रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४४ रामायणमीमांसा पञ्चम हिंसा को बढ़ावा देना है। वास्तव में जो मुखपर पट्टी बाँधकर अपने को अहिंसाव्रती घोषित करते हैं, साथ ही दूसरों के इष्ट देवताओं को अपमानित करते हैं और वेदों एवं यज्ञों का खण्डन करते हैं वे ही अहिंसा के बीच में हिंसा की प्रतिष्ठा करते हैं। इससे बचना सबसे पहला काम है। जैसा कि मैंने पहले कहा है, वाल्मीकिरामायण में ईश्वर और यज्ञों का वर्णन किया है एवं वेद का महत्त्व वर्णित है, वह जैनाचार्यों के अपने सिद्धान्त के विरुद्ध है। परन्तु रामकथा पर जनसामान्य का अनुराग है; अतः जैन भी यदि वाल्मीकिरामायण पढ़ेंगे तो अवश्य ही उससे प्रभावित होंगे, अतः वाल्मीकिरामायण को अपने धर्म के साँचे में ही ढालकर रामकथा से वेद, ईश्वर तथा यज्ञ निकाल कर जैनरामकथाओं में उसे विकृत किया गया है। यही जैनों की रामायण-रचना है। स्वतन्त्रता हमारी ही नहीं और लोगों की भी है; अतः यदि स्वतन्त्रताएँ टकरायेगी तो शान्ति और अहिंसा टिक नहीं सकेगी। इसी लिए वैदिकों ने कहा है— “आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत् ।” जो अपने लिए प्रतिकूल हो वह दूसरों के लिए न करना यह धर्म का सर्वस्व है। जैसे हमारे इष्ट देवता का खण्डन हमारे लिए उद्वेजक है वैसे ही दूसरों के धर्म, धर्मग्रन्थ या देवता का खण्डन दूसरों के लिए भी उद्वेगकर होगा ही और वह हिंसा ही होगी। तेरापन्थी आचार्य तुलसी आदि की रामकथा के द्वारा तो आर्यमर्यादा एवं नैतिक पक्ष का हनन ही हुआ है। वस्तुतः निखरना या पालिश करना आदि ही कृत्रिमता का हेतु हैं। सत्य स्वयं में देदीप्यमान होता है। सूर्य को निखारने की आवश्यकता नहीं होती। निखार का अर्थ है आधुनिक सुधार और आधुनिक सुधार के नाम पर शास्त्रीय एवं स्वाभाविक स्थिति को बिगाड़ कर उसे अपने अभीष्ट अन्य रूप में परिणत करना, किन्तु यह एक घोर अपराध है। अन्यथाभूत वस्तु का अन्यथा वर्णन करना चोरी है, पाप है। इसे कविप्रतिभा का स्वातन्त्र्य नहीं माना जा सकता। भगवान् मनु ने कहा है— “योऽन्यथा सन्तमात्मानमन्यथा सत्सु भाषते । स पापकृत्तमो लोके स्तेन आत्मापहारकः ॥” ( म० ४।२५५ ) महाभारत में भी स्पष्ट कहा है— “ अन्यथा सन्तमात्मानमन्यथा यः प्रपद्यते । किं तेन न कृतं पापं चौरेणात्मापहारिणा ॥” जो अन्यथाभूत वस्तु को अन्यथा समझता या वर्णन करता है, उस आत्मापहारी चोर ने कौन सा पाप नहीं किया ? सत्य को जैसा का तैसा रहने देना ही ठीक है। उसको निखारने का प्रयत्न करना उसमें विकृति लाना है। आगे लेखक स्वयं स्वीकार करता है—जैनरामायण की कथा अपने ढंग की है। उसका सारा विवेचन, दर्शन और परिणाम स्वतन्त्र है। वह वाल्मीकि की नकल नहीं है। पर यह स्वतन्त्रता ही तो उच्छृङ्खलता है। क्या बिना कुड्य के चित्रोल्लेख सम्भव है ? आखिर जैनरामकथा का आधार क्या है ? वाल्मीकि राम के समकाल के महर्षि थे। उस समय की घटना का उन्हें ज्ञान होना असम्भव नहीं। फिर ब्रह्मा के आदेशानुसार समाधिजन्य ऋतम्भरा प्रज्ञा से भी उन्हें परिस्थिति का यथार्थ ज्ञान होना सम्भव है। क्या विमलसूरि या तुलसी आदि जैन आचार्य भी राम के समय में थे ? नहीं थे तो स्वतन्तरूप से रामचरित्र कैसे विदित हुआ ? बिना किसी प्रमाण के कल्पनामात्रप्रसूत कोई गल्प या उपन्यास हो सकता है। उसका वस्तुस्थिति से सम्बन्ध नहीं रहता है। वैदिक लोग भी जैन तीर्थङ्करों के सम्बन्ध में बेसिर-पैर की कल्पना कर सकते थे; पर उन्होंने इसे जघन्य अपराध समझकर वैसा