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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 187, कुल 1049 में से

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पृष्ठ 187

११० रामायणमीमांसा पञ्चम इससे राम की पूज्यता आदि विशेषताएँ स्पष्टतया विदित होती हैं। अतः किसी कल्प की कथा में अहल्या पाषाण भी हो गयी होगी। जब कि राम ईश्वरावतार हैं ही तब उनके चरणस्पर्श से पापयुक्त गौतमपत्नी का शाप- मुक्त होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। अतएव श्रीव्यासदेव के रामाश्रमेध आदि ग्रन्थों में अनेक ऋषियों ने राम को प्रणाम आदि किया ही है। आगे कौसल्यायन के राम वसिष्ठ और विश्वामित्र के सङ्घर्ष की चर्चा करते हुए कहते हैं—"जब विश्वामित्र द्वारा बलात् कामधेनु ले जाने के लिए सेना का प्रयोग किया गया तब वसिष्ठ ने कामधेनु से कहा कि ऐसी सेना उत्पन्न करो जो विश्वामित्र को परास्त कर सके । कामधेनु ने दिव्य शक्ति से पहले शक, काम्बोज तथा यवन आदि जातियों के सैनिकों को उत्पन्न किया। उनकी सहायता से पराजित होकर विश्वामित्र ने कहा कि ब्रह्मबल ही श्रेष्ठ बल है। उसके मुकाबले में क्षत्रियबल तुच्छ है। यदि आपस के कलह में विदेशियों की सहायता लेकर विजय प्राप्त करना ही ब्रह्मबल है, तो क्या ऐसे ब्रह्मबल को भी धिक्कार नहीं है ?" परन्तु यह भी कुचोद्य ही है, क्योंकि प्रकृत में विदेशी सहायता का कोई प्रसङ्ग ही नहीं है। वहाँ तो स्पष्ट है कि कामधेनु ने ही कहा था—"मुझे राजकर्मचारी दण्डित कर रहे हैं, मैंने क्या अपराध किया जो आपने मुझे त्याग दिया ।” ब्रह्मर्षि ने कहा—"मैं नही त्याग रहा हूँ। वह राजा है, उसके समान मेरे पास बल नहीं है।" कामधेनु ने कहा—"आपके बल के सामने उस राजा का कुछ भी बल नहीं है। ब्रह्मतेजसम्पन्न आप मुझे आज्ञा दें तो मैं विश्वामित्र के बल और दर्प को नष्ट कर सकती हूँ।" इस प्रकार कामधेनु की प्रार्थना पर ही वसिष्ठ ने उसे सेनानिर्माण का आदेश दिया था। सुरभि ने वसिष्ठ के ब्रह्मबल के सहारे अपनी शक्ति से पल्लव, शक आदि का निर्माण किया था। किसी विदेशी से सहायता प्राप्त नहीं की थी। विश्वामित्र के बल से उस बल के नष्ट हो जाने पर पुनः वसिष्ठ ने आज्ञा दी। तब पुनः सुरभि ने हुङ्कार से सूर्यतुल्य काम्बोजों का निर्माण किया, अपने ऊधस् से शस्त्रपाणि बर्बरों का निर्माण किया, योनिदेश से यवनों का निर्माण किया, गोमय के स्थान से शकों की उत्पत्ति की एवं रोमकूपों से म्लेच्छ आदि की उत्पत्ति कर विश्वामित्र के बल को नष्ट कर दिया— “तस्या हुङ्कारतो जाताः काम्बोजाः रविसन्निभाः । ऊधसश्चाथ सम्भूता बर्बराः शस्त्रपाणयः ॥ योनिदेशाच्च यवनाः शकृद्देशाच्छकाः स्मृताः । रोमकूपेषु म्लेच्छाश्च हारीताः सकिरातकाः ॥” (वा० रा० १।५५।२,३.) वस्तुतः कौसल्यायन वेदों, शास्त्रों तथा महर्षियों के यौगिक चमत्कारों में विश्वास नहीं रखते । अतएव- उन्हें विदेशी सहायता की बात ही सूझी। फिर, जब स्वयं विश्वामित्र ने ही अपने महान् बल को वसिष्ठ के ब्रह्मबल से तुच्छ समझा है, तब दूसरे की विपरीत कल्पना का मूल्य ही क्या है ? जनकसुता जानकी के सम्बन्ध में वे अपनी अटकल लगाते हैं—"वह राजा जनक को हल चलाते समय खेत में मिल गयी थी। पृथ्वीपुत्र तो हम सभी हैं, किन्तु क्या बिना माता-पिता के संयोग से मात्र पृथिवी से किसी की उत्पत्ति हुई है ? अतः उसके यथार्थ माता-पिता अज्ञात रहे होंगे।" यह भी कथन मिथ्या ही है; क्योंकि वाल्मीकिरामायण में राम ने ऐसा कोई विचार प्रकट नहीं किया है। श्रीराम परम आस्तिक थे। उन्हें शास्त्रों में विश्वास था। देवताधिकरण के अनुसार स्थूल पृथ्वी से अतिरिक्त उसकी एक दिव्य अधिष्ठात्री शक्ति देवता भी शास्त्रप्रमाण बल से सिद्ध है। सीता उसी की पुत्री थी।

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