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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 225

१४८ रामायणमीमांसा पञ्चम और कहा कि इसमें तो ऐसे कोई भी शब्द नहीं हैं। तब उन्होंने जैनरामायण का नाम लिया, पर जब जैनरामायण में भी उसका कोई आधार नहीं मिला। तब उन्होंने उसे अपनी कल्पना मान लिया था। तेरापन्थी आचार्य तुलसी के उक्त ग्रन्थ को देखकर श्रीविनोवाजी ने कहा—यह तो किसी बालक का ग्रन्थ है। यदि आचार्य तुलसी का हो तो भी उनकी बाल्यावस्था का ग्रन्थ हो सकता है। जगद्गुरु शङ्कराचार्य पुरीपीठाधीश्वर तथा ब्रह्मीभूत ज्योतिष्पीठाधीश्वर ने भी इसकी निन्दा की । साधुसमाज के भी प्रतिष्ठित महात्माओं ने इसकी निन्दा की है। स्वामी आत्मानन्द ने कहा कि इसमें लोकापवाद का चित्रण इतने विस्तार और स्थूलता से किया गया है कि वह अत्यन्त मोटी और खटकनेवाली बात हो गयी है। उक्त काव्य में राम को बहुपत्नीधारी बताया गया है और उन्हें एक सामान्य मानव के रूप में दर्शाया गया है। सीता को अणुव्रती बताकर अणुव्रत का प्रोपेगण्डा किया गया है। अग्निपरीक्षा हिन्दू-भावना पर ठेस पहुँचानेवाली पुस्तक है। प्रकाशवती मिश्र ने इस पुस्तक का सक्रिय घोर विरोध किया है। बलदेवप्रसाद मिश्र डी. लिट्. ने लिखा है—'अग्निपरीक्षा रामचरित्र के उच्च आदर्शों को नीचे गिराने का उपक्रम करती है। अग्निपरीक्षा साम्प्रदायिकता का प्रचारक साहित्य बन गया है। उच्छृङ्खल बातें लिखकर अपनी कलम की स्वतन्त्रता भले ही मान लें; परन्तु यह शोभा की बात नहीं है।' उपयोगिता की दृष्टि से अग्निपरीक्षा पुस्तक न होती तो कोई हानि न थी। सीता के चरित्र को लिखने की आज कोई आवश्यकता नहीं है। जन-जन के मानस में सीता की जगज्जननी के रूप में संप्रतिष्ठा है ही। इसके लिए वाल्मीकिरामायण तथा रामचरितमानस पर्याप्त हैं। अपने अणुव्रत या तथोक्त अध्यात्म-प्रचार के लिए अन्य किसी कथा का आश्रयण कर लिया जा सकता था। इस पुस्तक में आदि से अन्त तक सिनेमा के छिछले तर्जों के गायनों में वाल्मीकिरामायण, रामचरितमानस एवं श्रीसीता और राम के आदर्शों के विरुद्ध अनेक चित्रण हैं। रामायणों के अनुसार मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने पिता की आज्ञा का पालन करते हुए अपने परम मित्र के श्रृङ्गवेरपुर में भी प्रवेश नहीं किया। सुग्रीव एवं विभीषण का राजतिलक करने के लिए भी किष्किन्धा एवं लङ्का में उन्होंने प्रवेश नहीं किया। लक्ष्मण के द्वारा ही उनका तिलक हुआ। ठीक उसके विपरीत अग्निपरीक्षा पुस्तक में श्रीराम लङ्का में राज्यसिंहासन पर बैठे दिखाये गये हैं। इस प्रकार ग्रन्थ के आरम्भ से ही श्रीराम की मर्यादाओं का भङ्ग दिखलाया गया है। प्रासाद दिव्य दशकन्धर का दिखलाता अपनी नव्य प्रभा । सिंहासन पर रघुवर लक्ष्मण रविचन्द्र तुल्य थे चमक रहे ॥” ( पृ० १ ) वैदिक रामायणों के अनुसार श्रीराम, भरत और माताओं चिन्ता में अधीर हैं। विभीषण उनको शीघ्र ही पुष्पक विमान द्वारा पहुँचाने का आश्वासन देते हैं, पर अग्निपरीक्षा के अनुसार राम माताओं को भूलकर लङ्का में आनन्द मना रहे हैं। सबको भूले हैं। “तुम तो आनन्द मनाते हो, रोती हैं वे माताएँ । माता के मन को ममता को, मैं तुम्हें सुनाने आया हूँ। लो कान खोलकर सुनो करुण, सन्देशा माँ का लाया हूँ ॥” वैदिक रामायण के अनुसार राम एकपत्नीव्रत हैं। इतना ही क्यों, गोस्व.मीजी के अनुसार तो 'एक नारि- व्रत सब नर नारी।' हैं। पर अग्निपरीक्षा में श्रीराम बहुत रमणियों के भोक्ता हैं। वे लिखते हैं—'रमणियां राम की सोच रही हैं। सीता रहते किंचित् सुख हमें नहीं है।' ( पृ० २३ )