रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११६ रामायणमीमांसा पञ्चम तो सुग्रीव से मैं सीता को खोज निकालने के कार्य में किसी प्रकार की सहायता की आशा कैसे कर सकता था ?" इस प्रकार की उक्तियाँ मिथ्या वासुदेवरूप कल्पित राम की ही हो सकती हैं । वाल्मीकिवर्णित मर्यादापुरुषोत्तम राम तो ज्ञान, विज्ञान, नीति, प्रीति और परमार्थ के महान् वेत्ता थे । वे ऐसी ऊल-जलूल बातें सोच भी नहीं सकते थे । वाल्मीकिरामायण के अनुसार श्रीराम ने वाली द्वारा किये गये विविध आक्षेपों का उत्तर देते हुए कहा था कि धर्म, अर्थ और काम के सम्बन्ध में और लौकिक व्यवहार के ज्ञान के बिना बालकपन के कारण तुम मेरी विगर्हणा कर रहे हो, बुद्धिसम्पन्न, आचार्य वृद्धों से बिना प्रश्न किये, वानर-स्वभावसुलभ चपलता के कारण मुझसे कहना चाहते हो । यह शैल, वन, कानन समेत सम्पूर्ण भूमि इक्ष्वाकुवंशीय राजाओं के शासन में है । मृग, पक्षी तथा मनुष्यों के निग्रह-अनुग्रह का उन्हें अधिकार है । इस समय धर्मात्मा भरत समस्त भूमि के शासक हैं। वे स्वयं धर्म, काम तथा अर्थ के तत्त्वज्ञ हैं । वे सत्यवान् तथा ऋजु हैं । उनमें नय और विनय तथा सत्य और विक्रम सु- व्यवस्थित हैं । वह देश और काल के भी ज्ञाता हैं । उन्हीं के धर्मकृत आदेश से पृथ्वी में धर्मविस्तार की दृष्टि से हम भ्रमण करते हैं । धर्मात्मा भरत के शासन में धर्म का विप्रिय करना किसी के लिए भी क्षम्य नहीं है । तुम काम- प्रधान होने के कारण राजमार्ग पर प्रतिष्ठित नहीं हो । ज्येष्ठ भ्राता तथा पिता और जो विद्या प्रदान करता है—ये तीनों ही धर्मपंथ पर वर्तमान होकर पिता के तुल्य ही माने जाते हैं। छोटा भाई, पुत्र तथा शिष्य—ये तीनों ही पुत्र- वत् चिन्त्य होते हैं । सत्पुरुषों का सूक्ष्म धर्म परम अविज्ञेयरूप से सब प्राणियों के हृदय में रहता है । वह शुभ- अशुभ सब जानता है । तुम स्वयं चपल वानर अकृतात्मा चपल वानरों के साथ वैसे ही विफल मन्त्रणा करते हो जैसे जात्यन्ध जन्मान्ध लोगों के निर्देशन में चलते हैं । तुम भ्राता की भार्या के साथ सनातन मर्यादा को छोड़कर बर्ताव करते हो । विशेषतः सुग्रीव जीवित है, उसकी भार्या रूमा, जो तुम्हारी स्नुषा के तुल्य है, उसमें तुम रमण करते हो, इसी लिये तुम्हें दण्ड दिया गया है। लोकवृत्त पराङ्मुख तुम्हारा दण्ड के द्वारा निग्रह युक्त ही है। कहा जा सकता है कि मनुष्यों के सम्बन्ध में ही विधि-निषेधरूप शास्त्र प्रवृत्त होते हैं और वाली मनुष्य नहीं, किन्तु शाखामृग है । आगे स्वयं श्रीराम ने भी कहा है कि मृग होने के कारण उनके द्वारा उसको मारना दोष नहीं । पर यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि मृग होने पर भी मनुष्यों के तुल्य उनमें राज्य, राजा आदि का व्यवहार होता था । मनुष्यों जैसा ही उनमें ज्ञान भी था; अतः उनमें भी विधि-निषेधशास्त्र की प्रवृत्ति हो सकती है । इसके अतिरिक्त इन्द्र आदि देवता अग्निहोत्र आदि धर्म के अधिकारी न होने पर भी निषेध का अतिक्रमण करने से प्रायश्चित्त के अधिकारी अक्सर हो जाते हैं । अतएव वृत्रवध के कारण ब्रह्महत्या आदि दोष इन्द्र को लगे ही थे । उसी प्रकार की स्थिति वाली, सुग्रीव आदि की भी है । वे लोग ज्ञान-विज्ञान सम्पन्न थे, अतः निषेध के अतिक्रमण में उनको भी दोष होना उचित ही था । अग्निहोत्र आदि में देवताओं का तो अनधिकार इसलिये था कि कर्मों में इन्द्र आदि देवताओं के ही उद्देश्य से हविष् आदि प्रदान किया जाता है । ऐसी स्थिति में इन्द्रादि द्वारा अर्चनीय अन्य इन्द्र आदि न होने से वे कर्म में अनधिकृत होते हैं । फिर भी जिन दान आदि कर्मों में इन्द्रादि यजनीय देवताओं की अपेक्षा नहीं है, उनमें इन्द्र आदि का भी अधिकार मान्य ही है । ब्रह्मविद्या में उनका अधिकार मान्य है । ये सब बातें पूर्वमीमांसा तथा उत्तर- मीमांसा में निर्णीत हैं ! इसी प्रकार का अधिकार वाली आदि वानरों का भी है । सज्ञान अन्य पशु-पक्षियों का भी ऐसा ही अधिकार होता है । अन्य दृष्टि से यजनीय देवता का वाचक शब्द अन्तर्यामी परमेश्वर का वाचक होता है । इस दृष्टि से यज्ञ आदि में भी देवताओं का अधिकार मान्य है । तभी इन्द्र आदि का भी यजन कहीं कहीं श्रुत है । उनमें भी बृहस्पति, चन्द्र, बुध आदि में ब्राह्मणत्व एवं इन्द्र आदि मे, वैवस्वत मनु आदि के समान, क्षत्रियत्व आदि मान्य हैं । चन्द्रादि का यज्ञ भी प्रसिद्ध है । वेदों में त्रैवर्णिकों का अधिकार है । यहाँ त्रैवर्णिक पद वेद-वेदार्थज्ञानवान् का उपलक्षण ही होता है—यही व्यास, वाल्मीकि प्रभृति ऋषियों का आशय है ।