भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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अध्याय बौद्धों द्वारा विकृत रामचरित ११५ “राम देखि नर चरित तुम्हारे । बुध हरषहिं जड़ होहिं दुखारे ।” ( रा० मा० २।१२५।८ ) अकम्पन, मारीच आदि राक्षसों ने भी श्रीराम की ब्रह्मरूपता का अनुभव किया था। फिर भी बौद्ध एवं जैन प्रायः बहिर्मुखों को राम में लौकिकता ही परिलक्षित होती है । किष्किन्धाकाण्ड में लौकिक नरलीला का ही अनुसरण करते हुए श्रीराम ने सीता के विरह में व्याकुल होकर मानव-लीला व्यक्त की है । वालिवध पर वाली ने जो श्रीराम पर आक्षेप किया, श्रीराम ने उसका समाधान कर दिया और स्वयं वाली ने अपना अपराध एवं श्रीराम की निर्दोषता मान ली । फिर भी कौसल्यायन के कल्पित राम कहते हैं—"उस समय जो मैंने वाली को उत्तर दिया, उससे आज मेरा ही समाधान नहीं होता है। यदि किसी अपराध का दण्ड दिया जाता है तो उसपर पहले आरोप लगाया जाता है । उसे अपने आपको निर्दोष करने का अवसर दिया जाता है । यदि वह अपने को निर्दोष न सिद्ध कर सके तभी उसे राजदण्ड दिया जाता है। यह कैसा राजदण्ड था कि मैंने वाली को छिपकर मार डाला था ।” परन्तु यह कुतर्क निर्मूल है, कारण कि जहाँ न्यायाधीश दण्डदाता को अपराध का निश्चय न हो, वहीं यह नियम होता है। मरकर प्राणी यमराज के वश में जाकर दण्डस्थान में भेज दिया जाता है। वहाँ उसके पाप का लेखा-जोखा तथा सूर्य, चन्द्र, दिन, रात आदि कर्म के साक्षी भी विद्यमान रहते हैं। यहाँ भी राम ने उसके अपराध का निश्चय करके ही दण्ड दिया। वाली के पूछने पर राम ने बता भी दिया था और वाली इसपर निरुत्तर भी हो गया था। फिर दूसरे को शङ्का उठाने का अवकाश ही कहाँ ? श्रीराम ने कहा था—सुग्रीव के साथ मेरी मित्रता है । मैंने उसका राज्य और स्त्री दिलवाने की प्रतिज्ञा की है। शङ्कापक्षी के राम कहते हैं—"यह समाधान लाचारी का था, क्योंकि ऐसी प्रतिज्ञा ही क्यों की। यह प्रतिज्ञा स्वार्थमूलक थी । सीता की तलाश में मदद करने के कारण वह प्रतिज्ञा थी ।” परन्तु यह भी कुचोद्य कुकल्पना व्यर्थ ही है, क्योंकि एक मित्र दूसरे मित्र का हित करता है। परस्पर उपकार करना ही मित्रता का स्वरूप है। इसमें अनौचित्य का प्रश्न ही नहीं उठता । विचार केवल यह होना चाहिये कि वाली ने सुग्रीव के साथ अन्याय किया था या नहीं। उसकी स्त्री तथा सम्पत्ति का हरण किया था कि नहीं । यदि किया था तो उसको दण्ड देना किसी प्रकार भी अनुचित नहीं कहा जा सकता । मित्र का शत्रु शत्रु होता है, यह नीति भी ठीक ही है। इसके बिना कोई भी शासन सुस्थिर रह ही नहीं सकता । कौसल्यायन कहते हैं— "मृगया करनेवाले लोग सावधान, असावधान, विमुख तथा भागनेवाले मृगों को भी मारते हैं। ऐसा करने पर भी उनको दोष नहीं लगता । तुम शाखामृग होने से वध्य हो । यदि कोई आज मुझसे प्रश्न करे कि क्या यह हो सकता है कि आप एक व्यक्ति को मानव भी मानें और शाखामृग भी मानें, तो मुझे निरु- त्तर हो जाना पड़ेगा । यदि वाली मानव नहीं था, शाखामृगमात्र था और हमें मानवदण्डों से या क्षत्रिय-धर्म के अनुसार उसे कैसे भी मार डालने का अधिकार प्राप्त था, तो फिर एक शाखामृग से यह आशा कैसे कर सकते थे कि वह भाई की पत्नी का परहेज करे । और उसपर यह प्रतिबन्ध कैसे लगा सकते हैं कि वह अपने छोटे भाई की स्त्री के साथ समागम न करे । क्या चतुष्पादों में ऐसे प्रतिबन्ध सुने या माने गये हैं ? मुझे स्वीकार करना चाहिए कि वाली की हत्या करना मेरी गलती थी और गलती के लिए इतिहास मुझे कभी भी क्षमा नहीं करेगा और न उसे क्षमा करना चाहिए । राजा का पुत्र होने से उसका पुत्र ही राजगद्दी का अधिकारी हो सकता था । प्रश्न था बड़े भाई के मरने पर उसका छोटा भाई गद्दी सम्भाले अथवा पुत्र ? मुझे सुग्रीव के पक्ष में ही निर्णय देना पड़ा। मैं ऐसा न करता