भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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"सीतामादाय हस्तेन मधु मैरेयकं शुचि । पाययामास काकुत्स्थः शचीमिव पुरन्दरः ॥” ( वा० रा० ७।४२।१९ ) का अर्थ यह है कि काकुत्स्थ श्रीराम ने अपने हाथ से पवित्र मैरेयक मधु श्रीसीता को पिलाया जैसे इन्द्र शची को पिलाते हैं । 'शुचि' विशेषण शराब का नहीं हो सकता । पुनः कौसल्यायन की--"दूसरों के मन को रिझानेवाले पुरुषों में श्रेष्ठ मैं उत्तम वस्त्राभूषणों से भूषित उन मनोरम रमणियों के साथ रमण करता था ।"--यह भी अशुद्ध व्याख्या है । प्रकृत श्लोक यह है-- “मनोभिरामा रामाश्च रामो रमयतां वरः । रमयामास धर्मात्मा नित्यं परमभूषिताः ।।” ( वा० रा० ७।७२।२२ ) इसका आशय यों समझना चाहिए- "एष ह्येवानन्दयति” ( तै० उ० २।७ ) यह परमात्मा ही सब प्राणियों को अनेक आनन्द से आनन्दित करते हैं- इस तथ्य के अनुसार प्राणिमात्र को आनन्दित ( सुखी ) करनेवाले धर्मात्मा राम ने उन ब्रह्म में रमण करनेवाली अभिरामा रामाओं को रमण कराया ( सन्तुष्ट किया ) । टीकाकारों ने 'तोषयामास' यह अर्थ किया है । अन्यथा 'धर्मात्मा' विशेषण सङ्गत नहीं होगा; क्योंकि अविवाहित स्त्रियों से रमण करनेवाला धर्मात्मा नहीं हो सकता । साथ ही यह भी ध्यान देने योग्य है कि यदि प्रकृत श्लोक में 'रेमे' पाठ होता, तभी 'रमण करना' अर्थ हो सकता था, यहाँ तो 'रमयामास' पाठ है । उसका अर्थ होता है—'रमण कराना' सुखी या आनन्दित करना । श्रीरामचन्द्र का एकपत्नीव्रत प्रसिद्ध ही है । इसी प्रकार पुरवासियों के द्वारा सीतासम्बन्धी आरोपों का अपने लक्ष्मण, भरत आदि भाइयों के प्रति किये गये समाधान में भी कौसल्यायन ने लीपा-पोती करके लङ्का की अग्निपरीक्षा को छिपा डाला है । प्रकृत में भी “निर्दोष मम सन्निधौ” ( वा० रा० ७।४७।१३ ) से लक्ष्मण ने कहा है कि आप मेरे समक्ष अग्निपरीक्षा से निर्दोष सिद्ध हो चुकी हैं, किन्तु ऐसी पुनीतचरिता आपका राजा ने परित्याग कर दिया, क्योंकि वह लोकापवाद से भीत हैं । "मैं अपनी अन्तरात्मा से सीता को निष्कलङ्क मानता था, इसलिए उसे यहाँ अपने साथ अयोध्या लाया ।” ( रा० क० पृ० २७४ ) इसका आधारभूत वाल्मीकिरामायण में कोई श्लोक नहीं है । इसी तरह कौसल्यायन के अनुसार राम ने कहा- "मैंने साध्वी सती सीता का त्याग किया । मैं जानता हूँ, इसके लिए लोग मुझे कभी क्षमा न करेंगे और न उन्हें क्षमा करना चाहिये । हो सकता है आगे चलकर कोई मुझे निर्दोष सिद्ध करने के लिए सारा दोष दैव के माथे मढ़ डाले । अथवा मेरी या किसी के पूर्वजन्म की घटना को इसका जिम्मेदार ठहराये; किन्तु यह सारा दोष भी नासमझी का था। निःसन्देह सीता मेरी पत्नी थी । उसे त्यागने या अपनाने का मुझे जन्मसिद्ध अधिकार प्राप्त था; किन्तु क्या एक नागरिक के नाते सीता का अपना स्वतन्त्र व्यक्तित्व न था । यदि मैं उसके पति के साथ साथ अयोध्या का नरेश न होता या केवल उसका पति ही होता तो क्या वह मेरे ही दरबार में मेरे इस निर्णय के विरुद्ध अपील न कर सकती थी । मेरे बारे में सूत का विचार सुनकर लक्ष्मण ने ठीक ही कहा था- सूत ! सीताजी के बारे में अन्यायपूर्ण बात करनेवाले इन पुरवासियों के कारण ऐसे कीर्तिनाशक कर्म में प्रवृत्त होकर श्रीरामचन्द्र ने किस धर्मराशि का उपार्जन कर लिया है ?” परन्तु यह सब निराधार है । महर्षि वाल्मीकि निर्मित रामायण के अनुसार श्रीराम ने ऐसा विचार कहीं भी प्रकट नहीं किया है । जन्मान्तरीय हेतुओं से कितनी ही घटनाएँ होती हैं । सूत ने जो भी कहा था वह सही ही है । बुद्धदेव ने भी तो आनन्द और चाण्डालकन्या के सम्बन्ध में जन्मान्तरीय बातों का उल्लेख किया ही है । कौसल्यायन के अनुसार श्रीराम ब्राह्मणपुत्र का मरण और शम्बूक शूद्र की तपस्या तथा शम्बूक के वध से ब्राह्मण के पुत्र के जीवित होने की सब बात वाल्मीकि के अनुसार ही वर्णन करते हैं । इसके बाद कौसल्यायन निराधार