रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 190, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय बौद्धों द्वारा विकृत रामचरित ११३ चोर में कोई अन्तर नहीं है और तथागत को नास्तिक जानो । इसलिए जनता हित की दृष्टि से नास्तिक को मुख न लगाये, उसका मुख न देखे । पर इस वाल्मीकिप्रोक्त सत्य बात को झुठलाने का प्रयत्न करते हुए मिथ्या वासुदेव कहते हैं—"मैंने कभी किसी के बारे के ऐसे हल्के शब्दों का प्रयोग नहीं किया । गौतम बुद्ध का धर्म बुद्धिप्रधान था । वे वेद को ही सत्यविद्याओं का भण्डार नहीं मानते थे । किसी वर्णविशेष को अन्य वर्णों की अपेक्षा श्रेष्ठ नहीं मानते थे और वे किसी तथाकथित ईश्वर को सृष्टि का रचयिता नहीं मानते थे; लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वह शुभाशुभ कर्म और उनसे मिलनेवाले फल को न माननेवाले नास्तिक थे । यह जो मेरे मुँह में डाला गया है कि जो दण्ड चोर को दिया जाता है, वही नास्तिक को दिया जाय और उसकी शक्ल न देखी जाय । यह मेरे प्रति सरासर अन्याय है ।” वस्तुतः अन्याय तो यह है जो परम्परा से प्रचलित रामायण के राम द्वारा कही हुई बातों को झुठलाने का प्रयास किया जा रहा है । जब मनु वेदनिन्दक को स्पष्ट ही नास्तिक कहते हैं— “नास्तिको वेदनिन्दकः ।” ( म० २।११ ) तब वेदनिन्दक बुद्ध को राम नास्तिक क्यों न कहते ? जब कोई सृष्टिरचयिता ईश्वर बुद्ध को मान्य नहीं, तो कर्मफलदाता भी कौन हो सकता है ? जीव अल्पज्ञ है, कर्म स्वयं जड़ है । फिर फलदाता कौन होगा ? वस्तुतः परमेश्वर ही अनन्त ब्रह्माण्ड के अनन्त प्राणियों के शुभाशुभ कर्मों का वेदादि शास्त्रों के अनुसार निर्णयकर फल देते हैं—इस तथ्य को झुठलानेवाले बुद्ध नास्तिक ही हैं। कौसल्यायन के मिथ्या राम ने ठीक वाल्मीकि के वास्तविक राम से विपरीत मत व्यक्त किया और उन्होंने कहा— "निःसंदेह मुझे इस बात पर विचार करना चाहिए था कि राजा ने मुझसे स्वेच्छा से वनगमन के लिए आज्ञा नहीं दी थी । वे तो मात्र माता कैकेयी द्वारा ठगे गये थे । ऐसी आज्ञा का पालन न बुद्धिगम्य था, न आत्महितसाधक था तथा न परहितसाधक ही था । तब भी उस समय मेरी यही धारणा थी कि पिता के वचनों को, चाहे जैसी भी परिस्थिति में मुँह से निकले हों, शिरोधार्य करना चाहिये ।” इसका अर्थ यह है कि उस समय राम का निर्णय भ्रान्तिपूर्ण था, परन्तु ऐसी कल्पना भी निष्प्रमाण ही है । कौसल्यायन के मिथ्या राम की धारणाओं तथा अनर्गल प्रलापों से परिपूर्ण 'राम की कहानी राम की जबानी' से कौसल्यायन ने बौद्धमत में रहे सहे विश्वास को भी नष्ट कर दिया है । यद्यपि विभिन्न कथनों के अन्त में वाल्मीकिरामायण के कुछ श्लोक दिये गये हैं; परन्तु वह केवल धोखा है । शास्त्र एवं धर्म के विपरीत जो कुछ श्रीराम के नाम पर कौसल्यायन ने कहा है, वह सब अत्यन्त निर्मूल है । “अनसूया स्वयं शिथिल अङ्गवाली वृद्धा थी । बुढ़ापे के कारण उसके बाल सफेद हो गये थे । वह प्रवात में कदली के तुल्य कांपती थी । उसने सीता को दिव्य माल्य, आभरण एवं अङ्गराग कहाँ से दिये ?” यह कौसल्यायन के कल्पित राम की समझ में नहीं आता । परन्तु वाल्मीकि के राम का तो ऋषियों के तपोबल पर विश्वास है । उस तपस्विनी ने अपने तपोबल से ही वैसी वस्तुएँ सीता को प्रदान की थीं । यही क्यों, भरद्वाज भी तो अकिञ्चन मुनि ही थे; परन्तु उन्होंने भरत का जो स्वागत किया था, क्या वह किसी सम्राट् के यहाँ भी सम्भव है ? अरण्यकाण्ड में कौसल्यायन के कल्पित राम कहते हैं— "वह राक्षस मेरे हाथ से मारा गया, इसलिए स्वर्ग गया; पर ऐसे लोगों का मैं क्या करूँ, जो किसी की पत्नी को उठा ले जानेवाले राक्षस के भी स्वर्ग जाने में विश्वास करते हैं ।” परन्तु यह भी सोचना चाहिये कि अन्त में किसी भी पाप का प्रायश्चित्त तो होता ही है । विशेषतः राजदण्ड के द्वारा किसी भी पाप की निवृत्ति धर्मशास्त्रों को मान्य ही है । जैसे पापों के निवृत्यर्थ अन्यान्य प्रायश्चित्त मान्य हैं वैसे ही राजदण्ड भी एक महान् प्रायश्चित्त मान्य है ही । श्रीराम तो साक्षात् परब्रह्म हैं। उनके नामोच्चारणमात्र से प्राणियों के सब पाप निवृत्त होते हैं । फिर जिसको साक्षात् श्रीराम का दर्शन हो जाय और उनके द्वारा स्पृष्ट बाणों से जिसका वध हो उसके कल्याण में संशय की कोई बात ही नहीं उठ सकती है । १५