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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 214

अध्याय जैनमत में रामकथा १३७ में ईश्वर भी मान्य नहीं है। फिर उस मत में सीता और राम का ईश्वर होना कैसे सम्भव है। साधक कहते हैं— कवि की प्रतिभा स्वतन्त्र होती है। विधि-निषेधों की रेखाओं से उसे बाँधा नहीं जा सकता। पर साधक यह भूल जाते हैं कि इसी सम्बन्ध में एक जैन सज्जन ने अग्निपरीक्षा बनाम आर्यपरीक्षा पुस्तक लिखी है। उसमें लेखक ने लिखा है कि काव्य के कुछ नियम होते हैं। प्रामाणिक इतिहास पुराणादि का आश्रयण करके ही कवि-काव्य यशस्वी होता है। यदि कवि प्रमाणनिरपेक्ष कोई कल्पना करता है तो वह प्रतिभा का स्वातन्त्र्य उच्छृङ्खलता का ही रूप धारण कर लेता है। जो प्रतिभा प्रमाण की भी आवश्यकता नहीं समझती वह भी क्या प्रतिभा कहलाने योग्य है ? धर्मान्तरण उक्त सज्जन को लगता है कि जब हिन्दुओं में से किसी के ईसाई, मुसलमान और बौद्ध बनने में कोई बाधा नहीं डाली जाती है तो उनमें से जैन बनाने में ही क्यों बाधा डाली जाती है ? परन्तु क्या यह भी कोई दलील है। क्या यह कोई चोर या डाकू नहीं कह सकता कि जब अमुक अमुक खजाने से बहुत रत्न चुरा लिये, तब हमपर ही प्रतिबन्ध क्यों ? उसे यह समझना चाहिए कि एक पाप के उदाहरण से दूसरा पाप पुण्य नहीं बन जाता ? और किसी सनातनधर्मी प्रहरी के लिए यह कोई उत्तर नहीं है। जो भी वैदिक सनातनियों को बहकाकर, धोखा देकर, धर्मान्तरण की बात करते हैं, वे सब दण्डनीय हैं। हिन्दू और जैन प्रश्न करते हैं—क्या हिन्दुओं से जैन अलग हैं ? जन्म से मरण तक सारे क्रियाकलाप ब्राह्मणों से करानेवाले जैनों को जानबूझकर हिन्दुसमाज से अलग करना क्या हिन्दुधर्म के हित में होगा ? जो बुद्ध एवं ऋषभदेव को अवतार मानते हैं, चार्वाक जैसे नास्तिक को भी महामुनि मानते हैं, उन अहिंसा को आदर्श मानने- वाले जैनों से झगड़ना क्या घर के चिराग से घर में आग लगाना जैसा कार्य नहीं है ? इससे सारी सामाजिक व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो जायगी। रिश्ते नाते टूट जायेंगे। हिन्दुसमाज विभाजित हो जायगा। पर यह प्रश्न तो तुलसी से ही करना चाहिये, क्योंकि तुलसी स्वयं हिन्दू की धर्ममूलक कोई परिभाषा नहीं मानते हैं। उनकी दृष्टि में तो हिन्दुस्तान में रहनेवाला ही हिन्दु होता है। इस दृष्टि से जैसे हिन्दुस्तान में रहनेवाले ईसाई और मुसलमान को हिन्दू या हिन्दी कहा जा सकता है वैसे ही जैन को भी। श्रीविनोवा के साथ हुए वार्तालाप में उन्होंने हिन्दू परिभाषा में गोरक्षा का सन्निवेश भी अनुचित कहा है। हिन्दूपरिभाषा के विचारकों की दृष्टि से तो वैदिक स्मृति- ग्रन्थों पर आधृत मिताक्षरादि निबन्ध ग्रन्थों के अनुसार जन्म-मरणादि संस्कार तथा दायभाग की व्यवस्था स्वीकार करने के कारण जैन भी हिन्दू ही हैं; परन्तु पन्थी जैनाचार्य ही इसका विरोध करते हैं। उनके अनुसार वेद तथा वैदिक ब्राह्मणों द्वारा जैनों को विवाहादि संस्कार नहीं कराना चाहिये। वस्तुतः वैदिक अवैदिक का, ईश्वरवादी निरीश्वरवादी का रिश्ता नाता रहना उचित भी नहीं है। सही बात तो यह है कि जैनधर्म में वर्णाश्रमधर्म मान्य ही नहीं है। फिर भी जैनों में वैश्य जाति के ही लोग अधिकांश हैं। वे व्यापारी होने से निकृति एवं क्षमा का ही आदर करते हैं—“अर्थस्य मूलं निकृतिः क्षमा च”। इसी लिए बौद्धों के समान अक्खड़ नहीं हैं। व्यवहार में वर्णभेद मानते रहे हैं। वैश्यों में ही शादी-ब्याह, खान-पान करते रहे हैं। ब्राह्मणों, क्षत्रियों या अन्त्यजों, शूद्रों से शादी-ब्याह उन्होंने नहीं किया; परन्तु बौद्धों ने धड़ल्ले से वर्णधर्म का व्यवहार में भी विरोध किया। मनमानी शादियाँ कीं। मनमाना खानपान किया। इसी कारण वे इस देश में न रह पाये। परन्तु जैन अपनी नीति से नम्र होने के कारण यहाँ रह गये। इसी कारण जैनों का सनातनी वैश्यों में विवाह होता रहा और उस सम्बन्ध से ही उनके कर्मों में ब्राह्मणों का सम्बन्ध रहा। पर आज के कट्टर जैन इसका खुलकर विरोध करते हैं। जैनों के पक्ष से कहा जाता है—"ब्रह्मा वा विष्णुर्वा हरो जिनो वा नमस्तस्मै" के अनुसार हिन्दुओं और जैनों में मेल-जोल रहेगा ही। सांस्कृतिक दृष्टि से भारत एक विशाल देश है। पर क्या ही अच्छा होता यदि