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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 215

१३८ रामायणमीमांसा पञ्चम इसके साथ वेद तथा वैदिक यज्ञों तथा ईश्वर का खण्डन करनेवाले ग्रन्थों तथा उनके लेखक और प्रचारक जैनों की भी उपेक्षा की जाती । उनके जाल में फँसे हुए ही अपने बन्धुओं को बचाने का प्रयास किया जाता । पर वस्तुस्थिति भिन्न है। वास्तव में ऐसे लोगों के द्वारा ही भारत की सांस्कृतिक विशालता का खण्डन होता है। जैनपन्थी छद्मनीति से ऐसी बातें कहते हैं पर राम जैसे सर्वमान्यचरित्र कभी भी ऐसी साजिश को सफल नहीं होने देंगे। हमारी राष्ट्रीय सांस्कृतिक चेतना एवं भावात्मक एकता का प्रतिनिधि राम के अतिरिक्त है कौन ? वास्तव में राम-भक्तों को क्या श्रीराम को ईश्वर न मानकर एक जैन जीव माननेवाले नास्तिकों का खण्डन करने का साहस नहीं करना चाहिए ? वैदिकों ने तो ऋषभदेव एवं बुद्ध को अवतार मानकर उन्हें सम्मानित कर ऊँचे पद पर बैठाया है, पर और लोग अपने उन तुलसी जैसे जैनों के कृत्यों पर ध्यान नहीं देते, जिन्होंने वैदिक दृष्टि से परमेश्वर राम को अपने समान ही णमुक्कार मन्त्र जपनेवाला जीव बनाकर रावणवादियों के समान ही सीता और राम के लिए लोकापवाद के व्याज से अभद्र शब्दों का प्रयोग किया है। साथ ही यह भी ध्यान में रखना चाहिये कि जिन ग्रन्थों ने ऋषभदेव या बुद्ध को अवतार बताया है उन्होंने यह भी कह दिया है कि ब्रह्मात्मनिष्ठ ऋषभदेव के सर्वोत्कृष्ट परमहंसभाव को न समझकर ही उनके बाह्य आचरणों के आधार पर किसी राजा ने जिस प्रकार जैनधर्म चला दिया था उसी प्रकार वैदिक धर्म के अनधिकारी कुछ असुरों के व्यामोहनार्थ ही बुद्ध एवं बृहस्पति ने बौद्ध एवं चार्वाक धर्म का उपदेश किया था। अतएव वैदिक ऋषभदेव, बुद्ध एवं वृहस्पति का सम्मान करते हुए भी वेदविरुद्ध जैन, बौद्ध और चार्वाक आदि मतों का आदर नहीं करते। वस्तुतः जैसे आजकल हिन्दुओं के मेलों में ईसाई प्रचारक स्त्री-पुरुष खड़े होकर लोगों को बटोरने के लिए श्रीराम एवं श्रीकृष्ण का गुणगान करते हैं और जब लोग इकट्ठे हो जाते हैं तब उन्हें यीशु की महिमा बताकर पुस्तक बाँटकर हिन्दू धर्म की निन्दा करके उन्हें ईसाई बनने की प्रेरणा देते हैं, ठीक वैसे ही श्रीराम की लोकप्रियता के कारण जैन श्रीराम की चर्चा करते हैं, परन्तु उन्हें ईश्वर न मानकर लोगों को यह बताते हैं कि अन्त में दुःखी होकर राम सोलह हजार राजाओं एवं सीता आदि रानियों के साथ जैनी हो गये। क्या यही श्रीराम की भक्ति है ? तेरापन्थी आचार्य तुलसी आदि का अणुव्रत और सर्वधर्मसम्मेलन आदि आन्दोलन ईसाइयों के समान केवल गैर जैनियों को बटोरकर जैनधर्म-प्रचार करने का साधनमात्र है। उसकी ओट में वे शुद्ध कट्टर साम्प्रदायिकता का प्रचार करते हैं। जैन रामायण की चाहे कितनी भी प्राचीनता क्यों न मानी जाय, अन्ततः तो वैदिक रामायण से वह अर्वाचीन ही है। इतिहास की दृष्टि से सबसे प्राचीन जैन रामकथा विमलसूरि की ही है। वह जैन विद्वानों के अनुसार ही ईशा की प्रथम शती की है। परन्तु आधुनिक इतिहास की दृष्टि से भी वाल्मीकिरामायण कम से कम विक्रमशती से ६०० वर्ष प्राचीन है। वास्तव में तो वाल्मीकिरामायण ग्रन्थ के अपने अक्षरों के अनुसार वह सिंहासनासीन राम के समकाल में लिखा गया है। व्यास की प्राचीनता भी कुछ कम नहीं है। फिर क्या यह नहीं कहा जा सकता कि वाल्मीकि एवं व्यास द्वारा वर्णित रामकथा को ही जैनियों ने अपने मत के अनुसार परिवर्तित किया। स्पष्ट है कि वाल्मीकि तथा व्यास द्वारा रचित रामायणों में, ईश्वर का, वेदों का और यज्ञों का महत्त्व वर्णित है। वहाँ राम को ईश्वर माना गया है। यह सब जैनों के मत से विरुद्ध था। इसलिए जैनों ने उसी रामकथा को विकृत कर अपने रूप में गढ़ा। आधुनिक जैनपन्थियों का कहना है—महर्षि वाल्मीकि, व्यास, विमलसूरि, रविषेण, हेमचन्द्र, कालिदास आदि अनेक महाकवियों ने रामायण काव्य लिखा है। हिन्दुस्तान, नेपाल, वर्मा, जावा, सुमात्रा, श्याम, थाईलैण्ड आदि में रहनेवाले लोगों के भी राम आराध्य हैं। आराध्य की आराधना आराधकों ने लिखी। वह सब रामचरित है। इसी प्रसङ्ग में उन्होंने कामिल बुल्के की रामकथा पुस्तक का स्मरण कर रामायण क्या है ? उसका विस्तार कैसा है ? उसका किन-किन रूपों में भक्तों ने विस्तार किया, कथाभेद रहने पर भी समूची दुनिया में श्रीराम स्मरणीय क्यों हैं ?

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