रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 197, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ें१२० रामायणमीमांसा पञ्चम अन्यथा मधुशाला होती मधुवन का उल्लेख न होता, अतः मधुपान से शराब पीना और हनुमान्जी ने भी अधिक पो ली थी इत्यादि कल्पनाएँ निराधार हैं। कौसल्यायन लिखते हैं कि “श्रीराम कहते हैं आज मेरे पास पुरस्कार देने योग्य वस्तु का अभाव है; यह बात मेरे मन में बड़ी कसक पैदा कर रही है। यहाँ जिसने मुझे ऐसा प्रिय संवाद सुनाया उसका मैं कोई वैसा प्रिय कार्य नहीं कर पा रहा हूँ” परन्तु यह उनका अनुवाद अशुद्ध है। मूल श्लोक है— “इदं तु मम दीनस्य मनो भूयः प्रकर्षति । यदिहास्य प्रियाख्यातुर्न कुर्मि सदृशं प्रियम् ॥” सीतावियोगजनित दीनता के कारण मेरे मन की यह स्थिति और कष्ट पहुँचाती है कि जिसने मुझे प्रिय संवाद सुनाया उसका उसके सदृश उपकार नहीं कर रहा हूँ। यहाँ पुरस्कार देने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। क्यों ? श्रीहनुमान् किसी वस्तु की अपेक्षा नहीं रखते हैं। श्रीराम ने अपने पराक्रम से सुग्रीव को राज्य प्रदान किया। कोई भी वस्तु उनकी आज्ञा के अनुसार सुग्रीव प्रदान कर सकते थे। विभीषण को भी श्रीराम ने लङ्काधिपति बना दिया था। वैसे भी वाल्मीकिरामायण के अनुसार श्रीराम परब्रह्म परमात्मा ही हैं। सङ्कल्पमात्र से वे सब प्रदान कर सकते हैं। फिर वे यह कैसे कह सकते हैं कि आज,मेरे पास पुरस्कार देने योग्य वस्तुओं का अभाव है। अतः कौसल्यायन का उक्त अर्थ निराधार ही है। इसी प्रकार—“इस समय इन महात्मा हनुमान् को मैं अपना प्रगाढ़ आलिङ्गन प्रदान करता हूँ; क्योंकि यही मेरा सर्वस्व है।” यह भी कौसल्यायन का अर्थ अशुद्ध है। श्लोक यों है— “एष सर्वस्वभूतस्तु परिष्वङ्गो हनूमतः । मया कालमिमं प्राप्य दत्तस्तस्य महात्मनः ॥” (वा० रा० ६।१।१३) हनुमत्कृत प्रिय सीताख्यान के सदृश प्रियान्तर न देखते हुए आत्मपरिष्वङ्ग को ही तत्तुल्य देखकर श्रीराम ने हनुमान् के लिए वही आत्मपरिष्वङ्ग (प्रगाढ आलिङ्गन) प्रदान किया है; क्योंकि भगवद्देह शुद्ध आनन्दरूप होने से उसका आलिङ्गन ही भगवान् का सर्वस्व है। आनन्दस्वरूप ब्रह्म ही माया या दिव्यलीलाशक्ति में राम-देह के रूप से भासमान होता है। यही बात गीता और विष्णुसहस्रनाम के भाष्य आदि में स्पष्टरूप से वर्णित है। ब्रह्मपरिष्वङ्ग और ब्रह्मप्राप्ति दोनों एक ही वस्तु हैं। वही सर्वोत्कृष्ट वस्तु है, वही सीताप्रियाख्यान के सदृश हो सकता है। उसी का प्रदान हनुमान् के लिए उपयुक्त हो सकता है। कौसल्यायन ने बीच बीच में रामकथा के साथ अपनी नोन-मिर्च लगायी है, जिसका वाल्मीकिरामायण के श्लोकों से कोई सम्बन्ध नहीं है। “सच्ची बात यह थी कि यह सारा वैर-विरोध लक्ष्मण के कारण आरम्भ हुआ था। शूर्पणखा मेरे पास और बाद में लक्ष्मण के पास प्रणय का निवेदन करने ही तो आयी थी। हमें एक गम्भीर पुरुष की तरह उसे समझा देना चाहिये था कि हम दोनों भाई विवाहित हैं। हम दोनों में से कोई भी उसे अङ्गीकृत करने में असमर्थ हैं, किन्तु हमें थोड़ा विनोद करने की सूझी। मैंने शूर्पणखा को लक्ष्मण के पास भेजा और उसने बेचारी को दो दो बार मेरे पास वापस लौटाया। बेचारी तङ्ग आ गयी होगी। उसे लगा होगा कि सीता ही उसके मार्ग का काँटा है। वह सीता की ओर लपकी थी। लक्ष्मण ने उसके नाक-कान काटकर उसे कुरूप बना दिया। यदि लक्ष्मण ऐसी अनुत्तरदायित्वपूर्ण बात न करता तो सम्भवतः हमारा रावण से किसी प्रकार का वैर-विरोध न होता इत्यादि।” (रामकहानी पृ० १९७) यह सब कौसल्यायन की कल्पना निराधार है। वाल्मीकिरामायण के राम ने ऐसा न सोचा ओर न कहा ही है। शूर्पणखा के दलाल तो बौद्ध ही या असभ्य बौद्ध ही हो सकते हैं। सदाचारी,