रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 223, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंकिन्तु मेरे ही जन्मान्तरीय दुष्कृतों का यह असह्य दुर्विपाक वज्र मेरे सामने आया है और पुनः श्रीसीता वही भाव व्यक्त करती हैं, जो श्रीसीताजी के ही अनुरूप है। तथा है समस्त वेदादि-शास्त्रानुप्राणित संस्कृति के परम अनुरूप । “साहं तपः सूर्यनिविष्टदृष्टिरूर्ध्वं प्रसूतेश्चरितुं यतिष्ये । भूयो यथा मे जननान्तरेऽपि त्वमेव भर्ता न च विप्रयोगः ॥” ( रघु० १४।६६ ) आपसे परित्यक्ता होने पर भी मैं (सीता) प्रसूति के अनन्तर सूर्यनिविष्टदृष्टि होकर ऐसी तपश्चर्या करूंगी जिससे जन्मान्तर में भी आप ही मेरे भर्ता हों और कभी आपसे मेरा विप्रयोग न हो । आगे लेखक दलबदलुओं का दृष्टान्त देकर श्रीराम के जैनधर्म में प्रवेश का समर्थन करता है; परन्तु परमेश्वरावतार राम को निरीश्वरवादी जीव बना देना ही तो सबसे बड़ा अपराध है । अति प्राचीन वेद, उपनिषद् तथा वाल्मीकिरामायण के द्वारा परमेश्वररूप से प्रतिपादित श्रीराम को जैनी के रूप में देखना ही तो अपने ही चश्मे से देखने का मूढ़ामह है । आगे लेखक ने गोस्वामी तुलसीदास के रामचरितमानस की प्रशंसा करते हुए कहा है 'गोस्वामीजी ने जैनरामायण को भी देखा ही होगा। सबको दृष्टि में रखते हुए रामचरितमानस लिखा है। इसी लिए किसी ने जैन या जैनेतर ने उसके विरुद्ध कलम नहीं उठायी । वह अनुपम भक्ति-काव्य ग्रन्थ है ।' यह ठीक है। पर जब यह मानते हैं तो उसके अनुसार श्रीराम को— “व्यापक ब्रह्म निरञ्जन निर्गुन बिगत बिनोद । सोइ अज भक्त प्रेमवश कौशल्या की गोद ॥” ( रा० मा० १।१०८ ) क्यों नहीं मानते ? उन्हें जैनी जीव बनाने का जघन्य अपराध क्यों करते हैं ? आगे तो लेखक ने बहुत ही छिछले शब्दों से आधुनिक मनचले लेखकों के जैसे आक्षेप करते हुए वस्तुस्थिति को अन्यथा रूप में व्यक्त किया है, जिसका उसी रूप में उत्तर देना मेरे लिए असम्भव ही है । पर साथ ही वह यह भी मान लेता है । 'गये शहर में आप मुझे तब ले न गये साथ । बकबक करनेवालों को दिखला देता दो हाथ ॥ छन्द पढ़ते ही स्पष्ट हो जाता है कि ये पद्य आचार्य तुलसी के प्रौढ़ कवित्व के कितने परिचायक हैं ? पर वह यह मानता है—'आजाद भारत के आजाद युवक समाधान की खोज में भटक रहे हैं । उन्हें एक प्यास है । वह प्यास धर्म, दर्शन से नहीं बुझती । उस तृष्णा की पूर्ति का सङ्केतात्मक प्रयास आचार्य तुलसी ने किया है ।' लेखक ने यह बात अवश्य पते की कही, तभी सिनेमाप्रिय आजाद युवकों के लिए उन्होंने अग्निपरीक्षा में सिनेमा के गानों का सन्निवेश किया है; परन्तु यह तृष्णापूर्ति तो सिनेमा से ही होगी । इससे तेरापन्थी तुलसी का घासलेट साहित्य सफल न होगा । लेखक ने आठवें पृष्ठ में लिखा है 'आचार्य तुलसी घोषित कर चुके हैं कि मुझे अपनी ओर से इस ग्रन्थ के बारे मे कुछ भी कहने की जरूरत नहीं है ।' १० वें पृष्ठ में लिखा है 'उन्होंने अपनी कृति में संशोधन करना स्वीकार कर लिया है ।' क्या यह बुद्धिमानी है । लेखक ने— 'तुलसी जाके मुखन ते धोखेहु निकसत राम । ताके पग की पानही मेरे तन की चाम ॥' इस दोहे का स्मरण किया है। यदि यह दाम्भिक भाव से न होकर शुद्ध भाव से स्मरण-पथ में लाया गया हो तो इसका यही अर्थ है— “भाव कुभाव अनख आलस हूँ, नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ ।” ( रा० मा० १।२७।१ )