भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 227

१५० रामायणमीमांसा पञ्चम वास्तव में श्रीराम मर्यादापुरुषोत्तम प्रजावत्सल राजा हैं। उन्होंने प्रजारञ्जन के लिए स्नेह, राज्य, सौख्य सब कुछ त्यागने की प्रतिज्ञा की थी। और वैसा ही उसका पालन भी किया था— "स्नेहं दयांश्च सौख्यञ्च यदि वा जानकीमपि । आराधनाय लोकस्य मुञ्चतो नास्ति मे व्यथा ॥" ( उ० रा० च० १।१२ ) उनके राज्य में, उनकी प्रजा में तेरापन्थी तुलसी वर्णित षड्यन्त्र, मिथ्या प्रलाप, वैर, सौतिया डाह सम्भव ही नहीं था। रामराज्य का वर्णन श्रीगोस्वामीजी ने यों किया है— वैर न कर काहू सन कोई । राम प्रताप विषमता खोई ॥ दैहिक दैविक भौतिक तापा । राम राज्य काहू नहिं व्यापा ॥ सब नर करहिं परस्पर प्रीती । चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती ॥ ( रा० मा० ७।१९-२०।४-१ ) अग्निपरीक्षा में वर्णित कथानक से आदर्श रामराज्य के आदर्श की पूर्ण हत्या ही व्यक्त होती है। भीषण से भीषण कलियुग में निकृष्ट शासन प्रणाली में जो दुराचार और मिथ्या प्रलाप हो सकता है वही तेरापन्थी तुलसी ने रामराज्य में दिखाया है और निकृष्ट गालियाँ जो हो सकती हैं वे सीता को दिलाई हैं। सिर्फ सीता-त्याग की भूमिका बनाने के लिए जब कि वाल्मीकि के अनुसार कामवासनोपरक्त दुष्ट चक्षु से दृष्ट होने से ही राम ने सीता को त्याज्य समझा था। "दृष्टां दुष्टेन चक्षुषा ।" ( वा० रा० ६।११९।२० ) अग्निपरीक्षा में यद्यपि सीता को महासती कहा गया है, परन्तु वह सब जैनों का णमुक्कार मन्त्र जपने के प्रभाव से बतलाया गया है। करती है कभी आत्मचिन्तन अन्तरवेग हटाने को । रटती जाती है णमुक्कार महामन्त्र शान्ति सुख पाने को ॥ अरिहन्त सुगुरु सद्धर्म बिना है कोई त्राण नहीं । डिग जाता ऐसी स्थितियों में जिसकी श्रद्धा सप्राण नहीं ॥ अर्थ—सद्गुरु अर्हन् के णमुक्कार मन्त्र को सीता ने जपा ऐसे सुन्दर गुरु के सद्धर्म बिना त्राण का कोई रास्ता नहीं ( पृ० ७४ ) । यह है साम्प्रदायिकता की पराकाष्ठा । ऐसे लोग अपने चश्मे से ईश्वर को भी अपने धर्म में दीक्षित करने का साहस करते हैं। आगे चलकर अग्निपरीक्षा के अनुसार वन में श्रीसीता के पास भिक्षोपजीवी अकिंचन जैन सिद्ध पुरुष आते हैं। उनका सीता सम्मान करती है। सीता अपने पुत्रों के पढ़ाने की चिन्ता प्रकट करती है। वह जैन साधु लवण और अङ्कुश को पढ़ाने का उत्तरदायित्व अपने ऊपर लेता है। लेता हूँ दायित्व स्वयं मैं कर मत इसका तनिक विचार । मेरी विद्याओं के सच्चे पात्र मिले मन के अनुसार । वाल्मीकिरामायण के अनुसार वाल्मीकि के आश्रम में ही सीता रही। कालिदास, हर्षवर्धन आदि ने इसका समर्थन किया है। महर्षि वाल्मीकि से ही उन्हें वेदादि शास्त्रों तथा अन्य-शास्त्र आदि की शिक्षा प्राप्त हुई थी। परन्तु उदारता एवं सर्वधर्मसमन्वय का दम्भ रचनेवाले तेरापन्थी तुलसी का वेद-विद्वेष इतना उग्र हो उठा कि वे ठीक उसके विपरीत उनकी किसी जैनी सिद्ध से शिक्षा की व्यवस्था करते हैं। इतने पर भी दूसरों को साम्प्रदायिक कहने का साहस ! स्कूलों में कोई शरारती विद्यार्थी किसी शान्त विद्यार्थी को चिकोटी काटता है। यदि वह रोता है तो