रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११४ रामायणमीमांसा पञ्चम कौसल्यायन के राम कहते हैं- "उस समय तो मैंने सीता के गले यह बात उतार दी थी कि महर्षि लोग यद्यपि शाप से राक्षसों को भस्म कर सकते हैं; किन्तु वे ऐसा इसलिये नहीं करते कि ऐसा करने से उनका तप क्षीण हो जा सकता है । किन्तु अब मैं सोचता हूँ कि यदि शाप देने से ऋषियों और मुनियों का तप क्षीण हो सकता था तो क्या हम दोनों भाइयों के हाथ से राक्षसों का वध कराने में उनका तप क्षीण नहीं हुआ होगा ?” यद्यपि यह शङ्का राम को नहीं हो सकती थी, क्योंकि वे सर्वज्ञ तथा शास्त्रज्ञ भी थे । तथापि कौसल्यायन के कल्पित राम तो शास्त्रसम्बन्धशून्य होने से वैसी अनर्गल शङ्का कर सकते हैं। न्यायाधीश के द्वारा दिया गया मृत्युदण्ड अपराधी और संसार के कल्याण का हेतु होता है; परन्तु वही मृत्युदण्ड यदि कोई अन्य देता है तो उसे पाप का भागी होना पड़ता है । इस तरह एक क्षत्रिय राजा, जिसका अपराधियों, अन्यायियों को दण्ड देना धर्म है, यदि राक्षसों का वध करता है तो उसमें तपःक्षय का कोई प्रश्न ही नहीं उठता । कौसल्यायन के कल्पित राम कहते हैं- “अगस्त्य मुनि की स्त्रियों के बारे में बहुत ही बुरी राय थी । .........परन्तु मेरा तो अनुभव मुनि के अनुभव से सर्वथा भिन्न था ।” यह भी निष्प्रमाण है। अपने दुविचारों को राम पर आरोपित करना पाप है। वस्तुतस्तु उक्त प्रसङ्ग में अगस्त्य मुनि ने सीता की प्रशंसा करते हुए साधारण स्त्रियों का स्वभाव बतलाया था । यह सुकुमारी भर्तृस्नेह से प्रेरित होकर राज्य-सुख त्यागकर दोषों से पूर्ण वन में आयी है । तुम्हारा अनुसरण करके इसने दुष्कर कर्म किया है। आम तौर पर स्त्रियाँ अच्छी अवस्था में पति का अनुसरण करती हैं और आपत्तिदशा में उसे त्याग देती हैं। स्त्रियाँ विद्युत् के चाञ्चल्य और शस्त्रों की तीक्ष्णता एवं गरुड़ तथा अनिल की शीघ्रता का अनुसरण करती हैं। परन्तु यह तुम्हारी भार्या सीता इन दोषों से विवर्जित, श्लाघ्या तथा देवियों में अरुन्धती के समान प्रशंसनीय है। श्रीराम यह सुनकर बहुत प्रसन्न हुए थे— “एषा च सुकुमारी च खेदेश्च न विमानिता । प्राज्यदोषं वनं प्राप्ता भर्तृस्नेहप्रचोदिता ॥ यथैषा रमते राम इह सीता तथा कुरु । दुष्करं कृतवत्येषा वने त्वामभिगच्छती । एषा हि प्रकृतिः स्त्रीणामासृष्टे रघुनन्दन । समस्थमनुरज्यन्ते विषमस्थं त्यजन्ति च ॥ शतह्रदानां लोलत्वं शस्त्राणां तीक्ष्णतां यथा । गरुडानिलयोः शैघ्यमनुगच्छन्ति योषितः ॥ इयं तु भवतो भार्या दोषैरेतैर्विवर्जिता । श्लाघ्या च व्यपदेश्या च यथा देवेष्वरुन्धती ॥” (वा० रा० ३।१३।३-७) “रावण ने सीता को दोनों भुजाओं में आबद्ध कर लिया (पृ० १०५)” यह अशुद्ध अनुवाद है। श्लोक निम्नोक्त है— “वामेन सीतां पद्माक्षीं मूर्धजेषु करेण सः। ऊर्वोस्तु दक्षिणेनैव परिजग्राह पाणिना ॥” (वा० रा० ३।४९।१७ ) रथ पर बैठाने के लिए रावण ने वाये हाथ से सीता के बालों का और दक्षिण हाथ से सीता के दोनों ऊरुओं के पश्चिम भाग को ग्रहण किया था। श्रीराम परब्रह्म परमेश्वर होने पर भी रावण के वधार्थ मनुष्यरूप में प्रकट हुए थे । और उसी प्रसङ्ग में मानवरूप मानवलीलाओं का अनुसरण उन्होंने किया था। तथा च पत्नी के वियोग में सामान्य मनुष्यों के जैसे शोक एवं सन्ताप उन्हें हुए थे ।