भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 198, कुल 1049 में से

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पृष्ठ 198

अध्याय बौद्धों द्वारा विकृत रामचरित १२१ सभ्य बौद्ध भी शूर्पणखा का पक्ष लेने को कभी भी प्रस्तुत नहीं हो सकता है । जिसका कोई भी धर्म और सदाचार है वह शूर्पणखा की भर्त्सना ही करेगा और लक्ष्मण ने वही दण्ड दिया जो ऐसी कुलटाओं के लिए उचित था । हाँ कौसल्यायन ने--'रावण को ब्रह्मा ने शाप दिया था कि तू आज से किसी दूसरी नारी के साथ बल- पूर्वक समागम करेगा तो तेरे मस्तक के सौ टुकड़े हो जायेंगे' इसमें संशय नहीं किया और इस बात को स्वीकार कर लिया । विभीषण के सम्बन्ध में भी कौसल्यायन ने अनर्गल कल्पना की है- 'इतिहास में जब तक राम रावण की कहानी मुंह से सुनी-सुनायी जाती रहेगी । तब तक लोग विभीषण को भ्रातृद्रोही तथा देशद्रोही के रूप में ही स्मरण करते रहेंगे ।' यह भी निराधार है; क्योंकि वाल्मीकिरामायण में इस प्रकार का कोई उल्लेख नहीं है । वस्तुस्थिति तो यह है कि असत्य एवं अन्याय का पक्ष सर्वथा ही त्याज्य है । रावण असत् पक्ष पर था, उसका त्याग ही प्रशंसनीय है । श्रीशुक्रादि नीतिज्ञों ने तभी तो कहा है- "न्याय के रास्ते पर चलनेवाले के साथ पशु-पक्षी आदि भी हो लेते हैं; परन्तु अन्याय के रास्ते पर चलनेवाले का तो उसका सगा भाई भी साथ छोड़ देता है- "यान्ति न्यायप्रवृत्तस्य तिर्यञ्चोऽपि सहायताम् । अपन्थानं तु गच्छन्तं सोदरोऽपि विमुञ्चति ॥" ( अनर्घराघव १।४ ) 'समुद्र मूर्तिमान् होकर श्रीराम के सामने आया । नल विश्वकर्मा का पुत्र था । समुद्र के परामर्शानुसार उसने पाँच दिनों में सौ योजन लम्बे समुद्र पर पुल बाँध दिया ।' यह कौसल्यायन ने स्वीकार किया है । आश्चर्य है एक तरफ नास्तिकता और दूसरी तरफ ऐसी चमत्कारपूर्ण बातों में विश्वास करना, दोनों का सम्बन्ध कैसे हो गया ? कौसल्यायन का यह कथन भी-- "मेरे मन में इसका खेद है कि मैंने आँख के ओझल रहकर वाली को क्यों बींध डाला।" ( रा० क० पृ० २१ ) निराधार है । 'गरुड़ ने नागपाश से छुड़ाकर राम को व्रणमुक्त किया ।' इस बात में कौसल्यायन को विश्वास करना पड़ा । ( रा० क० पृ० २११ ) 'औषधियों को सूंघकर लक्ष्मण स्वस्थ हो गये ।' आदि में भी विश्वास करने से प्राणी आस्तिकता की ओर आता ही है । 'देवराज इन्द्र का रथ राम की सहायता के लिए आया । श्रीराम ने युद्ध में रावण को मारा ।' यह सब कौसल्यायन को स्वीकृत है । "विदेहकुमारी ने अग्निदेव की परिक्रमा की और निःशङ्क चित्त से अग्निचिता में समा गयीं । जनसमुदाय ने मिथिलेशकुमारी को इस जलती हुई चिता में प्रविष्ट होते देखा । 'साँच को आँच नहीं' की कहावत प्रसिद्ध ही है । सीता के सतीत्व ने उसकी रक्षा की । दीप्त अग्निशिखा ने उसके रोममात्र को भी स्पर्श नहीं किया ।" ( रा० क० पृ० २३९ ) आधुनिक लोग इस बात में विश्वास नहीं कर सकते कि कोई स्त्री अग्निचिता में प्रविष्ट हो सकती है ? और उसमें से जीवित पुनः निकल आना तो और भी कठिन है; परन्तु शायद भूलकर ही सही कौसल्यायन ने ऐसा स्वीकार कर लिया । श्रीभरत हनुमान् के मुख से श्रीराम के आगमन का समाचार सुनकर बड़े प्रसन्न हुए और उस प्रियाख्यान के बदले में एक सहस्र गायें, सौ ग्राम तथा शुभ आचरणवाली हेमवर्ण सर्वाभरणसम्पन्न सकुण्डला १६ कन्याओं को प्रदान किया । कौसल्यायन कहते हैं--'उस बालब्रह्मचारी पवनसुत को सोलह कन्यायें किस लिये दी ।' पर कौसल्यायन यह नहीं जानते, वह तो प्रियाख्यान का पुरस्कारमात्र था । वैसे गायें और ग्राम भी हनुमान् के किस काम के थे ? जैसे देवतादि की प्रसन्नता के लिए ब्राह्मण-भोजन आदि कराये जाते हैं, वैसे ही हनुमान् की प्रसन्नता के लिए श्रीभरत ने गायें, ग्राम तथा कन्याएँ प्रदान की थीं । उत्तरकाण्ड में भी कौसल्यायन ने श्लोक का मनमाना अर्थ किया है। वे कहते हैं- "जैसे इन्द्र शची को मधु ( सुरा ) का पान कराते थे वैसे ही मैंने ( राम ने ) ही सीता को हाथ से पकड़ कर मैरेय शराब पिलाया ।" वस्तुतः-- १६

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