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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 220, कुल 1049 में से

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पृष्ठ 220

अध्याय जैनमत में रामकथा १४३ जिन्हके रही भावना जैसी। प्रभुमूरति देखी तिन्ह तैसी ।। (रा० मा० १।२४०।२) के आदर्श को अस्वीकार करने पर भी व्यवहार में उसे मान्य कर लिया। यहाँ लेखक अपने ही पूर्वापरविरोध को भूल गया। पहले उसने कहा—जैन हिन्दुओं से अलग नहीं हैं, पर अब यहाँ वह स्वयं हिन्दू और जैन का बिलकुल पृथक्-पृथक् उल्लेख करने लगा। यही है लेखक के मन की सत्य भावना जो उसके सिर पर चढ़ कर बोलने लगी। पीछे मैंने लिखा है कि वैदिकों ने ऋषभदेव का अपमान नहीं किया; किन्तु जैन मतानुसार ऋषभदेवजी का वैदिकों ने उन्हें ईश्वर मानकर आदर ही किया। फिर, तकरार का प्रश्न ही कहाँ उठता था। किन्तु जैन ने तो वैदिकों के परमेश्वर राम को एक दुःखी जीव बनाकर उनका अपमान ही किया है। महत्त्व तो उन्होंने उनको जैनदीक्षा में दीक्षित करके दिया। लेखक ने मुझपर आरोप लगाते हुए कहा है कि 'मैं अपने ही चश्में में सबको देखना चाहता हूँ; पर आर्यसमाजी ही वैसा नहीं मानते ।' वस्तुतः यह उल्टी बात है। मैं तो लीपापोती ही को दोष मानता हूँ। स्पष्टरूप से प्रमाण-प्रमेय विचार तो भिन्न-भिन्न मतों के हैं ही; क्योंकि जैनों के श्वेताम्बर, दिगम्बर, तेरापन्थी आदि आपस में ही कुछ कम खण्डन-मण्डन नहीं करते हैं। बौद्ध और जैन दोनों ही अवैदिक, निरीश्वरवादी तथा वर्णाश्रमविरोधी होते हुए भी क्या एक दूसरे की बात मानते हैं ? अपने-अपने मत में दृढ़ रहने से सबको अपने ही चश्मे से नहीं देखना चाहते हैं ? क्या बुद्ध और महावीर एक दूसरे के सर्वज्ञ होने का दावा मानते थे ? आर्यसमाजी तो फिर भी ईश्वर की सत्ता एवं वेद के ही कुछ ग्रन्थों को प्रमाण मानते ही हैं। रामचरित के सम्बन्ध में भी वे वाल्मीकि- रामायण को ही प्रमाण मानते हैं, जैनी रामकथा को नहीं। लेखक कहता है, "आखिर जैनरामायण में क्या है ? क्या राम को रावण बना दिया, क्या राम को गोमांसभक्षी बनाया गया है ?" परन्तु जब मनमानी ही है, प्रमाण की अपेक्षा नहीं है तो कोई राम को वैसा भी तो कह और लिख सकता ही है। वैसे साक्षात् परब्रह्म, परमेश्वर को दुःखी मनुष्य मानकर उनका अवैदिक, निरीश्वरवादी जैन मत में दीक्षित होने का वर्णन करना उनका कुछ कम अपमान नहीं है। आगे लेखक कहता है—"जैनरामायण में सर्वत्र नैतिक पक्ष निखारा गया है जो समस्त आर्य-साहित्य का गौरव है। हिंसा के बीच अहिंसा की प्रतिष्ठा का यह साङ्गोपाङ्ग दर्शन है। उसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती।" किन्तु विचार करना चाहिए, क्या यह ठीक है ? वस्तुतः यही तो मतिभ्रम है। क्या वाल्मीकिरामायण के याथातथ्य वर्णन में नैतिकपक्ष कमजोर है ? क्या रावण जैसे दुर्दान्त सर्वधर्मघातक का वध हिंसा है ? हिंसा के बीच अहिंसा का तो यही अर्थ है कि श्रीराम रावण के अन्यायों के प्रतीकारस्वरूप उसे दण्ड तो देते हैं, पर उसका अहित नहीं चाहते। उससे द्वेष नहीं मानते। विभीषण से श्रीराम ने कह दिया कि तुम रावण का और्ध्वदेहिक संस्कार करो। जैसा यह तुम्हारा है वैसा ही हमारा। श्रीराम ने विराध का वध किया, पर उसका और्ध्वदेहिक कृत्य उसके इच्छानुसार ही किया। गीताकार ने— “साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ।” (गी० ६।९) इस वचन के अनुसार सुहृद् मित्र, अरि एवं उदासीन तथा साधु एवं असाधु सर्वत्र ब्रह्मदर्शन का उपदेश करते हुए भी धर्मयुक्त संग्राम से मुंह मोड़ने को कायरता बतलाया और कहा— "क्लैब्यं मास्म गमः पार्थ !" (गी० २।३) अर्जुन, तुम क्लैब्य मत धारण करो। यहाँ तक कह दिया कि यदि तुम धर्मयुक्त सङ्ग्राम से विमुख होओगे तो तुम्हारे स्वधर्म एवं कीर्ति का नाश ही नहीं होगा, तुम्हें पाप भी लगेगा। अन्याथियों को दण्ड न देना ही अन्याय एवं