भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 194, कुल 1049 में से

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अध्याय बौद्धों द्वारा विकृत रामचरित ११७ मार्कण्डेयपुराण के अनुसार जैमिनि ने विन्ध्यारण्यनिवासी तत्त्वज्ञ पक्षियों से ज्ञान प्राप्त किया था । इससे पक्षियों का भी तत्त्वज्ञान में अधिकार सिद्ध है । गृध्रराज जटायु का भगवान् राम ने ही दाह आदि संस्कार किया था । सम्पाति ने भी अपने भ्राता का मरण सुनकर तर्पण किया था । यह सब वाल्मीकिरामायण से सिद्ध ही है । ये सब सामान्य वानर या पक्षी नहीं थे । कोई सूर्य के अंश से, कोई इन्द्र के अंश से, कोई ब्रह्मा के अंश से और कोई अग्नि के अंश से श्रीराम की सहायता के लिए वानररूप में अवतीर्ण हुए थे। वाली चारों समुद्रों में सन्ध्या के लिए जाता था । अतः वे निषेध के उल्लङ्घन से अवश्य दण्डनीय हैं । अपराध निश्चय न होने से ही प्रमाणरूप में साक्षी आदि की अपेक्षा होती है । यहाँ तो दण्ड देनेवाला और दण्ड पानेवाला—दोनों ही जिसे स्वीकार करते हैं उसके लिए सफाई पेश करने का प्रश्न ही नहीं उठता है । इसी तरह सुग्रीव की मैत्री का भी प्रश्न था । मित्र के शत्रु को शत्रु मान कर उसका वध भी नीतिशास्त्र सम्मत है ही—“वयस्यस्योपकर्तव्यं धर्ममेवानुपश्यता ।” (वा० रा० ४।१८।२९) धर्मदृष्टि से तुम्हें भी धर्म का अनु- वर्तन करते हुए मेरे द्वारा प्राप्त दण्ड को प्रायश्चित्तरूप में स्वीकार करना चाहिये । पाप की जानकारी होने से शिष्ट लोग स्वेच्छापूर्वक राजदण्ड की माँग करते हैं; जैसे लिखित महर्षि ने स्वयं जाकर राजदण्ड ग्रहण किया था । मनु ने दो श्लोक कहे हैं । धर्मकुशल लोगों ने उन्हें स्वीकार किया था । १—राजाओं से दण्ड पाकर पाप करनेवाले मनुष्य निर्मल होकर सुकृतियों के समान ही स्वर्ग को जाते हैं । २—दण्डरूप शासन या मोक्ष अर्थात् छुटकारा होने पर स्तेन पाप से मुक्त हो जाता है । पर स्तेन (चोर) का शासन न करने से राजा उस किल्बिष का भागी होता है— “शक्यं त्वयापि यत्कार्यं धर्ममेवानुवर्तता । श्रूयते मनुना गीतौ श्लोकौ चारित्रवत्सलो ॥ राजभिर्घृतदण्डाश्च कृत्वा पापानि मानवाः । निर्मलाः स्वर्गमायान्ति सन्तः सुकृतिनो यथा ॥ शासनाद्वापि मोक्षाद्वा स्तेनः पापात्प्रमुच्यते । राजा त्वशासन् पापस्य तदवाप्नोति किल्बिषम् ॥” (वा० रा० ४।१८।३०-३२) मेरे कुल के ही आर्य मान्धाता ने किसी के ऐसा ही पाप करने पर उसे दण्ड दिया था । अन्य राजाओं ने भी प्रमत्त पुरुषों द्वारा किये गये पापों की शुद्धि के लिए दण्डविधान किया है । उसी से पाप नष्ट होता है, इसलिए तुम्हें परिताप न करना चाहिये, यह शास्त्रानुसार ही है । हम लोग भी शास्त्रपरतन्त्र ही हैं, स्वतन्त्र नहीं । (वा० रा० ४।१८।३३-३५) धर्मकोविंद मृगयार्थी भी शिकार में विविध जालों एवं कूट उपायों से मृगों को मारते हैं । दृश्य या प्रति- च्छन्न, भागते हुए, भयभीत हुए या विश्वस्त हुए मृगों को वे मारते हैं । प्रमत्त, अप्रमत्त और विमुख मृगों को मारना मृगया में धर्म ही है । इसलिए युद्ध बिना भी तुम्हारा वध अनुचित नहीं है । तुम स्वयं धर्म न जान कर परम्पराप्राप्त धर्म में स्थित होने पर भी मुझ पर आक्षेप कर रहे हो । वाली सन्ध्यावन्दन आदि करता था, शास्त्रज्ञ था । उस दृष्टि से भी पूर्वोक्त धर्मोल्लङ्घन के कारण उसका वध शास्त्रीय था । यदि केवल वह मृगमात्र था तो उस दृष्टि से मृगया के दृष्टान्त से उसके वध का समर्थन किया गया है । श्रीराम की उक्त बातों को सुनकर वाली दुःखी हुआ और उसे धर्म का निश्चय हो गया, इसलिए श्रीराम को कोई दोष न देकर उसने उन्हें निर्दोष ही माना और हाथ जोड़कर श्रीराम से कहा—"नरश्रेष्ठ ! आपने जो कहा है वह ठीक है । अपकृष्ट लोग प्रकृष्ट लोगों के सम्बन्ध में कुछ नहीं कह सकते । मैंने प्रमाद से जो अप्रिय वचन कहे हैं, उनसे आप मेरे दोषों का विचार न करें; क्योंकि आप दृष्टार्थ, तत्त्वज्ञ हैं । प्रजा के हित में निरत हैं । कार्य-कारण निश्चय में आपकी अनन्यसदृश बुद्धि स्पष्ट है । धर्म से व्यतिक्रान्त मेरा धर्मयुक्त वाणी से रक्षण करें—

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