भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 222, कुल 1049 में से

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पृष्ठ 222

अध्याय जैनमत में रामकथा १४५ नहीं किया; किन्तु अहिंसात्मक शान्त आन्दोलन के द्वारा श्रीतुलसी को उसे परिवर्तित करने का ही आग्रह किया है । आपने यह भी लिखा है— “कवि न होउँ नहिं चतुर कहाऊँ। मति अनुरूप राम गुण गाऊँ ॥” जैसे गोस्वामीजी ने रामकथा का विस्तार किया है वैसे ही जैनों ने किया है । आचार्य तुलसी का भी यही आधार है । पर यह भी ठीक नहीं; क्योंकि गोस्वामी तुलसीदास का तो दर्शन परिणाम स्वतन्त्र नहीं है । यह पहले कहा जा चुका है कि वे तो आदि महर्षियों के रचित रामायणरूप सेतु पर चढ़कर चींटी के समान ही अपने रामचरितरूपी अपार सरित्त्वर के पार जाने की बात करते हैं । कोई भी चरित्र निराधार निष्प्रमाण हो भी कैसे सकता है ? यदि किसी को स्वतन्त्र विवेचन, दर्शन लिखना है तो उसको अ, व, ख आदि किसी अन्य नाम का प्रयोग करना चाहिये । क्या कोई मुहम्मद साहब का नाम लेकर ऐसा स्वतन्त्र मनमाना विवेचन लिख सकता है । अग्निपरीक्षा का परिचय आगे अग्निपरीक्षा पुस्तक का परिचय देते हुए लेखक कहता है—‘‘उसमें सीता को महासती के रूप में प्रस्तुत करके शील और पवित्र जीवन बिताने की शिक्षा दी गयी है, जिसमें सीता का शौर्य भरा जीवन दीखता है । सन्देश नया, आदेश नया, उपदेश नया तथा नारी जागृतिका उन्मेष नया; परन्तु यहाँ आधुनिक सुधारवाद की भावना से ओत-प्रोत तेरापन्थी आचार्य तुलसी की अपनी भावना है । प्रामाणिक प्राचीनतम रामायण की भावना नहीं है और आधुनिक नारीस्वातन्त्र्य आन्दोलन से प्रभावित श्रीतुलसी के हृदय में आर्यमर्यादानुरूप नारी का प्राचीन गौरव नहीं है । सुधारकों में नवीनता का भूत चढ़ा ही होता है । लेखक के आर्यसाहित्य के गौरव का यही नमूना है । महाकवि कालिदास द्वारा वर्णित आर्य नारी का गौरव देखिये । अपने प्रियतम से परित्यक्त होने के कारण श्रीसीता को उद्वेग हुआ । उसी में वह कह उठीं—‘‘लक्ष्मण ! तुम मेरी ओर से राजा से कहना लङ्का में मेरी आपके समक्ष अग्निपरीक्षा हुई है फिर भी लोकवादश्रवण के कारण आपने जो मेरा त्याग किया है, क्या यह आपके श्रुत— वेदादि-स्वाध्यायाध्ययन अथवा आपके कुल के अनुरूप है ? “वाच्यस्त्वया मद्वचनात् स राजा वह्नौ विशुद्धापि यत्समक्षम् । मां लोकवादश्रवणादहासीः श्रुतस्य तत् किं सदृशं कुलस्य ॥” ( रघु० १४।६१ ) परन्तु तत्क्षण ही वह भारतीय परम्परागत नारीगौरव के अनुसार संभलकर कहती हैं— “कल्याणबुद्धेरथवा तवायं न कामचारो मयि शङ्कनीयः । ममैव जन्मान्तरपातकानां विपाकविस्फूर्जथुरप्रसह्यः ॥” ( रघु० १४।६२ ) अथवा आप तो कल्याणबुद्धि हैं, सबका ही हित चाहते हैं, कभी अरि का भी अहित नहीं चाहते । “अरिहुँ क अनभल कीन्ह न रामा ।” ( रा० मा० २।१८१।३ ) “कदाचिदुपकारेण कृतेनैकेन तुष्यति । न स्मरत्यपकाराणां शतमप्यात्मवत्तया ॥” ( वा० रा० २।१।११ ) श्रीराम कभी किसी तरह किये हुए एक उपकार से सन्तुष्ट होते हैं फिर आत्मवान् होने के कारण वे सैकड़ों अपकारों का स्मरण तक नहीं करते; अतः मेरे सम्बन्ध में आपके कामचार ( मनमानी ) की शङ्का नहीं हो सकती; १९.

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