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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 189

११२ रामायणमीमांसा पञ्चम वेदादिशास्त्रविमुख बौद्ध भिक्षु को यह नहीं विदित हो सका कि ज्ञानपूर्वक की गयी प्रथम प्रतिज्ञा के विरुद्ध होने से तदुत्तरकालीन विचारों का कोई मूल्य नहीं होता । इसके अतिरिक्त प्रजा के सामने कोई प्रतिज्ञा की बात भी नहीं थी । राम को राजगद्दी देने का विचार महाराज का ही था । उन्होंने उसी सम्बन्ध में प्रजा की सम्मति प्राप्त की थी । किं बहुना इस बौद्ध की रामकहानी में भूल से ही कोई एकाध बात सत्य होगी । प्रायः सबकी सब बातें मनगढन्त मिथ्या दुष्कल्पनाएँ ही प्रभूत हैं। जो वाल्मीकिरामायण में नहीं है, उसकी कल्पना की गयी है और रामायण में उक्त बातों को झुठलाया गया है। फिर भी झूठ के आधार पर कहा गया है कि यह वाल्मीकि के अनुसार है। मिथ्या वासुदेव के मुख से कहलाया गया है कि "मुझसे भी गलती हो गयी जो मेरे पिता ने की थी, बिना यह जाने कि पिता मुझे क्या कहना चाहते हैं और सचमुच कहना चाहते हैं या नहीं मैंने कैकेयी को कह दिया कि मैं प्रतिज्ञा करता हूँ राजा को जो अभीष्ट है उसे मैं पूर्ण करूँगा। राम एक ही बात कहनेवाला है इत्यादि ।" वस्तुतः इससे बढ़कर क्या दुष्टता होगी कि परम पितृभक्त एवं सत्यनिष्ठ राम के द्वारा अनार्य शब्द कहलवाया जाय क्या इसी तरह बुद्ध की कथाओं में भी मनमानी कल्पना करना इस नास्तिक को अभीष्ट होगा ? बुद्ध स्वयं अहिंसा एवं सत्य के पुजारी नहीं थे । वे एवं उनके प्रमुख शिष्य वाममार्गी थे, क्या इस कल्पना का प्रतिरोधक कोई प्रमाण उस नास्तिक के पास है ? वाल्मीकिरामायण के अनुसार जाबालि ने नास्तिकमत का आश्रयण कर राम को वनसे लौटाने का प्रयत्न किया था, किन्तु राम ने उसे धर्मविरुद्ध कहकर तथागत बुद्ध आदि नास्तिकों को चोर के समान दण्डनीय कहा, किन्तु वाल्मीकिरामायण में भी स्पष्ट उल्लेख रहने पर भी निन्दा करते हुए कौसल्यायन के कल्पित मिथ्या वासुदेव कहते हैं- "मैं उसके प्रस्ताव से क्यों सहमत न हो सका । इसका कारण मैंने न उसपर प्रकट किया, न किसी अन्य पर, किन्तु मैंने देखा जाबालि के तर्क बड़े जोरदार थे" पर यह निराधार ही है। जो बात राम ने जाबालि को नहीं बतायी, उसका ज्ञान कौसल्यायन को कैसे हो गया ? जाबालि ने बौद्ध मत का समर्थन किया था। इसी लिए बड़ी तत्परता से कौस- ल्पायन ने जाबालिप्रोक्त बौद्धमत का विवरण बड़े चाव से दिया है--"ऋतुमती माता के द्वारा गर्भ में धारण किया हुआ वीर्य और रज का परस्पर संयोग ही पुरुष के जन्म का वास्तविक कारण होता है। पिता तो एक निमित्त मात्र है। यदि यहाँ दूसरे का खाया हुआ अन्न दूसरे के शरीर में चला जाता हैं तो परदेश में जानेवालों के लिए श्राद्ध ही कर देना चाहिए। उन्हें मार्ग का भोजन (पाथेय) देना उचित नहीं। जाबालि की बातें काफी बुद्धिसङ्गत थीं, किन्तु मैं भरत या जाबालि के कहने से अयोध्या वापिस चलने की तैयारी कर लेता तो अभी तक मैंने जो सुयश कमाया था, वह सारा धूल में मिल जाता ।" पर यदि जाबालि की बातें काफी तर्कपूर्ण थीं तो बौद्ध मत भी टिक नहीं सकता; क्योंकि बौद्ध मत में भी इस लोक में किये गये शुभाशुभ कर्मों का फल जन्मान्तर में मान्य है। दूसरों की सेवा करने के लिए, दुःख दूर करने के लिए धन, सम्पत्ति तथा प्राण देनेवाले प्रशंसनीय होते हैं। अतः लङ्कावतारसूत्र आदि बौद्ध ग्रन्थकारों को परलोक मानना ही पड़ा था। यदि यह ठीक है, तब तो पित्रादि के उद्देश्य से ब्राह्मणादि को भोजन कराने का भी उत्तम परिणाम पित्रादि को प्राप्त हो ही सकता है। कौसल्यायन के मिथ्या वासुदेव कहते हैं- "किसी वाल्मीकि ने मेरे मुख में यह बात डाल दी है।" वस्तुतः डाल नहीं दी, राम के समकालीन वाल्मीकि ने आर्ष दृष्टि से सत्य घटना को जानकर ही लिखा है। श्रीराम ने कहा-"आपकी बुद्धि विषम मार्ग में स्थित है। आप वेदविरुद्ध मार्ग पर आरूढ़ हैं। आप घोर नास्तिक और धर्म के मार्ग से दूर हैं। ऐसी पाखण्डी बुद्धि के द्वारा अनुचित विचार का प्रचार करनेवाले आपको पिताजी ने अपना याजक बनाया। उनके उस कार्य की मैं निन्दा करता हूँ।" श्रीराम ने जाबालि से यह भी कहा कि आपमें और