रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय जैनमत में रामकथा १४९ जहाँ वैदिक ग्रन्थों ने पत्नी को पति की काया की छाया, चाँद की चाँदनी एवं भानु की प्रभा माना जाता है, वहाँ सुधारवादी तुलसी के रामराज्य में भी नारियों के समानाधिकार का चित्रण नहीं छूटा। वे लिखते हैं— “नारियों का स्थान पुरुषों से न किञ्चित् हीन था। आत्मनिर्णय में रहा चिन्तन सदा स्वाधीन था॥” वैदिक रामायणों के अनुसार राजनीति के चारों अङ्गों से साम और दाम का ही प्रयोग होता था। दण्ड केवल दण्डी संन्यासियों के हाथ में और भेद केवल नर्तक-नृत्यसमाज में ही परिलक्षित होता था। पर अग्निपरीक्षा में उसी रामराज्य में भी भीषण षड्यन्त्र चलता है। उसके अनुसार रामराज्य में बहुपत्नी प्रथा, सौतिया डाह, असत्य भाषण तथा भ्रष्टाचार दिखाई पड़ता है। दूत, दूतियाँ प्रलोभनवश सीता का अपवाद घर घर पहुँचाती हैं। प्रलोभनवश ही वे लोग राम से भी अत्यन्त प्रपञ्चयुक्त आपत्तिजनक शब्द कहते हैं। सीता के लिए अत्यन्त निम्न स्तर की भाषा का प्रयोग करते हैं। रावण के चरणों का चित्र बनाकर सीता के द्वारा पूजा करने की कथा भी राम के सामने पहुँचायी जाती है। बिठा अकेली पुष्पक में, रावण ले जाया करता था। निर्जन उपवन में प्रमोद से, जी बहलाया करता था॥ विद्या यन्त्र मन्त्र से जिसने, लिए देव देवी भी कील। क्या सम्भव है उसके आगे, रहा अखण्डित शील॥ हाय कलङ्कित हो रहा, सूर्यवंश अभिराम। दुराचारिणी के बने, रघुकुल राम गुलाम॥ (पृ० ३७) पत्नी के पीछे पागल बन, राघव ने लोपी कुलकार। महासती का जामा पहने, कभी न पतिता छिप सकती। सती साध्वी और रानियां, बैठे बैठे रोती हैं। उल्टा युग आया देखो, कुलटा पटरानी होती है॥ पर वे देवी रावण के, चरणों की पूजा करती। इन पापाचारों से कैसे, टिक पायेगी यह धरती॥ (पृ० ३८) देखो भाई दीख रहे हैं, कलियुग के आसार रे। राजघराने में भी पलते, ऐसे पापाचार रे॥ रावण के साथ रहा निश्चित, उसका अनुचित व्यवहार रे। हाँ में हाँ भरने वालों की, बनी आज सरकार रे॥ (पृ० ३९) सीता का पापाचार यहाँ। (पृ० ४०) री पापिन क्यों कर रही, मुझे राम के तुल्य। जिसने पत्नी के लिए, खोया अपना मूल्य॥ सिंहासन को बदनाम किया, भयभीत वहाँ वह कायर है। उस दुराचारिणी से अपना, किञ्चित् सम्बन्ध न तो इसका॥ (पृ० ४४) स्पष्ट है ऐसे पापपूर्ण अनुचित शब्द वैदिक रामायण में तो क्या जैनरामायण में भी नहीं हैं। यही है तेरापन्थी तुलसी का जघन्य अक्षम्य अपराध। जिसके कारण उन्हें रायपुर में उसका फल भोगना पड़ा। यह सब मिथ्या कल्पना है एवं प्रमाणविरुद्ध है। तेरापन्थी की अपनी दुर्भावना और नास्तिकता का दुष्परिणाम है।