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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 188

अध्याय बौद्धों द्वारा विकृत रामचरित १११ सामान्य लोगों की उत्पत्ति में द्यौ, पर्जन्य, भूमि, पुरुष और स्त्री इन पाँच अग्नियों की अपेक्षा होती है। द्रोण स्त्रीनिरपेक्ष चार अग्नियों से ही उत्पन्न हुए थे। सीता, द्रौपदी, धृष्टद्युम्न आदि की उत्पत्ति माता-पिता की अपेक्षा न रखकर तीन ही अग्नियों से हुई थी। दृष्ट ही माननेवाला प्रत्यक्षप्रामाण्यवादी चार्वाक होता है। उसकी दृष्टि में प्रत्यक्ष से भिन्न कोई प्रमाण नहीं है। परन्तु बुद्ध ने अनुमान प्रमाण को भी स्वीकार किया है। बौद्ध तो बुद्ध को सर्वज्ञ मानकर उनके वचनों को भी प्रमाण मानते हैं। पर जब हम सब में कोई सर्वज्ञ नहीं होता तो बुद्ध को ही सर्वज्ञ क्यों माना जाय ? यदि बुद्ध में अन्य लोगों की अपेक्षा विलक्षणता मान्य है तो सीता और राम के सम्बन्ध में भी शास्त्रोक्त विलक्षणता क्यों न मान्य हो । कौसल्यायन के कल्पित राम कहते हैं—"मेरे सामर्थ्य को बढ़ा चढ़ा कर दिखाने के लिए उस धनुष का भी ऐसा वर्णन किया गया है कि पाँच हज़ार मनुष्यों द्वारा लायी गयी पेटिका में वह धनुष रखा था, यह वर्णन अयथार्थ है ।" पर वस्तुतः मिथ्या वासुदेव का यह कथन ही अयथार्थ है, क्योंकि लाखों वर्ष पुरानी घटना जानने में भी तो प्रमाण की अपेक्षा होती है। वाल्मीकि के राम ने ऐसा कुछ भी नहीं कहा है। उनके नाम पर मिथ्या कल्पना करनेवाले बौद्ध भिक्षु कौसल्यायन ने साधारण नैतिकता को भी तिलाञ्जलि दे दी है। शिव एवं विष्णु के धनुष को सर्वसाधारण धनुष जैसा नहीं कहा जा सकता । कौसल्यायन के अनुसार—"मेरा इरादा उसे तोड़ने का नहीं था, वह यूँ ही टूट ही गया ।” यह कथन भी निष्प्रमाण होने से मिथ्या है । अयोध्याकाण्ड में भी इसी तरह वाल्मीकिरामायण के नाम पर मिथ्या कल्पित कौसल्यायन के राम ने अनर्गल प्रलाप किया है। वे कहते हैं—"मेरे बारे में कहा गया है कि मैं साक्षात् विष्णु था और परम प्रचण्ड रावण के वध की अभिलाषा रखनेवाले देवताओं की प्रार्थना पर मनुष्यलोक में अवतीर्ण हुआ था। पर इस कथन से मेरा वास्तविक रूप प्रच्छन्न हो गया है। एक तरफ मुझे विष्णु कहा गया, दूसरी तरफ मैं स्वर्ग की आशा से धर्म का पालन करता हूँ ।" यह भी काल्पनिक ही राम का कहना है, वास्तविक राम का नहीं । अतएव ऐसी वस्तुओं को राम- कहानी का रूप देना पाखण्ड से सत्य को ढँकनामात्र है और पूर्वप्रतिज्ञा के विरुद्ध ही है । पीछे कहा गया है कि वाल्मीकि ने सत्य सत्य बातें कही हैं; पर अब वाल्मीकि की बातों को झुठलाने का निरर्थक यत्न किया जा रहा है— "स हि देवैरुदीर्णस्य रावणस्य वधार्थिभिः । अर्थितो मानुषे लोके जज्ञे विष्णुः सनातनः ॥" ( वा० रा० २।१।७ ) इस वाल्मीकिवचन से स्पष्ट ही राम का विष्णु होना सिद्ध है और यह श्लोक क्षेप भी नहीं है। तभी मिथ्या वासुदेव को इसका विरोध करना पड़ा । इसी प्रकार अनेक मिथ्या कल्पनाएँ जो वाल्मीकि के राम ने कभी भी नहीं सोची थीं उन्हीं के नाम से निर्लज्ज कौसल्यायन ने उठायी हैं । राजा दशरथ वेदादि शास्त्रों के अनुयायी एवं वेदोक्त धर्म के पालक थे । सत्यप्रतिज्ञ थे । कैकेयी को प्रदत्त दो वरदानों का पालन करना अपना कर्तव्य समझते थे । अतएव कौसल्यायन का यह प्रलाप निरर्थक ही है कि “यह कैसा धर्मबन्धन था। क्या यह सरासर मूर्खता का बन्धन नहीं था। कैकेयी के मोहपाश में बँधे हुए मेरे पिता धर्मबुद्धि से सर्वथा हाथ धो बैठे थे, क्योंकि बिना यह जाने कि वह क्या वर माँगेगी, दुष्टा कैकेयी को उन्होंने वरदान दे दिया था। उनकी दृष्टि में उस वरदान का तो मूल्य था, किन्तु अपनी सारी प्रजा को उन्होंने जो सूचना दी थी कि ज्येष्ठ पुत्र होने के कारण मैं राजगद्दी पर बैठाया जाऊँगा, उस बचन का कुछ भी मूल्य न था ।”