रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३६ रामायणमीमांसा पञ्चम सीता स्वर्ग पहुँचती है। लक्ष्मण के सम्बन्ध में उल्लेख है कि वे भी नरक से निकल कर संयम धारण करेंगे और मोक्ष प्राप्त करेंगे। प्राचीन एवं अर्वाचीन जैन विद्वानों की दृष्टि में जैनधर्म-दीक्षाप्रचार मुख्य लक्ष्य रहा है। उसी लक्ष्य के अनुसार उन्होंने रामकथा की लोकप्रियता का उपयोग किया है। यदि वास्तविक वाल्मीकीय रामकथा की ओर जैन बन्धुओं की प्रवृत्ति होती तो वेदप्रामाण्य एवं ईश्वरवाद का भाव उनपर अवश्य पड़ता, परन्तु यह इष्ट नहीं था। इसीलिए उन्होंने वाल्मीकिरामायण की कथा को ही विकृत करके जैन जनता के सामने उपस्थित किया है। आजकल लोग अहिंसा और सत्य का नाम लेकर लोगों में प्रतिष्ठा प्राप्त करके उसकी ओट में हिंसा का अकाण्डताण्डव करते हैं। तेरहपन्थी आचार्य तुलसी ने अग्निपरीक्षा नाम की पुस्तक लिखी है। उसमें उन्होंने श्रीसीता और राम के लिए बहुत अभद्र शब्दों का प्रयोग किया है। अनादि अपौरुषेय मन्त्र ब्राह्मणात्मक वेदों में राम का वर्णन मिलता है। काण्वसंहिता में अनेक स्थलों पर राम नाम का प्रयोग मिलता है। महाभारत एवं हरिवंश के टीकाकार नीलकण्ठ चतुर्धर ने मन्त्ररामायण एवं मन्त्रभागवत लिखकर ऋग्वेद के मन्त्रों के आधार पर श्रीराम- चरित्र तथा श्रीकृष्णचरित्र का वर्णन किया है। रामतापनीयोपनिषद्, रामरहस्योपनिषद् तथा सीतोपनिषद् एवं मुक्तिकोपनिषद् में सीता और राम की महिमा वर्णित है। अन्य पचीसों उपनिषदों में भी श्रीरामवन्दनारूप ही मङ्गलाचरण किया गया है। पुराणों के अनुसार वेदवेद्य परमात्मा के श्रीरामरूप से अवतीर्ण होने पर साक्षात् वेद भी महर्षि प्राचेतस वाल्मीकि के मुखारविन्द से रामायण के रूप में प्रकट हुए हैं। महर्षि ने वाल्मीकिरामायण के अनुसार श्रीब्रह्माजी के आदेश से समाधिजन्य ऋतम्भरा प्रज्ञा के द्वारा श्रीराम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न, श्रीदशरथ, कौशल्या, सुमित्रा, कैकेयी, सीता, हनुमान् आदि के हसित, भाषित, इङ्गित, चेष्टित—सभी घटनाओं का प्रत्यक्ष साक्षात्कार करके रामायण का निर्माण किया है। रामायण आर्ष आदिकाव्य होते हुए भी शुद्ध आर्ष इतिहास भी है और वह आधुनिक इतिहासों के समान संवाददाताओं के तारों एवं टेलीप्रिन्टर के समाचारों के आधार पर विरचित इतिहास नहीं है। इसी लिए ब्रह्माजी का महर्षि वाल्मीकि को वरदान प्राप्त हुआ था कि इस काव्य में तुम्हारा एक वाक्य भी अनृत न होगा— “न ते वागनृता काव्ये काचिदत्र भविष्यति ।” (वा० रा० १।२।३५) ऋतम्भरा प्रज्ञा ऋत (परम सत्य) ही को धारण करती है। आर्षज्ञान लौकिक प्रत्यक्ष से भी अधिक प्रमाण होता है। लोक में तो आँखों देखी घटनाओं में भी मतभेद हो जाता है। युद्धकाल में आँखों देखी घटनाओं के वर्णन विभिन्न समाचार पत्रों में विभिन्न ढंग के निकलते हैं। तभी यद्यपि श्रीहनुमान्जी ने अपने हनुमन्नाटक में बहुधा आँखों देखी घटनाओं का ही वर्णन किया है, तथापि रामचरित्र का सर्वाधिक प्रामाणिक ग्रन्थ वाल्मीकिरामायण ही मान्य है। इसलिए महाभारत के भावदीपटीकाकार ने महाभारत में लक्ष्मण द्वारा वर्णित कुम्भकर्ण-वध को गौणार्थ मानकर उसे वाल्मीकिरामायण के अनुकूल बनाने का प्रयास किया है। कल्पभेद से रामकथा में भेद हो सकता है। परन्तु मूलतः उसमें भेद नहीं होता। “राम अनन्त अनन्त गुनानी” (रा० मा० ७।५१।२) का यह अर्थ नहीं है कि राम ने निरीश्वरवादी जैनमत की भी दीक्षा ले ली थी या राम ने अपनी बहन सीता से विवाह किया था। पर जब ऐतिहासिक तथ्यों एवं प्रमाणों के बिना भी मनमानी कल्पना हो सकती है तब तो परम वैदिक एवं वैदिक धर्म-मार्ग के प्रतिष्ठापक श्रीराम को ईश्वर, वेद एवं वैदिक यज्ञादिविरोधी जैन भी कहा ही जा सकता है। प्रामाणिक व्यक्तियों के लिए ये सब कल्पनाएँ निःसार ही हैं। जैनमत के सज्जन कहते हैं—अग्निपरीक्षा सीताराम की आराधना को उजागर करने की दृष्टि से लिखा गया छोटा सा खण्डकाव्य है, पर विचारे साधक को ज्ञात नहीं है कि जैनमत में सीताराम परमेश्वर नहीं, किन्तु एक णमोकार मन्त्र जपनेवाले जैनी हैं। निरीश्वरवादी जैनमत