रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 224, कुल 1049 में से
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अध्याय जैनमत में रामकथा १४७ परन्तु जिन राम का सादर ससम्मान परमेश्वररूप से स्मरण करने से तत्काल शान्ति मिलती है; उनका क्या रावण बनकर शत्रुभाव से नाम लेना बुद्धिमानी की बात है ? १३ वें पन्ने में भी लेखक ने वही तेरापन्थी तुलसी द्वारा उपयुक्त कुलटा, व्यभिचारिणी शब्दों का समर्थन करते हुए उसका खण्डन करने वालों को धर्मान्ध कहने की धृष्टता की है और उनपर भ्रान्ति फैलाने का आरोप लगाया है । गाली का अनुवाद भी पाप है । वस्तुतः लेखक अपने समान ही अपने चश्मे से ही सबको धर्मान्ध एवं पूर्वापर विवेकशून्य मानता है, अन्यथा यह कौन नहीं जानता कि अग्निपरीक्षा के षड्यन्त्र-प्रकरण द्वारा लोकापवाद का चित्रण किया गया है, परन्तु ऐसा होने पर ही अग्निपरीक्षा लेखक दोषमुक्त नहीं हो सकता; क्योंकि साक्षात् राघवेन्द्र राम की स्वरूपभूता महालक्ष्मी सीता के लिए या महासती के लिए अथवा अपनी माँ के लिए पिता द्वारा या अन्य दुष्ट जनों द्वारा दी हुई गालियों का अनुवाद भी पाप है । “कथापि खलु पापानामलमश्रेयसे यतः” (शि० २।४०) । पापियों की पापसम्बन्धिनी कथा भी अकल्याणकारिणी होती है । शिशुपाल ने कृष्ण को सौ गालियाँ दी थीं । वे भी ऐसी उद्वेजक नहीं थीं । प्रसिद्ध टीकाकार श्रीधर स्वामी ने लिखा है कि भगवान् को गाली देने के लिए प्रवर्तित होने पर भी उसकी सरस्वती ने भगवान् की स्तुति ही की है । और तदनुसारी अर्थ भी उन्होंने उन गालियों का व्यक्त किया है । निष्प्रमाण गालो- कल्पना घोर पाप है; परन्तु यहाँ तो वस्तुस्थिति भी वैसी नहीं है । जब पूर्ववर्ती व्यास-वाल्मीकिरामायणों में भी ऐसी गालियों का वर्णन नहीं है, तब वस्तुस्थिति के विपरीत वैसी गालियों की कल्पना सुतरां उच्छृङ्खलता है । यहाँ तक कि पूर्व जैनकथाओं में भी ऐसे अनुचित शब्दों का उल्लेख नहीं है । कुन्दमालाकार भी एक महान् जैन कवि हैं । उत्तररामचरित्र के तुल्य ही उनका उत्तररामचरित्रसम्बन्धी एक दिव्य नाटक है । उसमें उन्होंने भी इस प्रसङ्ग में नियन्त्रित सन्तुलित शब्दों का ही प्रयोग किया है । इसी लिए शास्त्रनियन्त्रित कवि की स्वतन्त्र प्रतिभा उन्मार्गगामिनी और उच्छृङ्खल नहीं होती है । इसी लिए प्रामाणिक ग्रन्थों की कथावस्तु के अनुसार ही काव्य, नाटकों के प्रणयन का निर्देश शास्त्रों में किया गया है । बिना अपवाद के भी अग्निपरीक्षा यद्यपि तुलसी झुक गये, अपनी कृति में संशोधन करना मान लिया, फिर भी लेखक अपने मूढ़ आग्रह के कारण उसका समर्थन करते हुए कहता है—"जनापवाद को इस सीमा तक पहुँचाये बिना सीता के वनवास की प्रक्रिया नहीं बन सकती थी । सामान्य स्थिति में क्या कोई पति अपनी पत्नी का परित्याग कर सकता है ? पर यह भी कितनी निःसार दलील है । लेखक ने यदि कभी वाल्मीकि आदि के रामायण ग्रन्थ पढ़े हों या उसे कभी आर्यशास्त्र सुनने पढ़ने को मिले हों तो उसको मालूम होना चाहिये कि एक वैदिक आर्य पुरुष तो स्वतन्त्ररूप से कतिचित् क्षण भी परगृहोषिता पत्नी को त्याग देता है । तभी तो श्रीराम ने लङ्का ही में जब कि किसी ने कुछ भी नहीं कहा था, स्वयं शङ्का उपस्थित कर श्रीसीता को अग्निपरीक्षा का अवसर दिया था । ऐसी स्थिति में यह कैसे कहा जा सकता है कि अपवाद को बिना चरम सीमा पर पहुँचाये सीता के परित्याग की प्रक्रिया नहीं बैठ सकती थी । इतना ही क्यों अग्निपरीक्षा के बाद भी वाल्मीकिरामायण के अनुसार यत्किञ्चित् लोकवाद के कारण ही राम ने सीता को वनवास दिया । यों तो आधुनिक ऐसे भी लोग हैं जो हजार अपवाद होने पर भी पत्नीत्याग नहीं करते । इतना ही क्यों, अनेक लोगों की भूतपूर्व पत्नियों को भी अपनी पत्नी बनाने में कुछ लोग संकोच नहीं करते । वस्तुतः यह पुस्तक कई वर्षों से छपी थी । इसे कोई जानता भी न था । इस वितण्डावाद के मूल भी आचार्य तुलसी ही हैं । रायपुर में जब उन्होंने एक सार्वजनिक भाषण में श्रीसीता के लिए निन्दित शब्द का प्रयोग किया तो वहाँ के लोगों ने क्षुब्ध होकर उसका आधार पूछा । तब उन्होंने अपनी अग्निपरीक्षा पुस्तक बतायी । उसका भी आधार पूछा गया तो वाल्मीकिरामायण को उन्होंने आधार बताया । जब लोगों ने वाल्मीकिरामायण दिखाया