रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशक्ति लङ्किनी पर नियन्त्रण स्थापित किया, उसी तरह सात्त्विकी शक्ति सुरसा को भी अपनी दक्षता से वशीकृत किया था। यह उचित ही था और सम्भव भी था ही। रामायण केवल आधिदैविक ऐतिहासिक ही कथा नहीं है, किन्तु वह आध्यात्मिक कथा भी है। श्रीराम आत्मा हैं, हनुमान् शुद्ध मन हैं, संसार समुद्र है, देह लङ्का है। अहङ्कार रावण है। शान्ति सीता हैं। संसाररूप समुद्र पार करने में सात्त्विकी, राजसी और तामसी प्रवृत्तियाँ बाधिका होती हैं। शुद्ध मन को उनका मुकाबला करना पड़ता है। तामसी प्रवृत्तियों को सर्वथा समास कर राजसी प्रवृत्ति का नियन्त्रण आवश्यक होता है। उसके पहले सात्त्विकी प्रवृत्तिशक्ति का आशीर्वाद ग्रहण करना पड़ता है। इन सब कामों के लिए धीरता, दक्षता, बुद्धिमत्ता, प्रबलता और पराक्रम की अपेक्षा होती है। जो केवल प्रत्यक्षवादी हैं, वे तो हनुमान् के समुद्रोल्लङ्घन में भी विश्वास नहीं कर सकते। वे बुद्ध की सर्वज्ञता में भी विश्वास नहीं कर सकते, परलोक एवं कर्मफल में भी विश्वास नहीं कर सकते। जो अनुमान और आगम में विश्वास करते हैं, उनके लिए श्रीहनुमान् की बाललीलाओं में किसी प्रकार की असङ्गति नहीं हो सकती। 'यद्यपि हनुमान् ने सौ योजन की दूरीवाले समुद्र को पार किया था तो भी उन्हें किसी प्रकार की थकावट नहीं हुई' ऐसा वाल्मीकि का कथन है। कौसल्यायन कहते हैं—"जहाँ तक समुद्र की चौड़ाई और लम्बाई का प्रश्न है वह अयथार्थ है। १०० योजन का मतलब ८०० मील है। आज की लङ्का भारततट से मुश्किल से ३० या ३२ मील है।" परन्तु कौसल्यायन को मालूम होना चाहिए कि जिसे बौद्ध श्रीलङ्का कहते हैं वह सिंहलद्वीप है। लङ्का नहीं है। श्रीभागवत आदि में सिंहलद्वीप से अतिरिक्त लङ्काद्वीप का वर्णन है। विभीषण के आग्रह से श्रीराम ने लङ्का को अगम्य बना दिया था। यह कथा भी पद्मपुराण आदि में वर्णित है। थोड़ी देर के लिए मान भी लिया जाय कि ३२ मील ही लङ्का है; परन्तु कोई बन्दर या मनुष्य इतने बड़े समुद्र को भी बिना नाव, जहाज या वायुयान का आश्रयण किये क्या पार कर सकता है ? कौसल्यायन वाल्मीकिरामायण को सत्य लेख मानते हैं, तो उनकी उक्ति को अप्रामाणिक कहना कहाँ तक सङ्गत है। कौसल्यायन कहते हैं—"अब राम न मांस खाते हैं, न शराब पीते हैं, पाँचवें दिन जङ्गली फल मूल खाकर रह जाते हैं।" “न माँस राघवो भुङ्क्ते न चैव मधु सेवते। वन्यं सुविहितं नित्यं भक्तमश्नाति पञ्चमम् ॥” ( वा० रा० ५।३६।४१ ) यहाँ कौसल्यायन ने "अब" अपनी तरफ से मिलाया है, मूल में वैसा कोई भी शब्द नहीं है। मूल का अर्थ यह है—श्रीराम मधु, मांस का सेवन नहीं करते, सुविहित आरण्यक भक्त ही प्रातः, सङ्गव, मध्याह्न और अपराह्न इन चार कालों को बिताकर पञ्चम अर्थात् सायाह्न में भोजन करते हैं। सीता ने अग्नि से प्रार्थना की थी—यदि मैंने पति की सेवा की है और यदि मुझमें तपस्या का बल है तो तुम हनुमान् के लिए शीतल हो जाओ, ऐसा ही हुआ। हनुमान् ने अपनी पूँछ से समस्त लङ्का जला दी; किन्तु स्वयं हनुमान्जी नहीं जले। इस चमत्कार में बौद्ध कौसल्यायन को भी इनकार करना असम्भव हो गया। समुद्र लांघकर हनुमान्जी अपने सैन्यदल में वापिस आये। कौसल्यायन ने लिखा है कि "सब वानर मधुवन पहुँचे और सब ने जीभर मधुपान किया। स्वयं हनुमान् ने भी इतनी अधिक पी ली थी कि उसे होश नहीं रहा था।" परन्तु यह सब कौसल्यायन की कल्पना ही है। मधुवन में मधुर फल और मधु (शहद) पर्याप्त था। वे फल और शहद मादक भी थे। यहाँ मधुपद से शराब नहीं गृहीत है।