, तब तो पित्रादि के उद्देश्य से ब्राह्मणादि को भोजन कराने का भी उत्तम परिणाम पित्रादि को प्राप्त हो ही सकता है। कौसल्यायन के मिथ्या वासुदेव कहते हैं- "किसी वाल्मीकि ने मेरे मुख में यह बात डाल दी है।" वस्तुतः डाल नहीं दी, राम के समकालीन वाल्मीकि ने आर्ष दृष्टि से सत्य घटना को जानकर ही लिखा है। श्रीराम ने कहा-"आपकी बुद्धि विषम मार्ग में स्थित है। आप वेदविरुद्ध मार्ग पर आरूढ़ हैं। आप घोर नास्तिक और धर्म के मार्ग से दूर हैं। ऐसी पाखण्डी बुद्धि के द्वारा अनुचित विचार का प्रचार करनेवाले आपको पिताजी ने अपना याजक बनाया। उनके उस कार्य की मैं निन्दा करता हूँ।" श्रीराम ने जाबालि से यह भी कहा कि आपमें और

अध्याय बौद्धों द्वारा विकृत रामचरित ११३ चोर में कोई अन्तर नहीं है और तथागत को नास्तिक जानो । इसलिए जनता हित की दृष्टि से नास्तिक को मुख न लगाये, उसका मुख न देखे । पर इस वाल्मीकिप्रोक्त सत्य बात को झुठलाने का प्रयत्न करते हुए मिथ्या वासुदेव कहते हैं—"मैंने कभी किसी के बारे के ऐसे हल्के शब्दों का प्रयोग नहीं किया । गौतम बुद्ध का धर्म बुद्धिप्रधान था । वे वेद को ही सत्यविद्याओं का भण्डार नहीं मानते थे । किसी वर्णविशेष को अन्य वर्णों की अपेक्षा श्रेष्ठ नहीं मानते थे और वे किसी तथाकथित ईश्वर को सृष्टि का रचयिता नहीं मानते थे; लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वह शुभाशुभ कर्म और उनसे मिलनेवाले फल को न माननेवाले नास्तिक थे । यह जो मेरे मुँह में डाला गया है कि जो दण्ड चोर को दिया जाता है, वही नास्तिक को दिया जाय और उसकी शक्ल न देखी जाय । यह मेरे प्रति सरासर अन्याय है ।” वस्तुतः अन्याय तो यह है जो परम्परा से प्रचलित रामायण के राम द्वारा कही हुई बातों को झुठलाने का प्रयास किया जा रहा है । जब मनु वेदनिन्दक को स्पष्ट ही नास्तिक कहते हैं— “नास्तिको वेदनिन्दकः ।” ( म० २।११ ) तब वेदनिन्दक बुद्ध को राम नास्तिक क्यों न कहते ? जब कोई सृष्टिरचयिता ईश्वर बुद्ध को मान्य नहीं, तो कर्मफलदाता भी कौन हो सकता है ? जीव अल्पज्ञ है, कर्म स्वयं जड़ है । फिर फलदाता कौन होगा ? वस्तुतः परमेश्वर ही अनन्त ब्रह्माण्ड के अनन्त प्राणियों के शुभाशुभ कर्मों का वेदादि शास्त्रों के अनुसार निर्णयकर फल देते हैं—इस तथ्य को झुठलानेवाले बुद्ध नास्तिक ही हैं। कौसल्यायन के मिथ्या राम ने ठीक वाल्मीकि के वास्तविक राम से विपरीत मत व्यक्त किया और उन्होंने कहा— "निःसंदेह मुझे इस बात पर विचार करना चाहिए था कि राजा ने मुझसे स्वेच्छा से वनगमन के लिए आज्ञा नहीं दी थी । वे तो मात्र माता कैकेयी द्वारा ठगे गये थे । ऐसी आज्ञा का पालन न बुद्धिगम्य था, न आत्महितसाधक था तथा न परहितसाधक ही था । तब भी उस समय मेरी यही धारणा थी कि पिता के वचनों को, चाहे जैसी भी परिस्थिति में मुँह से निकले हों, शिरोधार्य करना चाहिये ।” इसका अर्थ यह है कि उस समय राम का निर्णय भ्रान्तिपूर्ण था, परन्तु ऐसी कल्पना भी निष्प्रमाण ही है । कौसल्यायन के मिथ्या राम की धारणाओं तथा अनर्गल प्रलापों से परिपूर्ण 'राम की कहानी राम की जबानी' से कौसल्यायन ने बौद्धमत में रहे सहे विश्वास को भी नष्ट कर दिया है । यद्यपि विभिन्न कथनों के अन्त में वाल्मीकिरामायण के कुछ श्लोक दिये गये हैं; परन्तु वह केवल धोखा है । शास्त्र एवं धर्म के विपरीत जो कुछ श्रीराम के नाम पर कौसल्यायन ने कहा है, वह सब अत्यन्त निर्मूल है । “अनसूया स्वयं शिथिल अङ्गवाली वृद्धा थी । बुढ़ापे के कारण उसके बाल सफेद हो गये थे । वह प्रवात में कदली के तुल्य कांपती थी । उसने सीता को दिव्य माल्य, आभरण एवं अङ्गराग कहाँ से दिये ?” यह कौसल्यायन के कल्पित राम की समझ में नहीं आता । परन्तु वाल्मीकि के राम का तो ऋषियों के तपोबल पर विश्वास है । उस तपस्विनी ने अपने तपोबल से ही वैसी वस्तुएँ सीता को प्रदान की थीं । यही क्यों, भरद्वाज भी तो अकिञ्चन मुनि ही थे; परन्तु उन्होंने भरत का जो स्वागत किया था, क्या वह किसी सम्राट् के यहाँ भी सम्भव है ? अरण्यकाण्ड में कौसल्यायन के कल्पित राम कहते हैं— "वह राक्षस मेरे हाथ से मारा गया, इसलिए स्वर्ग गया; पर ऐसे लोगों का मैं क्या करूँ, जो किसी की पत्नी को उठा ले जानेवाले राक्षस के भी स्वर्ग जाने में विश्वास करते हैं ।” परन्तु यह भी सोचना चाहिये कि अन्त में किसी भी पाप का प्रायश्चित्त तो होता ही है । विशेषतः राजदण्ड के द्वारा किसी भी पाप की निवृत्ति धर्मशास्त्रों को मान्य ही है । जैसे पापों के निवृत्यर्थ अन्यान्य प्रायश्चित्त मान्य हैं वैसे ही राजदण्ड भी एक महान् प्रायश्चित्त मान्य है ही । श्रीराम तो साक्षात् परब्रह्म हैं। उनके नामोच्चारणमात्र से प्राणियों के सब पाप निवृत्त होते हैं । फिर जिसको साक्षात् श्रीराम का दर्शन हो जाय और उनके द्वारा स्पृष्ट बाणों से जिसका वध हो उसके कल्याण में संशय की कोई बात ही नहीं उठ सकती है । १५

११४ रामायणमीमांसा पञ्चम कौसल्यायन के राम कहते हैं- "उस समय तो मैंने सीता के गले यह बात उतार दी थी कि महर्षि लोग यद्यपि शाप से राक्षसों को भस्म कर सकते हैं; किन्तु वे ऐसा इसलिये नहीं करते कि ऐसा करने से उनका तप क्षीण हो जा सकता है । किन्तु अब मैं सोचता हूँ कि यदि शाप देने से ऋषियों और मुनियों का तप क्षीण हो सकता था तो क्या हम दोनों भाइयों के हाथ से राक्षसों का वध कराने में उनका तप क्षीण नहीं हुआ होगा ?” यद्यपि यह शङ्का राम को नहीं हो सकती थी, क्योंकि वे सर्वज्ञ तथा शास्त्रज्ञ भी थे । तथापि कौसल्यायन के कल्पित राम तो शास्त्रसम्बन्धशून्य होने से वैसी अनर्गल शङ्का कर सकते हैं। न्यायाधीश के द्वारा दिया गया मृत्युदण्ड अपराधी और संसार के कल्याण का हेतु होता है; परन्तु वही मृत्युदण्ड यदि कोई अन्य देता है तो उसे पाप का भागी होना पड़ता है । इस तरह एक क्षत्रिय राजा, जिसका अपराधियों, अन्यायियों को दण्ड देना धर्म है, यदि राक्षसों का वध करता है तो उसमें तपःक्षय का कोई प्रश्न ही नहीं उठता । कौसल्यायन के कल्पित राम कहते हैं- “अगस्त्य मुनि की स्त्रियों के बारे में बहुत ही बुरी राय थी । .........परन्तु मेरा तो अनुभव मुनि के अनुभव से सर्वथा भिन्न था ।” यह भी निष्प्रमाण है। अपने दुविचारों को राम पर आरोपित करना पाप है। वस्तुतस्तु उक्त प्रसङ्ग में अगस्त्य मुनि ने सीता की प्रशंसा करते हुए साधारण स्त्रियों का स्वभाव बतलाया था । यह सुकुमारी भर्तृस्नेह से प्रेरित होकर राज्य-सुख त्यागकर दोषों से पूर्ण वन में आयी है । तुम्हारा अनुसरण करके इसने दुष्कर कर्म किया है। आम तौर पर स्त्रियाँ अच्छी अवस्था में पति का अनुसरण करती हैं और आपत्तिदशा में उसे त्याग देती हैं। स्त्रियाँ विद्युत् के चाञ्चल्य और शस्त्रों की तीक्ष्णता एवं गरुड़ तथा अनिल की शीघ्रता का अनुसरण करती हैं। परन्तु यह तुम्हारी भार्या सीता इन दोषों से विवर्जित, श्लाघ्या तथा देवियों में अरुन्धती के समान प्रशंसनीय है। श्रीराम यह सुनकर बहुत प्रसन्न हुए थे— “एषा च सुकुमारी च खेदेश्च न विमानिता । प्राज्यदोषं वनं प्राप्ता भर्तृस्नेहप्रचोदिता ॥ यथैषा रमते राम इह सीता तथा कुरु । दुष्करं कृतवत्येषा वने त्वामभिगच्छती । एषा हि प्रकृतिः स्त्रीणामासृष्टे रघुनन्दन । समस्थमनुरज्यन्ते विषमस्थं त्यजन्ति च ॥ शतह्रदानां लोलत्वं शस्त्राणां तीक्ष्णतां यथा । गरुडानिलयोः शैघ्यमनुगच्छन्ति योषितः ॥ इयं तु भवतो भार्या दोषैरेतैर्विवर्जिता । श्लाघ्या च व्यपदेश्या च यथा देवेष्वरुन्धती ॥” (वा० रा० ३।१३।३-७) “रावण ने सीता को दोनों भुजाओं में आबद्ध कर लिया (पृ० १०५)” यह अशुद्ध अनुवाद है। श्लोक निम्नोक्त है— “वामेन सीतां पद्माक्षीं मूर्धजेषु करेण सः। ऊर्वोस्तु दक्षिणेनैव परिजग्राह पाणिना ॥” (वा० रा० ३।४९।१७ ) रथ पर बैठाने के लिए रावण ने वाये हाथ से सीता के बालों का और दक्षिण हाथ से सीता के दोनों ऊरुओं के पश्चिम भाग को ग्रहण किया था। श्रीराम परब्रह्म परमेश्वर होने पर भी रावण के वधार्थ मनुष्यरूप में प्रकट हुए थे । और उसी प्रसङ्ग में मानवरूप मानवलीलाओं का अनुसरण उन्होंने किया था। तथा च पत्नी के वियोग में सामान्य मनुष्यों के जैसे शोक एवं सन्ताप उन्हें हुए थे ।

अध्याय बौद्धों द्वारा विकृत रामचरित ११५ “राम देखि नर चरित तुम्हारे । बुध हरषहिं जड़ होहिं दुखारे ।” ( रा० मा० २।१२५।८ ) अकम्पन, मारीच आदि राक्षसों ने भी श्रीराम की ब्रह्मरूपता का अनुभव किया था। फिर भी बौद्ध एवं जैन प्रायः बहिर्मुखों को राम में लौकिकता ही परिलक्षित होती है । किष्किन्धाकाण्ड में लौकिक नरलीला का ही अनुसरण करते हुए श्रीराम ने सीता के विरह में व्याकुल होकर मानव-लीला व्यक्त की है । वालिवध पर वाली ने जो श्रीराम पर आक्षेप किया, श्रीराम ने उसका समाधान कर दिया और स्वयं वाली ने अपना अपराध एवं श्रीराम की निर्दोषता मान ली । फिर भी कौसल्यायन के कल्पित राम कहते हैं—"उस समय जो मैंने वाली को उत्तर दिया, उससे आज मेरा ही समाधान नहीं होता है। यदि किसी अपराध का दण्ड दिया जाता है तो उसपर पहले आरोप लगाया जाता है । उसे अपने आपको निर्दोष करने का अवसर दिया जाता है । यदि वह अपने को निर्दोष न सिद्ध कर सके तभी उसे राजदण्ड दिया जाता है। यह कैसा राजदण्ड था कि मैंने वाली को छिपकर मार डाला था ।” परन्तु यह कुतर्क निर्मूल है, कारण कि जहाँ न्यायाधीश दण्डदाता को अपराध का निश्चय न हो, वहीं यह नियम होता है। मरकर प्राणी यमराज के वश में जाकर दण्डस्थान में भेज दिया जाता है। वहाँ उसके पाप का लेखा-जोखा तथा सूर्य, चन्द्र, दिन, रात आदि कर्म के साक्षी भी विद्यमान रहते हैं। यहाँ भी राम ने उसके अपराध का निश्चय करके ही दण्ड दिया। वाली के पूछने पर राम ने बता भी दिया था और वाली इसपर निरुत्तर भी हो गया था। फिर दूसरे को शङ्का उठाने का अवकाश ही कहाँ ? श्रीराम ने कहा था—सुग्रीव के साथ मेरी मित्रता है । मैंने उसका राज्य और स्त्री दिलवाने की प्रतिज्ञा की है। शङ्कापक्षी के राम कहते हैं—"यह समाधान लाचारी का था, क्योंकि ऐसी प्रतिज्ञा ही क्यों की। यह प्रतिज्ञा स्वार्थमूलक थी । सीता की तलाश में मदद करने के कारण वह प्रतिज्ञा थी ।” परन्तु यह भी कुचोद्य कुकल्पना व्यर्थ ही है, क्योंकि एक मित्र दूसरे मित्र का हित करता है। परस्पर उपकार करना ही मित्रता का स्वरूप है। इसमें अनौचित्य का प्रश्न ही नहीं उठता । विचार केवल यह होना चाहिये कि वाली ने सुग्रीव के साथ अन्याय किया था या नहीं। उसकी स्त्री तथा सम्पत्ति का हरण किया था कि नहीं । यदि किया था तो उसको दण्ड देना किसी प्रकार भी अनुचित नहीं कहा जा सकता । मित्र का शत्रु शत्रु होता है, यह नीति भी ठीक ही है। इसके बिना कोई भी शासन सुस्थिर रह ही नहीं सकता । कौसल्यायन कहते हैं— "मृगया करनेवाले लोग सावधान, असावधान, विमुख तथा भागनेवाले मृगों को भी मारते हैं। ऐसा करने पर भी उनको दोष नहीं लगता । तुम शाखामृग होने से वध्य हो । यदि कोई आज मुझसे प्रश्न करे कि क्या यह हो सकता है कि आप एक व्यक्ति को मानव भी मानें और शाखामृग भी मानें, तो मुझे निरु- त्तर हो जाना पड़ेगा । यदि वाली मानव नहीं था, शाखामृगमात्र था और हमें मानवदण्डों से या क्षत्रिय-धर्म के अनुसार उसे कैसे भी मार डालने का अधिकार प्राप्त था, तो फिर एक शाखामृग से यह आशा कैसे कर सकते थे कि वह भाई की पत्नी का परहेज करे । और उसपर यह प्रतिबन्ध कैसे लगा सकते हैं कि वह अपने छोटे भाई की स्त्री के साथ समागम न करे । क्या चतुष्पादों में ऐसे प्रतिबन्ध सुने या माने गये हैं ? मुझे स्वीकार करना चाहिए कि वाली की हत्या करना मेरी गलती थी और गलती के लिए इतिहास मुझे कभी भी क्षमा नहीं करेगा और न उसे क्षमा करना चाहिए । राजा का पुत्र होने से उसका पुत्र ही राजगद्दी का अधिकारी हो सकता था । प्रश्न था बड़े भाई के मरने पर उसका छोटा भाई गद्दी सम्भाले अथवा पुत्र ? मुझे सुग्रीव के पक्ष में ही निर्णय देना पड़ा। मैं ऐसा न करता

११६ रामायणमीमांसा पञ्चम तो सुग्रीव से मैं सीता को खोज निकालने के कार्य में किसी प्रकार की सहायता की आशा कैसे कर सकता था ?" इस प्रकार की उक्तियाँ मिथ्या वासुदेवरूप कल्पित राम की ही हो सकती हैं । वाल्मीकिवर्णित मर्यादापुरुषोत्तम राम तो ज्ञान, विज्ञान, नीति, प्रीति और परमार्थ के महान् वेत्ता थे । वे ऐसी ऊल-जलूल बातें सोच भी नहीं सकते थे । वाल्मीकिरामायण के अनुसार श्रीराम ने वाली द्वारा किये गये विविध आक्षेपों का उत्तर देते हुए कहा था कि धर्म, अर्थ और काम के सम्बन्ध में और लौकिक व्यवहार के ज्ञान के बिना बालकपन के कारण तुम मेरी विगर्हणा कर रहे हो, बुद्धिसम्पन्न, आचार्य वृद्धों से बिना प्रश्न किये, वानर-स्वभावसुलभ चपलता के कारण मुझसे कहना चाहते हो । यह शैल, वन, कानन समेत सम्पूर्ण भूमि इक्ष्वाकुवंशीय राजाओं के शासन में है । मृग, पक्षी तथा मनुष्यों के निग्रह-अनुग्रह का उन्हें अधिकार है । इस समय धर्मात्मा भरत समस्त भूमि के शासक हैं। वे स्वयं धर्म, काम तथा अर्थ के तत्त्वज्ञ हैं । वे सत्यवान् तथा ऋजु हैं । उनमें नय और विनय तथा सत्य और विक्रम सु- व्यवस्थित हैं । वह देश और काल के भी ज्ञाता हैं । उन्हीं के धर्मकृत आदेश से पृथ्वी में धर्मविस्तार की दृष्टि से हम भ्रमण करते हैं । धर्मात्मा भरत के शासन में धर्म का विप्रिय करना किसी के लिए भी क्षम्य नहीं है । तुम काम- प्रधान होने के कारण राजमार्ग पर प्रतिष्ठित नहीं हो । ज्येष्ठ भ्राता तथा पिता और जो विद्या प्रदान करता है—ये तीनों ही धर्मपंथ पर वर्तमान होकर पिता के तुल्य ही माने जाते हैं। छोटा भाई, पुत्र तथा शिष्य—ये तीनों ही पुत्र- वत् चिन्त्य होते हैं । सत्पुरुषों का सूक्ष्म धर्म परम अविज्ञेयरूप से सब प्राणियों के हृदय में रहता है । वह शुभ- अशुभ सब जानता है । तुम स्वयं चपल वानर अकृतात्मा चपल वानरों के साथ वैसे ही विफल मन्त्रणा करते हो जैसे जात्यन्ध जन्मान्ध लोगों के निर्देशन में चलते हैं । तुम भ्राता की भार्या के साथ सनातन मर्यादा को छोड़कर बर्ताव करते हो । विशेषतः सुग्रीव जीवित है, उसकी भार्या रूमा, जो तुम्हारी स्नुषा के तुल्य है, उसमें तुम रमण करते हो, इसी लिये तुम्हें दण्ड दिया गया है। लोकवृत्त पराङ्मुख तुम्हारा दण्ड के द्वारा निग्रह युक्त ही है। कहा जा सकता है कि मनुष्यों के सम्बन्ध में ही विधि-निषेधरूप शास्त्र प्रवृत्त होते हैं और वाली मनुष्य नहीं, किन्तु शाखामृग है । आगे स्वयं श्रीराम ने भी कहा है कि मृग होने के कारण उनके द्वारा उसको मारना दोष नहीं । पर यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि मृग होने पर भी मनुष्यों के तुल्य उनमें राज्य, राजा आदि का व्यवहार होता था । मनुष्यों जैसा ही उनमें ज्ञान भी था; अतः उनमें भी विधि-निषेधशास्त्र की प्रवृत्ति हो सकती है । इसके अतिरिक्त इन्द्र आदि देवता अग्निहोत्र आदि धर्म के अधिकारी न होने पर भी निषेध का अतिक्रमण करने से प्रायश्चित्त के अधिकारी अक्सर हो जाते हैं । अतएव वृत्रवध के कारण ब्रह्महत्या आदि दोष इन्द्र को लगे ही थे । उसी प्रकार की स्थिति वाली, सुग्रीव आदि की भी है । वे लोग ज्ञान-विज्ञान सम्पन्न थे, अतः निषेध के अतिक्रमण में उनको भी दोष होना उचित ही था । अग्निहोत्र आदि में देवताओं का तो अनधिकार इसलिये था कि कर्मों में इन्द्र आदि देवताओं के ही उद्देश्य से हविष् आदि प्रदान किया जाता है । ऐसी स्थिति में इन्द्रादि द्वारा अर्चनीय अन्य इन्द्र आदि न होने से वे कर्म में अनधिकृत होते हैं । फिर भी जिन दान आदि कर्मों में इन्द्रादि यजनीय देवताओं की अपेक्षा नहीं है, उनमें इन्द्र आदि का भी अधिकार मान्य ही है । ब्रह्मविद्या में उनका अधिकार मान्य है । ये सब बातें पूर्वमीमांसा तथा उत्तर- मीमांसा में निर्णीत हैं ! इसी प्रकार का अधिकार वाली आदि वानरों का भी है । सज्ञान अन्य पशु-पक्षियों का भी ऐसा ही अधिकार होता है । अन्य दृष्टि से यजनीय देवता का वाचक शब्द अन्तर्यामी परमेश्वर का वाचक होता है । इस दृष्टि से यज्ञ आदि में भी देवताओं का अधिकार मान्य है । तभी इन्द्र आदि का भी यजन कहीं कहीं श्रुत है । उनमें भी बृहस्पति, चन्द्र, बुध आदि में ब्राह्मणत्व एवं इन्द्र आदि मे, वैवस्वत मनु आदि के समान, क्षत्रियत्व आदि मान्य हैं । चन्द्रादि का यज्ञ भी प्रसिद्ध है । वेदों में त्रैवर्णिकों का अधिकार है । यहाँ त्रैवर्णिक पद वेद-वेदार्थज्ञानवान् का उपलक्षण ही होता है—यही व्यास, वाल्मीकि प्रभृति ऋषियों का आशय है ।

अध्याय बौद्धों द्वारा विकृत रामचरित ११७ मार्कण्डेयपुराण के अनुसार जैमिनि ने विन्ध्यारण्यनिवासी तत्त्वज्ञ पक्षियों से ज्ञान प्राप्त किया था । इससे पक्षियों का भी तत्त्वज्ञान में अधिकार सिद्ध है । गृध्रराज जटायु का भगवान् राम ने ही दाह आदि संस्कार किया था । सम्पाति ने भी अपने भ्राता का मरण सुनकर तर्पण किया था । यह सब वाल्मीकिरामायण से सिद्ध ही है । ये सब सामान्य वानर या पक्षी नहीं थे । कोई सूर्य के अंश से, कोई इन्द्र के अंश से, कोई ब्रह्मा के अंश से और कोई अग्नि के अंश से श्रीराम की सहायता के लिए वानररूप में अवतीर्ण हुए थे। वाली चारों समुद्रों में सन्ध्या के लिए जाता था । अतः वे निषेध के उल्लङ्घन से अवश्य दण्डनीय हैं । अपराध निश्चय न होने से ही प्रमाणरूप में साक्षी आदि की अपेक्षा होती है । यहाँ तो दण्ड देनेवाला और दण्ड पानेवाला—दोनों ही जिसे स्वीकार करते हैं उसके लिए सफाई पेश करने का प्रश्न ही नहीं उठता है । इसी तरह सुग्रीव की मैत्री का भी प्रश्न था । मित्र के शत्रु को शत्रु मान कर उसका वध भी नीतिशास्त्र सम्मत है ही—“वयस्यस्योपकर्तव्यं धर्ममेवानुपश्यता ।” (वा० रा० ४।१८।२९) धर्मदृष्टि से तुम्हें भी धर्म का अनु- वर्तन करते हुए मेरे द्वारा प्राप्त दण्ड को प्रायश्चित्तरूप में स्वीकार करना चाहिये । पाप की जानकारी होने से शिष्ट लोग स्वेच्छापूर्वक राजदण्ड की माँग करते हैं; जैसे लिखित महर्षि ने स्वयं जाकर राजदण्ड ग्रहण किया था । मनु ने दो श्लोक कहे हैं । धर्मकुशल लोगों ने उन्हें स्वीकार किया था । १—राजाओं से दण्ड पाकर पाप करनेवाले मनुष्य निर्मल होकर सुकृतियों के समान ही स्वर्ग को जाते हैं । २—दण्डरूप शासन या मोक्ष अर्थात् छुटकारा होने पर स्तेन पाप से मुक्त हो जाता है । पर स्तेन (चोर) का शासन न करने से राजा उस किल्बिष का भागी होता है— “शक्यं त्वयापि यत्कार्यं धर्ममेवानुवर्तता । श्रूयते मनुना गीतौ श्लोकौ चारित्रवत्सलो ॥ राजभिर्घृतदण्डाश्च कृत्वा पापानि मानवाः । निर्मलाः स्वर्गमायान्ति सन्तः सुकृतिनो यथा ॥ शासनाद्वापि मोक्षाद्वा स्तेनः पापात्प्रमुच्यते । राजा त्वशासन् पापस्य तदवाप्नोति किल्बिषम् ॥” (वा० रा० ४।१८।३०-३२) मेरे कुल के ही आर्य मान्धाता ने किसी के ऐसा ही पाप करने पर उसे दण्ड दिया था । अन्य राजाओं ने भी प्रमत्त पुरुषों द्वारा किये गये पापों की शुद्धि के लिए दण्डविधान किया है । उसी से पाप नष्ट होता है, इसलिए तुम्हें परिताप न करना चाहिये, यह शास्त्रानुसार ही है । हम लोग भी शास्त्रपरतन्त्र ही हैं, स्वतन्त्र नहीं । (वा० रा० ४।१८।३३-३५) धर्मकोविंद मृगयार्थी भी शिकार में विविध जालों एवं कूट उपायों से मृगों को मारते हैं । दृश्य या प्रति- च्छन्न, भागते हुए, भयभीत हुए या विश्वस्त हुए मृगों को वे मारते हैं । प्रमत्त, अप्रमत्त और विमुख मृगों को मारना मृगया में धर्म ही है । इसलिए युद्ध बिना भी तुम्हारा वध अनुचित नहीं है । तुम स्वयं धर्म न जान कर परम्पराप्राप्त धर्म में स्थित होने पर भी मुझ पर आक्षेप कर रहे हो । वाली सन्ध्यावन्दन आदि करता था, शास्त्रज्ञ था । उस दृष्टि से भी पूर्वोक्त धर्मोल्लङ्घन के कारण उसका वध शास्त्रीय था । यदि केवल वह मृगमात्र था तो उस दृष्टि से मृगया के दृष्टान्त से उसके वध का समर्थन किया गया है । श्रीराम की उक्त बातों को सुनकर वाली दुःखी हुआ और उसे धर्म का निश्चय हो गया, इसलिए श्रीराम को कोई दोष न देकर उसने उन्हें निर्दोष ही माना और हाथ जोड़कर श्रीराम से कहा—"नरश्रेष्ठ ! आपने जो कहा है वह ठीक है । अपकृष्ट लोग प्रकृष्ट लोगों के सम्बन्ध में कुछ नहीं कह सकते । मैंने प्रमाद से जो अप्रिय वचन कहे हैं, उनसे आप मेरे दोषों का विचार न करें; क्योंकि आप दृष्टार्थ, तत्त्वज्ञ हैं । प्रजा के हित में निरत हैं । कार्य-कारण निश्चय में आपकी अनन्यसदृश बुद्धि स्पष्ट है । धर्म से व्यतिक्रान्त मेरा धर्मयुक्त वाणी से रक्षण करें—

११८ रामायणमीमांसा पञ्चम “एवमुक्तस्तु रामेण वाली प्रव्यथितो भृशम् । न दोषं राघवे दध्यौ धर्मेऽधिगतनिश्चयः ॥ प्रत्युवाच ततो रामं प्राञ्जलिर्वानरेश्वरः । यत्त्वमात्थ नरश्रेष्ठ तत्तथैव न संशयः ॥” (वा० रा० ४।१८।४४।४५।४८) मिथ्या वासुदेव राम ने इन श्लोकों को छिपाकर अर्थ का अनर्थ किया है । वाली ने स्वयं अङ्गद की रक्षा की प्रार्थना की थी । श्रीराम ने वाली को आश्वस्त किया और तत्त्वार्थयुक्त साधुसम्मत वाणी से आश्वासन देकर कहा-“अब तुम्हें अपने सम्बन्ध में और हम लोगों के सम्बन्ध में चिन्ता नहीं करनी चाहिये, क्योंकि धर्म के सम्बन्ध में हमारा निश्चय तुम्हारी अपेक्षा अधिक है। जो दण्ड्य को दण्ड देता है और जो दण्डित होता है दोनों ही कार्य-कारण द्वारा कृतार्थ होते हैं। अवसाद को नहीं प्राप्त होते । तुम दण्ड-व्याज से विगतकल्मष होकर दिष्टमार्ग से अपनी धर्म्या प्रकृति पर स्थित हो गये हो। शोक, मोह और हृदयस्थित भय को त्याग दो। दैवविधान का कोई भी अतिवर्तन नहीं कर सकता। अङ्गद जैसे तुम्हारे संनिधान में स्वस्थ और प्रसन्न था वैसा ही सुग्रीव और मेरे संनिधान में सुखी रहेगा।” मधुर वचन से राम द्वारा धर्मपथानुवर्ती वार्ता सुनकर वाली ने कहा—मैंने अनजान में जो कहा था उसे क्षमा कीजिये— “इदं महेन्द्रोपम भीमविक्रम प्रसादितस्त्वं क्षम मे हरीश्वर ॥” (वा० रा० ४।१८।६६) इसी तरह अन्य भी छोटी-छोटी बातों पर कौसल्यायन ने विचार किया है। हनुमान् महाबलवान् थे। उन्होंने अपना बड़ा रूप बनाया “चकार रूपं महदात्मनस्तदा ।” (वा० रा० ४।६६।३८) । पर सुन्दरकाण्ड के प्रसङ्ग में कौसल्यायन ने कहा है-“हनुमान् के बल-वैभव तथा बुद्धि का चमत्कार दिखानेवाली जो बालकथाएँ प्रचलित हैं, उन्हें ऐतिहासिक तथ्य मानने की कोई आवश्यकता नहीं है तथा गढ़नेवालों ने सचमुच कमाल किया है। हनुमान् के बारे में कहा है कि जब वे बालक थे तो उन्होंने सूर्य को अपने मुख में रख लिया था। उस सूर्य को जो पृथ्वी से भी कई गुना बड़ा है। फिर, यह भी कहा कि जब हनुमान्जी लङ्कापुरी जाने के लिए समुद्र पर से उड़े चले जा रहे थे तब सुरसा नाम की एक राक्षसी ने उन्हें निगल जाने के लिए अपना मुँह खोला और हनुमान्जी ने अपने शरीर का आकार इतना बढ़ा लिया कि वह किसी भी तरह उन्हें निगल न सकी । तब सुरसा ने अपना मुँह और अधिक खोला । हनुमान्जी ने भी अपना आकार और बढ़ा लिया। यह क्रम यहाँ तक चला कि हनुमान्जी सैकड़ों मील के हो गये, तब सुरसा सौ योजन की हो गयी। कुछ लोगों को आज भी ऐसी गप्पों में रस आता हैं।” पर साथ ही हनुमान् का समुद्र पार कर लङ्का जा पहुँचना इस बात पर कौसल्यायन भी विश्वास करते हैं। यह अर्धकुक्कुटीन्याय ही तो है। जब एक बन्दर सौ योजन समुद्र पार कर सकता है तो फिर उसके सम्बन्ध में और चमत्कार के न मानने में तर्क भी क्या है ? बुद्ध अपनी माता के पेट में से ऐसे दिखायी देते थे, जैसे शीशे के पात्र में कोई वस्तु दिखायी दे । बुद्ध को देखते ही गुरु के आश्रम की पाषाणमयी मूर्तियाँ उठ-उठ कर बुद्ध को प्रणाम करने लगीं । बुद्ध की उष्णीषरश्मि ब्रह्मलोक तक पहुँची। जब ऐसी बौद्ध जातकों की कथाएँ सत्य हो सकती हैं, तब आर्ष वाल्मीकिरामायण की उक्तियों में अप्रामाण्य का प्रसङ्ग ही क्यों ? वैदिक कथाएँ तो दर्शनों पर आधारित हैं। सूर्य तेजस्तत्त्व के प्रतिनिधि देवता हैं। हनुमान् वायुतत्त्व के प्रतिनिधि देवता हैं। संवर्गविद्या के अनुसार वायु में पृथ्वी, जल और तेज का अन्तर्भाव होता है। प्राण में वागादि इन्द्रियों का विलयन होता है। अतः हनुमान् के मुख में सूर्य का अन्तर्भाव असम्भव नहीं है। इस तरह सुरसा एक सात्त्विक दैवी प्रवृत्ति शक्ति है। हनुमान् ने जैसे छायाग्राहिणी तामसी शक्ति पर विक्रम से विजय प्राप्त की, राजसी

शक्ति लङ्किनी पर नियन्त्रण स्थापित किया, उसी तरह सात्त्विकी शक्ति सुरसा को भी अपनी दक्षता से वशीकृत किया था। यह उचित ही था और सम्भव भी था ही। रामायण केवल आधिदैविक ऐतिहासिक ही कथा नहीं है, किन्तु वह आध्यात्मिक कथा भी है। श्रीराम आत्मा हैं, हनुमान् शुद्ध मन हैं, संसार समुद्र है, देह लङ्का है। अहङ्कार रावण है। शान्ति सीता हैं। संसाररूप समुद्र पार करने में सात्त्विकी, राजसी और तामसी प्रवृत्तियाँ बाधिका होती हैं। शुद्ध मन को उनका मुकाबला करना पड़ता है। तामसी प्रवृत्तियों को सर्वथा समास कर राजसी प्रवृत्ति का नियन्त्रण आवश्यक होता है। उसके पहले सात्त्विकी प्रवृत्तिशक्ति का आशीर्वाद ग्रहण करना पड़ता है। इन सब कामों के लिए धीरता, दक्षता, बुद्धिमत्ता, प्रबलता और पराक्रम की अपेक्षा होती है। जो केवल प्रत्यक्षवादी हैं, वे तो हनुमान् के समुद्रोल्लङ्घन में भी विश्वास नहीं कर सकते। वे बुद्ध की सर्वज्ञता में भी विश्वास नहीं कर सकते, परलोक एवं कर्मफल में भी विश्वास नहीं कर सकते। जो अनुमान और आगम में विश्वास करते हैं, उनके लिए श्रीहनुमान् की बाललीलाओं में किसी प्रकार की असङ्गति नहीं हो सकती। 'यद्यपि हनुमान् ने सौ योजन की दूरीवाले समुद्र को पार किया था तो भी उन्हें किसी प्रकार की थकावट नहीं हुई' ऐसा वाल्मीकि का कथन है। कौसल्यायन कहते हैं—"जहाँ तक समुद्र की चौड़ाई और लम्बाई का प्रश्न है वह अयथार्थ है। १०० योजन का मतलब ८०० मील है। आज की लङ्का भारततट से मुश्किल से ३० या ३२ मील है।" परन्तु कौसल्यायन को मालूम होना चाहिए कि जिसे बौद्ध श्रीलङ्का कहते हैं वह सिंहलद्वीप है। लङ्का नहीं है। श्रीभागवत आदि में सिंहलद्वीप से अतिरिक्त लङ्काद्वीप का वर्णन है। विभीषण के आग्रह से श्रीराम ने लङ्का को अगम्य बना दिया था। यह कथा भी पद्मपुराण आदि में वर्णित है। थोड़ी देर के लिए मान भी लिया जाय कि ३२ मील ही लङ्का है; परन्तु कोई बन्दर या मनुष्य इतने बड़े समुद्र को भी बिना नाव, जहाज या वायुयान का आश्रयण किये क्या पार कर सकता है ? कौसल्यायन वाल्मीकिरामायण को सत्य लेख मानते हैं, तो उनकी उक्ति को अप्रामाणिक कहना कहाँ तक सङ्गत है। कौसल्यायन कहते हैं—"अब राम न मांस खाते हैं, न शराब पीते हैं, पाँचवें दिन जङ्गली फल मूल खाकर रह जाते हैं।" “न माँस राघवो भुङ्क्ते न चैव मधु सेवते। वन्यं सुविहितं नित्यं भक्तमश्नाति पञ्चमम् ॥” ( वा० रा० ५।३६।४१ ) यहाँ कौसल्यायन ने "अब" अपनी तरफ से मिलाया है, मूल में वैसा कोई भी शब्द नहीं है। मूल का अर्थ यह है—श्रीराम मधु, मांस का सेवन नहीं करते, सुविहित आरण्यक भक्त ही प्रातः, सङ्गव, मध्याह्न और अपराह्न इन चार कालों को बिताकर पञ्चम अर्थात् सायाह्न में भोजन करते हैं। सीता ने अग्नि से प्रार्थना की थी—यदि मैंने पति की सेवा की है और यदि मुझमें तपस्या का बल है तो तुम हनुमान् के लिए शीतल हो जाओ, ऐसा ही हुआ। हनुमान् ने अपनी पूँछ से समस्त लङ्का जला दी; किन्तु स्वयं हनुमान्‌जी नहीं जले। इस चमत्कार में बौद्ध कौसल्यायन को भी इनकार करना असम्भव हो गया। समुद्र लांघकर हनुमान्‌जी अपने सैन्यदल में वापिस आये। कौसल्यायन ने लिखा है कि "सब वानर मधुवन पहुँचे और सब ने जीभर मधुपान किया। स्वयं हनुमान् ने भी इतनी अधिक पी ली थी कि उसे होश नहीं रहा था।" परन्तु यह सब कौसल्यायन की कल्पना ही है। मधुवन में मधुर फल और मधु (शहद) पर्याप्त था। वे फल और शहद मादक भी थे। यहाँ मधुपद से शराब नहीं गृहीत है।

१२० रामायणमीमांसा पञ्चम अन्यथा मधुशाला होती मधुवन का उल्लेख न होता, अतः मधुपान से शराब पीना और हनुमान्‌जी ने भी अधिक पो ली थी इत्यादि कल्पनाएँ निराधार हैं। कौसल्यायन लिखते हैं कि “श्रीराम कहते हैं आज मेरे पास पुरस्कार देने योग्य वस्तु का अभाव है; यह बात मेरे मन में बड़ी कसक पैदा कर रही है। यहाँ जिसने मुझे ऐसा प्रिय संवाद सुनाया उसका मैं कोई वैसा प्रिय कार्य नहीं कर पा रहा हूँ” परन्तु यह उनका अनुवाद अशुद्ध है। मूल श्लोक है— “इदं तु मम दीनस्य मनो भूयः प्रकर्षति । यदिहास्य प्रियाख्यातुर्न कुर्मि सदृशं प्रियम् ॥” सीतावियोगजनित दीनता के कारण मेरे मन की यह स्थिति और कष्ट पहुँचाती है कि जिसने मुझे प्रिय संवाद सुनाया उसका उसके सदृश उपकार नहीं कर रहा हूँ। यहाँ पुरस्कार देने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। क्यों ? श्रीहनुमान् किसी वस्तु की अपेक्षा नहीं रखते हैं। श्रीराम ने अपने पराक्रम से सुग्रीव को राज्य प्रदान किया। कोई भी वस्तु उनकी आज्ञा के अनुसार सुग्रीव प्रदान कर सकते थे। विभीषण को भी श्रीराम ने लङ्काधिपति बना दिया था। वैसे भी वाल्मीकिरामायण के अनुसार श्रीराम परब्रह्म परमात्मा ही हैं। सङ्कल्पमात्र से वे सब प्रदान कर सकते हैं। फिर वे यह कैसे कह सकते हैं कि आज,मेरे पास पुरस्कार देने योग्य वस्तुओं का अभाव है। अतः कौसल्यायन का उक्त अर्थ निराधार ही है। इसी प्रकार—“इस समय इन महात्मा हनुमान् को मैं अपना प्रगाढ़ आलिङ्गन प्रदान करता हूँ; क्योंकि यही मेरा सर्वस्व है।” यह भी कौसल्यायन का अर्थ अशुद्ध है। श्लोक यों है— “एष सर्वस्वभूतस्तु परिष्वङ्गो हनूमतः । मया कालमिमं प्राप्य दत्तस्तस्य महात्मनः ॥” (वा० रा० ६।१।१३) हनुमत्कृत प्रिय सीताख्यान के सदृश प्रियान्तर न देखते हुए आत्मपरिष्वङ्ग को ही तत्तुल्य देखकर श्रीराम ने हनुमान् के लिए वही आत्मपरिष्वङ्ग (प्रगाढ आलिङ्गन) प्रदान किया है; क्योंकि भगवद्देह शुद्ध आनन्दरूप होने से उसका आलिङ्गन ही भगवान् का सर्वस्व है। आनन्दस्वरूप ब्रह्म ही माया या दिव्यलीलाशक्ति में राम-देह के रूप से भासमान होता है। यही बात गीता और विष्णुसहस्रनाम के भाष्य आदि में स्पष्टरूप से वर्णित है। ब्रह्मपरिष्वङ्ग और ब्रह्मप्राप्ति दोनों एक ही वस्तु हैं। वही सर्वोत्कृष्ट वस्तु है, वही सीताप्रियाख्यान के सदृश हो सकता है। उसी का प्रदान हनुमान् के लिए उपयुक्त हो सकता है। कौसल्यायन ने बीच बीच में रामकथा के साथ अपनी नोन-मिर्च लगायी है, जिसका वाल्मीकिरामायण के श्लोकों से कोई सम्बन्ध नहीं है। “सच्ची बात यह थी कि यह सारा वैर-विरोध लक्ष्मण के कारण आरम्भ हुआ था। शूर्पणखा मेरे पास और बाद में लक्ष्मण के पास प्रणय का निवेदन करने ही तो आयी थी। हमें एक गम्भीर पुरुष की तरह उसे समझा देना चाहिये था कि हम दोनों भाई विवाहित हैं। हम दोनों में से कोई भी उसे अङ्गीकृत करने में असमर्थ हैं, किन्तु हमें थोड़ा विनोद करने की सूझी। मैंने शूर्पणखा को लक्ष्मण के पास भेजा और उसने बेचारी को दो दो बार मेरे पास वापस लौटाया। बेचारी तङ्ग आ गयी होगी। उसे लगा होगा कि सीता ही उसके मार्ग का काँटा है। वह सीता की ओर लपकी थी। लक्ष्मण ने उसके नाक-कान काटकर उसे कुरूप बना दिया। यदि लक्ष्मण ऐसी अनुत्तरदायित्वपूर्ण बात न करता तो सम्भवतः हमारा रावण से किसी प्रकार का वैर-विरोध न होता इत्यादि।” (रामकहानी पृ० १९७) यह सब कौसल्यायन की कल्पना निराधार है। वाल्मीकिरामायण के राम ने ऐसा न सोचा ओर न कहा ही है। शूर्पणखा के दलाल तो बौद्ध ही या असभ्य बौद्ध ही हो सकते हैं। सदाचारी,

अध्याय बौद्धों द्वारा विकृत रामचरित १२१ सभ्य बौद्ध भी शूर्पणखा का पक्ष लेने को कभी भी प्रस्तुत नहीं हो सकता है । जिसका कोई भी धर्म और सदाचार है वह शूर्पणखा की भर्त्सना ही करेगा और लक्ष्मण ने वही दण्ड दिया जो ऐसी कुलटाओं के लिए उचित था । हाँ कौसल्यायन ने--'रावण को ब्रह्मा ने शाप दिया था कि तू आज से किसी दूसरी नारी के साथ बल- पूर्वक समागम करेगा तो तेरे मस्तक के सौ टुकड़े हो जायेंगे' इसमें संशय नहीं किया और इस बात को स्वीकार कर लिया । विभीषण के सम्बन्ध में भी कौसल्यायन ने अनर्गल कल्पना की है- 'इतिहास में जब तक राम रावण की कहानी मुंह से सुनी-सुनायी जाती रहेगी । तब तक लोग विभीषण को भ्रातृद्रोही तथा देशद्रोही के रूप में ही स्मरण करते रहेंगे ।' यह भी निराधार है; क्योंकि वाल्मीकिरामायण में इस प्रकार का कोई उल्लेख नहीं है । वस्तुस्थिति तो यह है कि असत्य एवं अन्याय का पक्ष सर्वथा ही त्याज्य है । रावण असत् पक्ष पर था, उसका त्याग ही प्रशंसनीय है । श्रीशुक्रादि नीतिज्ञों ने तभी तो कहा है- "न्याय के रास्ते पर चलनेवाले के साथ पशु-पक्षी आदि भी हो लेते हैं; परन्तु अन्याय के रास्ते पर चलनेवाले का तो उसका सगा भाई भी साथ छोड़ देता है- "यान्ति न्यायप्रवृत्तस्य तिर्यञ्चोऽपि सहायताम् । अपन्थानं तु गच्छन्तं सोदरोऽपि विमुञ्चति ॥" ( अनर्घराघव १।४ ) 'समुद्र मूर्तिमान् होकर श्रीराम के सामने आया । नल विश्वकर्मा का पुत्र था । समुद्र के परामर्शानुसार उसने पाँच दिनों में सौ योजन लम्बे समुद्र पर पुल बाँध दिया ।' यह कौसल्यायन ने स्वीकार किया है । आश्चर्य है एक तरफ नास्तिकता और दूसरी तरफ ऐसी चमत्कारपूर्ण बातों में विश्वास करना, दोनों का सम्बन्ध कैसे हो गया ? कौसल्यायन का यह कथन भी-- "मेरे मन में इसका खेद है कि मैंने आँख के ओझल रहकर वाली को क्यों बींध डाला।" ( रा० क० पृ० २१ ) निराधार है । 'गरुड़ ने नागपाश से छुड़ाकर राम को व्रणमुक्त किया ।' इस बात में कौसल्यायन को विश्वास करना पड़ा । ( रा० क० पृ० २११ ) 'औषधियों को सूंघकर लक्ष्मण स्वस्थ हो गये ।' आदि में भी विश्वास करने से प्राणी आस्तिकता की ओर आता ही है । 'देवराज इन्द्र का रथ राम की सहायता के लिए आया । श्रीराम ने युद्ध में रावण को मारा ।' यह सब कौसल्यायन को स्वीकृत है । "विदेहकुमारी ने अग्निदेव की परिक्रमा की और निःशङ्क चित्त से अग्निचिता में समा गयीं । जनसमुदाय ने मिथिलेशकुमारी को इस जलती हुई चिता में प्रविष्ट होते देखा । 'साँच को आँच नहीं' की कहावत प्रसिद्ध ही है । सीता के सतीत्व ने उसकी रक्षा की । दीप्त अग्निशिखा ने उसके रोममात्र को भी स्पर्श नहीं किया ।" ( रा० क० पृ० २३९ ) आधुनिक लोग इस बात में विश्वास नहीं कर सकते कि कोई स्त्री अग्निचिता में प्रविष्ट हो सकती है ? और उसमें से जीवित पुनः निकल आना तो और भी कठिन है; परन्तु शायद भूलकर ही सही कौसल्यायन ने ऐसा स्वीकार कर लिया । श्रीभरत हनुमान् के मुख से श्रीराम के आगमन का समाचार सुनकर बड़े प्रसन्न हुए और उस प्रियाख्यान के बदले में एक सहस्र गायें, सौ ग्राम तथा शुभ आचरणवाली हेमवर्ण सर्वाभरणसम्पन्न सकुण्डला १६ कन्याओं को प्रदान किया । कौसल्यायन कहते हैं--'उस बालब्रह्मचारी पवनसुत को सोलह कन्यायें किस लिये दी ।' पर कौसल्यायन यह नहीं जानते, वह तो प्रियाख्यान का पुरस्कारमात्र था । वैसे गायें और ग्राम भी हनुमान् के किस काम के थे ? जैसे देवतादि की प्रसन्नता के लिए ब्राह्मण-भोजन आदि कराये जाते हैं, वैसे ही हनुमान् की प्रसन्नता के लिए श्रीभरत ने गायें, ग्राम तथा कन्याएँ प्रदान की थीं । उत्तरकाण्ड में भी कौसल्यायन ने श्लोक का मनमाना अर्थ किया है। वे कहते हैं- "जैसे इन्द्र शची को मधु ( सुरा ) का पान कराते थे वैसे ही मैंने ( राम ने ) ही सीता को हाथ से पकड़ कर मैरेय शराब पिलाया ।" वस्तुतः-- १६

"सीतामादाय हस्तेन मधु मैरेयकं शुचि । पाययामास काकुत्स्थः शचीमिव पुरन्दरः ॥” ( वा० रा० ७।४२।१९ ) का अर्थ यह है कि काकुत्स्थ श्रीराम ने अपने हाथ से पवित्र मैरेयक मधु श्रीसीता को पिलाया जैसे इन्द्र शची को पिलाते हैं । 'शुचि' विशेषण शराब का नहीं हो सकता । पुनः कौसल्यायन की--"दूसरों के मन को रिझानेवाले पुरुषों में श्रेष्ठ मैं उत्तम वस्त्राभूषणों से भूषित उन मनोरम रमणियों के साथ रमण करता था ।"--यह भी अशुद्ध व्याख्या है । प्रकृत श्लोक यह है-- “मनोभिरामा रामाश्च रामो रमयतां वरः । रमयामास धर्मात्मा नित्यं परमभूषिताः ।।” ( वा० रा० ७।७२।२२ ) इसका आशय यों समझना चाहिए- "एष ह्येवानन्दयति” ( तै० उ० २।७ ) यह परमात्मा ही सब प्राणियों को अनेक आनन्द से आनन्दित करते हैं- इस तथ्य के अनुसार प्राणिमात्र को आनन्दित ( सुखी ) करनेवाले धर्मात्मा राम ने उन ब्रह्म में रमण करनेवाली अभिरामा रामाओं को रमण कराया ( सन्तुष्ट किया ) । टीकाकारों ने 'तोषयामास' यह अर्थ किया है । अन्यथा 'धर्मात्मा' विशेषण सङ्गत नहीं होगा; क्योंकि अविवाहित स्त्रियों से रमण करनेवाला धर्मात्मा नहीं हो सकता । साथ ही यह भी ध्यान देने योग्य है कि यदि प्रकृत श्लोक में 'रेमे' पाठ होता, तभी 'रमण करना' अर्थ हो सकता था, यहाँ तो 'रमयामास' पाठ है । उसका अर्थ होता है—'रमण कराना' सुखी या आनन्दित करना । श्रीरामचन्द्र का एकपत्नीव्रत प्रसिद्ध ही है । इसी प्रकार पुरवासियों के द्वारा सीतासम्बन्धी आरोपों का अपने लक्ष्मण, भरत आदि भाइयों के प्रति किये गये समाधान में भी कौसल्यायन ने लीपा-पोती करके लङ्का की अग्निपरीक्षा को छिपा डाला है । प्रकृत में भी “निर्दोष मम सन्निधौ” ( वा० रा० ७।४७।१३ ) से लक्ष्मण ने कहा है कि आप मेरे समक्ष अग्निपरीक्षा से निर्दोष सिद्ध हो चुकी हैं, किन्तु ऐसी पुनीतचरिता आपका राजा ने परित्याग कर दिया, क्योंकि वह लोकापवाद से भीत हैं । "मैं अपनी अन्तरात्मा से सीता को निष्कलङ्क मानता था, इसलिए उसे यहाँ अपने साथ अयोध्या लाया ।” ( रा० क० पृ० २७४ ) इसका आधारभूत वाल्मीकिरामायण में कोई श्लोक नहीं है । इसी तरह कौसल्यायन के अनुसार राम ने कहा- "मैंने साध्वी सती सीता का त्याग किया । मैं जानता हूँ, इसके लिए लोग मुझे कभी क्षमा न करेंगे और न उन्हें क्षमा करना चाहिये । हो सकता है आगे चलकर कोई मुझे निर्दोष सिद्ध करने के लिए सारा दोष दैव के माथे मढ़ डाले । अथवा मेरी या किसी के पूर्वजन्म की घटना को इसका जिम्मेदार ठहराये; किन्तु यह सारा दोष भी नासमझी का था। निःसन्देह सीता मेरी पत्नी थी । उसे त्यागने या अपनाने का मुझे जन्मसिद्ध अधिकार प्राप्त था; किन्तु क्या एक नागरिक के नाते सीता का अपना स्वतन्त्र व्यक्तित्व न था । यदि मैं उसके पति के साथ साथ अयोध्या का नरेश न होता या केवल उसका पति ही होता तो क्या वह मेरे ही दरबार में मेरे इस निर्णय के विरुद्ध अपील न कर सकती थी । मेरे बारे में सूत का विचार सुनकर लक्ष्मण ने ठीक ही कहा था- सूत ! सीताजी के बारे में अन्यायपूर्ण बात करनेवाले इन पुरवासियों के कारण ऐसे कीर्तिनाशक कर्म में प्रवृत्त होकर श्रीरामचन्द्र ने किस धर्मराशि का उपार्जन कर लिया है ?” परन्तु यह सब निराधार है । महर्षि वाल्मीकि निर्मित रामायण के अनुसार श्रीराम ने ऐसा विचार कहीं भी प्रकट नहीं किया है । जन्मान्तरीय हेतुओं से कितनी ही घटनाएँ होती हैं । सूत ने जो भी कहा था वह सही ही है । बुद्धदेव ने भी तो आनन्द और चाण्डालकन्या के सम्बन्ध में जन्मान्तरीय बातों का उल्लेख किया ही है । कौसल्यायन के अनुसार श्रीराम ब्राह्मणपुत्र का मरण और शम्बूक शूद्र की तपस्या तथा शम्बूक के वध से ब्राह्मण के पुत्र के जीवित होने की सब बात वाल्मीकि के अनुसार ही वर्णन करते हैं । इसके बाद कौसल्यायन निराधार

अध्याय बौद्धों द्वारा विकृत रामचरित १२३ निम्नोक्त बात कहते है—'प्रत्येक पुरुष अपने युग के मिथ्या विश्वासों का शिकार होता है। मैं नहीं जानता था कि कोई स्वर्गलोक है अथवा नहीं। किन्तु मेरे समय के लोग मानते थे कि है और मैं भी मानता था कि है। मैं नहीं जानता कि मरने के बाद कोई भी किसी भी स्वर्गलोक में जाता है, या नहीं। किन्तु मेरे युग के लोग मानते थे कि आदमी सशरीर भी स्वर्ग जा सकता है। मैं भी ऐसा ही मानता था। मैं नहीं जानता था कि किसी शूद्र के लिए तपस्या करना क्यों निषिद्ध ठहराया गया था। पैर ऊपर सिर नीचे करके तपस्या करने से स्वर्ग होता है या नहीं यह सब मैं नहीं जानता था। परन्तु मेरे युग के सब लोग यह सब मानते थे। तपस्या करना शूद्र का विहित कर्म नहीं है और मैं भी मानता था कि उसका ऐसा करना अधर्म है। मैं यह नहीं जानता था कि शूद्र का तपस्या करना किसी ब्राह्मण के लड़के की मृत्यु का कारण कैसे हो सकता है ? किन्तु नारद मुनि ने ऐसा कहा था। मैंने इसपर विश्वास कर लिया था। ये सारे विश्वास सत्ययुग में ब्राह्मणों तक ही सीमित थे। त्रेतायुग में हम क्षत्रिय भी इनके शिकार हो गये और अब वैश्य और शूद्र भी। अन्यथा किसी शूद्र को क्या पड़ी थी कि वह पेड़ पर सिर नीचा और पैर ऊपर करके लटके और सोचे कि वह सशरीर स्वर्ग पहुँच जायगा। जहाँ तक मिथ्या विश्वास का सम्बन्ध है मुझमें और उस शूद्र में कोई अन्तर नहीं था। भावी इतिहासकार मुझे शम्बूक का वध करने के लिए दोषी ठहरायेंगे। वे यह नहीं सोचेंगे कि मैं स्वयं कितने अधिक मिथ्या विश्वासों का शिकार था। सही बात यही है कि मैं द्विजों के स्वार्थों के संरक्षण को साक्षात् मूर्ति था। शम्बूक शूद्रवर्ग की उभरती हुई चेतना का प्रतिनिधि था। ब्राह्मणबालक का मरण ब्राह्मणवाद का मरण था और शम्बूक का वध शूद्रों की जाग्रत् चेतना की हत्या। एक के जीवित रहने के लिए दूसरे का निधन आवश्यक था। मृत ब्राह्मण जी उठे उसके लिए यह अनिवार्य था कि शम्बूक शूद्र की हत्या हो। मैं तो केवल एक निमित्त मात्र था। क्या भावी इतिहास लेखक मुझे क्षमा नहीं करेंगे ?" कौसल्यायन की यह अपने फितूरी मस्तिष्क की कल्पना है। इसका वाल्मीकिरामायण तथा श्रीराम से कोई सम्बन्ध नहीं है। वाल्मीकिरामायण के अनुसार तो शम्बूक स्वयं अपने को शूद्र योनि में उत्पन्न मानता था और तपस्या से स्वर्ग की प्राप्ति सम्भव मानता था— “शूद्रयोन्यां प्रजातोऽस्मि तप उग्रं समास्थितः । देवत्वं प्रार्थये राम सशरीरो महायशः ॥ (वा० रा० ७।७६।२) जब ब्राह्मणयोनि और शूद्रयोनि में भेद है तो उसके कर्मों में भी भेद हो ही सकता है। यदि कौसल्यायन थोड़ा और प्रगतिशील हों और बौद्ध धर्म छोड़कर चार्वाक हो जायें तब तो उनको बौद्ध धर्म भी अन्धविश्वास ही प्रतीत होगा; क्योंकि पुनर्जन्म की मान्यता बौद्ध धर्म में भी है। लङ्कावतारसूत्र में हत्या करने से, झूठ बोलने से तथा मांस खाने से अधम योनियों की प्राप्ति बतलायी गयी है। तप और व्रत आदि का महत्त्व भी बौद्ध धर्म में मान्य है। आज भी बौद्धगया में अनेकों बौद्ध भिक्षु दण्डवत् प्रणाम करते दिखायी देते हैं। 'मणिपद्मे हुँ' की चरखी भी चलाते हुए अनेक तिब्बती बौद्ध लामा दिखायी देते हैं। यह सब भी तो क्या मिथ्या विश्वास नहीं है। वस्तुतः कौसल्यायन का उक्त कथन बौद्ध धर्म के विरुद्ध ही है। कारण कि बौद्ध लोग भी धर्म, अधर्म में भगवान् बुद्ध के वचनों को ही प्रमाण मानते हैं। इसी लिए बुद्ध की सर्वज्ञतासिद्धि के लिए उनका महान् प्रयास है। सामान्य और प्रत्यक्ष अनुमान से ही सब काम सिद्ध हो जायें तो बुद्ध की सर्वज्ञतासिद्धि का कुछ प्रयोजन नहीं रहता है। नैयायिक आदि ईश्वर को सर्वज्ञ तथा ऋषियों को परावरद्रष्टा मानकर ईश्वर के वेद तथा आर्ष ग्रन्थों के आधार पर ही धर्माधर्म का निर्णय करते हैं। पूर्वोत्तरमीमांसक अनादि अपौरुषेय वेद एवं तन्मूलक आर्ष धर्म-ग्रन्थों से धर्मादि का निर्णय करते हैं। जैसे चक्षु द्वारा रूप का ज्ञान मिथ्या ज्ञान या मिथ्या विश्वास नहीं है; श्रोत्र द्वारा शब्द का ज्ञान, मन द्वारा सुख-दुख का ज्ञान मिथ्या ज्ञान नहीं है वैसे ही वेदादि शास्त्रों के द्वारा धर्म और ब्रह्म का ज्ञान मिथ्या ज्ञान या मिथ्या विश्वास नहीं है। उसके अनुसार तपस्या का स्वरूप और उसका फल विदित होता है। उनके अनुसार श्वान, शूकर, गौ, गर्दभ, अश्व आदि योनियों के समान ही ब्राह्मण, शूद्र आदि योनियाँ भी सिद्ध होती हैं।

१२४ रामायणमीमांसा पञ्चम “श्वयोनिं वा शूकरयोनिं वा चाण्डालयोनिं वा.....” (छा० उ० ५।१०।७) योनिभेद से कर्मभेद होते हैं। सम्राट् हो जाने पर भी कोई राजसूय का अधिकारी नहीं हो सकता है यदि क्षत्रिय योनि में पैदा न हुआ हो। इसी प्रकार तपस्या में शूद्र का अधिकार नहीं हो सकता। यह भी शास्त्रगम्य धर्म है, अन्धविश्वास नहीं है। ब्राह्मणवाद कोई वाद नहीं है। वेदादिशास्त्रप्रामाण्यवाद आस्तिकमात्र का वाद है। राम उसी शास्त्ररक्षण की साक्षात् मूर्ति थे। उनसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र ही नहीं विश्व के प्राणिमात्र का कल्याण होता है। शम्बूक शूद्रवर्ग की उभरती हुई चेतना का प्रतीक न होकर प्रमाद का प्रतीक था। कारण कि जिन शास्त्रों के अनुसार तपस्या का महत्त्व है, तपस्या से स्वर्गप्राप्ति कही गयी है, उन्हीं शास्त्रों में शूद्र के लिए तपस्या वर्जित भी है। क्या आधी मुर्गी पकाने और आधी अण्डा देने के काम में आ सकती है ? इसी तरह उन्हीं शास्त्रों का कोई अंश स्वीकार कर लेना, अन्य अंश छोड़ देना क्या उचित है ? वैसा करना चेतना नहीं प्रमाद है। जो जिसमें अधिकृत है उसे छोड़ कर अन्य अच्छे कर्म में भी प्रवृत्ति प्रमाद है, अपराध है और ऐसा करनेवाला दण्डनीय भी है। उदाहरणार्थ मार्गदर्शक या एक यातायातनियामक आरक्षी ( पुलिस ) यदि अपना काम छोड़कर किन्हीं सभ्य पुरुषों की हमलावर गुण्डों से रक्षा करने के काम में भी लग जाता है तो वह दण्डनीय है। गुण्डों से सभ्य पुरुषों की रक्षा करना अच्छी बात है, परन्तु यदि इसी बीच यातायात का नियन्त्रण न होने के कारण मोटर आदि का एक्सीडेण्ट हो जाने से अनेकों सभ्य पुरुषों की मृत्यु हो जाय तो उसका उत्तरदायित्व उसी पर होगा और वही होगा दण्ड का भागी। एक न्यायाधीश की दृष्टि में किसी हत्यारे को फाँसी देना आवश्यक है फिर भले ही उसकी फाँसी से उसके बूढ़े माँ-बाप अनाथ हो जायें, उसकी विधवा स्त्री और छोटे-छोटे बच्चे अनाथ होकर घोर विपत्ति में पड़ जायें। दया करना बहुत अच्छी बात होने पर भी उस न्यायाधीश का दया करके हत्यारे को फाँसी न देना प्रमाद होगा। उसी तरह एक शासक जो धन, धर्म तथा मर्यादाओं की रक्षा के लिए उत्तरदायी है, उसका स्वकर्तव्यविमुख अन्य के कर्म में तल्लीन नागरिक को दण्ड देना अत्यावश्यक है। यदि कोई सफाई-विभाग या हेल्थ डिपार्टमेण्ट का अधिकारी बिना त्यागपत्र दिये तथा दूसरे अधिकारी को बिना चार्ज दिये अपना काम छोड़कर आसन, प्राणायाम या तपस्या में रत हो जाय और सफाई में गड़बड़ी होने से कॉलरा फैल जाय तथा कई नागरिकों की मृत्यु हो जाय तो उस काण्ड का उत्तरदायी और दण्ड्य वह अधिकारी ही होगा, अन्य नहीं । इस तथ्य को दृष्टि में रखते हुए यदि स्वकर्तव्यविमुख होकर तपस्या मे लगने के कारण शम्बूक को श्रीराम ने दण्ड दिया, तो वह सर्वथा उचित ही है। दण्ड्य को दण्ड नहीं देनेवाले और अदण्ड्य को दण्ड देनेवाले शासक समानरूप से दोषी होते हैं। श्रीराम ने जैसे स्वकर्तव्यविमुख शम्बूक शूद्र को दण्ड दिया वैसे ही स्वकर्तव्यविमुख रावण जैसे ब्राह्मण को भी दण्ड दिया था। अतः सचमुच नीति, प्रीति, परमार्थ तथा स्वार्थ का वेत्ता श्रीराम के समान अन्य कोई नहीं हुआ— “नीति प्रीति परमारथ स्वारथ । कोउ न राम सम जान जथारथ ।।” (रा० मा० २।२५२।३) उच्छृङ्खलता और धर्मनियन्त्रण दोनों परस्पर विरुद्ध ही हैं। एक के उन्मेष में दूसरे की मृत्यु निश्चित है। उच्छृङ्खलता के उज्ज्रीवन से विश्व में विप्लव होगा, उसके विनाश एवं धर्मनियन्त्रण के रक्षण से विश्व का कल्याण होगा। इसी लिए श्रीराम ने देवता, दानव, ब्राह्मण, शूद्र सभी के कल्याणार्थ उच्छृङ्खलता का वध कर धर्मनियन्त्रण का रक्षण किया। यही है शम्बूक के वध से ब्राह्मणपुत्र की रक्षा का अभिप्राय । सीता के शपथ के सम्बन्ध में कौसल्यान की कल्पना है—“श्रीराम ने कहा कि किसी के अपमान की कोई हद होती है। अपनी प्राणप्रिया सीता का मैं अनन्त अपमान कर चुका था। जो सीता सारे राजसुखों का त्याग

कर वन-वन भटकने के लिए मेरे साथ चली आयी थी, जिस सीता ने मेरे वल्कलवसन धारण करने पर स्वयं भी वल्कल- वसन धारण कर लिये थे, जिस सीता ने गङ्गातरण के समय मेरे सकुशल अयोध्या लौट आने पर अनेक मन्नतें (मान- ताएँ) मानी थीं, जो सीता ऋषिपत्नी अनसूया की आज्ञा मानकर उसके द्वारा प्रदत्त वस्त्राभूषणों को पहनकर वन में भी मेरे पास आयी थी, जिस सीता ने मुझसे निरपराध प्राणियों के न मारने और अहिंसाधर्मपालन करने का अनुरोध किया था, जिस सीता ने उस स्वर्णवर्ण कपटमृग को जीवित या मृत अवस्था में लाने के लिए मुझे उसके पीछे दौड़ाया था, जिस सीता की सुरक्षा के लिए मैं लक्ष्मण को उसके पास छोड़ आया था, जिस सीता ने अपनी तनिक भी चिन्ता न कर लक्ष्मण को मेरी सहायता के लिए जाने को मजबूर किया था, जिस सीता को रोती बिलखती अवस्था में रावण उठाकर ले गया था, जिस सीता को रावण ने अनेक प्रलोभन दिये थे और जिसने मेरे मुकाबले में रावण को हमेशा नगण्य समझा था, जिस सीता को रावण ने केवल दो मास और जीवित रहने की धमकी दी थी, जो इससे भी टस से मस नहीं हुई थी, जिस सीता ने परपुरुष के शरीर तक का स्पर्श न करके अपनी मर्यादा को निभाने के कारण हनुमान् की पीठ पर बैठने से इनकार कर दिया था, जिस सीता के चरित्र पर सन्देह करके मैंने रावणवध के अनन्तर उसे अन्यत्र जाने के लिए कह दिया था, जिस सीता ने अपने पातिव्रत्य धर्म को निष्कलङ्क सिद्ध करने के लिए अग्नि में प्रवेश किया था, जिस सीता को मूर्तिमान् अग्निदेव ने मुझे समर्पित कर उसकी पवित्रता को प्रमाणित किया था और जिसे मैंने सहर्ष स्वीकार किया था, जिस सीता को भद्र की अशुभ सूचना पर मैंने त्याग दिया था और जिसके चरित्र की परिशुद्धता को मुनि वाल्मीकि ने प्रमाणित किया था, उसी सीता को मैंने एक बार फिर भरी सभा में अपनी शुद्धता को प्रमाणित करने के लिए शपथ ग्रहण करने को कहा। मुझे इसमें अब कोई सन्देह नहीं कि मेरे जैसे लोका- पवादभीरु पति के साथ रहने की अपेक्षा सीता ने, उस भूमिपुत्री ने, पुनः भूमि में ही समा जाना श्रेयस्कर समझा। उस समय सीता तपस्विनियों के अनुरूप गेरुवा वस्त्र धारण किये हुए थी। सारी उपस्थित जनमण्डली की ओर करबद्ध मुद्रा अपनाये हुए वे बोलीं-मैं श्रीरघुनाथ के सिवा किसी भी पुरुष का मन से भी चिन्तन नहीं करती; यदि यह सत्य है तो भगवती पृथ्वी मुझे अपनी गोद में स्थान दें। श्रीराम को छोड़कर मैं किसी दूसरे पुरुष को नहीं जानती, यदि यह कथन सत्य है तो भगवती पृथ्वी मुझे अपनी गोद में स्थान दें। पृथ्वी माता ने विवर दे दिया। सभी लोगों के देखते-देखते जानकी रसातल प्रयाण कर गयी। वहाँ एकत्रित जनता नाना प्रकार की भिन्न-भिन्न भावनाओं से ग्रस्त हो उठी। मैंने मिथलेशकुमारी के चरित्र पर प्रश्न चिह्न लगाया था और उसने स्वप्न में भी मेरे बारे में अन्य कुछ न सोचा था। मैं पातकी सिद्ध हुआ और वह पतितपावनी। ऋषि-मुनि ही नहीं सभी राक्षस तथा वानर भी पुकार उठे :-साध्वी सीते तुम धन्य हो....।।" कौसल्यायनने अपने बौद्ध स्वभाव के कारण यहाँ भी श्रीराम के द्वारा मैं पातकी हूँ इत्यादि दुष्कल्पना करा ही डाली। परन्तु भाव, कुभाव किसी तरह श्रीरामाचरित पढ़ते-पढ़ते कौसल्यायन की बुद्धि ठिकाने आ गयी और उन्होंने श्रीसीता के निर्मल चरित्र का यथावत् वर्णन कर डाला। सीता का अग्निप्रवेश स्वीकार किया और मूर्तिमान् अग्निदेव ने सीता को राम के लिए समर्पण किया-यह मान लिया और यह दुस्तर्क नहीं किया कि कोई मनुष्य अग्नि में प्रविष्ट होकर जीवित कैसे निकल सकता हैं, अग्नि मूर्तिमान् देवता कैसे हो सकता हं और वह सीता को समर्पित कैसे कर सकता हैं ? कौसल्यायन के राम कहते हैं-"श्रीलक्ष्मण ने हाथ में जल लिया और प्राणवायु का अवरोध कर वहीं शान्त हो गये। तब विभीषण को मैंने आशीर्वाद दे दिया। जबतक पृथ्वी रहेगी और जबतक संसार में मेरी कथा प्रचलित रहेगी तबतक इस भूतल पर तुम्हारा राज्य रहेगा। हनुमान् से भी मैंने कहा-हरीश्वर ! जबतक संसार में मेरी कथाओं का प्रचार रहे तबतक तुम भी मेरी आज्ञाओं का पालन करते हुए प्रसन्नतापूर्वक विचरते रहना। जाम्ब-