रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११८ रामायणमीमांसा पञ्चम “एवमुक्तस्तु रामेण वाली प्रव्यथितो भृशम् । न दोषं राघवे दध्यौ धर्मेऽधिगतनिश्चयः ॥ प्रत्युवाच ततो रामं प्राञ्जलिर्वानरेश्वरः । यत्त्वमात्थ नरश्रेष्ठ तत्तथैव न संशयः ॥” (वा० रा० ४।१८।४४।४५।४८) मिथ्या वासुदेव राम ने इन श्लोकों को छिपाकर अर्थ का अनर्थ किया है । वाली ने स्वयं अङ्गद की रक्षा की प्रार्थना की थी । श्रीराम ने वाली को आश्वस्त किया और तत्त्वार्थयुक्त साधुसम्मत वाणी से आश्वासन देकर कहा-“अब तुम्हें अपने सम्बन्ध में और हम लोगों के सम्बन्ध में चिन्ता नहीं करनी चाहिये, क्योंकि धर्म के सम्बन्ध में हमारा निश्चय तुम्हारी अपेक्षा अधिक है। जो दण्ड्य को दण्ड देता है और जो दण्डित होता है दोनों ही कार्य-कारण द्वारा कृतार्थ होते हैं। अवसाद को नहीं प्राप्त होते । तुम दण्ड-व्याज से विगतकल्मष होकर दिष्टमार्ग से अपनी धर्म्या प्रकृति पर स्थित हो गये हो। शोक, मोह और हृदयस्थित भय को त्याग दो। दैवविधान का कोई भी अतिवर्तन नहीं कर सकता। अङ्गद जैसे तुम्हारे संनिधान में स्वस्थ और प्रसन्न था वैसा ही सुग्रीव और मेरे संनिधान में सुखी रहेगा।” मधुर वचन से राम द्वारा धर्मपथानुवर्ती वार्ता सुनकर वाली ने कहा—मैंने अनजान में जो कहा था उसे क्षमा कीजिये— “इदं महेन्द्रोपम भीमविक्रम प्रसादितस्त्वं क्षम मे हरीश्वर ॥” (वा० रा० ४।१८।६६) इसी तरह अन्य भी छोटी-छोटी बातों पर कौसल्यायन ने विचार किया है। हनुमान् महाबलवान् थे। उन्होंने अपना बड़ा रूप बनाया “चकार रूपं महदात्मनस्तदा ।” (वा० रा० ४।६६।३८) । पर सुन्दरकाण्ड के प्रसङ्ग में कौसल्यायन ने कहा है-“हनुमान् के बल-वैभव तथा बुद्धि का चमत्कार दिखानेवाली जो बालकथाएँ प्रचलित हैं, उन्हें ऐतिहासिक तथ्य मानने की कोई आवश्यकता नहीं है तथा गढ़नेवालों ने सचमुच कमाल किया है। हनुमान् के बारे में कहा है कि जब वे बालक थे तो उन्होंने सूर्य को अपने मुख में रख लिया था। उस सूर्य को जो पृथ्वी से भी कई गुना बड़ा है। फिर, यह भी कहा कि जब हनुमान्जी लङ्कापुरी जाने के लिए समुद्र पर से उड़े चले जा रहे थे तब सुरसा नाम की एक राक्षसी ने उन्हें निगल जाने के लिए अपना मुँह खोला और हनुमान्जी ने अपने शरीर का आकार इतना बढ़ा लिया कि वह किसी भी तरह उन्हें निगल न सकी । तब सुरसा ने अपना मुँह और अधिक खोला । हनुमान्जी ने भी अपना आकार और बढ़ा लिया। यह क्रम यहाँ तक चला कि हनुमान्जी सैकड़ों मील के हो गये, तब सुरसा सौ योजन की हो गयी। कुछ लोगों को आज भी ऐसी गप्पों में रस आता हैं।” पर साथ ही हनुमान् का समुद्र पार कर लङ्का जा पहुँचना इस बात पर कौसल्यायन भी विश्वास करते हैं। यह अर्धकुक्कुटीन्याय ही तो है। जब एक बन्दर सौ योजन समुद्र पार कर सकता है तो फिर उसके सम्बन्ध में और चमत्कार के न मानने में तर्क भी क्या है ? बुद्ध अपनी माता के पेट में से ऐसे दिखायी देते थे, जैसे शीशे के पात्र में कोई वस्तु दिखायी दे । बुद्ध को देखते ही गुरु के आश्रम की पाषाणमयी मूर्तियाँ उठ-उठ कर बुद्ध को प्रणाम करने लगीं । बुद्ध की उष्णीषरश्मि ब्रह्मलोक तक पहुँची। जब ऐसी बौद्ध जातकों की कथाएँ सत्य हो सकती हैं, तब आर्ष वाल्मीकिरामायण की उक्तियों में अप्रामाण्य का प्रसङ्ग ही क्यों ? वैदिक कथाएँ तो दर्शनों पर आधारित हैं। सूर्य तेजस्तत्त्व के प्रतिनिधि देवता हैं। हनुमान् वायुतत्त्व के प्रतिनिधि देवता हैं। संवर्गविद्या के अनुसार वायु में पृथ्वी, जल और तेज का अन्तर्भाव होता है। प्राण में वागादि इन्द्रियों का विलयन होता है। अतः हनुमान् के मुख में सूर्य का अन्तर्भाव असम्भव नहीं है। इस तरह सुरसा एक सात्त्विक दैवी प्रवृत्ति शक्ति है। हनुमान् ने जैसे छायाग्राहिणी तामसी शक्ति पर विक्रम से विजय प्राप्त की, राजसी