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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

१२० रामायणमीमांसा पञ्चम अन्यथा मधुशाला होती मधुवन का उल्लेख न होता, अतः मधुपान से शराब पीना और हनुमान्‌जी ने भी अधिक पो ली थी इत्यादि कल्पनाएँ निराधार हैं। कौसल्यायन लिखते हैं कि “श्रीराम कहते हैं आज मेरे पास पुरस्कार देने योग्य वस्तु का अभाव है; यह बात मेरे मन में बड़ी कसक पैदा कर रही है। यहाँ जिसने मुझे ऐसा प्रिय संवाद सुनाया उसका मैं कोई वैसा प्रिय कार्य नहीं कर पा रहा हूँ” परन्तु यह उनका अनुवाद अशुद्ध है। मूल श्लोक है— “इदं तु मम दीनस्य मनो भूयः प्रकर्षति । यदिहास्य प्रियाख्यातुर्न कुर्मि सदृशं प्रियम् ॥” सीतावियोगजनित दीनता के कारण मेरे मन की यह स्थिति और कष्ट पहुँचाती है कि जिसने मुझे प्रिय संवाद सुनाया उसका उसके सदृश उपकार नहीं कर रहा हूँ। यहाँ पुरस्कार देने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। क्यों ? श्रीहनुमान् किसी वस्तु की अपेक्षा नहीं रखते हैं। श्रीराम ने अपने पराक्रम से सुग्रीव को राज्य प्रदान किया। कोई भी वस्तु उनकी आज्ञा के अनुसार सुग्रीव प्रदान कर सकते थे। विभीषण को भी श्रीराम ने लङ्काधिपति बना दिया था। वैसे भी वाल्मीकिरामायण के अनुसार श्रीराम परब्रह्म परमात्मा ही हैं। सङ्कल्पमात्र से वे सब प्रदान कर सकते हैं। फिर वे यह कैसे कह सकते हैं कि आज,मेरे पास पुरस्कार देने योग्य वस्तुओं का अभाव है। अतः कौसल्यायन का उक्त अर्थ निराधार ही है। इसी प्रकार—“इस समय इन महात्मा हनुमान् को मैं अपना प्रगाढ़ आलिङ्गन प्रदान करता हूँ; क्योंकि यही मेरा सर्वस्व है।” यह भी कौसल्यायन का अर्थ अशुद्ध है। श्लोक यों है— “एष सर्वस्वभूतस्तु परिष्वङ्गो हनूमतः । मया कालमिमं प्राप्य दत्तस्तस्य महात्मनः ॥” (वा० रा० ६।१।१३) हनुमत्कृत प्रिय सीताख्यान के सदृश प्रियान्तर न देखते हुए आत्मपरिष्वङ्ग को ही तत्तुल्य देखकर श्रीराम ने हनुमान् के लिए वही आत्मपरिष्वङ्ग (प्रगाढ आलिङ्गन) प्रदान किया है; क्योंकि भगवद्देह शुद्ध आनन्दरूप होने से उसका आलिङ्गन ही भगवान् का सर्वस्व है। आनन्दस्वरूप ब्रह्म ही माया या दिव्यलीलाशक्ति में राम-देह के रूप से भासमान होता है। यही बात गीता और विष्णुसहस्रनाम के भाष्य आदि में स्पष्टरूप से वर्णित है। ब्रह्मपरिष्वङ्ग और ब्रह्मप्राप्ति दोनों एक ही वस्तु हैं। वही सर्वोत्कृष्ट वस्तु है, वही सीताप्रियाख्यान के सदृश हो सकता है। उसी का प्रदान हनुमान् के लिए उपयुक्त हो सकता है। कौसल्यायन ने बीच बीच में रामकथा के साथ अपनी नोन-मिर्च लगायी है, जिसका वाल्मीकिरामायण के श्लोकों से कोई सम्बन्ध नहीं है। “सच्ची बात यह थी कि यह सारा वैर-विरोध लक्ष्मण के कारण आरम्भ हुआ था। शूर्पणखा मेरे पास और बाद में लक्ष्मण के पास प्रणय का निवेदन करने ही तो आयी थी। हमें एक गम्भीर पुरुष की तरह उसे समझा देना चाहिये था कि हम दोनों भाई विवाहित हैं। हम दोनों में से कोई भी उसे अङ्गीकृत करने में असमर्थ हैं, किन्तु हमें थोड़ा विनोद करने की सूझी। मैंने शूर्पणखा को लक्ष्मण के पास भेजा और उसने बेचारी को दो दो बार मेरे पास वापस लौटाया। बेचारी तङ्ग आ गयी होगी। उसे लगा होगा कि सीता ही उसके मार्ग का काँटा है। वह सीता की ओर लपकी थी। लक्ष्मण ने उसके नाक-कान काटकर उसे कुरूप बना दिया। यदि लक्ष्मण ऐसी अनुत्तरदायित्वपूर्ण बात न करता तो सम्भवतः हमारा रावण से किसी प्रकार का वैर-विरोध न होता इत्यादि।” (रामकहानी पृ० १९७) यह सब कौसल्यायन की कल्पना निराधार है। वाल्मीकिरामायण के राम ने ऐसा न सोचा ओर न कहा ही है। शूर्पणखा के दलाल तो बौद्ध ही या असभ्य बौद्ध ही हो सकते हैं। सदाचारी,

अध्याय बौद्धों द्वारा विकृत रामचरित १२१ सभ्य बौद्ध भी शूर्पणखा का पक्ष लेने को कभी भी प्रस्तुत नहीं हो सकता है । जिसका कोई भी धर्म और सदाचार है वह शूर्पणखा की भर्त्सना ही करेगा और लक्ष्मण ने वही दण्ड दिया जो ऐसी कुलटाओं के लिए उचित था । हाँ कौसल्यायन ने--'रावण को ब्रह्मा ने शाप दिया था कि तू आज से किसी दूसरी नारी के साथ बल- पूर्वक समागम करेगा तो तेरे मस्तक के सौ टुकड़े हो जायेंगे' इसमें संशय नहीं किया और इस बात को स्वीकार कर लिया । विभीषण के सम्बन्ध में भी कौसल्यायन ने अनर्गल कल्पना की है- 'इतिहास में जब तक राम रावण की कहानी मुंह से सुनी-सुनायी जाती रहेगी । तब तक लोग विभीषण को भ्रातृद्रोही तथा देशद्रोही के रूप में ही स्मरण करते रहेंगे ।' यह भी निराधार है; क्योंकि वाल्मीकिरामायण में इस प्रकार का कोई उल्लेख नहीं है । वस्तुस्थिति तो यह है कि असत्य एवं अन्याय का पक्ष सर्वथा ही त्याज्य है । रावण असत् पक्ष पर था, उसका त्याग ही प्रशंसनीय है । श्रीशुक्रादि नीतिज्ञों ने तभी तो कहा है- "न्याय के रास्ते पर चलनेवाले के साथ पशु-पक्षी आदि भी हो लेते हैं; परन्तु अन्याय के रास्ते पर चलनेवाले का तो उसका सगा भाई भी साथ छोड़ देता है- "यान्ति न्यायप्रवृत्तस्य तिर्यञ्चोऽपि सहायताम् । अपन्थानं तु गच्छन्तं सोदरोऽपि विमुञ्चति ॥" ( अनर्घराघव १।४ ) 'समुद्र मूर्तिमान् होकर श्रीराम के सामने आया । नल विश्वकर्मा का पुत्र था । समुद्र के परामर्शानुसार उसने पाँच दिनों में सौ योजन लम्बे समुद्र पर पुल बाँध दिया ।' यह कौसल्यायन ने स्वीकार किया है । आश्चर्य है एक तरफ नास्तिकता और दूसरी तरफ ऐसी चमत्कारपूर्ण बातों में विश्वास करना, दोनों का सम्बन्ध कैसे हो गया ? कौसल्यायन का यह कथन भी-- "मेरे मन में इसका खेद है कि मैंने आँख के ओझल रहकर वाली को क्यों बींध डाला।" ( रा० क० पृ० २१ ) निराधार है । 'गरुड़ ने नागपाश से छुड़ाकर राम को व्रणमुक्त किया ।' इस बात में कौसल्यायन को विश्वास करना पड़ा । ( रा० क० पृ० २११ ) 'औषधियों को सूंघकर लक्ष्मण स्वस्थ हो गये ।' आदि में भी विश्वास करने से प्राणी आस्तिकता की ओर आता ही है । 'देवराज इन्द्र का रथ राम की सहायता के लिए आया । श्रीराम ने युद्ध में रावण को मारा ।' यह सब कौसल्यायन को स्वीकृत है । "विदेहकुमारी ने अग्निदेव की परिक्रमा की और निःशङ्क चित्त से अग्निचिता में समा गयीं । जनसमुदाय ने मिथिलेशकुमारी को इस जलती हुई चिता में प्रविष्ट होते देखा । 'साँच को आँच नहीं' की कहावत प्रसिद्ध ही है । सीता के सतीत्व ने उसकी रक्षा की । दीप्त अग्निशिखा ने उसके रोममात्र को भी स्पर्श नहीं किया ।" ( रा० क० पृ० २३९ ) आधुनिक लोग इस बात में विश्वास नहीं कर सकते कि कोई स्त्री अग्निचिता में प्रविष्ट हो सकती है ? और उसमें से जीवित पुनः निकल आना तो और भी कठिन है; परन्तु शायद भूलकर ही सही कौसल्यायन ने ऐसा स्वीकार कर लिया । श्रीभरत हनुमान् के मुख से श्रीराम के आगमन का समाचार सुनकर बड़े प्रसन्न हुए और उस प्रियाख्यान के बदले में एक सहस्र गायें, सौ ग्राम तथा शुभ आचरणवाली हेमवर्ण सर्वाभरणसम्पन्न सकुण्डला १६ कन्याओं को प्रदान किया । कौसल्यायन कहते हैं--'उस बालब्रह्मचारी पवनसुत को सोलह कन्यायें किस लिये दी ।' पर कौसल्यायन यह नहीं जानते, वह तो प्रियाख्यान का पुरस्कारमात्र था । वैसे गायें और ग्राम भी हनुमान् के किस काम के थे ? जैसे देवतादि की प्रसन्नता के लिए ब्राह्मण-भोजन आदि कराये जाते हैं, वैसे ही हनुमान् की प्रसन्नता के लिए श्रीभरत ने गायें, ग्राम तथा कन्याएँ प्रदान की थीं । उत्तरकाण्ड में भी कौसल्यायन ने श्लोक का मनमाना अर्थ किया है। वे कहते हैं- "जैसे इन्द्र शची को मधु ( सुरा ) का पान कराते थे वैसे ही मैंने ( राम ने ) ही सीता को हाथ से पकड़ कर मैरेय शराब पिलाया ।" वस्तुतः-- १६

"सीतामादाय हस्तेन मधु मैरेयकं शुचि । पाययामास काकुत्स्थः शचीमिव पुरन्दरः ॥” ( वा० रा० ७।४२।१९ ) का अर्थ यह है कि काकुत्स्थ श्रीराम ने अपने हाथ से पवित्र मैरेयक मधु श्रीसीता को पिलाया जैसे इन्द्र शची को पिलाते हैं । 'शुचि' विशेषण शराब का नहीं हो सकता । पुनः कौसल्यायन की--"दूसरों के मन को रिझानेवाले पुरुषों में श्रेष्ठ मैं उत्तम वस्त्राभूषणों से भूषित उन मनोरम रमणियों के साथ रमण करता था ।"--यह भी अशुद्ध व्याख्या है । प्रकृत श्लोक यह है-- “मनोभिरामा रामाश्च रामो रमयतां वरः । रमयामास धर्मात्मा नित्यं परमभूषिताः ।।” ( वा० रा० ७।७२।२२ ) इसका आशय यों समझना चाहिए- "एष ह्येवानन्दयति” ( तै० उ० २।७ ) यह परमात्मा ही सब प्राणियों को अनेक आनन्द से आनन्दित करते हैं- इस तथ्य के अनुसार प्राणिमात्र को आनन्दित ( सुखी ) करनेवाले धर्मात्मा राम ने उन ब्रह्म में रमण करनेवाली अभिरामा रामाओं को रमण कराया ( सन्तुष्ट किया ) । टीकाकारों ने 'तोषयामास' यह अर्थ किया है । अन्यथा 'धर्मात्मा' विशेषण सङ्गत नहीं होगा; क्योंकि अविवाहित स्त्रियों से रमण करनेवाला धर्मात्मा नहीं हो सकता । साथ ही यह भी ध्यान देने योग्य है कि यदि प्रकृत श्लोक में 'रेमे' पाठ होता, तभी 'रमण करना' अर्थ हो सकता था, यहाँ तो 'रमयामास' पाठ है । उसका अर्थ होता है—'रमण कराना' सुखी या आनन्दित करना । श्रीरामचन्द्र का एकपत्नीव्रत प्रसिद्ध ही है । इसी प्रकार पुरवासियों के द्वारा सीतासम्बन्धी आरोपों का अपने लक्ष्मण, भरत आदि भाइयों के प्रति किये गये समाधान में भी कौसल्यायन ने लीपा-पोती करके लङ्का की अग्निपरीक्षा को छिपा डाला है । प्रकृत में भी “निर्दोष मम सन्निधौ” ( वा० रा० ७।४७।१३ ) से लक्ष्मण ने कहा है कि आप मेरे समक्ष अग्निपरीक्षा से निर्दोष सिद्ध हो चुकी हैं, किन्तु ऐसी पुनीतचरिता आपका राजा ने परित्याग कर दिया, क्योंकि वह लोकापवाद से भीत हैं । "मैं अपनी अन्तरात्मा से सीता को निष्कलङ्क मानता था, इसलिए उसे यहाँ अपने साथ अयोध्या लाया ।” ( रा० क० पृ० २७४ ) इसका आधारभूत वाल्मीकिरामायण में कोई श्लोक नहीं है । इसी तरह कौसल्यायन के अनुसार राम ने कहा- "मैंने साध्वी सती सीता का त्याग किया । मैं जानता हूँ, इसके लिए लोग मुझे कभी क्षमा न करेंगे और न उन्हें क्षमा करना चाहिये । हो सकता है आगे चलकर कोई मुझे निर्दोष सिद्ध करने के लिए सारा दोष दैव के माथे मढ़ डाले । अथवा मेरी या किसी के पूर्वजन्म की घटना को इसका जिम्मेदार ठहराये; किन्तु यह सारा दोष भी नासमझी का था। निःसन्देह सीता मेरी पत्नी थी । उसे त्यागने या अपनाने का मुझे जन्मसिद्ध अधिकार प्राप्त था; किन्तु क्या एक नागरिक के नाते सीता का अपना स्वतन्त्र व्यक्तित्व न था । यदि मैं उसके पति के साथ साथ अयोध्या का नरेश न होता या केवल उसका पति ही होता तो क्या वह मेरे ही दरबार में मेरे इस निर्णय के विरुद्ध अपील न कर सकती थी । मेरे बारे में सूत का विचार सुनकर लक्ष्मण ने ठीक ही कहा था- सूत ! सीताजी के बारे में अन्यायपूर्ण बात करनेवाले इन पुरवासियों के कारण ऐसे कीर्तिनाशक कर्म में प्रवृत्त होकर श्रीरामचन्द्र ने किस धर्मराशि का उपार्जन कर लिया है ?” परन्तु यह सब निराधार है । महर्षि वाल्मीकि निर्मित रामायण के अनुसार श्रीराम ने ऐसा विचार कहीं भी प्रकट नहीं किया है । जन्मान्तरीय हेतुओं से कितनी ही घटनाएँ होती हैं । सूत ने जो भी कहा था वह सही ही है । बुद्धदेव ने भी तो आनन्द और चाण्डालकन्या के सम्बन्ध में जन्मान्तरीय बातों का उल्लेख किया ही है । कौसल्यायन के अनुसार श्रीराम ब्राह्मणपुत्र का मरण और शम्बूक शूद्र की तपस्या तथा शम्बूक के वध से ब्राह्मण के पुत्र के जीवित होने की सब बात वाल्मीकि के अनुसार ही वर्णन करते हैं । इसके बाद कौसल्यायन निराधार

अध्याय बौद्धों द्वारा विकृत रामचरित १२३ निम्नोक्त बात कहते है—'प्रत्येक पुरुष अपने युग के मिथ्या विश्वासों का शिकार होता है। मैं नहीं जानता था कि कोई स्वर्गलोक है अथवा नहीं। किन्तु मेरे समय के लोग मानते थे कि है और मैं भी मानता था कि है। मैं नहीं जानता कि मरने के बाद कोई भी किसी भी स्वर्गलोक में जाता है, या नहीं। किन्तु मेरे युग के लोग मानते थे कि आदमी सशरीर भी स्वर्ग जा सकता है। मैं भी ऐसा ही मानता था। मैं नहीं जानता था कि किसी शूद्र के लिए तपस्या करना क्यों निषिद्ध ठहराया गया था। पैर ऊपर सिर नीचे करके तपस्या करने से स्वर्ग होता है या नहीं यह सब मैं नहीं जानता था। परन्तु मेरे युग के सब लोग यह सब मानते थे। तपस्या करना शूद्र का विहित कर्म नहीं है और मैं भी मानता था कि उसका ऐसा करना अधर्म है। मैं यह नहीं जानता था कि शूद्र का तपस्या करना किसी ब्राह्मण के लड़के की मृत्यु का कारण कैसे हो सकता है ? किन्तु नारद मुनि ने ऐसा कहा था। मैंने इसपर विश्वास कर लिया था। ये सारे विश्वास सत्ययुग में ब्राह्मणों तक ही सीमित थे। त्रेतायुग में हम क्षत्रिय भी इनके शिकार हो गये और अब वैश्य और शूद्र भी। अन्यथा किसी शूद्र को क्या पड़ी थी कि वह पेड़ पर सिर नीचा और पैर ऊपर करके लटके और सोचे कि वह सशरीर स्वर्ग पहुँच जायगा। जहाँ तक मिथ्या विश्वास का सम्बन्ध है मुझमें और उस शूद्र में कोई अन्तर नहीं था। भावी इतिहासकार मुझे शम्बूक का वध करने के लिए दोषी ठहरायेंगे। वे यह नहीं सोचेंगे कि मैं स्वयं कितने अधिक मिथ्या विश्वासों का शिकार था। सही बात यही है कि मैं द्विजों के स्वार्थों के संरक्षण को साक्षात् मूर्ति था। शम्बूक शूद्रवर्ग की उभरती हुई चेतना का प्रतिनिधि था। ब्राह्मणबालक का मरण ब्राह्मणवाद का मरण था और शम्बूक का वध शूद्रों की जाग्रत् चेतना की हत्या। एक के जीवित रहने के लिए दूसरे का निधन आवश्यक था। मृत ब्राह्मण जी उठे उसके लिए यह अनिवार्य था कि शम्बूक शूद्र की हत्या हो। मैं तो केवल एक निमित्त मात्र था। क्या भावी इतिहास लेखक मुझे क्षमा नहीं करेंगे ?" कौसल्यायन की यह अपने फितूरी मस्तिष्क की कल्पना है। इसका वाल्मीकिरामायण तथा श्रीराम से कोई सम्बन्ध नहीं है। वाल्मीकिरामायण के अनुसार तो शम्बूक स्वयं अपने को शूद्र योनि में उत्पन्न मानता था और तपस्या से स्वर्ग की प्राप्ति सम्भव मानता था— “शूद्रयोन्यां प्रजातोऽस्मि तप उग्रं समास्थितः । देवत्वं प्रार्थये राम सशरीरो महायशः ॥ (वा० रा० ७।७६।२) जब ब्राह्मणयोनि और शूद्रयोनि में भेद है तो उसके कर्मों में भी भेद हो ही सकता है। यदि कौसल्यायन थोड़ा और प्रगतिशील हों और बौद्ध धर्म छोड़कर चार्वाक हो जायें तब तो उनको बौद्ध धर्म भी अन्धविश्वास ही प्रतीत होगा; क्योंकि पुनर्जन्म की मान्यता बौद्ध धर्म में भी है। लङ्कावतारसूत्र में हत्या करने से, झूठ बोलने से तथा मांस खाने से अधम योनियों की प्राप्ति बतलायी गयी है। तप और व्रत आदि का महत्त्व भी बौद्ध धर्म में मान्य है। आज भी बौद्धगया में अनेकों बौद्ध भिक्षु दण्डवत् प्रणाम करते दिखायी देते हैं। 'मणिपद्मे हुँ' की चरखी भी चलाते हुए अनेक तिब्बती बौद्ध लामा दिखायी देते हैं। यह सब भी तो क्या मिथ्या विश्वास नहीं है। वस्तुतः कौसल्यायन का उक्त कथन बौद्ध धर्म के विरुद्ध ही है। कारण कि बौद्ध लोग भी धर्म, अधर्म में भगवान् बुद्ध के वचनों को ही प्रमाण मानते हैं। इसी लिए बुद्ध की सर्वज्ञतासिद्धि के लिए उनका महान् प्रयास है। सामान्य और प्रत्यक्ष अनुमान से ही सब काम सिद्ध हो जायें तो बुद्ध की सर्वज्ञतासिद्धि का कुछ प्रयोजन नहीं रहता है। नैयायिक आदि ईश्वर को सर्वज्ञ तथा ऋषियों को परावरद्रष्टा मानकर ईश्वर के वेद तथा आर्ष ग्रन्थों के आधार पर ही धर्माधर्म का निर्णय करते हैं। पूर्वोत्तरमीमांसक अनादि अपौरुषेय वेद एवं तन्मूलक आर्ष धर्म-ग्रन्थों से धर्मादि का निर्णय करते हैं। जैसे चक्षु द्वारा रूप का ज्ञान मिथ्या ज्ञान या मिथ्या विश्वास नहीं है; श्रोत्र द्वारा शब्द का ज्ञान, मन द्वारा सुख-दुख का ज्ञान मिथ्या ज्ञान नहीं है वैसे ही वेदादि शास्त्रों के द्वारा धर्म और ब्रह्म का ज्ञान मिथ्या ज्ञान या मिथ्या विश्वास नहीं है। उसके अनुसार तपस्या का स्वरूप और उसका फल विदित होता है। उनके अनुसार श्वान, शूकर, गौ, गर्दभ, अश्व आदि योनियों के समान ही ब्राह्मण, शूद्र आदि योनियाँ भी सिद्ध होती हैं।

१२४ रामायणमीमांसा पञ्चम “श्वयोनिं वा शूकरयोनिं वा चाण्डालयोनिं वा.....” (छा० उ० ५।१०।७) योनिभेद से कर्मभेद होते हैं। सम्राट् हो जाने पर भी कोई राजसूय का अधिकारी नहीं हो सकता है यदि क्षत्रिय योनि में पैदा न हुआ हो। इसी प्रकार तपस्या में शूद्र का अधिकार नहीं हो सकता। यह भी शास्त्रगम्य धर्म है, अन्धविश्वास नहीं है। ब्राह्मणवाद कोई वाद नहीं है। वेदादिशास्त्रप्रामाण्यवाद आस्तिकमात्र का वाद है। राम उसी शास्त्ररक्षण की साक्षात् मूर्ति थे। उनसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र ही नहीं विश्व के प्राणिमात्र का कल्याण होता है। शम्बूक शूद्रवर्ग की उभरती हुई चेतना का प्रतीक न होकर प्रमाद का प्रतीक था। कारण कि जिन शास्त्रों के अनुसार तपस्या का महत्त्व है, तपस्या से स्वर्गप्राप्ति कही गयी है, उन्हीं शास्त्रों में शूद्र के लिए तपस्या वर्जित भी है। क्या आधी मुर्गी पकाने और आधी अण्डा देने के काम में आ सकती है ? इसी तरह उन्हीं शास्त्रों का कोई अंश स्वीकार कर लेना, अन्य अंश छोड़ देना क्या उचित है ? वैसा करना चेतना नहीं प्रमाद है। जो जिसमें अधिकृत है उसे छोड़ कर अन्य अच्छे कर्म में भी प्रवृत्ति प्रमाद है, अपराध है और ऐसा करनेवाला दण्डनीय भी है। उदाहरणार्थ मार्गदर्शक या एक यातायातनियामक आरक्षी ( पुलिस ) यदि अपना काम छोड़कर किन्हीं सभ्य पुरुषों की हमलावर गुण्डों से रक्षा करने के काम में भी लग जाता है तो वह दण्डनीय है। गुण्डों से सभ्य पुरुषों की रक्षा करना अच्छी बात है, परन्तु यदि इसी बीच यातायात का नियन्त्रण न होने के कारण मोटर आदि का एक्सीडेण्ट हो जाने से अनेकों सभ्य पुरुषों की मृत्यु हो जाय तो उसका उत्तरदायित्व उसी पर होगा और वही होगा दण्ड का भागी। एक न्यायाधीश की दृष्टि में किसी हत्यारे को फाँसी देना आवश्यक है फिर भले ही उसकी फाँसी से उसके बूढ़े माँ-बाप अनाथ हो जायें, उसकी विधवा स्त्री और छोटे-छोटे बच्चे अनाथ होकर घोर विपत्ति में पड़ जायें। दया करना बहुत अच्छी बात होने पर भी उस न्यायाधीश का दया करके हत्यारे को फाँसी न देना प्रमाद होगा। उसी तरह एक शासक जो धन, धर्म तथा मर्यादाओं की रक्षा के लिए उत्तरदायी है, उसका स्वकर्तव्यविमुख अन्य के कर्म में तल्लीन नागरिक को दण्ड देना अत्यावश्यक है। यदि कोई सफाई-विभाग या हेल्थ डिपार्टमेण्ट का अधिकारी बिना त्यागपत्र दिये तथा दूसरे अधिकारी को बिना चार्ज दिये अपना काम छोड़कर आसन, प्राणायाम या तपस्या में रत हो जाय और सफाई में गड़बड़ी होने से कॉलरा फैल जाय तथा कई नागरिकों की मृत्यु हो जाय तो उस काण्ड का उत्तरदायी और दण्ड्य वह अधिकारी ही होगा, अन्य नहीं । इस तथ्य को दृष्टि में रखते हुए यदि स्वकर्तव्यविमुख होकर तपस्या मे लगने के कारण शम्बूक को श्रीराम ने दण्ड दिया, तो वह सर्वथा उचित ही है। दण्ड्य को दण्ड नहीं देनेवाले और अदण्ड्य को दण्ड देनेवाले शासक समानरूप से दोषी होते हैं। श्रीराम ने जैसे स्वकर्तव्यविमुख शम्बूक शूद्र को दण्ड दिया वैसे ही स्वकर्तव्यविमुख रावण जैसे ब्राह्मण को भी दण्ड दिया था। अतः सचमुच नीति, प्रीति, परमार्थ तथा स्वार्थ का वेत्ता श्रीराम के समान अन्य कोई नहीं हुआ— “नीति प्रीति परमारथ स्वारथ । कोउ न राम सम जान जथारथ ।।” (रा० मा० २।२५२।३) उच्छृङ्खलता और धर्मनियन्त्रण दोनों परस्पर विरुद्ध ही हैं। एक के उन्मेष में दूसरे की मृत्यु निश्चित है। उच्छृङ्खलता के उज्ज्रीवन से विश्व में विप्लव होगा, उसके विनाश एवं धर्मनियन्त्रण के रक्षण से विश्व का कल्याण होगा। इसी लिए श्रीराम ने देवता, दानव, ब्राह्मण, शूद्र सभी के कल्याणार्थ उच्छृङ्खलता का वध कर धर्मनियन्त्रण का रक्षण किया। यही है शम्बूक के वध से ब्राह्मणपुत्र की रक्षा का अभिप्राय । सीता के शपथ के सम्बन्ध में कौसल्यान की कल्पना है—“श्रीराम ने कहा कि किसी के अपमान की कोई हद होती है। अपनी प्राणप्रिया सीता का मैं अनन्त अपमान कर चुका था। जो सीता सारे राजसुखों का त्याग

कर वन-वन भटकने के लिए मेरे साथ चली आयी थी, जिस सीता ने मेरे वल्कलवसन धारण करने पर स्वयं भी वल्कल- वसन धारण कर लिये थे, जिस सीता ने गङ्गातरण के समय मेरे सकुशल अयोध्या लौट आने पर अनेक मन्नतें (मान- ताएँ) मानी थीं, जो सीता ऋषिपत्नी अनसूया की आज्ञा मानकर उसके द्वारा प्रदत्त वस्त्राभूषणों को पहनकर वन में भी मेरे पास आयी थी, जिस सीता ने मुझसे निरपराध प्राणियों के न मारने और अहिंसाधर्मपालन करने का अनुरोध किया था, जिस सीता ने उस स्वर्णवर्ण कपटमृग को जीवित या मृत अवस्था में लाने के लिए मुझे उसके पीछे दौड़ाया था, जिस सीता की सुरक्षा के लिए मैं लक्ष्मण को उसके पास छोड़ आया था, जिस सीता ने अपनी तनिक भी चिन्ता न कर लक्ष्मण को मेरी सहायता के लिए जाने को मजबूर किया था, जिस सीता को रोती बिलखती अवस्था में रावण उठाकर ले गया था, जिस सीता को रावण ने अनेक प्रलोभन दिये थे और जिसने मेरे मुकाबले में रावण को हमेशा नगण्य समझा था, जिस सीता को रावण ने केवल दो मास और जीवित रहने की धमकी दी थी, जो इससे भी टस से मस नहीं हुई थी, जिस सीता ने परपुरुष के शरीर तक का स्पर्श न करके अपनी मर्यादा को निभाने के कारण हनुमान् की पीठ पर बैठने से इनकार कर दिया था, जिस सीता के चरित्र पर सन्देह करके मैंने रावणवध के अनन्तर उसे अन्यत्र जाने के लिए कह दिया था, जिस सीता ने अपने पातिव्रत्य धर्म को निष्कलङ्क सिद्ध करने के लिए अग्नि में प्रवेश किया था, जिस सीता को मूर्तिमान् अग्निदेव ने मुझे समर्पित कर उसकी पवित्रता को प्रमाणित किया था और जिसे मैंने सहर्ष स्वीकार किया था, जिस सीता को भद्र की अशुभ सूचना पर मैंने त्याग दिया था और जिसके चरित्र की परिशुद्धता को मुनि वाल्मीकि ने प्रमाणित किया था, उसी सीता को मैंने एक बार फिर भरी सभा में अपनी शुद्धता को प्रमाणित करने के लिए शपथ ग्रहण करने को कहा। मुझे इसमें अब कोई सन्देह नहीं कि मेरे जैसे लोका- पवादभीरु पति के साथ रहने की अपेक्षा सीता ने, उस भूमिपुत्री ने, पुनः भूमि में ही समा जाना श्रेयस्कर समझा। उस समय सीता तपस्विनियों के अनुरूप गेरुवा वस्त्र धारण किये हुए थी। सारी उपस्थित जनमण्डली की ओर करबद्ध मुद्रा अपनाये हुए वे बोलीं-मैं श्रीरघुनाथ के सिवा किसी भी पुरुष का मन से भी चिन्तन नहीं करती; यदि यह सत्य है तो भगवती पृथ्वी मुझे अपनी गोद में स्थान दें। श्रीराम को छोड़कर मैं किसी दूसरे पुरुष को नहीं जानती, यदि यह कथन सत्य है तो भगवती पृथ्वी मुझे अपनी गोद में स्थान दें। पृथ्वी माता ने विवर दे दिया। सभी लोगों के देखते-देखते जानकी रसातल प्रयाण कर गयी। वहाँ एकत्रित जनता नाना प्रकार की भिन्न-भिन्न भावनाओं से ग्रस्त हो उठी। मैंने मिथलेशकुमारी के चरित्र पर प्रश्न चिह्न लगाया था और उसने स्वप्न में भी मेरे बारे में अन्य कुछ न सोचा था। मैं पातकी सिद्ध हुआ और वह पतितपावनी। ऋषि-मुनि ही नहीं सभी राक्षस तथा वानर भी पुकार उठे :-साध्वी सीते तुम धन्य हो....।।" कौसल्यायनने अपने बौद्ध स्वभाव के कारण यहाँ भी श्रीराम के द्वारा मैं पातकी हूँ इत्यादि दुष्कल्पना करा ही डाली। परन्तु भाव, कुभाव किसी तरह श्रीरामाचरित पढ़ते-पढ़ते कौसल्यायन की बुद्धि ठिकाने आ गयी और उन्होंने श्रीसीता के निर्मल चरित्र का यथावत् वर्णन कर डाला। सीता का अग्निप्रवेश स्वीकार किया और मूर्तिमान् अग्निदेव ने सीता को राम के लिए समर्पण किया-यह मान लिया और यह दुस्तर्क नहीं किया कि कोई मनुष्य अग्नि में प्रविष्ट होकर जीवित कैसे निकल सकता हैं, अग्नि मूर्तिमान् देवता कैसे हो सकता हं और वह सीता को समर्पित कैसे कर सकता हैं ? कौसल्यायन के राम कहते हैं-"श्रीलक्ष्मण ने हाथ में जल लिया और प्राणवायु का अवरोध कर वहीं शान्त हो गये। तब विभीषण को मैंने आशीर्वाद दे दिया। जबतक पृथ्वी रहेगी और जबतक संसार में मेरी कथा प्रचलित रहेगी तबतक इस भूतल पर तुम्हारा राज्य रहेगा। हनुमान् से भी मैंने कहा-हरीश्वर ! जबतक संसार में मेरी कथाओं का प्रचार रहे तबतक तुम भी मेरी आज्ञाओं का पालन करते हुए प्रसन्नतापूर्वक विचरते रहना। जाम्ब-

१२६ रामायणमीमांसा पञ्चम वान् आदि वानरनायकों को मैंने द्वापर के अन्ततक जीवित बने रहने का आशीर्वाद दिया।" आश्चर्य है—चार्वाक- प्राय कौसल्यायन को ऐसी बातों में विश्वास कैसे हो गया ! आगे कौसल्यायन के अनुसार "सरयू नदी पर पहुँच कर राम ने तथा राम का अनुसरण करते हुए विशाल जनसमूह ने जलसमाधि ले ली। राम की ही तरह वे भी परम धाम को प्राप्त हुए। सभी पुरवासी राम के पीछे हो लिये एक भी प्राणी पीछे नहीं रहा, कोई पशु-पक्षी भी पीछे नहीं रहे।" प्रश्न यह है कि कौसल्यायन को यह कैसे विश्वास हो गया कि समस्त जनता और पशु-पक्षियों तक ने जलसमाधि (डूबने) के लिए श्रीराम का अनुसरण किया ? आगे कौसल्यायन के अनुसार श्रीराम ने कहा कि 'मैं चाहता हूँ कि उन भयावह भूलों से लोग बचें जिन भूलों को मैंने अपने जीवन में बार-बार दुहराया है।' पर यह भी कौसल्यायन की मनगढ़न्त कल्पना ही है; क्योंकि वाल्मीकिरामायण में ऐसा कोई भी शब्द नहीं है, जिसका यह अर्थ होता हो। केवल जनता की आँखों में धूल डालने के लिए उन्होंने वाल्मीकिरामायण के श्लोकों का उद्धरण किया है। उनकी दुष्कल्पनाएँ रामायण तथा वेदादि शास्त्रों, दर्शनों तथा सत्तर्कों से अत्यन्त विरुद्ध हैं। जलसमाधि बतलानेवाला भी वाल्मीकिरामायण का कोई वचन नहीं है। परम्परा से भी दूर से भी किसी श्लोक का ऐसा अर्थ नहीं है। वाल्मीकिरामायण के उत्तरकाण्ड में स्पष्ट कहा गया है—श्रीराम की अयोध्या के पुरवासी तथा पशु-पक्षी तक सम्पूर्ण जीवित प्राणी राम के साथ हो लिये— "नोच्छ्वसत्तदयोध्यायां सूक्ष्ममपि दृश्यते । तिर्यग्योनिगताश्चैव सर्वे राममनुव्रताः ॥" (वा० रा० ७।१०९।२२) क्या किसी राजा के साथ पशु-पक्षी सहित सभी पुरवासी जलसमाधि (डूबने) के लिए जा सकते हैं ? क्या यह श्रीराम के परब्रह्म होने में प्रमाण नहीं है ? श्रीराम सरयूतट पर डेढ़ योजन पश्चिम की ओर गये। उसी समय सब देवों एवं महात्माओं से परिवृत लोकपितामह ब्रह्माजी वहाँ आये; जहाँ श्रीरामजी परमधाम जाने के लिए प्रस्तुत थे। शतकोटि दिव्य विमानों से तथा दिव्य तेजों से वहाँ का आकाश दिव्य ज्योतिर्मय, स्वयंप्रभ, पुण्यकर्मा स्वर्गियों से दीप्त हो रहा था, दिव्य गन्धवान् पुण्य वायु बह रहा था और पुष्पवृष्टि हो रही थी— "अथ तस्मिन् मुहूर्ते तु ब्रह्मा लोकपितामहः । सर्वैः परिवृतो देवैर्भूषितैश्च महात्मभिः ॥" (वा० रा० ७।११०।२) "आययौ यत्र काकुत्स्थः स्वर्गार्थं समुपस्थितः । विमानशतकोटीभिर्दिव्याभिरभिसंवृतः ॥" (वा० रा० ७।११०।७) बाजे बज रहे थे। गन्धर्व, अप्सरा आदि से वह स्थान सङ्कुल था। श्रीराम ने सरयूसलिल में अपने चरणों से चलना आरम्भ किया— "सरयूसलिलं रामः पद्भ्यां समुपचक्रमे ॥" (वा० रा० ७।११०।७) उसी समय आकाश से पितामह ब्रह्मा ने दिव्य वाणी से कहा—"हे विष्णो ! आपका भद्र हो। बड़े सौभाग्य से आप प्राप्त हुए हो। देवतुल्य अपने भ्राताओं के साथ अपने सगुण निर्गुण जैसे स्वरूप की इच्छा हो, उसे स्वीकार करो। आप वैष्णवी तनु अथवा शुद्ध सनातन शुद्ध ब्रह्मरूप से विराजमान हों। आप ही सब लोगों को दिव्य गति प्रदान करनेवाले और आप ही सब लोगों के गन्तव्य परमपद हैं। आपकी विशालाक्षी, ज्ञानशक्तिरूपा, पूर्वपरिग्रहा, नित्यसिद्धा सहजा माया के अनुग्रह के बिना अतिशय तपःसम्पन्न लोग भी आपके अचिन्त्य महान् अपरिच्छिन्न अक्षय ब्रह्मरूप को नहीं जानते हैं। श्रवण, मनन, निदिध्यासन तथा भक्ति, ध्यान आदि से प्रसन्न हुई विशालाक्षी, नित्यसिद्धा आपकी चितिरूपा महाशक्ति के अनुग्रह से ही आपका ज्ञान होता है—

अध्याय बौद्धों द्वारा विकृत रामचरित १२७ “ततः पितामहो वाणीं त्वन्तरिक्षादभाषत । आगच्छ विष्णो ! भद्रं ते दिष्ट्या प्राप्तोऽपि राघव ॥ भ्रातृभिः सह देवाभैः प्रविशस्व स्विकां तनुम् । यामिच्छसि महाबाहो तां तनुं प्रविश स्विकाम् ॥ वैष्णवीं तां महातेजो यद्वाकाशं सनातनम् । त्वं हि लोकगतिर्देव न त्वां केचित् प्रजानते !। ऋते मायां विशालाक्षीं तव पूर्वपरिग्रहाम् । त्वामचिन्त्यं महद्भूतमक्षयं चाजरं तथा !' यामिच्छसि महातेजस्तां तनुं प्रविश स्वयम् ।।” (वा० रा० ७।१००।८-११) श्रीपितामह का वचन सुनकर महामति राम अनुजों के साथ सशरीर वैष्णव तेज में प्रविष्ट हुए । जैसे जल में जल प्रविष्ट होता है वैसे ही चिन्मय तेजःस्वरूप श्रीराम चिन्मय वैष्णव स्वरूप तेजःपुञ्ज में प्रविष्ट हो गये । एतावता भगवान् का स्वरूप भौतिक न होकर चिन्मय तेजःस्वरूप ही होता है, यह सिद्ध है । “येन सूर्यस्तपति तेजसेद्धः” (तै० ब्रा० ३।१२।९।७) जिस चिन्मय तेज से इद्ध होकर सूर्य तपता है वही चिन्मय तेज वैष्णवरूप है । न केवल श्रीराम ही अपितु भरत आदि श्रीभगवान् राम के अनुज भी सशरीर ही वैष्णव तेज में प्रविष्ट हुए थे। उस समय साध्य, मरुद्गण, इन्द्र, अग्नि सहित सब देवता, आदित्य, ऋषिगण, गन्धर्व, अप्सराएँ, दैत्य, दानव, मानव, राक्षस, सुपर्ण, नाग, यक्ष आदि सभी ने भगवान् श्रीराम की अर्चना की । सभी पुष्ट एवं प्रमुदित हो गये । सबके मनोरथ पूर्ण हुए । साधु साधु शब्द का सर्वत्र उद्घोष होने लगा । त्रिदिव त्रिताप रहित हो गया— “पितामहवचः श्रुत्वा विनिश्चित्य महामतिः । विवेश वैष्णवं तेजः सशरीरः सहानुजः ॥ ततो विष्णुमयं देवं पूजयन्ति स्म देवताः । साध्या मरुद्गणाश्चैव सेन्द्राः साग्निपुरोगमाः ॥ ये च दिव्या ऋषिगणा गन्धर्वाप्सरसश्च याः । सुपर्णानागयक्षाश्च दैत्यदानवराक्षसाः ॥ सर्वं पुष्टं प्रमुदितं सुसम्पूर्णमनोरथम् । साधु साध्विति तैर्देवैस्त्रिदिवं गतकल्मषम् ॥ (वा०रा० ७।११०।१२-१५) उसके बाद विष्णुभावापन्न श्रीराम या रामस्वरूप विष्णु ने पितामह से कहा—“मेरे साथ में आये हुए जनसमूह को उत्तम लोक देने की व्यवस्था करें। ये सब मेरे स्नेह से सब त्याग कर मेरा अनुगमन करनेवाले हैं, भक्त हैं, अतएव भजनीय हैं ।” भगवान् विष्णु का वचन सुनकर ब्रह्मा पितामह ने कहा—“ये सब सन्तानक ( साकेत ) लोक को प्राप्त करेंगे । पशु-पक्षी जो भी आपका चिन्तन करते हुए प्राणत्याग करेंगे वे सभी सन्तानक लोक में निवास करेंगे। वह सन्तानक लोक ब्रह्मलोक के सभी गुणों से युक्त है। ब्रह्मलोक के अनन्तर है। सभी वानर और ऋक्ष आदि तक उसी लोक को प्राप्त हो गये । ब्रह्मलोकनिवासियों के समान ही उन्हें निर्गुण ब्रह्म का साक्षात्कार और शुद्धब्रह्म की प्राप्ति भी उनके हस्तगत ही है— “अथ विष्णुर्महातेजाः पितामहमुवाच ह । एषां लोकं जनौघानां दातुमर्हसि सुव्रत ॥

१२८ रामायणमीमांसा पञ्चम इमे हि सर्वे स्नेहान्मामनुयाता यशस्विनः । भक्ता हि भजितव्याश्च त्यक्तात्मानश्च मत्कृते ॥ तच्छ्रुत्वा विष्णुवचनं ब्रह्मा लोकगुरुः प्रभुः । लोकान् सन्तानकान्नाम यास्यन्तीमे समागताः ॥ यच्च तिर्यग्गतं किञ्चित्त्वामेवमनुचिन्तयत् । प्राणांस्त्यक्ष्यति भक्त्या तत् सन्तानेषु निवत्स्यति ॥ सर्वैर्ब्रह्मगुणैर्युक्ते ब्रह्मलोकादनन्तरे । वानराश्च स्विकां योनिमृक्षाश्चैव तथा ययुः ॥” (वा० रा० ७।११०।१६-२०) अवधवासी सभी प्रजा ने प्रसन्नता एवं हर्षपूर्ण आनन्दाश्रु से विह्वल होकर सरयू में स्नान करके स्वेच्छा से प्राणत्याग किया और विमान पर आरूढ़ होकर वे सन्तानकलोक पहुँच गये । न केवल मनुष्य ही; किन्तु पशु-पक्षी भी सरयूजल से क्लिन्न होकर प्रभावान् दिव्य देह से युक्त होकर दिव्य देवलोक में चले गये— “भेजिरे सरयू सर्वे हर्षपूर्णाश्रुविक्लवाः । अवगाह्याप्सु यो यो वै प्राणांस्त्यक्त्वा प्रहृष्टवत् ॥ मानुषं देहमुत्सृज्य विमानं सोऽध्यरोहत । तिर्यग्योनिगतानां च शतानि सरयूजलम् ॥ सम्प्राप्य त्रिदिवं जग्मुः प्रभासुरवपूंषि तु । दिव्या दिव्येन वपुषा देवा दीप्ता इवाभवन् ॥ गत्वा तु सरयूतोयं स्थावराणि चराणि च । प्राप्य तत्तोयविक्लेदं देवलोकमुपागमन् ॥” (वा० रा० ७।११०।२३-२६) इतने स्पष्ट उल्लेख पर भी यह कहना कि श्रीराम ने अपनी प्रजा के साथ जलसमाधि ले ली—स्पष्ट ही सत्य का तिरस्कार है और प्रजा की आँखों में धूलिप्रक्षेप करना है। इस तरह स्पष्ट है कि वाल्मीकिरामायण का नाम लेकर मिथ्या कल्पना के आधार पर ही आनन्द कौसल्यायन ने जो ‘राम की जबानी राम की कहानी’ लिखी है वह निराधार, निष्प्रमाण अतएव उपेक्षणीय ही है । ✤ जैनमत में रामकथा बुल्के के कथनानुसार जैनधर्म में रामकथा को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है। राम (पद्म), लक्ष्मण और रावण न केवल जैनधर्मावलम्बी थे; किन्तु उनकी गणना जैनियों के त्रिषष्टि महापुरुषों में होती है। इन त्रिषष्टि महापुरुषों का वर्णन इस प्रकार है—२४ तीर्थङ्कर, १२ चक्रवर्ती, ९ बलदेव, ९ वासुदेव और ९ प्रतिवासुदेव । इन सब की जीवनियां जैनधर्म में महाभारत, रामायण तथा पुराणों के समान आदरणीय हैं । त्रिषष्टिलक्षणमहापुराण, आदिपुराण, उत्तरपुराण एवं पउमचरियं में उनका विस्तृत वर्णन है। पउम- चरियं (रामचरित) चौथी शती ई० का माना जाता है। प्रत्येक कल्प में ९ बलदेव, ९ वासुदेव और ९ प्रतिवासुदेव होते हैं। वे ही क्रमशः राम, लक्ष्मण और रावण माने जाते हैं। बलदेव और वासुदेव किसी राजा की विभिन्न

अध्याय जैनमत में रामकथा १२९ रानियों के पुत्र हैं। वासुदेव अपने बड़े भाई बलदेव के साथ प्रतिवासुदेव (प्रतिनारायण) से युद्ध कर उसका वध करते हैं। दिग्विजय कर वे भारत के तीन खण्डों पर अधिकार कर अर्धचक्रवर्ती बन जाते हैं। मरने पर वासुदेव को प्रतिवासुदेव के वध के कारण नरक जाना पड़ता है। नौ वासुदेवों में लक्ष्मण और कृष्ण विशेषरूप से उल्लेखनीय हैं। बलदेव अपने भाई की मृत्यु के कारण शोकाकुल होकर जैनदीक्षा लेकर मोक्ष प्राप्त करते हैं। प्रतिवासुदेव सदैव वासुदेव का विरोध करते हैं और वासुदेव के चक्र से मारे जाते हैं। जैन कथा के अनुसार वानर और राक्षस दोनों विद्याधरवंश की विभिन्न शाखायें हैं। कथासरित्सागर, रामायण तथा महाभारत में विद्याधर देवयोनि का वर्णन अवश्य है। परन्तु महाभारत तथा रामायण के अनुसार उनका कोई महत्वपूर्ण स्थान नहीं है। महाभारत आदि में हनुमान्, वाली, सुग्रीव आदि विद्याधर नहीं, किन्तु वायु, इन्द्र, सूर्य आदि देवताओं के अंशभूत विशिष्ट वानर ही थे। जैनों के अनुसार ऋषभ ने अपने सौ पुत्रों में से भरत को अपना राज्य सौंपकर स्वयं दीक्षा ले ली। पश्चात् नमि और विनमि ने उनके पास पहुँचकर राज्यलक्ष्मी माँगी तो उनको विविध विद्यायें मिलीं। ऋषभ के परामर्शानुसार विन्ध्य-प्रदेश में उन्होंने अपना राज्य स्थापित किया। ये ही दो राजकुमार विद्याधरों के पूर्वज हैं (पउमचरियं पर्व ३)। ये सब मनुष्य ही थे। उनको कामरूपत्व, आकाशगामित्व आदि विद्यायें सिद्ध थीं। वानर-वंशीय विद्याधरों की ध्वजाओं एवं महलों पर वानरों के चिह्न होते थे। इसलिए वे 'वानर' कहलाये (पउमचरियं ६।८९)। जैन रामकथाओं में प्रारम्भ में ही उन लौकिक ग्रन्थों का उल्लेख मिलता है जिनमें राम का शिकार करना, रावण आदि का मांसाहारी होना, कुम्भकर्ण की छः महीने की निद्रा, रावण के राक्षस तथा सुग्रीव के वानर होने की असत्य कथायें वर्णित हैं। इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि जैन रामकथा वाल्मीकिरामायण के बाद ही प्रचारित हुई है। वस्तुतः अनादि वेद तथा उपनिषद् मूलक वाल्मीकिरामायण ही राम के चरित्र में परम प्रमाण है। रामचरित्र की अत्यन्त लोकप्रियता देखकर जैन तीर्थङ्करों ने यह सोचा होगा कि यदि जैन जनता वाल्मीकिरामायण की ओर आकर्षित हुई तो स्वभावतः उनकी प्रीति वेद एवं ईश्वर तथा वैदिक कर्मकाण्ड में हो जायगी, परन्तु यह जैनधर्म के विरुद्ध है; अतः वाल्मीकिरामायण से रामचरित लेकर उसे विकृत रूप में उपस्थित किया जाय । श्वेताम्बर-सम्प्रदाय में विमलसूरि की राम-कथा प्रचलित है; दिगम्बर सम्प्रदाय में विमलसूरि एवं गुणभद्र की रामकथा का प्रचलन है। विमलसूरि की परम्परा की चर्चा करते हुए बुल्के ने स्पष्ट कहा है कि "विमलसूरि ने पउमचरियं लिखकर पहले पहल लोकप्रिय रामकथा को जैनधर्म के साँचे में ढालने का प्रयास किया है" (पृ० ६७ अनु० ५८)। विमलसूरि का काल जैन-परम्परा के अनुसार (पउमचरियं ११८।१०३) पउमचरियं ७२ ई० की रचना है। भाषा के आधार पर डा० याकोबी आदि विद्वान् पउमचरियं को तीसरी अथवा चौथी शती ई० की रचना मानते हैं। यह ग्रन्थ शुद्ध जैन-महाराष्ट्री में लिखा गया है। इसका संस्कृत रूपान्तर रविषेणाचार्य ने ६६० ई० में किया, जो पद्मचरित के नाम से प्रसिद्ध है। बुल्के के अनुसार "संघदासकृत वसुदेवहिण्डि में जो संक्षिप्त रामकथा मिलती है वह विमलसूरि की अपेक्षा वाल्मीकि के अधिक निकट है।" यद्यपि विमलसूरि का कहना है कि पद्मचरित आचार्यों की परम्परा से चला आ रहा है और नामावली- बद्ध था; पर इसका इतना ही अर्थ है कि कथा के प्रधान पात्रों, उनके माता-पिताओं, स्थानों, भवान्तरों आदि के नाम ही उसमें होंगे। पल्लवित कथा का रूप विमलसूरि ने ही निर्मित किया है। १७

१३० रामायणमीमांसा पञ्चम वस्तुतः यह भी वाल्मीकि का ही अनुकरण है; क्योंकि वहाँ भी रामायण को वेद-उपनिषद् पर आधारित माना जाता है। बुल्के ने प्राकृत पद्मचरित या रामचरित की चर्चा करते हुए विमलसूरिकृत पउमचरियं को ईसा की तीसरी या चौथी शताब्दी की रचना स्वीकार किया है, साथ ही ईसा की नवीं शताब्दी में शीलाचार्यकृत रामलक्खणचरिय को विमलसूरि की परम्परान्तर्गत मानते हुए भी वाल्मीकीय रामायण से अधिक प्रभावित माना है। भद्रेश्वरकृत कहावली के अन्तर्गत रामायण, भुवनतुङ्गसूरिकृत सीयाचरिय तथा रामलक्खणचरिय को भी ग्यारहवीं ई० शती की रचना माना है। संस्कृत जैन रामायणों की चर्चा में रविषेणकृत पद्मचरित को सन् ६६० ई० का माना है। हेमचन्द्रकृत योगशास्त्र की टीका में सीतारामकथानकम्, जिनदासकृत रामायण या रामदेवपुराणम् को ईसा की १५ वीं; पद्मदेवविजयगणिकृत रामचरित और सोमसेनकृत रामचरित को १६ वीं तथा सोमप्रभकृत लघुत्रिषष्टिशलाकापुरुष- चरित और मेघविजयगणिवरकृत लघुत्रिषष्टिशलाकापुरुषचरित को ई० १७ वीं शती की रचना माना है। इसी तरह पद्मपुराण अथवा रामचरित्र, सीताचरित्र, रामायणकथानकम्, सीताकथानकम् आदि ग्रन्थों की भी प्रसिद्धि है। अपभ्रंश में प्राप्त स्वयम्भूदेवकृत पउमचरिउ अथवा रामायणपुराण ८ वीं ई० शती, रइधूकृत पद्मपुराण अथवा बलभद्र- पुराण १५ वीं शती, कन्नड़ में पम्परामायण या रामचन्द्रचरितपुराण ११ वीं, कुमुदेन्दुकृत रामायण और देवप्पकृत रामविजयचरित १६ वीं शती तथा चन्द्रसागरवर्णीकृत जिनरामायण १९ वीं शती की रचनाएँ प्रसिद्ध हैं। उक्त सभी ग्रन्थ ईसा की तीसरी चौथी शती के बाद की ही रचनाएँ हैं, अतः बाल्मीकिरामायण से अर्वाचीन ही हैं, सुतरां उन सब का मूल वाल्मीकिरामायण ही है। रावणचरित (पर्व १-२०) के प्रारम्भ में विद्याधरलोक, राक्षस-वंश तथा वानर-वंश का वर्णन है, जो वाल्मीकिरामायण के उत्तर-काण्ड में वर्णित रावण से सम्बन्धित होने पर भी उससे पर्याप्त भिन्न भी है। रावणचरित के अनुसार राक्षसराज रत्नश्रवा से कैकेसी में दशमुख (रावण), भानुकर्ण (कुम्भकर्ण), चन्द्रनखा (शूर्पणखा) और विभीषण ये चार सन्तानें हुईं। रत्नश्रवा ने जब अपने पुत्र को पहले पहल देखा तब वह अपने गले में एक माला पहने हुए था; उस माला में पिता को बालक के दस सिर दिखाई पड़े; अतः उस शिशु का नाम दशमुख रख दिया गया। अपने मौसेरे भाई वैश्रवण का विभव देखकर दशमुख ने अपने भाइयों के साथ तप किया और विभिन्न विद्याएँ प्राप्त कीं। तदनन्तर उसने मन्दोदरी तथा अन्य छः विद्याधर कन्याओं से विवाह किया और कालान्तर में वैश्रवण और यम को परास्त कर पुष्पक विमान प्राप्त कर लङ्का में प्रवेश किया। रावणवालि-संघर्ष रावण ने वाली के पास अपना दूत भेज कर कहलाया कि वह स्वयं आकर उसको प्रणाम करे और अपनी बहन श्रीप्रभा का विवाह उसके साथ कर दे। वाली जिनवरेन्द्र से अन्य किसी को भी प्रणाम नहीं करता था; अतः वह अपने भाई सुग्रीव को राज्य देकर स्वयं जैनदीक्षा लेने चला गया (पर्व ९)। सुग्रीव ने रावण को प्रणाम किया और उसके साथ अपनी बहन श्रीप्रभा का विवाह भी कर दिया। बाद में, वाली द्वारा रावण को पराजित किये जाने का वृत्तान्त एक सर्वथा नवीन रूप में प्रस्तुत किया गया है। तदनुसार वाली रामायणीय कथा के शिव का रूप लेता है और रावण द्वारा उठाये हुए पर्वतों को अपने पैर के अंगूठे से दबा देता है। आगे रावण द्वारा इन्द्र, वरुण एवं यम पर विजय प्राप्त करने का भी वर्णन है। जैनकथानुसार रावण एक धर्मभीरु जैनी है। उसने जैन-मन्दिरों का जीर्णोद्धार करवाया और ऐसे यज्ञों पर, जिनमें पशुवध होता हो, रोक लगायी (पर्व ११), नलकूबर की पत्नी उपरम्भा के प्रेम-प्रस्ताव को अस्वीकार किया (पर्व १२) और अनन्तवीर्य के धर्मोपदेशों को सुन कर व्रत ले लिया है कि वह विरक्त परनारी के साथ रमण नहीं करेगा।

अध्याय] जैनमत में रामकथा [१३१ वस्तुतः अत्यन्त परोक्ष अतीत घटनाओं में प्रामाणिक इतिहास के अतिरिक्त और कोई प्रमाण नहीं होता । वाल्मीकिरामायण ग्रन्थ रामराज्य-काल में ही लेखबद्ध किया गया था । एकमात्र वही प्रामाणिक ग्रन्थ है; वह अनादि वेदों के उपबृंहणार्थ लिखा हुआ आर्ष इतिहास है । रामायण की लोकप्रियता के कारण ही धर्मान्ध लोगों ने उसको विकृत कर अपने धर्म-प्रचारार्थ उसका दुरुपयोग किया है । यदि रावण धर्मभीरु और सदाचारी होता तो वह सीताहरण ही क्यों करता ? और राम उसका वध क्यों करते ? इसी तरह हनुमान् के चरित्रवर्णन में भी मनमानी तथा उलटफेर किया गया है। उन्हें पवनञ्जय एवं अञ्जनासुन्दरी का पुत्र माना गया है जैन-कथानुसार हनुमान् वरुण के विरुद्ध रावण की सहायता करते हैं ! चन्द्रनखा की पुत्री अनङ्गकुसुमा के साथ विवाह करते हैं, साथ ही अनेक अन्य विवाह भी करते हैं। अखण्डब्रह्मचर्य-व्रतनिष्ठ हनुमान् के सम्बन्ध में उक्त कल्पनाएँ सर्वथा निराधार हैं । जैनकथा में राम और सीता के जन्म एवं विवाह के सम्बन्ध में बहुत सी कल्पनाएँ हैं जो वाल्मीकि- रामायण के सर्वथा विपरीत हैं। तदनुसार ( पर्व २१-३२ ) अपराजिता और सुमित्रा के साथ दशरथ का विवाह हो जाने पर नारद ने उनको सूचना दी कि विभीषण उनको मारना चाहता है, क्योंकि एक नैमित्तिक के कथनानुसार दशरथ का पुत्र सागर के मार्ग से आकर जनक-पुत्री सीता के कारण रावण को मारेगा । नारद ने जनक को भी सावधान किया । दशरथ और जनक दोनों ही राजा अपने अपने राज्य छोड़ कर पृथ्वी-भ्रमण करने लगे और उनके मन्त्रियों ने उनके प्रतिरूप बनवा कर उनके महलों में रखवा दिये । विभीषण ने दशरथ की मूर्ति का सिर कटवाया । रविषेण के अनुसार परदेश में घूमते हुए दशरथ एवं जनक कैकेयी के स्वयंवर में पहुँचे । स्वयंवरा ने दशरथ के गले में माला डाल दी। इसपर अन्य राजाओं के साथ युद्ध हुआ जिसमें कैकेयी ने बड़े कौशल से दशरथ के रथ का संचा- लन किया । विवाह सम्पन्न होने पर दोनों राजा अपनी अपनी राजधानी लौट गये । घर पहुँच कर दशरथ ने कैकेयी को वर दिया । कैकेयी ने कहा कि अवसर आने पर इच्छित वर माँग लूँगी। श्रीराम या पद्म का अपराजिता ( कौशल्या ) से, लक्ष्मण का सुमित्रा से और भरत एवं शत्रुघ्न का कैकेयी से जन्म हुआ । रविषेण के अनुसार शत्रुघ्न का जन्म दशरथ की चतुर्थ महिषी सुप्रभा से हुआ था । अधिकांश जैन लेखक रविषेण का ही अनुसरण करते हैं । राजा जनक की विदेहा रानी से एक पुत्री सीता और एक पुत्र भामण्डल का जन्म हुआ । राम ने म्लेच्छों के विरुद्ध जनक की सहायता की, जिसके फलस्वरूप राम तथा सीता का वाग्दान हुआ। तदनन्तर सीतास्वयंवर के समय राम ने धनुष चढ़ाया और राम सीता का विवाह सम्पन्न हुआ । पश्चात् दशरथ को वैराग्य हुआ । उस समय कैकेयी ने पूर्व वरदान के बल पर भरत के लिए राज्य माँग लिया; यह सुन कर राम, सीता और लक्ष्मण दक्षिण दिशा की ओर वन चले गये । पश्चात्तापिनी कैकेयी के अनुरोध पर भरत ने वन में जाकर राम से राज्य स्वीकार करने का अनुरोध किया । राम के अस्वीकार करने पर भरत अयोध्या लौट आये और राज्यभार ग्रहण किया तथा किसी मुनि के सामने उन्होंने प्रतिज्ञा की कि राम के प्रत्यागमन पर मैं दीक्षा ग्रहण कर लूँगा । जैन-ग्रन्थों में अपने धर्म के प्रति इतनी धर्मान्धता है कि वे देवता, दानव, मानव सब को जैन-दीक्षा ग्रहण करवा देते हैं । पउमचरियं के वन-भ्रमण ( पर्व ३३-४२ ) में चित्रकूट का उल्लेख है; परन्तु वाल्मीकिरामायण के उल्लेखों से अत्यन्त भिन्न है । 'वन-भ्रमण के उल्लेखानुसार वज्रकर्ण ने ८ तथा सिंहोदर आदि राजाओं ने ३०० कन्याएँ लक्ष्मण को प्रदान की थीं। इसके अतिरिक्त वनमाला; रतिमाला और जितपद्मा नामक कन्याओं को भी लक्ष्मण ने प्राप्त किया ।

१३२ रामायणमीमांसा पञ्चम राम की आज्ञा से राजा सुरप्रभ ने वंशपर्वत पर बहुत से मन्दिर बनवाये थे; इससे उसका नाम रामगिरि हुआ (पर्व ४०) । दण्डकारण्य में प्रवेश करने पर एक मुनिवर ने जटायु से सीता की रक्षा करने के लिए निवेदन किया। सीताहरण और अन्वेषण (पर्व ४३-५३) विमलसूरि के कथनानुसार चन्द्रनखा के पुत्र शम्बूकने सूर्यहास खड्ग की सिद्धि के लिए बारह वर्ष पर्यन्त साधना की। उसकी सफल साधना से खड्ग प्रकट हुआ। संयोगवशात् उसी समय लक्ष्मण वहाँ पहुँचे और खड्ग को उठाकर पास के बाँस को काटकर शम्बूक का सिर भी काट दिया। चन्द्रनखा अपने मृत पुत्र को देखकर विलाप करती हुई बन में भटकने लगी । भटकते-भटकते राम-लक्ष्मण के पास पहुँच कर उसने उनकी पत्नी बननेका प्रस्ताव किया । प्रस्ताव के अस्वीकार होने पर वह अपने पति के पास गयी और उसको पुत्र-वध का समाचार सुनाया। रावण को भी सूचना भेजी गयी। इस बीच लक्ष्मण अकेले ही खरदूषण की सेना को रोक लेते हैं। रावण वहाँ पहुँचता है। रावण अवलोकनी-विद्या के द्वारा यह जान लेता है कि लक्ष्मण ने रामको बुलाने के लिए सिंहनाद का संकेत बताया है, अतः वह सिंहनाद कर राम को लक्ष्मण के पास भेज कर सीता हरण-करने में सफल हो जाता है। सीता-हरण के पश्चात् सुग्रीव तथा राम के सख्य का वर्णन है। साहसगति ने सुग्रीव का रूप धारण कर उसकी पत्नी और राज्य छीन लिया था। राम ने साहसगति को मारकर सुग्रीव को उसका राज्य लौटा दिया। सुग्रीव ने राम के लिए अपनी तेरह कन्याएँ समर्पित कीं; किन्तु सीता के वियोग में राम को उनके संग सुख नहीं मिलता था। सुग्रीव की आज्ञा से विद्याधर सीता की खोज करने जाते हैं। खोज लेते हुए सुग्रीव ने रत्नजटी से सुना कि रावण ने सीता का हरण किया है। यह सुनकर सब विद्याधरों ने रावण से भयभीत हो युद्ध करने से अस्वीकार कर दिया। उस समय सुग्रीव को स्मरण होता हैं कि अनन्तवीर्य ने रावण से कहा था कि जो कोटिशिला उठा सकेगा उससे तेरी मृत्यु होगी। वे सब विमान पर चढ़ कर वहाँ जाते हैं; लक्ष्मण कोटिशिला उठा लेते हैं; परन्तु विद्याधर रावण के भय से मुक्त नहीं हो पाते और हनुमान् को रावण के पास भेज कर विभीषण की सहायता से उसको समझाने का प्रयास करने की सलाह देते हैं। हनुमान् अपनी इस यात्रा में अपने नाना महेन्द्र को परास्त करते हैं; क्योंकि उन्होंने हनुमान् की माता अञ्जना को अपने घर से निकाल दिया था। तदनन्तर वे दधिमुखनगर के राजा की तीन कन्याओं से, जिनका विवाह साहसगति को मारनेवाले के साथ करने का निश्चय किया गया था, भेट करते हैं। लङ्का के पास पहुँच कर विभीषण द्वारा निर्मित प्राचीर पार कर वज्रमुख का वध करते हैं; तदनन्तर उसकी कन्या लङ्कासुन्दरी को परास्त कर उसके साथ रातभर क्रीड़ा करते हैं। लङ्का में प्रवेश कर सीता से मिलते हैं। वहाँ के महलों एवं उद्यानों का विध्वंस करते हैं। ओर इन्द्रजित् द्वारा बाँधे जाकर रावण के सामने उपस्थित किये जाते हैं। हनुमान् रावण को धमका कर अपने बन्धनों को तोड़ रावण का महल ध्वस्त कर सीता का सन्देश राम के पास ले जाते हैं। युद्ध (पर्व ५४-७७) युद्धपर्व के उल्लेखों में भी वाल्मीकिरामायण के उल्लेखों से निम्नाङ्कित स्थानों में भिन्नता है। १. वाल्मीकिरामायण में वर्णित सेतुबन्ध प्रसङ्ग का यहाँ सर्वथा भिन्न वर्णन दिया गया है। तदनुसार समुद्र नामक एक राजा वानरों की सेना को रोक लेता है, परन्तु नल द्वारा पराजित होकर लक्ष्मण को अपनी चार कन्याएँ समर्पित कर देता है।

अध्याय जैनमत में रामकथा १३३ २. विभीषण द्वारा सीता को लौटा देने का अनुरोध किये जाने पर रावण विभीषण को अपने नगर से निकल जाने का आदेश देता है; फलतः वह अपनी समस्त सेना के साथ हंसद्वीप जाकर राम की शरण लेता है। उसी समय सीता के भाई भामण्डल भी राम के साथ युद्ध में भाग लेने के लिए आ पहुँचते हैं। ३. सुग्रीव तथा भामण्डल इन्द्रजित् के नागपाश में बँध जाते हैं और गरुड़-केतु लक्ष्मण द्वारा मुक्त किये जाते हैं। राम और लक्ष्मण नागपाश में नहीं बँधे (पर्व ६०)। ४. लक्ष्मण को रावण की शक्ति लगने पर द्रोणमेघ को कन्या विशल्या उनकी चिकित्सा करती है। तदनन्तर लक्ष्मण और विशल्या का विवाह सम्पन्न हो जाता है। वे दोनों पूर्वजन्म के पुनर्वसु एवं अनङ्गशरा थे (पर्व ६१-६४)। ५. रावण ने सामन्त नामक अपने दूत को राम के पास सन्धि प्रस्ताव लेकर भेजा। इस सन्धि की शर्त थी—'राम सीता का त्याग कर दें और कुम्भकर्ण, इन्द्रजित् एवं मेघवाहन को छोड़ दें तो रावण राम को अपने राज्य का एक अंश और तीन हजार कन्याएँ देगा (पर्व ६५)। ६. रावण बहुरूपा साधक विद्या को सिद्ध करने के लिए शान्तिनाथ के मन्दिर में साधना करता है। वानरों के द्वारा उसका ध्यान-भङ्ग करने का निष्फल प्रयास किया जाता है। अन्ततोगत्वा रावण अपनी विद्यासाधना में सफल होता है (पर्व ६६-६८)। बहुरूपा विद्या सिद्ध करने पर रावण सीता के पास जाकर उसको धमकी देता है कि अब मैं अवश्य ही राम का वध कर तुमको अपनी रानी बना लूँगा। ७. सीता उत्तर देती हैं कि मेरा जीवन राम के जीवन पर अवलम्बित है और मूर्च्छा खाकर गिर पड़ती है। राम के प्रति सीता के प्रेम को देखकर रावण पश्चात्ताप करता है कि वह राम एवं लक्ष्मण को संग्राम में हराकर सीता को लौटा देगा (पर्व ६९)। ८. लक्ष्मण (नारायण) ने ही रावण (प्रतिनारायण) का वध किया। ९. रावण के वध के बाद उसके दोनों पुत्र इन्द्रजित् तथा मेघवाहन ओर कुम्भकर्ण जो युद्ध में बन्दी किये गये थे, मुक्त कर दिये जाते हैं। वे तीनों विरक्त होकर तप करने चले जाते हैं। साथ ही मन्दोदरी, चन्द्रनखा आदि आठ हजार युवतियाँ भी महलों को त्याग कर साधनामय जीवन व्यतीत करने लगती हैं (पर्व ७५)। १०. लङ्का-प्रवेश कर राम सर्वप्रथम सीता से मिलने जाते हैं। देवता दोनों का मिलन देख कर पुष्पवृष्टि करते हैं तथा सीता के निर्मल चरित्र की साक्षी देते हैं। राम के किसी सन्देह तथा सीता की अग्निपरीक्षा का कोई सङ्केत नहीं मिलता (पर्व ७६)। ११. तदनन्तर राम एवं लक्ष्मण रावण के महलों में रहने लगते हैं और उन कन्याओं को, जिनके साथ उनकी मँगनी हो चुकी थी, बुला कर विवाह करते हैं। यह विवाह लङ्का में ही सम्पन्न होता है। राम एवं लक्ष्मण छः वर्ष पर्यन्त लङ्का में रहते हैं (पर्व ७७)। उत्तरचरित (पर्व ७८-११८) नारद लङ्का में राम के पास जाकर पुत्र-वियोग के कारण दुःखित अपराजिता की दशा का वर्णन करते हैं, जिससे राम और लक्ष्मण साकेत लौटने का निश्चय करते हैं (पर्व ७८)। उनके आगमन के पश्चात् भरत को वैराग्य उत्पन्न होता है और वे दीक्षा लेकर निर्वाण प्राप्त करते हैं (पर्व ८०-८४)। अनन्तर लक्ष्मण के राज्याभिषेक और उनके द्वारा विद्याधर राजाओं पर विजय प्राप्त करने का वर्णन है। लक्ष्मण की विशल्या आदि आठ पटरानियाँ

१३४ रामायणमीमांसा पञ्चम तथा सोलह हजार रानियां और राम की आठ हजार पत्नियां बतायी गयी हैं, जिनमें सीता, प्रभावती, रतिनिभा तथा श्रीदामा प्रधान कही गयी हैं (पर्व ८५-९१)। सीता-त्याग की भी कथा वाल्मीकिरामायण से सर्वथा भिन्न नहीं है। इसके अनुसार सीता के दो पुत्र लवण तथा अंकुश थे। वे नारद के भड़काने पर राम एवं लक्ष्मण से युद्ध के लिए आते हैं। युद्ध के अनन्तर सुग्रीव, हनुमान् और विभीषण आदि के अनुरोध पर राम सीता को बुला भेजते हैं, परन्तु उनके सतीत्व का प्रमाण भी चाहते हैं : सीता अग्निपरीक्षा में सफल होकर दीक्षा ग्रहण कर लेती हैं और स्वर्ग में इन्द्र बन जाती हैं¹। राम और लक्ष्मण के प्रेम की परीक्षा के लिए देवताओं ने लक्ष्मण को राम के देहान्त का समाचार दिया, इससे लक्ष्मण का देहान्त हो जाता है। शोकातुर होकर मरने से नरक जाते हैं। लक्ष्मण की अन्त्येष्टि के बाद राम विरक्त होकर दीक्षा लेते हैं और १७ हजार वर्ष साधना कर निर्वाण को प्राप्त होते हैं। अन्त में कहा गया है कि लक्ष्मण, सीता और रावण भी अनेक जन्म लेने के बाद मुक्त हो जायेंगे (पर्व ११०-११२)। अनीश्वरवादी जैनाचार्य ईश्वर मानते ही नहीं, अतः अपने मत के रक्षार्थ ही साक्षात् परब्रह्मरूप राम तथा परब्रह्मरूपिणी सीता को मनुष्य ही मानकर उनके दीक्षा-ग्रहण की धृष्ट कथाओं का प्रचार करते हैं। इसी तरह भगवान् राम के स्वरूप लक्ष्मण के नरक जाने को वेद-शास्त्र विरुद्ध जैन-कथा सर्व वैदिक-धर्म-द्वेषमूलक ही है। बुल्के कहते हैं—परवर्ती जैन-कथाओं में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं। हरिभद्रकृत उपदेशपद, भद्रेश्वरकृत कहावली और हेमचन्द्रकृत जैनरामायण एवं रामचरित्र से रावण का चित्र सीता के परित्याग का कारण माना जाता है। हेमचन्द्रकृत सीतारावणकथानकम् के अनुसार कैकेयी अपने दूसरे वरदान के बदले में राम, लक्ष्मण और सीता के लिए १४ वर्ष पर्यन्त का वनवास माँगती है। गुणभद्र की रामकथा उत्तरपुराण में आठवें बलदेव, नारायण तथा प्रतिनारायण—जो वाल्मीकिरामायण के राम, लक्ष्मण तथा रावण हैं—का चरित्र ६७वें और ६८वें पर्वों में १११७ श्लोकों में वर्णित है। यह कथा विमलसूरि और वाल्मीकि दोनों से बहुत भिन्न है। इसमें सीता को रावण एवं मन्दोदरी की औरस पुत्री कहा गया है। सीताजन्म की कथा का इस रूप में उल्लेख सर्वप्रथम सङ्घदासकृत वसुदेवहिण्डि में प्राप्त होता है। गुणभद्र का आधार अज्ञात है; परन्तु कहा जा सकता है कि वे विमलसूरि तथा सङ्घदास की रचनाओं तथा परम्पराओं से परिचित थे। जिनसेन अपने ग्रन्थ आदिपुराण में कवि परमेश्वर की गद्यकथा का उल्लेख करते हैं और उसे ही अपनी रचना का आधार मानते हैं। गुणभद्र जिनसेन की अधूरी रचना पूर्ण करते हैं; अतः बहुत सम्भव है कि वे भी परमेश्वर कवि की कथा पर निर्भर रहे हों। परमेश्वर कवि की रचना अप्राप्य है। तिब्बती रामायण तथा अन्य तिब्बती ग्रन्थों में भी सीता मन्दोदरी की पुत्री ही मानी गयी हैं। जैन कवियों ने इसे अपने जैन धर्म के ग्रन्थों में स्थान दिया होगा। चामुण्डराय त्रिषष्टिलक्षणमहापुरुष के लेखकों की सूची में कूचिभट्टारक, नन्दिमुनीश्वर, कवि परमेश्वर, जिनसेन और गुणभद्र का उल्लेख करते हैं। गुणभद्र की रामकथा अन्य जैन-ग्रन्थों में भी सुबद्ध मिलती है। गुणभद्र- १. अपने धर्म के प्रचार और दीक्षा की महत्ता को स्थापित करने की दृष्टि से ही जैन तीर्थङ्कर सीता, राम, भरत आदि के द्वारा जैन-दीक्षा ग्रहण करने की कपोल-कल्पित कथाओं की चर्चा करते हैं। इसी आधार पर जैन-धर्माचार्य तुलसी ने भी अपनी पुस्तक ‘अग्निपरीक्षा’ में सीता एवं राम के सम्बन्ध में जनापवाद के व्याज से अभद्र शब्दों का प्रयोग किया है।

अध्याय जैनमत में रामकथा १३५ कृत संस्कृत उत्तरपुराण नवीं श० ई०, कृष्णदासकृत पुण्यचन्द्रोदयपुराण १६ वीं श० ई०, कन्नड़ चामुण्डरायकृत त्रिषष्टिशलाकापुरुषपुराण १०वीं श० ई०, बन्धुवर्मा कृत जीवनसम्बोधन १२ श० ई० और नागराजकृत पुण्यश्रव- कथासार १३३१ ई० की रचनाएँ हैं। इनके अनुसार दशरथ वाराणसी के राजा थे। उनके चार पुत्र हुए। सुबाला के गर्भ से राम और कैकेयी से लक्ष्मण उत्पन्न हुए। कालान्तर में राजा दशरथ ने साकेत को अपनी राजधानी बना लिया। यहाँ आने पर उनके दो और पुत्र भरत एवं शत्रुघ्न किसी अन्य रानी के गर्भ से, जिसका नाम नहीं दिया है, उत्पन्न हुए। दशानन विनमि विद्याधरवंश के पुलस्त्य का पुत्र है। असितवेग की पुत्री मणिमती को तपस्या करते हुए देखकर रावण उस पर आसक्त हो जाता है; अतः उसकी साधना में विघ्न डालता है। विघ्न के कारण मणिमती निदान करती है कि मैं रावण की पुत्री बनकर उसको मारूँगी। रावण की रानी मन्दोदरी के गर्भ से मणिमती का ही पुनर्जन्म सीता के रूप में होता है। ज्योतिषियों द्वारा यह बताये जाने पर कि यह कन्या अपने पिता के नाश का कारण बनेगी। रावण भयभीत हो मारीचि को आज्ञा देता है कि वह उस कन्या को कहीं छोड़ आये। मारीचि कन्या को मञ्जूषा में रखकर मिथिला देश में गाड़ आता है। हलकी नोक से उलझ जाने के कारण वह मञ्जूषा दिखलायी पड़ती है, और लोगों द्वारा जनक के पास ले जायी जाती है। मञ्जूषा खोल कर देखने पर जनक ने उसमें एक कन्या को देखा; इस कन्या का नाम सीता रखकर वे उसका पुत्रीवत् पालन करने लगे। बहुत दिनों बाद राजा जनक अपने यज्ञ की रक्षा के लिये राम एवं लक्ष्मण को बुलाते हैं। यज्ञ के सम्पूर्ण होने पर सीता और राम का विवाह हो जाता है। तदनन्तर राम सात अन्य कुमारियों से भी विवाह करते हैं। लक्ष्मण भी पृथ्वीदेवी आदि कई कन्याओं से विवाह करते हैं। राम एवं लक्ष्मण दोनों ही दशरथ की आज्ञा से वाराणसी में ही रहने लगते हैं। नारद से सीता के सौन्दर्य का वर्णन सुनकर रावण उसे हर लाने का सङ्कल्प करता है; सीता की मनोभावना जानने के लिए रावण शूर्पणखा को भेजता है। शूर्पणखा लौटकर आने पर बताती है कि सीता के मन को चलायमान करना असम्भव है। जब चित्रकूट में राम और सीता वाटिका में विहार कर रहे थे तब मारीच स्वर्णमृग के रूप में आकर राम को दूर ले गया और उसी समय रावण राम का रूप धारण कर आया और सीता से कहा कि मैंने मृग को महल में भेज दिया है; साथ ही, उनको पालकी पर चढ़ने की आज्ञा दी। वह पालकी वास्तव में पुष्पक विमान ही था; उसके द्वारा रावण सीता को लङ्का ले गया। रावण सीता का स्पर्श नहीं करता था; क्योंकि पतिव्रता के स्पर्श से उसकी आकाशगामिनी विद्या नष्ट हो जाती। दशरथ को स्वप्न में ज्ञात हुआ कि रावण ने सीता का हरण कर लिया है, अतः वे राम का समाचार जानने के लिए उनके पास दूत भेजते हैं। उसी समय सुग्रीव और हनुमान् राम के पास वाली के विरुद्ध सहायता माँगने पहुँच जाते हैं। हनुमान् लङ्का जाते हैं और सीता को सान्त्वना देकर लौट आते हैं। तदनन्तर लक्ष्मण के द्वारा वाली का वध होता है और सुग्रीव अपने राज्य का अधिकारी पुनः बन जाता है। वानरों और राम की सेना विमान से लङ्का पहुँचायी जाती है। लक्ष्मण चक्र से रावण का सिर काटते हैं। राम परीक्षा लिए बिना ही सीता को स्वीकार कर लेते हैं। पश्चात् राम लक्ष्मण को साथ लेकर ५२ वर्ष पर्यन्त दिग्विजय यात्रा करते हैं, परन्तु अर्धचक्रवर्ती बनकर अयोध्या लौट आते हैं। दोनों का सम्मिलित अभिषेक होता है। कुछ समय बाद राम एवं लक्ष्मण भरत एवं शत्रुघ्न को राज्य देकर वाराणसी चले जाते हैं। सीता को विजयराम आदि आठ पुत्र होते हैं। इन गाथाओं में सीता के त्याग की चर्चा नहीं है। लक्ष्मण किसी असाध्य रोग से मर जाते हैं और रावण-वध के कारण नरक में जाते हैं। राम लक्ष्मण के पुत्र पृथ्वीचन्द को राज्यपद पर और सीता के कनिष्ठ पुत्र अजितञ्जय को युवराजपद पर अभिषिक्त कर स्वयं सुग्रीव, अणुमान् और विभीषण आदि पाँच सौ राजाओं तथा अपने १८० पुत्रों के साथ साधना करने चले जाते हैं। ३९५ वर्ष बीत जाने के बाद राम को केवल्य ज्ञान उत्पन्न होता है; सीता भी अन्य अनेक रानियों के साथ दीक्षा लेती हैं। अन्त में राम तथा अणुमान् की मोक्ष-प्राप्ति का उल्लेख हुआ है।

१३६ रामायणमीमांसा पञ्चम सीता स्वर्ग पहुँचती है। लक्ष्मण के सम्बन्ध में उल्लेख है कि वे भी नरक से निकल कर संयम धारण करेंगे और मोक्ष प्राप्त करेंगे। प्राचीन एवं अर्वाचीन जैन विद्वानों की दृष्टि में जैनधर्म-दीक्षाप्रचार मुख्य लक्ष्य रहा है। उसी लक्ष्य के अनुसार उन्होंने रामकथा की लोकप्रियता का उपयोग किया है। यदि वास्तविक वाल्मीकीय रामकथा की ओर जैन बन्धुओं की प्रवृत्ति होती तो वेदप्रामाण्य एवं ईश्वरवाद का भाव उनपर अवश्य पड़ता, परन्तु यह इष्ट नहीं था। इसीलिए उन्होंने वाल्मीकिरामायण की कथा को ही विकृत करके जैन जनता के सामने उपस्थित किया है। आजकल लोग अहिंसा और सत्य का नाम लेकर लोगों में प्रतिष्ठा प्राप्त करके उसकी ओट में हिंसा का अकाण्डताण्डव करते हैं। तेरहपन्थी आचार्य तुलसी ने अग्निपरीक्षा नाम की पुस्तक लिखी है। उसमें उन्होंने श्रीसीता और राम के लिए बहुत अभद्र शब्दों का प्रयोग किया है। अनादि अपौरुषेय मन्त्र ब्राह्मणात्मक वेदों में राम का वर्णन मिलता है। काण्वसंहिता में अनेक स्थलों पर राम नाम का प्रयोग मिलता है। महाभारत एवं हरिवंश के टीकाकार नीलकण्ठ चतुर्धर ने मन्त्ररामायण एवं मन्त्रभागवत लिखकर ऋग्वेद के मन्त्रों के आधार पर श्रीराम- चरित्र तथा श्रीकृष्णचरित्र का वर्णन किया है। रामतापनीयोपनिषद्, रामरहस्योपनिषद् तथा सीतोपनिषद् एवं मुक्तिकोपनिषद् में सीता और राम की महिमा वर्णित है। अन्य पचीसों उपनिषदों में भी श्रीरामवन्दनारूप ही मङ्गलाचरण किया गया है। पुराणों के अनुसार वेदवेद्य परमात्मा के श्रीरामरूप से अवतीर्ण होने पर साक्षात् वेद भी महर्षि प्राचेतस वाल्मीकि के मुखारविन्द से रामायण के रूप में प्रकट हुए हैं। महर्षि ने वाल्मीकिरामायण के अनुसार श्रीब्रह्माजी के आदेश से समाधिजन्य ऋतम्भरा प्रज्ञा के द्वारा श्रीराम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न, श्रीदशरथ, कौशल्या, सुमित्रा, कैकेयी, सीता, हनुमान् आदि के हसित, भाषित, इङ्गित, चेष्टित—सभी घटनाओं का प्रत्यक्ष साक्षात्कार करके रामायण का निर्माण किया है। रामायण आर्ष आदिकाव्य होते हुए भी शुद्ध आर्ष इतिहास भी है और वह आधुनिक इतिहासों के समान संवाददाताओं के तारों एवं टेलीप्रिन्टर के समाचारों के आधार पर विरचित इतिहास नहीं है। इसी लिए ब्रह्माजी का महर्षि वाल्मीकि को वरदान प्राप्त हुआ था कि इस काव्य में तुम्हारा एक वाक्य भी अनृत न होगा— “न ते वागनृता काव्ये काचिदत्र भविष्यति ।” (वा० रा० १।२।३५) ऋतम्भरा प्रज्ञा ऋत (परम सत्य) ही को धारण करती है। आर्षज्ञान लौकिक प्रत्यक्ष से भी अधिक प्रमाण होता है। लोक में तो आँखों देखी घटनाओं में भी मतभेद हो जाता है। युद्धकाल में आँखों देखी घटनाओं के वर्णन विभिन्न समाचार पत्रों में विभिन्न ढंग के निकलते हैं। तभी यद्यपि श्रीहनुमान्जी ने अपने हनुमन्नाटक में बहुधा आँखों देखी घटनाओं का ही वर्णन किया है, तथापि रामचरित्र का सर्वाधिक प्रामाणिक ग्रन्थ वाल्मीकिरामायण ही मान्य है। इसलिए महाभारत के भावदीपटीकाकार ने महाभारत में लक्ष्मण द्वारा वर्णित कुम्भकर्ण-वध को गौणार्थ मानकर उसे वाल्मीकिरामायण के अनुकूल बनाने का प्रयास किया है। कल्पभेद से रामकथा में भेद हो सकता है। परन्तु मूलतः उसमें भेद नहीं होता। “राम अनन्त अनन्त गुनानी” (रा० मा० ७।५१।२) का यह अर्थ नहीं है कि राम ने निरीश्वरवादी जैनमत की भी दीक्षा ले ली थी या राम ने अपनी बहन सीता से विवाह किया था। पर जब ऐतिहासिक तथ्यों एवं प्रमाणों के बिना भी मनमानी कल्पना हो सकती है तब तो परम वैदिक एवं वैदिक धर्म-मार्ग के प्रतिष्ठापक श्रीराम को ईश्वर, वेद एवं वैदिक यज्ञादिविरोधी जैन भी कहा ही जा सकता है। प्रामाणिक व्यक्तियों के लिए ये सब कल्पनाएँ निःसार ही हैं। जैनमत के सज्जन कहते हैं—अग्निपरीक्षा सीताराम की आराधना को उजागर करने की दृष्टि से लिखा गया छोटा सा खण्डकाव्य है, पर विचारे साधक को ज्ञात नहीं है कि जैनमत में सीताराम परमेश्वर नहीं, किन्तु एक णमोकार मन्त्र जपनेवाले जैनी हैं। निरीश्वरवादी जैनमत

अध्याय जैनमत में रामकथा १३७ में ईश्वर भी मान्य नहीं है। फिर उस मत में सीता और राम का ईश्वर होना कैसे सम्भव है। साधक कहते हैं— कवि की प्रतिभा स्वतन्त्र होती है। विधि-निषेधों की रेखाओं से उसे बाँधा नहीं जा सकता। पर साधक यह भूल जाते हैं कि इसी सम्बन्ध में एक जैन सज्जन ने अग्निपरीक्षा बनाम आर्यपरीक्षा पुस्तक लिखी है। उसमें लेखक ने लिखा है कि काव्य के कुछ नियम होते हैं। प्रामाणिक इतिहास पुराणादि का आश्रयण करके ही कवि-काव्य यशस्वी होता है। यदि कवि प्रमाणनिरपेक्ष कोई कल्पना करता है तो वह प्रतिभा का स्वातन्त्र्य उच्छृङ्खलता का ही रूप धारण कर लेता है। जो प्रतिभा प्रमाण की भी आवश्यकता नहीं समझती वह भी क्या प्रतिभा कहलाने योग्य है ? धर्मान्तरण उक्त सज्जन को लगता है कि जब हिन्दुओं में से किसी के ईसाई, मुसलमान और बौद्ध बनने में कोई बाधा नहीं डाली जाती है तो उनमें से जैन बनाने में ही क्यों बाधा डाली जाती है ? परन्तु क्या यह भी कोई दलील है। क्या यह कोई चोर या डाकू नहीं कह सकता कि जब अमुक अमुक खजाने से बहुत रत्न चुरा लिये, तब हमपर ही प्रतिबन्ध क्यों ? उसे यह समझना चाहिए कि एक पाप के उदाहरण से दूसरा पाप पुण्य नहीं बन जाता ? और किसी सनातनधर्मी प्रहरी के लिए यह कोई उत्तर नहीं है। जो भी वैदिक सनातनियों को बहकाकर, धोखा देकर, धर्मान्तरण की बात करते हैं, वे सब दण्डनीय हैं। हिन्दू और जैन प्रश्न करते हैं—क्या हिन्दुओं से जैन अलग हैं ? जन्म से मरण तक सारे क्रियाकलाप ब्राह्मणों से करानेवाले जैनों को जानबूझकर हिन्दुसमाज से अलग करना क्या हिन्दुधर्म के हित में होगा ? जो बुद्ध एवं ऋषभदेव को अवतार मानते हैं, चार्वाक जैसे नास्तिक को भी महामुनि मानते हैं, उन अहिंसा को आदर्श मानने- वाले जैनों से झगड़ना क्या घर के चिराग से घर में आग लगाना जैसा कार्य नहीं है ? इससे सारी सामाजिक व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो जायगी। रिश्ते नाते टूट जायेंगे। हिन्दुसमाज विभाजित हो जायगा। पर यह प्रश्न तो तुलसी से ही करना चाहिये, क्योंकि तुलसी स्वयं हिन्दू की धर्ममूलक कोई परिभाषा नहीं मानते हैं। उनकी दृष्टि में तो हिन्दुस्तान में रहनेवाला ही हिन्दु होता है। इस दृष्टि से जैसे हिन्दुस्तान में रहनेवाले ईसाई और मुसलमान को हिन्दू या हिन्दी कहा जा सकता है वैसे ही जैन को भी। श्रीविनोवा के साथ हुए वार्तालाप में उन्होंने हिन्दू परिभाषा में गोरक्षा का सन्निवेश भी अनुचित कहा है। हिन्दूपरिभाषा के विचारकों की दृष्टि से तो वैदिक स्मृति- ग्रन्थों पर आधृत मिताक्षरादि निबन्ध ग्रन्थों के अनुसार जन्म-मरणादि संस्कार तथा दायभाग की व्यवस्था स्वीकार करने के कारण जैन भी हिन्दू ही हैं; परन्तु पन्थी जैनाचार्य ही इसका विरोध करते हैं। उनके अनुसार वेद तथा वैदिक ब्राह्मणों द्वारा जैनों को विवाहादि संस्कार नहीं कराना चाहिये। वस्तुतः वैदिक अवैदिक का, ईश्वरवादी निरीश्वरवादी का रिश्ता नाता रहना उचित भी नहीं है। सही बात तो यह है कि जैनधर्म में वर्णाश्रमधर्म मान्य ही नहीं है। फिर भी जैनों में वैश्य जाति के ही लोग अधिकांश हैं। वे व्यापारी होने से निकृति एवं क्षमा का ही आदर करते हैं—“अर्थस्य मूलं निकृतिः क्षमा च”। इसी लिए बौद्धों के समान अक्खड़ नहीं हैं। व्यवहार में वर्णभेद मानते रहे हैं। वैश्यों में ही शादी-ब्याह, खान-पान करते रहे हैं। ब्राह्मणों, क्षत्रियों या अन्त्यजों, शूद्रों से शादी-ब्याह उन्होंने नहीं किया; परन्तु बौद्धों ने धड़ल्ले से वर्णधर्म का व्यवहार में भी विरोध किया। मनमानी शादियाँ कीं। मनमाना खानपान किया। इसी कारण वे इस देश में न रह पाये। परन्तु जैन अपनी नीति से नम्र होने के कारण यहाँ रह गये। इसी कारण जैनों का सनातनी वैश्यों में विवाह होता रहा और उस सम्बन्ध से ही उनके कर्मों में ब्राह्मणों का सम्बन्ध रहा। पर आज के कट्टर जैन इसका खुलकर विरोध करते हैं। जैनों के पक्ष से कहा जाता है—"ब्रह्मा वा विष्णुर्वा हरो जिनो वा नमस्तस्मै" के अनुसार हिन्दुओं और जैनों में मेल-जोल रहेगा ही। सांस्कृतिक दृष्टि से भारत एक विशाल देश है। पर क्या ही अच्छा होता यदि

१३८ रामायणमीमांसा पञ्चम इसके साथ वेद तथा वैदिक यज्ञों तथा ईश्वर का खण्डन करनेवाले ग्रन्थों तथा उनके लेखक और प्रचारक जैनों की भी उपेक्षा की जाती । उनके जाल में फँसे हुए ही अपने बन्धुओं को बचाने का प्रयास किया जाता । पर वस्तुस्थिति भिन्न है। वास्तव में ऐसे लोगों के द्वारा ही भारत की सांस्कृतिक विशालता का खण्डन होता है। जैनपन्थी छद्मनीति से ऐसी बातें कहते हैं पर राम जैसे सर्वमान्यचरित्र कभी भी ऐसी साजिश को सफल नहीं होने देंगे। हमारी राष्ट्रीय सांस्कृतिक चेतना एवं भावात्मक एकता का प्रतिनिधि राम के अतिरिक्त है कौन ? वास्तव में राम-भक्तों को क्या श्रीराम को ईश्वर न मानकर एक जैन जीव माननेवाले नास्तिकों का खण्डन करने का साहस नहीं करना चाहिए ? वैदिकों ने तो ऋषभदेव एवं बुद्ध को अवतार मानकर उन्हें सम्मानित कर ऊँचे पद पर बैठाया है, पर और लोग अपने उन तुलसी जैसे जैनों के कृत्यों पर ध्यान नहीं देते, जिन्होंने वैदिक दृष्टि से परमेश्वर राम को अपने समान ही णमुक्कार मन्त्र जपनेवाला जीव बनाकर रावणवादियों के समान ही सीता और राम के लिए लोकापवाद के व्याज से अभद्र शब्दों का प्रयोग किया है। साथ ही यह भी ध्यान में रखना चाहिये कि जिन ग्रन्थों ने ऋषभदेव या बुद्ध को अवतार बताया है उन्होंने यह भी कह दिया है कि ब्रह्मात्मनिष्ठ ऋषभदेव के सर्वोत्कृष्ट परमहंसभाव को न समझकर ही उनके बाह्य आचरणों के आधार पर किसी राजा ने जिस प्रकार जैनधर्म चला दिया था उसी प्रकार वैदिक धर्म के अनधिकारी कुछ असुरों के व्यामोहनार्थ ही बुद्ध एवं बृहस्पति ने बौद्ध एवं चार्वाक धर्म का उपदेश किया था। अतएव वैदिक ऋषभदेव, बुद्ध एवं वृहस्पति का सम्मान करते हुए भी वेदविरुद्ध जैन, बौद्ध और चार्वाक आदि मतों का आदर नहीं करते। वस्तुतः जैसे आजकल हिन्दुओं के मेलों में ईसाई प्रचारक स्त्री-पुरुष खड़े होकर लोगों को बटोरने के लिए श्रीराम एवं श्रीकृष्ण का गुणगान करते हैं और जब लोग इकट्ठे हो जाते हैं तब उन्हें यीशु की महिमा बताकर पुस्तक बाँटकर हिन्दू धर्म की निन्दा करके उन्हें ईसाई बनने की प्रेरणा देते हैं, ठीक वैसे ही श्रीराम की लोकप्रियता के कारण जैन श्रीराम की चर्चा करते हैं, परन्तु उन्हें ईश्वर न मानकर लोगों को यह बताते हैं कि अन्त में दुःखी होकर राम सोलह हजार राजाओं एवं सीता आदि रानियों के साथ जैनी हो गये। क्या यही श्रीराम की भक्ति है ? तेरापन्थी आचार्य तुलसी आदि का अणुव्रत और सर्वधर्मसम्मेलन आदि आन्दोलन ईसाइयों के समान केवल गैर जैनियों को बटोरकर जैनधर्म-प्रचार करने का साधनमात्र है। उसकी ओट में वे शुद्ध कट्टर साम्प्रदायिकता का प्रचार करते हैं। जैन रामायण की चाहे कितनी भी प्राचीनता क्यों न मानी जाय, अन्ततः तो वैदिक रामायण से वह अर्वाचीन ही है। इतिहास की दृष्टि से सबसे प्राचीन जैन रामकथा विमलसूरि की ही है। वह जैन विद्वानों के अनुसार ही ईशा की प्रथम शती की है। परन्तु आधुनिक इतिहास की दृष्टि से भी वाल्मीकिरामायण कम से कम विक्रमशती से ६०० वर्ष प्राचीन है। वास्तव में तो वाल्मीकिरामायण ग्रन्थ के अपने अक्षरों के अनुसार वह सिंहासनासीन राम के समकाल में लिखा गया है। व्यास की प्राचीनता भी कुछ कम नहीं है। फिर क्या यह नहीं कहा जा सकता कि वाल्मीकि एवं व्यास द्वारा वर्णित रामकथा को ही जैनियों ने अपने मत के अनुसार परिवर्तित किया। स्पष्ट है कि वाल्मीकि तथा व्यास द्वारा रचित रामायणों में, ईश्वर का, वेदों का और यज्ञों का महत्त्व वर्णित है। वहाँ राम को ईश्वर माना गया है। यह सब जैनों के मत से विरुद्ध था। इसलिए जैनों ने उसी रामकथा को विकृत कर अपने रूप में गढ़ा। आधुनिक जैनपन्थियों का कहना है—महर्षि वाल्मीकि, व्यास, विमलसूरि, रविषेण, हेमचन्द्र, कालिदास आदि अनेक महाकवियों ने रामायण काव्य लिखा है। हिन्दुस्तान, नेपाल, वर्मा, जावा, सुमात्रा, श्याम, थाईलैण्ड आदि में रहनेवाले लोगों के भी राम आराध्य हैं। आराध्य की आराधना आराधकों ने लिखी। वह सब रामचरित है। इसी प्रसङ्ग में उन्होंने कामिल बुल्के की रामकथा पुस्तक का स्मरण कर रामायण क्या है ? उसका विस्तार कैसा है ? उसका किन-किन रूपों में भक्तों ने विस्तार किया, कथाभेद रहने पर भी समूची दुनिया में श्रीराम स्मरणीय क्यों हैं ?

अध्याय जैनमत में रामकथा १३९ वैयक्तिक, पारिवारिक, सामाजिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक जीवन अनेक प्रकार से रामायण से संबल पाता है। इसी लिए— "एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति" (ऋ० सं०) एक ही सत्य अनेक रूपों में व्यक्त किया गया है। तब जैनरामायण के पुस्तकीकरण से किसी को क्यों आपत्ति होनी चाहिये ? क्या इन समस्त रामायणों के रचयिताओं का व्याख्यावैशिष्ट्य ही तुलसीदास के इस कथन को प्रमाणित नहीं करता ? "राम अनंत अनंत गुन, अमित कथा बिस्तार। सुनि आचरजु न मानिहहिं, जिन्ह के बिमल बिचार।।" ( रा० मा० १।३३ ) यह तो ठीक ही है कि श्रीराम की कथा सब देशों में प्रचलित है और उनमें कुछ भेद भी है; परन्तु वस्तु- स्थिति को दृष्टि में रखते हुए तथ्य का मूल्याङ्कन करना चाहिये। क्रिया में विकल्प मान्य होने पर भी वस्तु में विकल्प नहीं हो सकता। कोई व्यक्ति पैदल चलता है, कोई घोड़े से चलता है, कोई नहीं चलता—ये सब विकल्प सम्भव हैं और यथार्थ हैं, परन्तु मन्दान्धकार में स्थित रज्जु में अनेक विरुद्ध ज्ञानों का समन्वय नहीं हो सकता। कोई उसे रज्जु कहे, कोई उसे सर्प कहे, कोई उसे माला कहे और कोई भूछिद्र कहे, तो उसमें सबका होना संभव नहीं है। वस्तुस्थिति के अनुसार एक ही ज्ञान को सत्य और अन्य को मिथ्या मानना ही पड़ता है। इतिहास भी वस्तुस्थिति से सम्बन्ध रखता है। इसी लिए इतिहास-शोधक प्रमाणों से अन्वेषण कर मिथ्या एवं सत्य इतिहास का भेद खोलते हैं; अतः यदि राम एवं रामचरित काल्पनिक नहीं हैं, कोई वस्तु है तो उसका कोई प्रामाणिक रूप तो जानना ही पड़ेगा। इस दृष्टि से देखने से भी राम के समकाल में निर्मित वाल्मीकिरामायण को ही राम एवं उनके चरित्र में मुख्य प्रमाण अवश्य ही मानना पड़ेगा। कामिल बुल्के आदि उस विकासवाद के दृष्टिकोण से ही रामकथा का विकास समझते हैं जिसके अनुसार आत्मा या परमात्मा का विकास हुआ है। उसके अनुसार जङ्गली मनुष्य, जङ्गल के वर्षा, बिजली एवं अन्धकार से भयभीत होकर अपने इर्द-गिर्द हजारों भूतों-प्रेतों की कल्पना करता है और फिर वही भूत-प्रेतों की कल्पना सभ्यता के साबुन में धुलते धुलते आत्मा या ईश्वर की कल्पना का रूप धारण कर लेती है; पुनः वही विज्ञान के चमत्कार से चमत्कृत होकर निर्गुण ब्रह्म कल्पना का रूप धारण कर लेती है। पर वास्तव में कल्पना तो कल्पना ही है। यदि इसी तरह राम और उनका चरित्र एक कल्पना है तो अवश्य मनमानी विभिन्नता लायी जा सकती है। पर उसका वस्तुस्थिति से कोई सम्बन्ध नहीं और न वह आराधकों एवं भक्तों का आराध्य या भजनीय ही हो सकता है। ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जिनके अनुसार राम या कृष्ण नाम का कोई व्यक्ति हुआ ही नहीं। पूर्ण ज्ञान में ही कवि-कल्पनाप्रसूत राम एवं उनके चरित्रों की कल्पना है, परन्तु प्रमाणों का आदर करनेवाले वैदिकों की दृष्टि में राम और उनका वर्णन करनेवाला रामायण ग्रन्थ कल्पना नहीं है, किन्तु वह अनादि, अपौरुषेय, स्वतःप्रमाण, वेदों, उप- निषदों एवं तन्मूलक वाल्मीकिरचित रामायण, महाभारत तथा पुराणों के प्रमाणों पर आधृत है। इसलिए श्रीबुल्के ने भी रामकथा के सम्बन्ध में वेदों, आरण्यकों एवं स्मार्त सूत्रों तथा वाल्मीकिरामायण को ही प्राथमिकता दी है। हमारे सामने थाईलैण्ड की रामकीर्ति के इङ्गलिश का हिन्दी अनुवाद है स्वामी सत्यानन्दपुरी का। वे लिखते हैं— "जिन काव्यरचनाओं ने विश्व-साहित्य पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है उनमें रामायण महाकाव्य सर्वोपरि है। भारत ही नहीं बाहर के देशों को भी उसने प्रभावित किया है। और अनेक सदियों की विपरीत परिस्थितियों के बावजूद वहाँ के धर्म, कला तथा साहित्य को सुव्यवस्थित किया है। विश्व में यदि कभी कोई ऐसा कवि उत्पन्न हुआ है जिसने न केवल साहित्य के व्यापक क्षेत्र में बल्कि धर्म और कला के क्षेत्र में भी अपनी अमर लेखनी से एक विशिष्ट सम्प्रदाय का निर्माण किया है तो वह मानवता के आदि कवि संस्कृत काव्य के जनक वाल्मीकि ही हैं। उनके अनुयायी विभिन्न कलाकारों ने उनसे चिरस्थायी कला की प्रेरणा लेकर अपनी कलाकृतियों को अमर बनाया है। यही नहीं