रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
१३६ रामायणमीमांसा पञ्चम सीता स्वर्ग पहुँचती है। लक्ष्मण के सम्बन्ध में उल्लेख है कि वे भी नरक से निकल कर संयम धारण करेंगे और मोक्ष प्राप्त करेंगे। प्राचीन एवं अर्वाचीन जैन विद्वानों की दृष्टि में जैनधर्म-दीक्षाप्रचार मुख्य लक्ष्य रहा है। उसी लक्ष्य के अनुसार उन्होंने रामकथा की लोकप्रियता का उपयोग किया है। यदि वास्तविक वाल्मीकीय रामकथा की ओर जैन बन्धुओं की प्रवृत्ति होती तो वेदप्रामाण्य एवं ईश्वरवाद का भाव उनपर अवश्य पड़ता, परन्तु यह इष्ट नहीं था। इसीलिए उन्होंने वाल्मीकिरामायण की कथा को ही विकृत करके जैन जनता के सामने उपस्थित किया है। आजकल लोग अहिंसा और सत्य का नाम लेकर लोगों में प्रतिष्ठा प्राप्त करके उसकी ओट में हिंसा का अकाण्डताण्डव करते हैं। तेरहपन्थी आचार्य तुलसी ने अग्निपरीक्षा नाम की पुस्तक लिखी है। उसमें उन्होंने श्रीसीता और राम के लिए बहुत अभद्र शब्दों का प्रयोग किया है। अनादि अपौरुषेय मन्त्र ब्राह्मणात्मक वेदों में राम का वर्णन मिलता है। काण्वसंहिता में अनेक स्थलों पर राम नाम का प्रयोग मिलता है। महाभारत एवं हरिवंश के टीकाकार नीलकण्ठ चतुर्धर ने मन्त्ररामायण एवं मन्त्रभागवत लिखकर ऋग्वेद के मन्त्रों के आधार पर श्रीराम- चरित्र तथा श्रीकृष्णचरित्र का वर्णन किया है। रामतापनीयोपनिषद्, रामरहस्योपनिषद् तथा सीतोपनिषद् एवं मुक्तिकोपनिषद् में सीता और राम की महिमा वर्णित है। अन्य पचीसों उपनिषदों में भी श्रीरामवन्दनारूप ही मङ्गलाचरण किया गया है। पुराणों के अनुसार वेदवेद्य परमात्मा के श्रीरामरूप से अवतीर्ण होने पर साक्षात् वेद भी महर्षि प्राचेतस वाल्मीकि के मुखारविन्द से रामायण के रूप में प्रकट हुए हैं। महर्षि ने वाल्मीकिरामायण के अनुसार श्रीब्रह्माजी के आदेश से समाधिजन्य ऋतम्भरा प्रज्ञा के द्वारा श्रीराम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न, श्रीदशरथ, कौशल्या, सुमित्रा, कैकेयी, सीता, हनुमान् आदि के हसित, भाषित, इङ्गित, चेष्टित—सभी घटनाओं का प्रत्यक्ष साक्षात्कार करके रामायण का निर्माण किया है। रामायण आर्ष आदिकाव्य होते हुए भी शुद्ध आर्ष इतिहास भी है और वह आधुनिक इतिहासों के समान संवाददाताओं के तारों एवं टेलीप्रिन्टर के समाचारों के आधार पर विरचित इतिहास नहीं है। इसी लिए ब्रह्माजी का महर्षि वाल्मीकि को वरदान प्राप्त हुआ था कि इस काव्य में तुम्हारा एक वाक्य भी अनृत न होगा— “न ते वागनृता काव्ये काचिदत्र भविष्यति ।” (वा० रा० १।२।३५) ऋतम्भरा प्रज्ञा ऋत (परम सत्य) ही को धारण करती है। आर्षज्ञान लौकिक प्रत्यक्ष से भी अधिक प्रमाण होता है। लोक में तो आँखों देखी घटनाओं में भी मतभेद हो जाता है। युद्धकाल में आँखों देखी घटनाओं के वर्णन विभिन्न समाचार पत्रों में विभिन्न ढंग के निकलते हैं। तभी यद्यपि श्रीहनुमान्जी ने अपने हनुमन्नाटक में बहुधा आँखों देखी घटनाओं का ही वर्णन किया है, तथापि रामचरित्र का सर्वाधिक प्रामाणिक ग्रन्थ वाल्मीकिरामायण ही मान्य है। इसलिए महाभारत के भावदीपटीकाकार ने महाभारत में लक्ष्मण द्वारा वर्णित कुम्भकर्ण-वध को गौणार्थ मानकर उसे वाल्मीकिरामायण के अनुकूल बनाने का प्रयास किया है। कल्पभेद से रामकथा में भेद हो सकता है। परन्तु मूलतः उसमें भेद नहीं होता। “राम अनन्त अनन्त गुनानी” (रा० मा० ७।५१।२) का यह अर्थ नहीं है कि राम ने निरीश्वरवादी जैनमत की भी दीक्षा ले ली थी या राम ने अपनी बहन सीता से विवाह किया था। पर जब ऐतिहासिक तथ्यों एवं प्रमाणों के बिना भी मनमानी कल्पना हो सकती है तब तो परम वैदिक एवं वैदिक धर्म-मार्ग के प्रतिष्ठापक श्रीराम को ईश्वर, वेद एवं वैदिक यज्ञादिविरोधी जैन भी कहा ही जा सकता है। प्रामाणिक व्यक्तियों के लिए ये सब कल्पनाएँ निःसार ही हैं। जैनमत के सज्जन कहते हैं—अग्निपरीक्षा सीताराम की आराधना को उजागर करने की दृष्टि से लिखा गया छोटा सा खण्डकाव्य है, पर विचारे साधक को ज्ञात नहीं है कि जैनमत में सीताराम परमेश्वर नहीं, किन्तु एक णमोकार मन्त्र जपनेवाले जैनी हैं। निरीश्वरवादी जैनमत
अध्याय जैनमत में रामकथा १३७ में ईश्वर भी मान्य नहीं है। फिर उस मत में सीता और राम का ईश्वर होना कैसे सम्भव है। साधक कहते हैं— कवि की प्रतिभा स्वतन्त्र होती है। विधि-निषेधों की रेखाओं से उसे बाँधा नहीं जा सकता। पर साधक यह भूल जाते हैं कि इसी सम्बन्ध में एक जैन सज्जन ने अग्निपरीक्षा बनाम आर्यपरीक्षा पुस्तक लिखी है। उसमें लेखक ने लिखा है कि काव्य के कुछ नियम होते हैं। प्रामाणिक इतिहास पुराणादि का आश्रयण करके ही कवि-काव्य यशस्वी होता है। यदि कवि प्रमाणनिरपेक्ष कोई कल्पना करता है तो वह प्रतिभा का स्वातन्त्र्य उच्छृङ्खलता का ही रूप धारण कर लेता है। जो प्रतिभा प्रमाण की भी आवश्यकता नहीं समझती वह भी क्या प्रतिभा कहलाने योग्य है ? धर्मान्तरण उक्त सज्जन को लगता है कि जब हिन्दुओं में से किसी के ईसाई, मुसलमान और बौद्ध बनने में कोई बाधा नहीं डाली जाती है तो उनमें से जैन बनाने में ही क्यों बाधा डाली जाती है ? परन्तु क्या यह भी कोई दलील है। क्या यह कोई चोर या डाकू नहीं कह सकता कि जब अमुक अमुक खजाने से बहुत रत्न चुरा लिये, तब हमपर ही प्रतिबन्ध क्यों ? उसे यह समझना चाहिए कि एक पाप के उदाहरण से दूसरा पाप पुण्य नहीं बन जाता ? और किसी सनातनधर्मी प्रहरी के लिए यह कोई उत्तर नहीं है। जो भी वैदिक सनातनियों को बहकाकर, धोखा देकर, धर्मान्तरण की बात करते हैं, वे सब दण्डनीय हैं। हिन्दू और जैन प्रश्न करते हैं—क्या हिन्दुओं से जैन अलग हैं ? जन्म से मरण तक सारे क्रियाकलाप ब्राह्मणों से करानेवाले जैनों को जानबूझकर हिन्दुसमाज से अलग करना क्या हिन्दुधर्म के हित में होगा ? जो बुद्ध एवं ऋषभदेव को अवतार मानते हैं, चार्वाक जैसे नास्तिक को भी महामुनि मानते हैं, उन अहिंसा को आदर्श मानने- वाले जैनों से झगड़ना क्या घर के चिराग से घर में आग लगाना जैसा कार्य नहीं है ? इससे सारी सामाजिक व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो जायगी। रिश्ते नाते टूट जायेंगे। हिन्दुसमाज विभाजित हो जायगा। पर यह प्रश्न तो तुलसी से ही करना चाहिये, क्योंकि तुलसी स्वयं हिन्दू की धर्ममूलक कोई परिभाषा नहीं मानते हैं। उनकी दृष्टि में तो हिन्दुस्तान में रहनेवाला ही हिन्दु होता है। इस दृष्टि से जैसे हिन्दुस्तान में रहनेवाले ईसाई और मुसलमान को हिन्दू या हिन्दी कहा जा सकता है वैसे ही जैन को भी। श्रीविनोवा के साथ हुए वार्तालाप में उन्होंने हिन्दू परिभाषा में गोरक्षा का सन्निवेश भी अनुचित कहा है। हिन्दूपरिभाषा के विचारकों की दृष्टि से तो वैदिक स्मृति- ग्रन्थों पर आधृत मिताक्षरादि निबन्ध ग्रन्थों के अनुसार जन्म-मरणादि संस्कार तथा दायभाग की व्यवस्था स्वीकार करने के कारण जैन भी हिन्दू ही हैं; परन्तु पन्थी जैनाचार्य ही इसका विरोध करते हैं। उनके अनुसार वेद तथा वैदिक ब्राह्मणों द्वारा जैनों को विवाहादि संस्कार नहीं कराना चाहिये। वस्तुतः वैदिक अवैदिक का, ईश्वरवादी निरीश्वरवादी का रिश्ता नाता रहना उचित भी नहीं है। सही बात तो यह है कि जैनधर्म में वर्णाश्रमधर्म मान्य ही नहीं है। फिर भी जैनों में वैश्य जाति के ही लोग अधिकांश हैं। वे व्यापारी होने से निकृति एवं क्षमा का ही आदर करते हैं—“अर्थस्य मूलं निकृतिः क्षमा च”। इसी लिए बौद्धों के समान अक्खड़ नहीं हैं। व्यवहार में वर्णभेद मानते रहे हैं। वैश्यों में ही शादी-ब्याह, खान-पान करते रहे हैं। ब्राह्मणों, क्षत्रियों या अन्त्यजों, शूद्रों से शादी-ब्याह उन्होंने नहीं किया; परन्तु बौद्धों ने धड़ल्ले से वर्णधर्म का व्यवहार में भी विरोध किया। मनमानी शादियाँ कीं। मनमाना खानपान किया। इसी कारण वे इस देश में न रह पाये। परन्तु जैन अपनी नीति से नम्र होने के कारण यहाँ रह गये। इसी कारण जैनों का सनातनी वैश्यों में विवाह होता रहा और उस सम्बन्ध से ही उनके कर्मों में ब्राह्मणों का सम्बन्ध रहा। पर आज के कट्टर जैन इसका खुलकर विरोध करते हैं। जैनों के पक्ष से कहा जाता है—"ब्रह्मा वा विष्णुर्वा हरो जिनो वा नमस्तस्मै" के अनुसार हिन्दुओं और जैनों में मेल-जोल रहेगा ही। सांस्कृतिक दृष्टि से भारत एक विशाल देश है। पर क्या ही अच्छा होता यदि
१३८ रामायणमीमांसा पञ्चम इसके साथ वेद तथा वैदिक यज्ञों तथा ईश्वर का खण्डन करनेवाले ग्रन्थों तथा उनके लेखक और प्रचारक जैनों की भी उपेक्षा की जाती । उनके जाल में फँसे हुए ही अपने बन्धुओं को बचाने का प्रयास किया जाता । पर वस्तुस्थिति भिन्न है। वास्तव में ऐसे लोगों के द्वारा ही भारत की सांस्कृतिक विशालता का खण्डन होता है। जैनपन्थी छद्मनीति से ऐसी बातें कहते हैं पर राम जैसे सर्वमान्यचरित्र कभी भी ऐसी साजिश को सफल नहीं होने देंगे। हमारी राष्ट्रीय सांस्कृतिक चेतना एवं भावात्मक एकता का प्रतिनिधि राम के अतिरिक्त है कौन ? वास्तव में राम-भक्तों को क्या श्रीराम को ईश्वर न मानकर एक जैन जीव माननेवाले नास्तिकों का खण्डन करने का साहस नहीं करना चाहिए ? वैदिकों ने तो ऋषभदेव एवं बुद्ध को अवतार मानकर उन्हें सम्मानित कर ऊँचे पद पर बैठाया है, पर और लोग अपने उन तुलसी जैसे जैनों के कृत्यों पर ध्यान नहीं देते, जिन्होंने वैदिक दृष्टि से परमेश्वर राम को अपने समान ही णमुक्कार मन्त्र जपनेवाला जीव बनाकर रावणवादियों के समान ही सीता और राम के लिए लोकापवाद के व्याज से अभद्र शब्दों का प्रयोग किया है। साथ ही यह भी ध्यान में रखना चाहिये कि जिन ग्रन्थों ने ऋषभदेव या बुद्ध को अवतार बताया है उन्होंने यह भी कह दिया है कि ब्रह्मात्मनिष्ठ ऋषभदेव के सर्वोत्कृष्ट परमहंसभाव को न समझकर ही उनके बाह्य आचरणों के आधार पर किसी राजा ने जिस प्रकार जैनधर्म चला दिया था उसी प्रकार वैदिक धर्म के अनधिकारी कुछ असुरों के व्यामोहनार्थ ही बुद्ध एवं बृहस्पति ने बौद्ध एवं चार्वाक धर्म का उपदेश किया था। अतएव वैदिक ऋषभदेव, बुद्ध एवं वृहस्पति का सम्मान करते हुए भी वेदविरुद्ध जैन, बौद्ध और चार्वाक आदि मतों का आदर नहीं करते। वस्तुतः जैसे आजकल हिन्दुओं के मेलों में ईसाई प्रचारक स्त्री-पुरुष खड़े होकर लोगों को बटोरने के लिए श्रीराम एवं श्रीकृष्ण का गुणगान करते हैं और जब लोग इकट्ठे हो जाते हैं तब उन्हें यीशु की महिमा बताकर पुस्तक बाँटकर हिन्दू धर्म की निन्दा करके उन्हें ईसाई बनने की प्रेरणा देते हैं, ठीक वैसे ही श्रीराम की लोकप्रियता के कारण जैन श्रीराम की चर्चा करते हैं, परन्तु उन्हें ईश्वर न मानकर लोगों को यह बताते हैं कि अन्त में दुःखी होकर राम सोलह हजार राजाओं एवं सीता आदि रानियों के साथ जैनी हो गये। क्या यही श्रीराम की भक्ति है ? तेरापन्थी आचार्य तुलसी आदि का अणुव्रत और सर्वधर्मसम्मेलन आदि आन्दोलन ईसाइयों के समान केवल गैर जैनियों को बटोरकर जैनधर्म-प्रचार करने का साधनमात्र है। उसकी ओट में वे शुद्ध कट्टर साम्प्रदायिकता का प्रचार करते हैं। जैन रामायण की चाहे कितनी भी प्राचीनता क्यों न मानी जाय, अन्ततः तो वैदिक रामायण से वह अर्वाचीन ही है। इतिहास की दृष्टि से सबसे प्राचीन जैन रामकथा विमलसूरि की ही है। वह जैन विद्वानों के अनुसार ही ईशा की प्रथम शती की है। परन्तु आधुनिक इतिहास की दृष्टि से भी वाल्मीकिरामायण कम से कम विक्रमशती से ६०० वर्ष प्राचीन है। वास्तव में तो वाल्मीकिरामायण ग्रन्थ के अपने अक्षरों के अनुसार वह सिंहासनासीन राम के समकाल में लिखा गया है। व्यास की प्राचीनता भी कुछ कम नहीं है। फिर क्या यह नहीं कहा जा सकता कि वाल्मीकि एवं व्यास द्वारा वर्णित रामकथा को ही जैनियों ने अपने मत के अनुसार परिवर्तित किया। स्पष्ट है कि वाल्मीकि तथा व्यास द्वारा रचित रामायणों में, ईश्वर का, वेदों का और यज्ञों का महत्त्व वर्णित है। वहाँ राम को ईश्वर माना गया है। यह सब जैनों के मत से विरुद्ध था। इसलिए जैनों ने उसी रामकथा को विकृत कर अपने रूप में गढ़ा। आधुनिक जैनपन्थियों का कहना है—महर्षि वाल्मीकि, व्यास, विमलसूरि, रविषेण, हेमचन्द्र, कालिदास आदि अनेक महाकवियों ने रामायण काव्य लिखा है। हिन्दुस्तान, नेपाल, वर्मा, जावा, सुमात्रा, श्याम, थाईलैण्ड आदि में रहनेवाले लोगों के भी राम आराध्य हैं। आराध्य की आराधना आराधकों ने लिखी। वह सब रामचरित है। इसी प्रसङ्ग में उन्होंने कामिल बुल्के की रामकथा पुस्तक का स्मरण कर रामायण क्या है ? उसका विस्तार कैसा है ? उसका किन-किन रूपों में भक्तों ने विस्तार किया, कथाभेद रहने पर भी समूची दुनिया में श्रीराम स्मरणीय क्यों हैं ?
अध्याय जैनमत में रामकथा १३९ वैयक्तिक, पारिवारिक, सामाजिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक जीवन अनेक प्रकार से रामायण से संबल पाता है। इसी लिए— "एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति" (ऋ० सं०) एक ही सत्य अनेक रूपों में व्यक्त किया गया है। तब जैनरामायण के पुस्तकीकरण से किसी को क्यों आपत्ति होनी चाहिये ? क्या इन समस्त रामायणों के रचयिताओं का व्याख्यावैशिष्ट्य ही तुलसीदास के इस कथन को प्रमाणित नहीं करता ? "राम अनंत अनंत गुन, अमित कथा बिस्तार। सुनि आचरजु न मानिहहिं, जिन्ह के बिमल बिचार।।" ( रा० मा० १।३३ ) यह तो ठीक ही है कि श्रीराम की कथा सब देशों में प्रचलित है और उनमें कुछ भेद भी है; परन्तु वस्तु- स्थिति को दृष्टि में रखते हुए तथ्य का मूल्याङ्कन करना चाहिये। क्रिया में विकल्प मान्य होने पर भी वस्तु में विकल्प नहीं हो सकता। कोई व्यक्ति पैदल चलता है, कोई घोड़े से चलता है, कोई नहीं चलता—ये सब विकल्प सम्भव हैं और यथार्थ हैं, परन्तु मन्दान्धकार में स्थित रज्जु में अनेक विरुद्ध ज्ञानों का समन्वय नहीं हो सकता। कोई उसे रज्जु कहे, कोई उसे सर्प कहे, कोई उसे माला कहे और कोई भूछिद्र कहे, तो उसमें सबका होना संभव नहीं है। वस्तुस्थिति के अनुसार एक ही ज्ञान को सत्य और अन्य को मिथ्या मानना ही पड़ता है। इतिहास भी वस्तुस्थिति से सम्बन्ध रखता है। इसी लिए इतिहास-शोधक प्रमाणों से अन्वेषण कर मिथ्या एवं सत्य इतिहास का भेद खोलते हैं; अतः यदि राम एवं रामचरित काल्पनिक नहीं हैं, कोई वस्तु है तो उसका कोई प्रामाणिक रूप तो जानना ही पड़ेगा। इस दृष्टि से देखने से भी राम के समकाल में निर्मित वाल्मीकिरामायण को ही राम एवं उनके चरित्र में मुख्य प्रमाण अवश्य ही मानना पड़ेगा। कामिल बुल्के आदि उस विकासवाद के दृष्टिकोण से ही रामकथा का विकास समझते हैं जिसके अनुसार आत्मा या परमात्मा का विकास हुआ है। उसके अनुसार जङ्गली मनुष्य, जङ्गल के वर्षा, बिजली एवं अन्धकार से भयभीत होकर अपने इर्द-गिर्द हजारों भूतों-प्रेतों की कल्पना करता है और फिर वही भूत-प्रेतों की कल्पना सभ्यता के साबुन में धुलते धुलते आत्मा या ईश्वर की कल्पना का रूप धारण कर लेती है; पुनः वही विज्ञान के चमत्कार से चमत्कृत होकर निर्गुण ब्रह्म कल्पना का रूप धारण कर लेती है। पर वास्तव में कल्पना तो कल्पना ही है। यदि इसी तरह राम और उनका चरित्र एक कल्पना है तो अवश्य मनमानी विभिन्नता लायी जा सकती है। पर उसका वस्तुस्थिति से कोई सम्बन्ध नहीं और न वह आराधकों एवं भक्तों का आराध्य या भजनीय ही हो सकता है। ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जिनके अनुसार राम या कृष्ण नाम का कोई व्यक्ति हुआ ही नहीं। पूर्ण ज्ञान में ही कवि-कल्पनाप्रसूत राम एवं उनके चरित्रों की कल्पना है, परन्तु प्रमाणों का आदर करनेवाले वैदिकों की दृष्टि में राम और उनका वर्णन करनेवाला रामायण ग्रन्थ कल्पना नहीं है, किन्तु वह अनादि, अपौरुषेय, स्वतःप्रमाण, वेदों, उप- निषदों एवं तन्मूलक वाल्मीकिरचित रामायण, महाभारत तथा पुराणों के प्रमाणों पर आधृत है। इसलिए श्रीबुल्के ने भी रामकथा के सम्बन्ध में वेदों, आरण्यकों एवं स्मार्त सूत्रों तथा वाल्मीकिरामायण को ही प्राथमिकता दी है। हमारे सामने थाईलैण्ड की रामकीर्ति के इङ्गलिश का हिन्दी अनुवाद है स्वामी सत्यानन्दपुरी का। वे लिखते हैं— "जिन काव्यरचनाओं ने विश्व-साहित्य पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है उनमें रामायण महाकाव्य सर्वोपरि है। भारत ही नहीं बाहर के देशों को भी उसने प्रभावित किया है। और अनेक सदियों की विपरीत परिस्थितियों के बावजूद वहाँ के धर्म, कला तथा साहित्य को सुव्यवस्थित किया है। विश्व में यदि कभी कोई ऐसा कवि उत्पन्न हुआ है जिसने न केवल साहित्य के व्यापक क्षेत्र में बल्कि धर्म और कला के क्षेत्र में भी अपनी अमर लेखनी से एक विशिष्ट सम्प्रदाय का निर्माण किया है तो वह मानवता के आदि कवि संस्कृत काव्य के जनक वाल्मीकि ही हैं। उनके अनुयायी विभिन्न कलाकारों ने उनसे चिरस्थायी कला की प्रेरणा लेकर अपनी कलाकृतियों को अमर बनाया है। यही नहीं
१४० रामायणमीमांसा पञ्चम बल्कि खेतों में काम करनेवाले किसान और नाव चलानेवाले नाविक लोग भी उनसे अप्रभावित नहीं रहे, जो उनके गीतों को गुनगुनाते हुए अपनी थकावट भूल जाते हैं । निःसन्देह वाल्मीकि की लेखनी ने मानवमात्र पर जिस सम्पूर्णता से प्रभाव डाला है वैसा प्रभाव और किसी कवि की लेखनी डालने में सफल नहीं हुई । रामकीति के रचयिता छठे राम राजा ने रामकीति के मूल का पता लगाया है । उनके पाण्डित्यपूर्ण विश्लेषण से मूल रामायण के रचयिता वाल्मीकि के बारे में ज्ञात हुआ है ।” यद्यपि रामकीर्ति की मूलकथा रामायण की मुख्य कथा से पूरा मेल खाती है, तथापि विस्तार में वह मूलकथा से एकदम भिन्न है । रामकीर्ति में भी राम को नारायण का अवतार माना गया है, अन्य अनेक पात्रों के नामों में भेद है । उसके प्राक्कथन के अनुसार थाईलैंड में रामायण भिन्न-भिन्न देशों एवं भिन्न-भिन्न मार्गों से आयी हुई प्रतीत होती है । इसी लिए उसमें अनेक अंशों में भिन्नता पायी जाती है । यहाँ ध्यान देने योग्य यह है कि जब भारत से दूर-दूर प्रदेशों में पहुँची हुई रामकथाओं का आधार वाल्मीकिरामायण है तब भारत में ही विकसित जैनरामकथा का आधार वाल्मीकिरामायण को छोड़कर अन्य क्या हो सकता है ? आधुनिक वैज्ञानिकों का भी इसी भाव से मेल खाता है । समान ज्ञान या समान कला कृतियों का विभिन्न देशों में स्वतन्त्ररूप से विकास मानने की अपेक्षा एक देश से किसी सूत्र द्वारा उसका अन्यत्र पहुँचना ही संभव और उचित माना जाता है; अतः रामकथा का भी स्वतन्त्ररूप से सर्वत्र विकास मानना तर्कशून्य ही है । ऐसी स्थिति में वेद, उपनिषद्, वाल्मीकिरामायण आदि ही उसके विकास के भी स्रोत हैं । अतएव मूल के अविरुद्ध कल्पनाएँ क्षम्य हो सकती हैं, पर सिद्धान्त एवं आदर्शविरुद्ध कल्पनाएँ सर्वथा अक्षम्य ही हैं । तुलसीदास के “राम अनंत अनंत गुन अमित”’ ( रा० मा० १।३३ ) के अनुसार रामकथा के सम्बन्ध में मनमानी या अराजकता का समर्थन नहीं किया जा सकता । उनका तात्पर्य तो वेद, वाल्मीकिरामायण एवं अध्यात्मरामायण आदि के अविरुद्ध ही रामकथाओं के समन्वय में है । जैन कथाओं में राम को ईश्वर न मानकर मनुष्य माना गया है; पर उसका जोरदार शब्दों में श्री- तुलसीदासजी खण्डन करते हैं । “रामु मनुज कस रे सठ बंगा । धन्वी कामु नदी पुनि गंगा ॥” (रा० मा० ६।२५।३) रे शठ अड़वङ्ग रावण, क्या राम मनुष्य हैं ? क्या काम कोई साधारण धन्वी है ? क्या गङ्गा कोई नदी है ? अब कहिये क्या तुलसीदास की इन बातों को लेखक मानेंगे । श्रीराम परमात्मा या परमेश्वर नहीं हैं, वे एक महापुरुष मनुष्य हैं—ऐसा माननेवाले के प्रति तुलसीदासजी की भर्त्सना सुनिये— “तुम्ह जो कहा राम कोउ आना । जेहि श्रुति गाव धरहिं मुनि ध्याना ॥” (रा० मा० १।११३।४) “कहहिं सुनहिं अस अधम नर, ग्रसे जे मोह पिसाच । पाखंडी हरिपद बिमुख, जानहिं झूठ न साच ॥” ( रा० मा० १।११४ ) “अज्ञ अकोविद अंध अभागी । काई विषय मुकुर मन लागी ॥ लंपट कपटी कुटिल बिसेषी । सपनेहुँ संतसभा नहिं देखी ॥ कहहिं ते वेद असंमत बानी । जिन्हके सूझ लाभ नहिं हानी ॥ मुकुर मलिन पुनि नयन बिहीना । रामरूप देखहिं किमि दीना ॥ बातुल भूत बिबश मतवारे । ते नहिं बोलहिं बचन बिचारे ॥ जिन्ह कृत महामोह मद पाना । तिन्हकर कहा करिअ नहिं काना ॥” ( रा० मा० १।११४।१-४)
अध्याय | जैनमत में रामकथा | १४१
शिवजी पार्वतीजी से कहते हैं कि तुमने जो शङ्का के रूप में यह कहा है कि श्रीराम वेदवेद्य एवं योगीन्द्र मुनीन्द्र ध्येय परमात्मा नहीं हैं, किन्तु परमेश्वर से भिन्न कोई और ही हैं, वह ठीक नहीं, क्योंकि ऐसा तो अधम लोग ही कहते सुनते हैं । जो मोह-पिशाच से ग्रस्त होते हैं । ऐसे लोग पाखण्डी तथा हरिपदविमुख हैं । वे क्या सत्य है क्या मिथ्या है कुछ भो नहीं जानते । वे अज्ञानी, मूर्ख और अभागे हैं । उनके मनरूपी दर्पण में विषयमयी काई लगी है, अतः वे राम को नहीं जान पाते । लम्पट कपटी कुटिल लोग जिन्होंने कभी सन्त-सभा नहीं देखी है, वे ही लोग वेद-असम्मत वाणी बोलते हैं । उनको वास्तविक हानि, लाभ का कुछ ज्ञान नहीं होता । जिनका मनरूप दर्पण मलिन है और जिनके पास वेदादि-शास्त्ररूप नेत्र नहीं हैं वे रामरूप को जान भी कैसे सकते हैं ? ऐसे लोग वातुल एवं भूतविवश मतवाले हैं । वे बिना विचार बोलते रहते हैं । जिन्होंने महामोहरूप मदिरा पी रखी है उनकी बातों पर ध्यान नहीं देना चाहिये । आधुनिक जैन लेखकों को गम्भीरता से सोचना चाहिये कि क्या श्रीतुलसीदासजी श्रीसीताराम को परब्रह्म परमेश्वर नहीं मानते ! अवश्य मानते हैं । और जो मानते हैं कि श्रीराम ने दुःखी होकर जैनमन्त्र की दीक्षा ली उनकी राम-कथा का तुलसीदास के रामचरितमानस के द्वारा समर्थन हो सकता है ? तुलसीदास स्वयं कपीश्वर हनुमान् से भी प्रथम वाल्मीकि की वन्दना करते हैं । “वन्दे विशुद्धविज्ञानौ कवीश्वरकपीश्वरौ ।” वे स्पष्ट कहते हैं जैसे कोई राजा बड़ी नदी पर सेतु निर्माण करता है और चींटी भी उसी पर चढ़कर श्रम के बिना नदी पार कर जाती है, वैसे ही महर्षि वाल्मीकि आदि मुनियों ने जो रामायण का निर्माण किया है वही रामचरित महासरिता-सेतु है । उसी मार्ग पर चलने में हम लोगों को सुगमता है— “मुनिन्ह प्रथम हरिकीरति गाई। तेहि मग चलत सुगम मोहिं भाई ॥” (रा० मा० १।१३) “अति अपार जे सरितबर जौं नृप सेतु कराहिं । चढ़ि पिपीलिकउ परम लघु बिनु श्रम पारहि जाहिं ॥” (रा० मा० १।१३) इसी तरह बिना समझे साधकजी ने 'एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति" वेदवाक्य को छेड़ा है । उनके जैना- चार्यों को वेद का प्रामाण्य मान्य ही नहीं है और उस मन्त्र का अर्थ उनके अनुकूल नहीं है । उसके द्वारा यह कहा गया है 'विप्र लोग उस एक ही सर्वाधिष्ठान स्वप्रकाश ब्रह्म का सोपाधिकरूप से अग्नि, यम, मित्र, वरुण, गरुत्मान् आदि अनेक रूपों में वर्णन करते हैं।' मन्त्र का यह अर्थ नहीं है कि वही वेदान्तियों का ब्रह्म है, वही जैनों का पुद्गल तथा मध्यम परिमाण आत्मा है और वही बौद्धों का क्षणभङ्ग विज्ञान है। जो राम को अनन्त मानते हैं, राम को गुणगणधाम मानते हैं तथा उस एक ही अनन्त राम का कल्पभेद से अवतार मानते हैं एवं तदनुसार राम की कल्प- भेद से कथा का भेद मानते हैं वे विमल विचारवाले लोग कल्प-भेद सम्बन्धी कथाभेद सुनकर आश्चर्य नहीं मानते। यह है आपके उद्धृत— राम अनंत अनंत गुन, अमित कथा बिस्तार । सुनि आचरजु न मानिहहिं जिनके बिमल विचार ॥ (रा० मा० १।३३) दोहे का अभिप्राय । कहिये, क्या आप या आपके जैनाचार्य श्रीराम को अनन्त मानते हैं या मध्यम परिमाण ? श्रीराम को अनन्तगुण परमेश्वर मानते हैं ? यदि नहीं, तो इस प्रकार के वचनों को उद्धृत करके लोगों की आँख में धूल क्यों डालते हैं ? धर्मान्ध लेखक के उद्धृत—
१४२ रामायणमीमांसा पंचम "रामकथा की मिति जग नाहीं । अस प्रतीति जिनके मन माहीं । नाना भाँति राम अवतारा । रामायण शतकोटि अपारा ।।" (रा० मा० १।३२ (३) का भी अभिप्राय है श्रीराम सबके हैं; पर आवश्यकता है मानने की । इसी तरह उस पुस्तक में कहा गया है—राम किसके हैं ? यदि तुलसीदास की भावना के अनुसार— "कहाँ कहौं छवि आजु की भले बने हो नाथ । तुलसी मस्तक तब नवै जब धनुष बाण लो हाथ ।।" उनका यह वचन सुनकर कृष्ण तत्काल श्रीराम के रूप में परिवर्तित हो गए; तो फिर यह मानने में क्यों झिझक होती है कि भगवान् राम ने जैनों की भावना का रक्षण करना भी अस्वीकार नहीं किया । भावना के भूखे भगवान् को अपने ही साँचे में फिट करने की कल्पना करनेवाले आग्रही हैं, बेसमझ हैं । उन्हीं के कारण असीम को ससीम बनानेवाले सम्प्रदाय फल फूल रहे हैं । वस्तुतः राम सर्वेश्वर हैं, अनन्त ब्रह्माण्ड के कण-कण उनके ही हैं और वे सबके हैं । पर वैसा मानना ही आस्तिकता है न मानना नास्तिकता है । ऐसी स्थिति में यहाँ लेखक से प्रश्न है कि क्या वे कृष्ण की मूर्ति का रामरूप में परिवर्तित हो जाना सत्य मानते हैं ? यदि नहीं, तो दृष्टान्त ही असिद्ध है फिर उसके आधार पर श्रीराम का जैन भावना के अनुसार जैन हो जाना कैसे मान्य हो सकता है ? इसके अतिरिक्त दृष्टान्तमात्र वस्तुसिद्धि का हेतु नहीं होता । उसमें सद् हेतु भी होना चाहिए । इसी लिए तो अग्नि के दृष्टान्त से जल को उष्ण नहीं कहा जा सकता । यदि उक्त घटना सत्य है तो क्या लेखक और उसके अन्य जैन बन्धु तुलसीदास के समान ही श्रीराम को ईश्वरावतार मानते हैं ? यदि नहीं तो भी उक्त कथन असङ्गत है । यदि मानते हैं, तो लेखक का स्वसिद्धान्तविरोध होगा; क्योंकि जैन-न्यायदर्शन, न्यायकुमुदचन्द्र आदि ग्रन्थों में जब समारोह के साथ ईश्वर का ही खण्डन है तब जैनों के अनुसार राम को ईश्वरावतार मानना वदतो व्याघात ही है । वैदिक दृष्टिकोण से तो ईश्वर सर्वज्ञ एवं सर्वशक्तिमान् है । वही वेदादि शास्त्रों के अनुसार श्रीराम हैं, वही श्रीकृष्ण हैं । फिर तो भक्त की भावना के अनुसार श्रीकृष्ण का श्रीराम हो जाना कोई कठिन बात नहीं है । पर क्या कोई मनुष्य जीव भी किसी की भावना के अनुसार कुछ का कुछ हो सकता है ? यदि कोई सिद्ध आम को कटहल बना दे तो वह उस सिद्ध की ही विशेषता होगी, आम की नहीं । यदि भावना के आधार पर वस्तुस्थिति में परिवर्तन हो तो क्या महावीरस्वामी को भावनावश कोई बौद्ध या वाम- मार्गी या गोमांस-भक्षक बना सकता है ? और उसे आप का (पूर्वपक्षलेखक का) सिद्धान्त स्वीकार करता है ? धर्मानन्द कौशाम्बी की 'भगवान् बुद्ध' नामक पुस्तक प्रकाशित है । उसमें उन्होंने लिखा है भगवान् बुद्ध तथा महावीर सूकर आदि का मांस खाकर मरे थे । यदि यह बात उनके प्रमाणों एवं भावना के अनुसार ठीक थी तो जैन विद्वानों ने उसका खण्डन क्यों किया था ? इसी लिए भावनाओं की भी सीमा होती है । शास्त्रानुसार भावना से ईश्वर या देवताओं में भावनानुरूप रूप-भेद शास्त्रसम्मत है । "तं यथा यथोपासते" (श० ब्रा० १०।५।२। २०) के अनुसार नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्त स्वभाव परमेश्वर बद्ध जीव नहीं बन सकता । देहात्मवादी चार्वाक या वेद- विरोधी जैन, बौद्ध ईश्वर नहीं हो सकता । सब कुछ ब्रह्म ही है यह बाधसमानाधिकरण व्यपदेश है । जैसे सर्प को बाधित कर रज्जु सर्प है वैसे ही सबको बाधित करके ब्रह्म सब है । प्रबोधचन्द्रोदय में जैन क्षपणक तथा बौद्ध भिक्षु को वाममार्गी बनते हुए दर्शाया गया है । क्या यह उनके भावनानुसार ठीक है ? आगे लेखक कहता है—ऋषभ को हिन्दुओं ने विकृत करके पेश किया है । वह जैनों की भावनाओं को उभाड़नेवाला है; पर जैन उभड़े नहीं । उन्होंने हिन्दुओं से इसके लिए तकरार नहीं की ।
अध्याय जैनमत में रामकथा १४३ जिन्हके रही भावना जैसी। प्रभुमूरति देखी तिन्ह तैसी ।। (रा० मा० १।२४०।२) के आदर्श को अस्वीकार करने पर भी व्यवहार में उसे मान्य कर लिया। यहाँ लेखक अपने ही पूर्वापरविरोध को भूल गया। पहले उसने कहा—जैन हिन्दुओं से अलग नहीं हैं, पर अब यहाँ वह स्वयं हिन्दू और जैन का बिलकुल पृथक्-पृथक् उल्लेख करने लगा। यही है लेखक के मन की सत्य भावना जो उसके सिर पर चढ़ कर बोलने लगी। पीछे मैंने लिखा है कि वैदिकों ने ऋषभदेव का अपमान नहीं किया; किन्तु जैन मतानुसार ऋषभदेवजी का वैदिकों ने उन्हें ईश्वर मानकर आदर ही किया। फिर, तकरार का प्रश्न ही कहाँ उठता था। किन्तु जैन ने तो वैदिकों के परमेश्वर राम को एक दुःखी जीव बनाकर उनका अपमान ही किया है। महत्त्व तो उन्होंने उनको जैनदीक्षा में दीक्षित करके दिया। लेखक ने मुझपर आरोप लगाते हुए कहा है कि 'मैं अपने ही चश्में में सबको देखना चाहता हूँ; पर आर्यसमाजी ही वैसा नहीं मानते ।' वस्तुतः यह उल्टी बात है। मैं तो लीपापोती ही को दोष मानता हूँ। स्पष्टरूप से प्रमाण-प्रमेय विचार तो भिन्न-भिन्न मतों के हैं ही; क्योंकि जैनों के श्वेताम्बर, दिगम्बर, तेरापन्थी आदि आपस में ही कुछ कम खण्डन-मण्डन नहीं करते हैं। बौद्ध और जैन दोनों ही अवैदिक, निरीश्वरवादी तथा वर्णाश्रमविरोधी होते हुए भी क्या एक दूसरे की बात मानते हैं ? अपने-अपने मत में दृढ़ रहने से सबको अपने ही चश्मे से नहीं देखना चाहते हैं ? क्या बुद्ध और महावीर एक दूसरे के सर्वज्ञ होने का दावा मानते थे ? आर्यसमाजी तो फिर भी ईश्वर की सत्ता एवं वेद के ही कुछ ग्रन्थों को प्रमाण मानते ही हैं। रामचरित के सम्बन्ध में भी वे वाल्मीकि- रामायण को ही प्रमाण मानते हैं, जैनी रामकथा को नहीं। लेखक कहता है, "आखिर जैनरामायण में क्या है ? क्या राम को रावण बना दिया, क्या राम को गोमांसभक्षी बनाया गया है ?" परन्तु जब मनमानी ही है, प्रमाण की अपेक्षा नहीं है तो कोई राम को वैसा भी तो कह और लिख सकता ही है। वैसे साक्षात् परब्रह्म, परमेश्वर को दुःखी मनुष्य मानकर उनका अवैदिक, निरीश्वरवादी जैन मत में दीक्षित होने का वर्णन करना उनका कुछ कम अपमान नहीं है। आगे लेखक कहता है—"जैनरामायण में सर्वत्र नैतिक पक्ष निखारा गया है जो समस्त आर्य-साहित्य का गौरव है। हिंसा के बीच अहिंसा की प्रतिष्ठा का यह साङ्गोपाङ्ग दर्शन है। उसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती।" किन्तु विचार करना चाहिए, क्या यह ठीक है ? वस्तुतः यही तो मतिभ्रम है। क्या वाल्मीकिरामायण के याथातथ्य वर्णन में नैतिकपक्ष कमजोर है ? क्या रावण जैसे दुर्दान्त सर्वधर्मघातक का वध हिंसा है ? हिंसा के बीच अहिंसा का तो यही अर्थ है कि श्रीराम रावण के अन्यायों के प्रतीकारस्वरूप उसे दण्ड तो देते हैं, पर उसका अहित नहीं चाहते। उससे द्वेष नहीं मानते। विभीषण से श्रीराम ने कह दिया कि तुम रावण का और्ध्वदेहिक संस्कार करो। जैसा यह तुम्हारा है वैसा ही हमारा। श्रीराम ने विराध का वध किया, पर उसका और्ध्वदेहिक कृत्य उसके इच्छानुसार ही किया। गीताकार ने— “साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ।” (गी० ६।९) इस वचन के अनुसार सुहृद् मित्र, अरि एवं उदासीन तथा साधु एवं असाधु सर्वत्र ब्रह्मदर्शन का उपदेश करते हुए भी धर्मयुक्त संग्राम से मुंह मोड़ने को कायरता बतलाया और कहा— "क्लैब्यं मास्म गमः पार्थ !" (गी० २।३) अर्जुन, तुम क्लैब्य मत धारण करो। यहाँ तक कह दिया कि यदि तुम धर्मयुक्त सङ्ग्राम से विमुख होओगे तो तुम्हारे स्वधर्म एवं कीर्ति का नाश ही नहीं होगा, तुम्हें पाप भी लगेगा। अन्याथियों को दण्ड न देना ही अन्याय एवं
१४४ रामायणमीमांसा पञ्चम हिंसा को बढ़ावा देना है। वास्तव में जो मुखपर पट्टी बाँधकर अपने को अहिंसाव्रती घोषित करते हैं, साथ ही दूसरों के इष्ट देवताओं को अपमानित करते हैं और वेदों एवं यज्ञों का खण्डन करते हैं वे ही अहिंसा के बीच में हिंसा की प्रतिष्ठा करते हैं। इससे बचना सबसे पहला काम है। जैसा कि मैंने पहले कहा है, वाल्मीकिरामायण में ईश्वर और यज्ञों का वर्णन किया है एवं वेद का महत्त्व वर्णित है, वह जैनाचार्यों के अपने सिद्धान्त के विरुद्ध है। परन्तु रामकथा पर जनसामान्य का अनुराग है; अतः जैन भी यदि वाल्मीकिरामायण पढ़ेंगे तो अवश्य ही उससे प्रभावित होंगे, अतः वाल्मीकिरामायण को अपने धर्म के साँचे में ही ढालकर रामकथा से वेद, ईश्वर तथा यज्ञ निकाल कर जैनरामकथाओं में उसे विकृत किया गया है। यही जैनों की रामायण-रचना है। स्वतन्त्रता हमारी ही नहीं और लोगों की भी है; अतः यदि स्वतन्त्रताएँ टकरायेगी तो शान्ति और अहिंसा टिक नहीं सकेगी। इसी लिए वैदिकों ने कहा है— “आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत् ।” जो अपने लिए प्रतिकूल हो वह दूसरों के लिए न करना यह धर्म का सर्वस्व है। जैसे हमारे इष्ट देवता का खण्डन हमारे लिए उद्वेजक है वैसे ही दूसरों के धर्म, धर्मग्रन्थ या देवता का खण्डन दूसरों के लिए भी उद्वेगकर होगा ही और वह हिंसा ही होगी। तेरापन्थी आचार्य तुलसी आदि की रामकथा के द्वारा तो आर्यमर्यादा एवं नैतिक पक्ष का हनन ही हुआ है। वस्तुतः निखरना या पालिश करना आदि ही कृत्रिमता का हेतु हैं। सत्य स्वयं में देदीप्यमान होता है। सूर्य को निखारने की आवश्यकता नहीं होती। निखार का अर्थ है आधुनिक सुधार और आधुनिक सुधार के नाम पर शास्त्रीय एवं स्वाभाविक स्थिति को बिगाड़ कर उसे अपने अभीष्ट अन्य रूप में परिणत करना, किन्तु यह एक घोर अपराध है। अन्यथाभूत वस्तु का अन्यथा वर्णन करना चोरी है, पाप है। इसे कविप्रतिभा का स्वातन्त्र्य नहीं माना जा सकता। भगवान् मनु ने कहा है— “योऽन्यथा सन्तमात्मानमन्यथा सत्सु भाषते । स पापकृत्तमो लोके स्तेन आत्मापहारकः ॥” ( म० ४।२५५ ) महाभारत में भी स्पष्ट कहा है— “ अन्यथा सन्तमात्मानमन्यथा यः प्रपद्यते । किं तेन न कृतं पापं चौरेणात्मापहारिणा ॥” जो अन्यथाभूत वस्तु को अन्यथा समझता या वर्णन करता है, उस आत्मापहारी चोर ने कौन सा पाप नहीं किया ? सत्य को जैसा का तैसा रहने देना ही ठीक है। उसको निखारने का प्रयत्न करना उसमें विकृति लाना है। आगे लेखक स्वयं स्वीकार करता है—जैनरामायण की कथा अपने ढंग की है। उसका सारा विवेचन, दर्शन और परिणाम स्वतन्त्र है। वह वाल्मीकि की नकल नहीं है। पर यह स्वतन्त्रता ही तो उच्छृङ्खलता है। क्या बिना कुड्य के चित्रोल्लेख सम्भव है ? आखिर जैनरामकथा का आधार क्या है ? वाल्मीकि राम के समकाल के महर्षि थे। उस समय की घटना का उन्हें ज्ञान होना असम्भव नहीं। फिर ब्रह्मा के आदेशानुसार समाधिजन्य ऋतम्भरा प्रज्ञा से भी उन्हें परिस्थिति का यथार्थ ज्ञान होना सम्भव है। क्या विमलसूरि या तुलसी आदि जैन आचार्य भी राम के समय में थे ? नहीं थे तो स्वतन्तरूप से रामचरित्र कैसे विदित हुआ ? बिना किसी प्रमाण के कल्पनामात्रप्रसूत कोई गल्प या उपन्यास हो सकता है। उसका वस्तुस्थिति से सम्बन्ध नहीं रहता है। वैदिक लोग भी जैन तीर्थङ्करों के सम्बन्ध में बेसिर-पैर की कल्पना कर सकते थे; पर उन्होंने इसे जघन्य अपराध समझकर वैसा
अध्याय जैनमत में रामकथा १४५ नहीं किया; किन्तु अहिंसात्मक शान्त आन्दोलन के द्वारा श्रीतुलसी को उसे परिवर्तित करने का ही आग्रह किया है । आपने यह भी लिखा है— “कवि न होउँ नहिं चतुर कहाऊँ। मति अनुरूप राम गुण गाऊँ ॥” जैसे गोस्वामीजी ने रामकथा का विस्तार किया है वैसे ही जैनों ने किया है । आचार्य तुलसी का भी यही आधार है । पर यह भी ठीक नहीं; क्योंकि गोस्वामी तुलसीदास का तो दर्शन परिणाम स्वतन्त्र नहीं है । यह पहले कहा जा चुका है कि वे तो आदि महर्षियों के रचित रामायणरूप सेतु पर चढ़कर चींटी के समान ही अपने रामचरितरूपी अपार सरित्त्वर के पार जाने की बात करते हैं । कोई भी चरित्र निराधार निष्प्रमाण हो भी कैसे सकता है ? यदि किसी को स्वतन्त्र विवेचन, दर्शन लिखना है तो उसको अ, व, ख आदि किसी अन्य नाम का प्रयोग करना चाहिये । क्या कोई मुहम्मद साहब का नाम लेकर ऐसा स्वतन्त्र मनमाना विवेचन लिख सकता है । अग्निपरीक्षा का परिचय आगे अग्निपरीक्षा पुस्तक का परिचय देते हुए लेखक कहता है—‘‘उसमें सीता को महासती के रूप में प्रस्तुत करके शील और पवित्र जीवन बिताने की शिक्षा दी गयी है, जिसमें सीता का शौर्य भरा जीवन दीखता है । सन्देश नया, आदेश नया, उपदेश नया तथा नारी जागृतिका उन्मेष नया; परन्तु यहाँ आधुनिक सुधारवाद की भावना से ओत-प्रोत तेरापन्थी आचार्य तुलसी की अपनी भावना है । प्रामाणिक प्राचीनतम रामायण की भावना नहीं है और आधुनिक नारीस्वातन्त्र्य आन्दोलन से प्रभावित श्रीतुलसी के हृदय में आर्यमर्यादानुरूप नारी का प्राचीन गौरव नहीं है । सुधारकों में नवीनता का भूत चढ़ा ही होता है । लेखक के आर्यसाहित्य के गौरव का यही नमूना है । महाकवि कालिदास द्वारा वर्णित आर्य नारी का गौरव देखिये । अपने प्रियतम से परित्यक्त होने के कारण श्रीसीता को उद्वेग हुआ । उसी में वह कह उठीं—‘‘लक्ष्मण ! तुम मेरी ओर से राजा से कहना लङ्का में मेरी आपके समक्ष अग्निपरीक्षा हुई है फिर भी लोकवादश्रवण के कारण आपने जो मेरा त्याग किया है, क्या यह आपके श्रुत— वेदादि-स्वाध्यायाध्ययन अथवा आपके कुल के अनुरूप है ? “वाच्यस्त्वया मद्वचनात् स राजा वह्नौ विशुद्धापि यत्समक्षम् । मां लोकवादश्रवणादहासीः श्रुतस्य तत् किं सदृशं कुलस्य ॥” ( रघु० १४।६१ ) परन्तु तत्क्षण ही वह भारतीय परम्परागत नारीगौरव के अनुसार संभलकर कहती हैं— “कल्याणबुद्धेरथवा तवायं न कामचारो मयि शङ्कनीयः । ममैव जन्मान्तरपातकानां विपाकविस्फूर्जथुरप्रसह्यः ॥” ( रघु० १४।६२ ) अथवा आप तो कल्याणबुद्धि हैं, सबका ही हित चाहते हैं, कभी अरि का भी अहित नहीं चाहते । “अरिहुँ क अनभल कीन्ह न रामा ।” ( रा० मा० २।१८१।३ ) “कदाचिदुपकारेण कृतेनैकेन तुष्यति । न स्मरत्यपकाराणां शतमप्यात्मवत्तया ॥” ( वा० रा० २।१।११ ) श्रीराम कभी किसी तरह किये हुए एक उपकार से सन्तुष्ट होते हैं फिर आत्मवान् होने के कारण वे सैकड़ों अपकारों का स्मरण तक नहीं करते; अतः मेरे सम्बन्ध में आपके कामचार ( मनमानी ) की शङ्का नहीं हो सकती; १९.
किन्तु मेरे ही जन्मान्तरीय दुष्कृतों का यह असह्य दुर्विपाक वज्र मेरे सामने आया है और पुनः श्रीसीता वही भाव व्यक्त करती हैं, जो श्रीसीताजी के ही अनुरूप है। तथा है समस्त वेदादि-शास्त्रानुप्राणित संस्कृति के परम अनुरूप । “साहं तपः सूर्यनिविष्टदृष्टिरूर्ध्वं प्रसूतेश्चरितुं यतिष्ये । भूयो यथा मे जननान्तरेऽपि त्वमेव भर्ता न च विप्रयोगः ॥” ( रघु० १४।६६ ) आपसे परित्यक्ता होने पर भी मैं (सीता) प्रसूति के अनन्तर सूर्यनिविष्टदृष्टि होकर ऐसी तपश्चर्या करूंगी जिससे जन्मान्तर में भी आप ही मेरे भर्ता हों और कभी आपसे मेरा विप्रयोग न हो । आगे लेखक दलबदलुओं का दृष्टान्त देकर श्रीराम के जैनधर्म में प्रवेश का समर्थन करता है; परन्तु परमेश्वरावतार राम को निरीश्वरवादी जीव बना देना ही तो सबसे बड़ा अपराध है । अति प्राचीन वेद, उपनिषद् तथा वाल्मीकिरामायण के द्वारा परमेश्वररूप से प्रतिपादित श्रीराम को जैनी के रूप में देखना ही तो अपने ही चश्मे से देखने का मूढ़ामह है । आगे लेखक ने गोस्वामी तुलसीदास के रामचरितमानस की प्रशंसा करते हुए कहा है 'गोस्वामीजी ने जैनरामायण को भी देखा ही होगा। सबको दृष्टि में रखते हुए रामचरितमानस लिखा है। इसी लिए किसी ने जैन या जैनेतर ने उसके विरुद्ध कलम नहीं उठायी । वह अनुपम भक्ति-काव्य ग्रन्थ है ।' यह ठीक है। पर जब यह मानते हैं तो उसके अनुसार श्रीराम को— “व्यापक ब्रह्म निरञ्जन निर्गुन बिगत बिनोद । सोइ अज भक्त प्रेमवश कौशल्या की गोद ॥” ( रा० मा० १।१०८ ) क्यों नहीं मानते ? उन्हें जैनी जीव बनाने का जघन्य अपराध क्यों करते हैं ? आगे तो लेखक ने बहुत ही छिछले शब्दों से आधुनिक मनचले लेखकों के जैसे आक्षेप करते हुए वस्तुस्थिति को अन्यथा रूप में व्यक्त किया है, जिसका उसी रूप में उत्तर देना मेरे लिए असम्भव ही है । पर साथ ही वह यह भी मान लेता है । 'गये शहर में आप मुझे तब ले न गये साथ । बकबक करनेवालों को दिखला देता दो हाथ ॥ छन्द पढ़ते ही स्पष्ट हो जाता है कि ये पद्य आचार्य तुलसी के प्रौढ़ कवित्व के कितने परिचायक हैं ? पर वह यह मानता है—'आजाद भारत के आजाद युवक समाधान की खोज में भटक रहे हैं । उन्हें एक प्यास है । वह प्यास धर्म, दर्शन से नहीं बुझती । उस तृष्णा की पूर्ति का सङ्केतात्मक प्रयास आचार्य तुलसी ने किया है ।' लेखक ने यह बात अवश्य पते की कही, तभी सिनेमाप्रिय आजाद युवकों के लिए उन्होंने अग्निपरीक्षा में सिनेमा के गानों का सन्निवेश किया है; परन्तु यह तृष्णापूर्ति तो सिनेमा से ही होगी । इससे तेरापन्थी तुलसी का घासलेट साहित्य सफल न होगा । लेखक ने आठवें पृष्ठ में लिखा है 'आचार्य तुलसी घोषित कर चुके हैं कि मुझे अपनी ओर से इस ग्रन्थ के बारे मे कुछ भी कहने की जरूरत नहीं है ।' १० वें पृष्ठ में लिखा है 'उन्होंने अपनी कृति में संशोधन करना स्वीकार कर लिया है ।' क्या यह बुद्धिमानी है । लेखक ने— 'तुलसी जाके मुखन ते धोखेहु निकसत राम । ताके पग की पानही मेरे तन की चाम ॥' इस दोहे का स्मरण किया है। यदि यह दाम्भिक भाव से न होकर शुद्ध भाव से स्मरण-पथ में लाया गया हो तो इसका यही अर्थ है— “भाव कुभाव अनख आलस हूँ, नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ ।” ( रा० मा० १।२७।१ )
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अध्याय जैनमत में रामकथा १४७ परन्तु जिन राम का सादर ससम्मान परमेश्वररूप से स्मरण करने से तत्काल शान्ति मिलती है; उनका क्या रावण बनकर शत्रुभाव से नाम लेना बुद्धिमानी की बात है ? १३ वें पन्ने में भी लेखक ने वही तेरापन्थी तुलसी द्वारा उपयुक्त कुलटा, व्यभिचारिणी शब्दों का समर्थन करते हुए उसका खण्डन करने वालों को धर्मान्ध कहने की धृष्टता की है और उनपर भ्रान्ति फैलाने का आरोप लगाया है । गाली का अनुवाद भी पाप है । वस्तुतः लेखक अपने समान ही अपने चश्मे से ही सबको धर्मान्ध एवं पूर्वापर विवेकशून्य मानता है, अन्यथा यह कौन नहीं जानता कि अग्निपरीक्षा के षड्यन्त्र-प्रकरण द्वारा लोकापवाद का चित्रण किया गया है, परन्तु ऐसा होने पर ही अग्निपरीक्षा लेखक दोषमुक्त नहीं हो सकता; क्योंकि साक्षात् राघवेन्द्र राम की स्वरूपभूता महालक्ष्मी सीता के लिए या महासती के लिए अथवा अपनी माँ के लिए पिता द्वारा या अन्य दुष्ट जनों द्वारा दी हुई गालियों का अनुवाद भी पाप है । “कथापि खलु पापानामलमश्रेयसे यतः” (शि० २।४०) । पापियों की पापसम्बन्धिनी कथा भी अकल्याणकारिणी होती है । शिशुपाल ने कृष्ण को सौ गालियाँ दी थीं । वे भी ऐसी उद्वेजक नहीं थीं । प्रसिद्ध टीकाकार श्रीधर स्वामी ने लिखा है कि भगवान् को गाली देने के लिए प्रवर्तित होने पर भी उसकी सरस्वती ने भगवान् की स्तुति ही की है । और तदनुसारी अर्थ भी उन्होंने उन गालियों का व्यक्त किया है । निष्प्रमाण गालो- कल्पना घोर पाप है; परन्तु यहाँ तो वस्तुस्थिति भी वैसी नहीं है । जब पूर्ववर्ती व्यास-वाल्मीकिरामायणों में भी ऐसी गालियों का वर्णन नहीं है, तब वस्तुस्थिति के विपरीत वैसी गालियों की कल्पना सुतरां उच्छृङ्खलता है । यहाँ तक कि पूर्व जैनकथाओं में भी ऐसे अनुचित शब्दों का उल्लेख नहीं है । कुन्दमालाकार भी एक महान् जैन कवि हैं । उत्तररामचरित्र के तुल्य ही उनका उत्तररामचरित्रसम्बन्धी एक दिव्य नाटक है । उसमें उन्होंने भी इस प्रसङ्ग में नियन्त्रित सन्तुलित शब्दों का ही प्रयोग किया है । इसी लिए शास्त्रनियन्त्रित कवि की स्वतन्त्र प्रतिभा उन्मार्गगामिनी और उच्छृङ्खल नहीं होती है । इसी लिए प्रामाणिक ग्रन्थों की कथावस्तु के अनुसार ही काव्य, नाटकों के प्रणयन का निर्देश शास्त्रों में किया गया है । बिना अपवाद के भी अग्निपरीक्षा यद्यपि तुलसी झुक गये, अपनी कृति में संशोधन करना मान लिया, फिर भी लेखक अपने मूढ़ आग्रह के कारण उसका समर्थन करते हुए कहता है—"जनापवाद को इस सीमा तक पहुँचाये बिना सीता के वनवास की प्रक्रिया नहीं बन सकती थी । सामान्य स्थिति में क्या कोई पति अपनी पत्नी का परित्याग कर सकता है ? पर यह भी कितनी निःसार दलील है । लेखक ने यदि कभी वाल्मीकि आदि के रामायण ग्रन्थ पढ़े हों या उसे कभी आर्यशास्त्र सुनने पढ़ने को मिले हों तो उसको मालूम होना चाहिये कि एक वैदिक आर्य पुरुष तो स्वतन्त्ररूप से कतिचित् क्षण भी परगृहोषिता पत्नी को त्याग देता है । तभी तो श्रीराम ने लङ्का ही में जब कि किसी ने कुछ भी नहीं कहा था, स्वयं शङ्का उपस्थित कर श्रीसीता को अग्निपरीक्षा का अवसर दिया था । ऐसी स्थिति में यह कैसे कहा जा सकता है कि अपवाद को बिना चरम सीमा पर पहुँचाये सीता के परित्याग की प्रक्रिया नहीं बैठ सकती थी । इतना ही क्यों अग्निपरीक्षा के बाद भी वाल्मीकिरामायण के अनुसार यत्किञ्चित् लोकवाद के कारण ही राम ने सीता को वनवास दिया । यों तो आधुनिक ऐसे भी लोग हैं जो हजार अपवाद होने पर भी पत्नीत्याग नहीं करते । इतना ही क्यों, अनेक लोगों की भूतपूर्व पत्नियों को भी अपनी पत्नी बनाने में कुछ लोग संकोच नहीं करते । वस्तुतः यह पुस्तक कई वर्षों से छपी थी । इसे कोई जानता भी न था । इस वितण्डावाद के मूल भी आचार्य तुलसी ही हैं । रायपुर में जब उन्होंने एक सार्वजनिक भाषण में श्रीसीता के लिए निन्दित शब्द का प्रयोग किया तो वहाँ के लोगों ने क्षुब्ध होकर उसका आधार पूछा । तब उन्होंने अपनी अग्निपरीक्षा पुस्तक बतायी । उसका भी आधार पूछा गया तो वाल्मीकिरामायण को उन्होंने आधार बताया । जब लोगों ने वाल्मीकिरामायण दिखाया
१४८ रामायणमीमांसा पञ्चम और कहा कि इसमें तो ऐसे कोई भी शब्द नहीं हैं। तब उन्होंने जैनरामायण का नाम लिया, पर जब जैनरामायण में भी उसका कोई आधार नहीं मिला। तब उन्होंने उसे अपनी कल्पना मान लिया था। तेरापन्थी आचार्य तुलसी के उक्त ग्रन्थ को देखकर श्रीविनोवाजी ने कहा—यह तो किसी बालक का ग्रन्थ है। यदि आचार्य तुलसी का हो तो भी उनकी बाल्यावस्था का ग्रन्थ हो सकता है। जगद्गुरु शङ्कराचार्य पुरीपीठाधीश्वर तथा ब्रह्मीभूत ज्योतिष्पीठाधीश्वर ने भी इसकी निन्दा की । साधुसमाज के भी प्रतिष्ठित महात्माओं ने इसकी निन्दा की है। स्वामी आत्मानन्द ने कहा कि इसमें लोकापवाद का चित्रण इतने विस्तार और स्थूलता से किया गया है कि वह अत्यन्त मोटी और खटकनेवाली बात हो गयी है। उक्त काव्य में राम को बहुपत्नीधारी बताया गया है और उन्हें एक सामान्य मानव के रूप में दर्शाया गया है। सीता को अणुव्रती बताकर अणुव्रत का प्रोपेगण्डा किया गया है। अग्निपरीक्षा हिन्दू-भावना पर ठेस पहुँचानेवाली पुस्तक है। प्रकाशवती मिश्र ने इस पुस्तक का सक्रिय घोर विरोध किया है। बलदेवप्रसाद मिश्र डी. लिट्. ने लिखा है—'अग्निपरीक्षा रामचरित्र के उच्च आदर्शों को नीचे गिराने का उपक्रम करती है। अग्निपरीक्षा साम्प्रदायिकता का प्रचारक साहित्य बन गया है। उच्छृङ्खल बातें लिखकर अपनी कलम की स्वतन्त्रता भले ही मान लें; परन्तु यह शोभा की बात नहीं है।' उपयोगिता की दृष्टि से अग्निपरीक्षा पुस्तक न होती तो कोई हानि न थी। सीता के चरित्र को लिखने की आज कोई आवश्यकता नहीं है। जन-जन के मानस में सीता की जगज्जननी के रूप में संप्रतिष्ठा है ही। इसके लिए वाल्मीकिरामायण तथा रामचरितमानस पर्याप्त हैं। अपने अणुव्रत या तथोक्त अध्यात्म-प्रचार के लिए अन्य किसी कथा का आश्रयण कर लिया जा सकता था। इस पुस्तक में आदि से अन्त तक सिनेमा के छिछले तर्जों के गायनों में वाल्मीकिरामायण, रामचरितमानस एवं श्रीसीता और राम के आदर्शों के विरुद्ध अनेक चित्रण हैं। रामायणों के अनुसार मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने पिता की आज्ञा का पालन करते हुए अपने परम मित्र के श्रृङ्गवेरपुर में भी प्रवेश नहीं किया। सुग्रीव एवं विभीषण का राजतिलक करने के लिए भी किष्किन्धा एवं लङ्का में उन्होंने प्रवेश नहीं किया। लक्ष्मण के द्वारा ही उनका तिलक हुआ। ठीक उसके विपरीत अग्निपरीक्षा पुस्तक में श्रीराम लङ्का में राज्यसिंहासन पर बैठे दिखाये गये हैं। इस प्रकार ग्रन्थ के आरम्भ से ही श्रीराम की मर्यादाओं का भङ्ग दिखलाया गया है। प्रासाद दिव्य दशकन्धर का दिखलाता अपनी नव्य प्रभा । सिंहासन पर रघुवर लक्ष्मण रविचन्द्र तुल्य थे चमक रहे ॥” ( पृ० १ ) वैदिक रामायणों के अनुसार श्रीराम, भरत और माताओं चिन्ता में अधीर हैं। विभीषण उनको शीघ्र ही पुष्पक विमान द्वारा पहुँचाने का आश्वासन देते हैं, पर अग्निपरीक्षा के अनुसार राम माताओं को भूलकर लङ्का में आनन्द मना रहे हैं। सबको भूले हैं। “तुम तो आनन्द मनाते हो, रोती हैं वे माताएँ । माता के मन को ममता को, मैं तुम्हें सुनाने आया हूँ। लो कान खोलकर सुनो करुण, सन्देशा माँ का लाया हूँ ॥” वैदिक रामायण के अनुसार राम एकपत्नीव्रत हैं। इतना ही क्यों, गोस्व.मीजी के अनुसार तो 'एक नारि- व्रत सब नर नारी।' हैं। पर अग्निपरीक्षा में श्रीराम बहुत रमणियों के भोक्ता हैं। वे लिखते हैं—'रमणियां राम की सोच रही हैं। सीता रहते किंचित् सुख हमें नहीं है।' ( पृ० २३ )
अध्याय जैनमत में रामकथा १४९ जहाँ वैदिक ग्रन्थों ने पत्नी को पति की काया की छाया, चाँद की चाँदनी एवं भानु की प्रभा माना जाता है, वहाँ सुधारवादी तुलसी के रामराज्य में भी नारियों के समानाधिकार का चित्रण नहीं छूटा। वे लिखते हैं— “नारियों का स्थान पुरुषों से न किञ्चित् हीन था। आत्मनिर्णय में रहा चिन्तन सदा स्वाधीन था॥” वैदिक रामायणों के अनुसार राजनीति के चारों अङ्गों से साम और दाम का ही प्रयोग होता था। दण्ड केवल दण्डी संन्यासियों के हाथ में और भेद केवल नर्तक-नृत्यसमाज में ही परिलक्षित होता था। पर अग्निपरीक्षा में उसी रामराज्य में भी भीषण षड्यन्त्र चलता है। उसके अनुसार रामराज्य में बहुपत्नी प्रथा, सौतिया डाह, असत्य भाषण तथा भ्रष्टाचार दिखाई पड़ता है। दूत, दूतियाँ प्रलोभनवश सीता का अपवाद घर घर पहुँचाती हैं। प्रलोभनवश ही वे लोग राम से भी अत्यन्त प्रपञ्चयुक्त आपत्तिजनक शब्द कहते हैं। सीता के लिए अत्यन्त निम्न स्तर की भाषा का प्रयोग करते हैं। रावण के चरणों का चित्र बनाकर सीता के द्वारा पूजा करने की कथा भी राम के सामने पहुँचायी जाती है। बिठा अकेली पुष्पक में, रावण ले जाया करता था। निर्जन उपवन में प्रमोद से, जी बहलाया करता था॥ विद्या यन्त्र मन्त्र से जिसने, लिए देव देवी भी कील। क्या सम्भव है उसके आगे, रहा अखण्डित शील॥ हाय कलङ्कित हो रहा, सूर्यवंश अभिराम। दुराचारिणी के बने, रघुकुल राम गुलाम॥ (पृ० ३७) पत्नी के पीछे पागल बन, राघव ने लोपी कुलकार। महासती का जामा पहने, कभी न पतिता छिप सकती। सती साध्वी और रानियां, बैठे बैठे रोती हैं। उल्टा युग आया देखो, कुलटा पटरानी होती है॥ पर वे देवी रावण के, चरणों की पूजा करती। इन पापाचारों से कैसे, टिक पायेगी यह धरती॥ (पृ० ३८) देखो भाई दीख रहे हैं, कलियुग के आसार रे। राजघराने में भी पलते, ऐसे पापाचार रे॥ रावण के साथ रहा निश्चित, उसका अनुचित व्यवहार रे। हाँ में हाँ भरने वालों की, बनी आज सरकार रे॥ (पृ० ३९) सीता का पापाचार यहाँ। (पृ० ४०) री पापिन क्यों कर रही, मुझे राम के तुल्य। जिसने पत्नी के लिए, खोया अपना मूल्य॥ सिंहासन को बदनाम किया, भयभीत वहाँ वह कायर है। उस दुराचारिणी से अपना, किञ्चित् सम्बन्ध न तो इसका॥ (पृ० ४४) स्पष्ट है ऐसे पापपूर्ण अनुचित शब्द वैदिक रामायण में तो क्या जैनरामायण में भी नहीं हैं। यही है तेरापन्थी तुलसी का जघन्य अक्षम्य अपराध। जिसके कारण उन्हें रायपुर में उसका फल भोगना पड़ा। यह सब मिथ्या कल्पना है एवं प्रमाणविरुद्ध है। तेरापन्थी की अपनी दुर्भावना और नास्तिकता का दुष्परिणाम है।
१५० रामायणमीमांसा पञ्चम वास्तव में श्रीराम मर्यादापुरुषोत्तम प्रजावत्सल राजा हैं। उन्होंने प्रजारञ्जन के लिए स्नेह, राज्य, सौख्य सब कुछ त्यागने की प्रतिज्ञा की थी। और वैसा ही उसका पालन भी किया था— "स्नेहं दयांश्च सौख्यञ्च यदि वा जानकीमपि । आराधनाय लोकस्य मुञ्चतो नास्ति मे व्यथा ॥" ( उ० रा० च० १।१२ ) उनके राज्य में, उनकी प्रजा में तेरापन्थी तुलसी वर्णित षड्यन्त्र, मिथ्या प्रलाप, वैर, सौतिया डाह सम्भव ही नहीं था। रामराज्य का वर्णन श्रीगोस्वामीजी ने यों किया है— वैर न कर काहू सन कोई । राम प्रताप विषमता खोई ॥ दैहिक दैविक भौतिक तापा । राम राज्य काहू नहिं व्यापा ॥ सब नर करहिं परस्पर प्रीती । चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती ॥ ( रा० मा० ७।१९-२०।४-१ ) अग्निपरीक्षा में वर्णित कथानक से आदर्श रामराज्य के आदर्श की पूर्ण हत्या ही व्यक्त होती है। भीषण से भीषण कलियुग में निकृष्ट शासन प्रणाली में जो दुराचार और मिथ्या प्रलाप हो सकता है वही तेरापन्थी तुलसी ने रामराज्य में दिखाया है और निकृष्ट गालियाँ जो हो सकती हैं वे सीता को दिलाई हैं। सिर्फ सीता-त्याग की भूमिका बनाने के लिए जब कि वाल्मीकि के अनुसार कामवासनोपरक्त दुष्ट चक्षु से दृष्ट होने से ही राम ने सीता को त्याज्य समझा था। "दृष्टां दुष्टेन चक्षुषा ।" ( वा० रा० ६।११९।२० ) अग्निपरीक्षा में यद्यपि सीता को महासती कहा गया है, परन्तु वह सब जैनों का णमुक्कार मन्त्र जपने के प्रभाव से बतलाया गया है। करती है कभी आत्मचिन्तन अन्तरवेग हटाने को । रटती जाती है णमुक्कार महामन्त्र शान्ति सुख पाने को ॥ अरिहन्त सुगुरु सद्धर्म बिना है कोई त्राण नहीं । डिग जाता ऐसी स्थितियों में जिसकी श्रद्धा सप्राण नहीं ॥ अर्थ—सद्गुरु अर्हन् के णमुक्कार मन्त्र को सीता ने जपा ऐसे सुन्दर गुरु के सद्धर्म बिना त्राण का कोई रास्ता नहीं ( पृ० ७४ ) । यह है साम्प्रदायिकता की पराकाष्ठा । ऐसे लोग अपने चश्मे से ईश्वर को भी अपने धर्म में दीक्षित करने का साहस करते हैं। आगे चलकर अग्निपरीक्षा के अनुसार वन में श्रीसीता के पास भिक्षोपजीवी अकिंचन जैन सिद्ध पुरुष आते हैं। उनका सीता सम्मान करती है। सीता अपने पुत्रों के पढ़ाने की चिन्ता प्रकट करती है। वह जैन साधु लवण और अङ्कुश को पढ़ाने का उत्तरदायित्व अपने ऊपर लेता है। लेता हूँ दायित्व स्वयं मैं कर मत इसका तनिक विचार । मेरी विद्याओं के सच्चे पात्र मिले मन के अनुसार । वाल्मीकिरामायण के अनुसार वाल्मीकि के आश्रम में ही सीता रही। कालिदास, हर्षवर्धन आदि ने इसका समर्थन किया है। महर्षि वाल्मीकि से ही उन्हें वेदादि शास्त्रों तथा अन्य-शास्त्र आदि की शिक्षा प्राप्त हुई थी। परन्तु उदारता एवं सर्वधर्मसमन्वय का दम्भ रचनेवाले तेरापन्थी तुलसी का वेद-विद्वेष इतना उग्र हो उठा कि वे ठीक उसके विपरीत उनकी किसी जैनी सिद्ध से शिक्षा की व्यवस्था करते हैं। इतने पर भी दूसरों को साम्प्रदायिक कहने का साहस ! स्कूलों में कोई शरारती विद्यार्थी किसी शान्त विद्यार्थी को चिकोटी काटता है। यदि वह रोता है तो
अध्याय जैनमत में रामकथा १५१ चिकोटी काटनेवाला उसपर कोलाहल मचाने का आरोप लगाता है। ठीक वैसे ही कट्टरसम्प्रदायवादी तेरापन्थी तुलसी वेद, उपनिषद्, वाल्मीकिरामायण आदि से सर्वथा निष्कलङ्क प्रमाणित अनादिकाल से सर्वलक्षण सीता और राम के चरित्र को दूषित करते हैं और उनके चेले तुलसीरामायण से उसका समर्थन करने का साहस करते हैं। वे इस मिथ्यावाद को भी उचित ठहराते हैं कि— रामकथा की मिति जग नाहीं, अस प्रतीति जिनके मन माहीं। नाना भाँति राम अवतारा, रामायण शतकोटि अपारा ।। (रा० मा० १।३२(३)) किमाश्चर्यमतः परम् । जो ईश्वर नहीं मानता, राम को ईश्वरावतार नही मानता वही अपने जघन्य अपराधों को, मिथ्यावादों को शतकोटिप्रविस्तर रामायण में सम्मिलित करना चाहता है और स्वाभिमत किसी जैनी जीव को रामावतार बनाने की दुश्चेष्टा करता है और ऐसे दुष्कृत्य का ही तेरापन्थी तुलसी को शङ्कराचार्य एवं आचार्य विनोबा के समान परम प्रतिष्ठित घोषित करने का दुःसाहस करता है। अन्त में भी तेरापन्थी तुलसी परमेश्वरी श्रीसीता से जैन तीर्थङ्कर की वन्दना कराकर उसका अग्निप्रवेश वर्णन करते हैं— मंगल लोकोत्तम शरण विघ्नहरण है चार । अर्हद्वतनु मुनि धर्म को रटती बारम्बार ।। नमोकार मन्त्र जप करके हृद् था बना विशाल । जलती ज्वाला कुण्ड में कूद पड़ी तत्काल ।। (पृ० ९६५ ) और उसी मन्त्र के प्रभाव से अग्नि पानी हो गया और कुण्ड एक महान् पानी का सरोवर हो गया । “सरवर हो रहा तरङ्गाकुल खिल रहे कमल उत्पल शतदल ।” आगे सीता की महिमा का वर्णन किया है। परन्तु वह जैन दीक्षिता सीता की महिमा है वेदादि शास्त्रोक्त ईश्वरस्वरूप सीता की नहीं । अग्निपरीक्षा की भूमिका के लेखक महेन्द्रकुमार ने वाल्मीकि के राम को एक महामानव के रूप में प्रस्तुत किया है। आदि से अन्त तक राम एक मानव रहते हैं । वह कहते हैं उनमें ईश्वरता का आरोप कवि ने नहीं किया । पर यह सर्वथा मिथ्या है, क्योंकि प्रस्तुत लेख में ही मैंने वाल्मीकि के ही राम को परात्पर ब्रह्म बतलाने- वाले सैकड़ों वचन प्रस्तुत किये हैं। युद्धकाण्ड में ब्रह्मा ने स्वयं कहा है— “भवान्नारायणो देवः श्रीमांश्चक्रायुधः प्रभुः ॥” आप चक्रधारी संसार के आदिकर्ता नारायण देव हैं। आगे भूमिका में कहता है—‘आज के बुद्धिप्रधान युग में जैनरामायणें बुद्धिगम्यता की दिशा में अधिक प्रशस्त मानी गयी हैं। वहाँ अधिकांश घटनाएँ स्वाभाविक और सम्भवरूप में मिलती हैं। वैदिक रामायणों में रावण के दस मुख माने गये हैं। स्वयम्भूकृत पद्मचरित में वैदिक परम्परा में चलनेवाली असङ्गतियों को प्रस्तुत किया गया है। रावण के दस मुख और बीस हाथ कैसे, कुम्भकर्ण छः महीने कैसे सोता था, करोड़ों महिषों को कैसे खा जाता था। कूर्म ने पृथ्वी को कैसे पीठ पर धारण किया था। इस प्रकार अवतारवादिता और विविध अस्वाभावकताओं को लेकर जैन और वैदिक परम्पराओं में बहुत से भेद आते हैं। परन्तु भूमिका लेखक को यह बात समझ में क्यों नहीं आयी कि णमुक्कार मन्त्र जप कर सीता के अग्निकुण्ड में कूदने से अग्नि पानी कैसे हो गया ? अग्निकुण्ड महान् सरोवर कैसे हो गया ? उसमें विविध कमल कैसे खिल गये ? क्या यह सब महावीर या तेरापन्थी तुलसी के करिश्मे से हो गया ? धर्मान्ध साम्प्रदायिक अपने सम्प्रदाय की असम्भव बातों को भी सम्भव मानता है, परन्तु अन्य सम्प्रदाय की तर्कसङ्गत बातें भी उसे असङ्गत जँचती हैं। कहा जाता है “जब वैदिक रामायणों में भी कथाभेद है। किसी रामायण में यह वर्णित है कि सीता जिस पर्णशाला में रहती थीं
१५२ रामायणमीमांसा पञ्चम रावण वहाँ की जमीन सहित पर्णशाला को ही लङ्का ले गया था। फिर जैन रामकथा का भेद क्यों अनुचित कहा जाय । प्रत्येक रचयिता प्रायः कुछ न कुछ अपनी ओर से जोड़ता ही है। कवि इसे अपना मौलिक अधिकार मानता है।' परन्तु यह बात भी उचित नहीं, क्योंकि वैदिक रामकथाओं के भेद में कल्पभेद से तथा अवतारभेद से कथाओं का भेद सम्भव होता है— कल्प भेद हरि चरित सुहाये । भांति अनेक मुनीसन गाये ॥ (रा० मा० १।३२।४) अतः भेद समूल हो सकते हैं परन्तु जिनके मतानुसार ईश्वर एवं अवतारवाद मान्य नहीं है, उनके यहाँ कथाभेद भूमिका-लेख के अनुसार कवि की अपनी ही कल्पना हो सकती है, जो वस्तुस्थिति से विरुद्ध होती है। हां, मूल कथावस्तु को ही सजाने और रोचक बनाने में शब्दालङ्कार आदि की योजना में कवियों की स्वतन्त्रता अवश्य मान्य होनी चाहिये । अन्यथा जैसे गल्प, उपन्यास आदि का कोई श्रद्धा से पाठ नहीं करता वैसे ही रामायण का भी पाठ नहीं कर सकेगा। ऐसे ही अप्रामाणिक तथा मिथ्याकल्पनापूर्ण वर्णनों को धार्मिक ग्रन्थ तो कहा ही नहीं जा सकता । नागेश के अनुसार वाल्मीकि ने नारद से भगवान् राम के गुणवर्णन का श्रवण किया और स्वयं भी राम- गुणवर्णन की इच्छा की। श्रीराम का गुण करुणरसमय है, अतः अतिकरुण व्यक्ति का ही रामायण-वर्णन में अधिकार है। अतः मुनि के चित्त में कारुण्य जानने के लिए और भृगुदत्त शाप का ही वाल्मीकि द्वारा दृढ़ीकरणार्थ श्रीराम ने ही मुनि के देखते देखते निषाद रूप धारण कर राक्षसवशेषरूप क्रौञ्च को मार दिया। अन्तर्यामी श्रीराम के इच्छानुसार ही उनकी प्रेरणा से ही इसने महान् अधर्म किया, इस क्रोध से महर्षि ने कहा पापबुद्धे जो तू ने काम- मोहित क्रौञ्च जोड़े के एक क्रौञ्च को मारा है अतः तू भी आयुःशेषभूत बहुत वर्षों तक प्रतिष्ठा—स्त्रीसहित होनेवाली सुख-शान्ति—न प्राप्त करेगा, किन्तु अल्पकाल ही सुख पावेगा। पद्मपुराण के अनुसार स्पष्ट विदित होता है। कोई एक दुर्वृत्त व्यक्ति ही ऐसा था जिसने सीता की निन्दा की थी। रामाभिरामी टीकाकार नागेशभट्ट के अनुसार पद्मपुराण में शिवशिवा-संवाद में कहा है— “ततो जानपदः कश्चित् पामरः काष्ठविक्रयी । स्ववधूगर्हणद्वारा रावणस्य गृहोषिताम् ॥ गर्हयामास वैदेहीं दुर्वृत्तो लोकनिन्दकः । तच्छ्रुत्वा देवि चारेभ्यो भीतो लोकापवादतः ॥ आहूय लक्ष्मणं प्राह रामो राजीवलोचनः । शृणु मे वचनं गुह्यं सीतासन्त्यागकारणम् ॥ वाल्मीकिनाथ भृगुणा शप्तोऽस्मि किल लक्ष्मण । तस्मादेनां त्यजाम्यद्य जनो नैवात्र कारणम् ॥” (वा० रा० १।२।१५ की टीका) किसी काष्ठविक्रयी दुर्वृत्त लोकनिन्दक ने अपनी स्त्री की निन्दा करते हुए रावणगृहोषिता वैदेही जानकी की निन्दा की थी। गुप्तचरों द्वारा यह सुनकर लोकापवादभय से राजीवलोचन राम ने लक्ष्मण को बुलाकर बतलाया कि वाल्मीकि और भृगु ने मुझे पत्नीवियोगदुःख का शाप दे रखा है। इसलिए साधारण आदमी इसका कारण नहीं है। जानकी का त्याग करना ही है। शाप के द्वारा अर्थात् शापप्राय श्लोक के मुख से निकलने से अकल्मष प्राचेतस मुनि सन्तप्त हो रहे थे। ब्रह्माजी ने वहाँ आकर महर्षि से सत्कृत होकर महर्षि से कहा—'वह निषाद नहीं था, किन्तु श्रीराम ही थे।
मृगया के लिए आये थे । तुम रामचन्द्र का यश वर्णन करने से ही संसार में सुश्लोक्य (प्रशंसनीय) होगे ।' यह कह कर ब्रह्मा ब्रह्मलोक चले गये । तब वाल्मीकि ने कोटि-कोटि ग्रन्थों (श्लोकों) द्वारा राम का वर्णन किया । यह स्कन्दपुराण पातालखण्ड की बात है— “शापोक्त्या हृदि सन्तप्तं प्राचेतसमकल्मषम् । प्रोवाच वचनं ब्रह्मा तत्रागत्य सुसत्कृतः ॥ न निषादः स वै रामः मृगयां चर्तुमागतः । तस्य संवर्णनेनैव सुश्लोक्यस्त्वं भविष्यसि ॥ ततः स वर्णयामास राघवं ग्रन्थकोटिभिः ॥” कोटिभिः का अर्थ है शतकोटिभिः, क्योंकि “चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम्” यह अन्यत्र (पद्मपुराण ५।१।२४ में) उक्त है और वह सब ब्रह्मलोक में है। यह ऐतिह्य है। मनुष्यलोक में तो कुश और लव के लिए २४ हजार श्लोकोंवाला रामायण ग्रन्थ है । वाल्मीकि ब्रह्मा के अंशभूत थे । उन्होंने नारद के अनुग्रह से निश्शेष रामचरित को जानकर भूलोकवर्ती चार वर्णों के तापत्रय-विमोचन के लिए स्वकृत शतकोटिप्रविस्तर रामायण का सार चतुर्विंशत्यक्षरा गायत्रीरूप ब्रह्मविद्या के विलासभूत चौबीस हजार श्लोकों के रूप में लव और कुश को पढ़ाया । श्रीराम के अवतार और पत्नीवियोगजन्य दुःख के कारण और भी बहुत से पुराणों तथा योगवासिष्ठ में उक्त हैं । यद्यप्येतत्सर्वं वाल्मीकिकृतमेव तथापि कुशलवगेयतयास्य काव्यस्य करणात्तदुक्तितयैवमुक्तिः । अन्यथा स्वचिन्तायाः स्वापरोक्षत्वाद् बभूवेति लिड्संगतिः स्यात् । (वा० रा० १।४।२१ की टीका) प्रथम सर्ग से ही सम्पूर्ण वाल्मीकिरामायण वाल्मीकिकृत ही है । तथापि वह कुश एवं लव के द्वारा गेयरूप से निर्मित है, अतएव इसमें कुश-लव के द्वारा ही वाल्मीकि वृत्तान्त भी वर्णित किया गया है । ‘मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः’ ( वा० रा० १।२।१५ ) इत्यादि श्लोक उच्चारण के बाद महर्षि के हृदय में चिन्ता हुई । यहाँ ‘बभूव’ लिट्लकार का प्रयोग सङ्गत है । अन्यथा अपनी चिन्ता अपने को प्रत्यक्ष ही होती है, अतः परोक्ष निर्देश सङ्गत न होता । “त्यक्त्वा जीर्णदुकूलवद्वसुमतीं बद्धोऽम्बुधिर्बिन्दुवद् बाणाग्रेण जरत्कपोतक इव व्यापादितो रावणः । लङ्का कापि विभीषणाय सहसा मुद्रेव हस्तेऽर्पिता श्रुत्वैवं रघुनायकस्य चरितं को वा नरो नाञ्चति ॥” (वा० रा० १।२।१५ की टीका) श्रीरघुनाथजी ने जीर्ण वस्त्र के समान पृथ्वी का राज्य पिता के आज्ञानुसार त्याग दिया । बिन्दु के तुल्य समुद्र को बाँध दिया, बाणाग्र से बूढ़े कबूतर के समान रावण को मार डाला एवं साधारण मुद्रा के समान लङ्का विभीषण को प्रदान कर दी । ऐसे राम के अलौकिक चरित्र को सुनकर कौन मनुष्य उनकी पूजा न करेगा । नाट्याचार्य भरतमुनि ने काव्य, नाटकों के सम्बन्ध में कुछ निर्देश दिये हैं— “अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि काव्यबन्धविकल्पनम् । प्रख्यातवस्तुविषयं प्रख्यातोदात्तनायकं चैव ॥ राजर्षिवंशचरितं तथा दिव्याश्रयोपेतम् । नानाविभूतिसंयुतमृद्धिविलासादिभिर्गुणैश्चापि ॥ अङ्कप्रवेशकाव्यं भवति हि तन्नाटकं नाम ।” ( ना० शा० २०।९-११ )
१५४ रामायणमीमांसा पञ्चम काव्य तथा नाटक की कथा वस्तु प्रख्यात ( इतिहास-पुराण प्रसिद्ध ) होनी चाहिए और उसका नायक प्रख्यात एवं उदात्त होना चाहिये । राजर्षिवंश-चरित तथा दिव्य आश्रययुक्त, नाना विभूतियों से संयुक्त, विविध विलासों से युक्त अङ्कप्रवेश सहित नाटक होता है । दशरूपककार धनञ्जय के अनुसार भी— “प्रख्यातवंशो राजर्षिर्दिव्यो वा यत्र नायकः। तत्प्रख्यातं विधातव्यं वृत्तमत्राधिकारिकम् ॥ यत्तत्रानुचितं किञ्चिन्नायकस्य रसस्य वा। विरुद्धं तत्परित्याज्यमन्यथा वा प्रकल्पयेत् ॥” ( द० रू० ३।२३–२५ ) नाटक का प्रख्यात वंश का राजर्षि या कोई दिव्य पुरुष नायक होना चाहिए । नायक की आधिकारिक ( प्रधानभूत ) कथावस्तु प्रख्यात ( पुराणादि-प्रसिद्ध ) ही होनी चाहिये । कथा वस्तु में जो अंश नायक या रस के अनुचित या विरुद्ध हो उसका त्याग कर देना चाहिए अथवा उसकी रस के अनुगुण नवीन कल्पना कर लेनी चाहिए । साहित्यदर्पण के अनुसार भी नाटक का लक्षण— “नाटकं ख्यातवृत्तं स्यात्.................... । प्रख्यातवंशो राजर्षिर्धीरोदात्तः प्रतापवान् ॥ दिव्योऽथ दिव्यादिव्यो वा गुणवान्नायको मतः ॥” ( ६।७–९ ) नाटक प्रख्यातवृत्त ही होना चाहिये । प्रख्यात वंश का राजर्षि धीरोदात्त प्रतापवान् दिव्य या दिव्यादिव्य गुणवान् नायक होना चाहिये । आचार्यदण्डी के काव्यादर्श में महाकाव्य का लक्षण कहा गया है— “सर्गबन्धो महाकाव्यमुच्यते तस्य लक्षणम् । आशीर्नमस्क्रिया वस्तुनिर्देशो वाऽपि तन्मुखम् ॥ इतिहासकथोद्भूतमितरद्वा सदाश्रयम् । चतुर्वर्गफलोपेतं चतुरोदात्तनायकम् ॥ अलङ्कृतमसंक्षिप्तं रसभावनिरन्तरम् । सर्गैरनतिविस्तीर्णैः श्रव्यवृत्तैः सुसन्धिभिः ॥ सर्वत्र भिन्नवृत्तान्तैरुपेतं लोकरञ्जनम् । काव्यं कल्पान्तरस्थायि जायते सदलङ्कृति ॥” सर्गबन्धयुक्त चतुवर्ग फलोपेत काव्य ग्रन्थ होता है । उसमें आशीर्वादात्मक, नमस्कारात्मक अथवा वस्तु- निर्देशात्मक मङ्गल होना चाहिये । इतिहासकथोद्भूत या अन्य सदाश्रय चतुर तथा उदात्त काव्य का नायक होना चाहिये । वह अलङ्कारों से युक्त, विस्तृत तथा आद्योपान्त निरन्तर रसमय होना चाहिये । अनतिविस्तीर्ण सर्गों एवं सुश्लिष्ट भव्य वृत्तान्तों से युक्त होना चाहिये । विभिन्न प्रकार के वृत्तान्तों से युक्त तथा लोकरञ्जन समीचीन अलङ्कारोंवाला ग्रन्थ काव्य कल्पान्तर पर्यन्त रहता है । भामह तथा रुद्रट सर्गबन्ध नामक काव्य का लक्षण देते हैं, किन्तु वे यह नहीं लिखते हैं कि उस प्रकार के काव्य या उसकी कथा-वस्तु प्रख्यात या इतिहासप्रसिद्ध हो ।
अध्याय जैनमत में रामकथा १५५ साहित्यदर्पण के अनुसार भी काव्यलक्षण— “सर्गबन्धो महाकाव्यं तत्रैको नायकः सुरः । सद्वंशः क्षत्रियो वापि धीरोदात्तगुणान्वितः ॥ एकावंशभवा भूपा कुलजा बहवोऽपि वा । शृङ्गारवीरशान्तानामेकोऽङ्गी रस इष्यते ॥ अङ्गानि सर्वेऽपि रसाः सर्वे नाटकसन्धयः । इतिहासोद्भवं वृत्तमन्यद् वा सज्जनाश्रयम् ॥ चत्वारस्तस्य वर्गाः स्युस्तेष्वेकं च फलं भवेत् ॥” सर्गबन्धयुक्त काव्य होता है । उसका एक नायक होता है । वह देवता हो या सद्वंशीय क्षत्रिय हो । वह धीरोदात्त एवं गुणयुक्त होना चाहिये । एक वंश में उद्भूत एवं कुलप्रसूत बहुत राजा भी नायक हो सकते हैं । इसमें शृङ्गार, वीर या शान्त कोई एक अङ्गी रस होना चाहिये और रसों का अङ्गरूप में संनिवेश होना चाहिए । इस दृष्टि से काव्य और नाटक के नाम पर भी कोई मानमाने अप्रामाणिक मिथ्या कथानकों का उल्लेख नहीं कर सकता है । श्रीकामिल बुल्के ने आदि कवि वाल्मीकि को अपनी रामकथा समर्पित करते हुए कहा है कि जिनकी प्रतिभा ने रामकथा को भारत तथा निकटवर्ती देशों के साहित्य में एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान दिलाया है और भारतीय संस्कृति का एक उज्ज्वल प्रतीक बना दिया, उन आदि कवि वाल्मीकि को रामकथा की दिग्विजय का प्रस्तुत विवरण सश्रद्ध समर्पित है । “त्वदीयं वस्तु वाल्मीके तुभ्यमेव समर्प्यते ।” जैनकथा की सारी विशेषता का वर्णन करते हुए बुल्के ने दिखाया है कि उनमें प्रारम्भ से ही उन लौकिक ग्रन्थों का उल्लेख मिलता है जिनमें राम का शिकार करना, रावण आदि का मांसाहारी होना, कुम्भकर्ण की ६ महीने की निद्रा, रावण के राक्षस तथा सुग्रीव के वानर होने आदि की असत्य कथाएँ पायी जाती हैं । इससे स्पष्ट है कि जैन-रामकथा वाल्मीकिरामायण के बाद उत्पन्न हुई है । बुल्के यह भी मानते हैं कि विमलसूरि ने पउमचरिय लिखकर पहले पहल लोकप्रिय रामकथा को जैनधर्म के साँचे में ढालने का प्रयास किया है (पृ० ६७) । आगे वे कहते हैं कवि का कहना है कि यह पद्मचरित्र आचार्यों की परम्परा से चला आ रहा था और नामावलीबद्ध था । इसका अर्थ यह हो सकता है कि रामचरित केवल नामा- वली के रूप में रहा होगा अर्थात् उसमें कथा के प्रधान प्रधान पात्रों, उनके माता-पिताओं, स्थानों और भवान्तरों आदि के नाम ही होंगे । वह पल्लवित कथा के रूप में न होगा और इसी की विमलसूरि ने विस्तृत चरित के रूप में रचना की होगी (पृ० ६७) । बुल्के के अनुसार वाल्मीकिरामायण के पूर्व रामकथासम्बन्धी आख्यान प्रचलित थे । इसका आभास महाभारत द्रोणपर्व और शान्तिपर्व के संक्षिप्त रामचरित से तथा अन्य निर्देशों से मिलता है । वे आख्यान आजकल अप्राप्य हैं इस प्रकार वाल्मीकिकृत रामायण रामकथा की प्राचीनतम विस्तृत रचना सिद्ध होती है (पृ० २७) । वाल्मीकि के अनुसार सीता की अग्निशुद्धि श्रीराम ने स्वयं कहा है कि सीते, तुम्हारे चरित्र के सम्बन्ध में सन्देह है । तुम हमारे लिए वैसे ही प्रति- कूल प्रतीत होती हो जैसे नेत्ररोगी के लिए दीप-शिखा । कौन कुलीन पुरुष परगृहोषित नारी को अपने घर रखेगा । रावण के अङ्क में पड़ी हुई और उसके दुष्ट चक्षु से निरीक्षित तुम्हें पुनः कैसे ग्रहण किया जाय । दिव्यरूपा मनोहरा तुम्हें अपने गृह में प्राप्त करके रावण चिरकाल तक कैसे तुमसे दूर रह सका होगा—