रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय जैनमत में रामकथा १३५ कृत संस्कृत उत्तरपुराण नवीं श० ई०, कृष्णदासकृत पुण्यचन्द्रोदयपुराण १६ वीं श० ई०, कन्नड़ चामुण्डरायकृत त्रिषष्टिशलाकापुरुषपुराण १०वीं श० ई०, बन्धुवर्मा कृत जीवनसम्बोधन १२ श० ई० और नागराजकृत पुण्यश्रव- कथासार १३३१ ई० की रचनाएँ हैं। इनके अनुसार दशरथ वाराणसी के राजा थे। उनके चार पुत्र हुए। सुबाला के गर्भ से राम और कैकेयी से लक्ष्मण उत्पन्न हुए। कालान्तर में राजा दशरथ ने साकेत को अपनी राजधानी बना लिया। यहाँ आने पर उनके दो और पुत्र भरत एवं शत्रुघ्न किसी अन्य रानी के गर्भ से, जिसका नाम नहीं दिया है, उत्पन्न हुए। दशानन विनमि विद्याधरवंश के पुलस्त्य का पुत्र है। असितवेग की पुत्री मणिमती को तपस्या करते हुए देखकर रावण उस पर आसक्त हो जाता है; अतः उसकी साधना में विघ्न डालता है। विघ्न के कारण मणिमती निदान करती है कि मैं रावण की पुत्री बनकर उसको मारूँगी। रावण की रानी मन्दोदरी के गर्भ से मणिमती का ही पुनर्जन्म सीता के रूप में होता है। ज्योतिषियों द्वारा यह बताये जाने पर कि यह कन्या अपने पिता के नाश का कारण बनेगी। रावण भयभीत हो मारीचि को आज्ञा देता है कि वह उस कन्या को कहीं छोड़ आये। मारीचि कन्या को मञ्जूषा में रखकर मिथिला देश में गाड़ आता है। हलकी नोक से उलझ जाने के कारण वह मञ्जूषा दिखलायी पड़ती है, और लोगों द्वारा जनक के पास ले जायी जाती है। मञ्जूषा खोल कर देखने पर जनक ने उसमें एक कन्या को देखा; इस कन्या का नाम सीता रखकर वे उसका पुत्रीवत् पालन करने लगे। बहुत दिनों बाद राजा जनक अपने यज्ञ की रक्षा के लिये राम एवं लक्ष्मण को बुलाते हैं। यज्ञ के सम्पूर्ण होने पर सीता और राम का विवाह हो जाता है। तदनन्तर राम सात अन्य कुमारियों से भी विवाह करते हैं। लक्ष्मण भी पृथ्वीदेवी आदि कई कन्याओं से विवाह करते हैं। राम एवं लक्ष्मण दोनों ही दशरथ की आज्ञा से वाराणसी में ही रहने लगते हैं। नारद से सीता के सौन्दर्य का वर्णन सुनकर रावण उसे हर लाने का सङ्कल्प करता है; सीता की मनोभावना जानने के लिए रावण शूर्पणखा को भेजता है। शूर्पणखा लौटकर आने पर बताती है कि सीता के मन को चलायमान करना असम्भव है। जब चित्रकूट में राम और सीता वाटिका में विहार कर रहे थे तब मारीच स्वर्णमृग के रूप में आकर राम को दूर ले गया और उसी समय रावण राम का रूप धारण कर आया और सीता से कहा कि मैंने मृग को महल में भेज दिया है; साथ ही, उनको पालकी पर चढ़ने की आज्ञा दी। वह पालकी वास्तव में पुष्पक विमान ही था; उसके द्वारा रावण सीता को लङ्का ले गया। रावण सीता का स्पर्श नहीं करता था; क्योंकि पतिव्रता के स्पर्श से उसकी आकाशगामिनी विद्या नष्ट हो जाती। दशरथ को स्वप्न में ज्ञात हुआ कि रावण ने सीता का हरण कर लिया है, अतः वे राम का समाचार जानने के लिए उनके पास दूत भेजते हैं। उसी समय सुग्रीव और हनुमान् राम के पास वाली के विरुद्ध सहायता माँगने पहुँच जाते हैं। हनुमान् लङ्का जाते हैं और सीता को सान्त्वना देकर लौट आते हैं। तदनन्तर लक्ष्मण के द्वारा वाली का वध होता है और सुग्रीव अपने राज्य का अधिकारी पुनः बन जाता है। वानरों और राम की सेना विमान से लङ्का पहुँचायी जाती है। लक्ष्मण चक्र से रावण का सिर काटते हैं। राम परीक्षा लिए बिना ही सीता को स्वीकार कर लेते हैं। पश्चात् राम लक्ष्मण को साथ लेकर ५२ वर्ष पर्यन्त दिग्विजय यात्रा करते हैं, परन्तु अर्धचक्रवर्ती बनकर अयोध्या लौट आते हैं। दोनों का सम्मिलित अभिषेक होता है। कुछ समय बाद राम एवं लक्ष्मण भरत एवं शत्रुघ्न को राज्य देकर वाराणसी चले जाते हैं। सीता को विजयराम आदि आठ पुत्र होते हैं। इन गाथाओं में सीता के त्याग की चर्चा नहीं है। लक्ष्मण किसी असाध्य रोग से मर जाते हैं और रावण-वध के कारण नरक में जाते हैं। राम लक्ष्मण के पुत्र पृथ्वीचन्द को राज्यपद पर और सीता के कनिष्ठ पुत्र अजितञ्जय को युवराजपद पर अभिषिक्त कर स्वयं सुग्रीव, अणुमान् और विभीषण आदि पाँच सौ राजाओं तथा अपने १८० पुत्रों के साथ साधना करने चले जाते हैं। ३९५ वर्ष बीत जाने के बाद राम को केवल्य ज्ञान उत्पन्न होता है; सीता भी अन्य अनेक रानियों के साथ दीक्षा लेती हैं। अन्त में राम तथा अणुमान् की मोक्ष-प्राप्ति का उल्लेख हुआ है।