रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय जैनमत में रामकथा १५१ चिकोटी काटनेवाला उसपर कोलाहल मचाने का आरोप लगाता है। ठीक वैसे ही कट्टरसम्प्रदायवादी तेरापन्थी तुलसी वेद, उपनिषद्, वाल्मीकिरामायण आदि से सर्वथा निष्कलङ्क प्रमाणित अनादिकाल से सर्वलक्षण सीता और राम के चरित्र को दूषित करते हैं और उनके चेले तुलसीरामायण से उसका समर्थन करने का साहस करते हैं। वे इस मिथ्यावाद को भी उचित ठहराते हैं कि— रामकथा की मिति जग नाहीं, अस प्रतीति जिनके मन माहीं। नाना भाँति राम अवतारा, रामायण शतकोटि अपारा ।। (रा० मा० १।३२(३)) किमाश्चर्यमतः परम् । जो ईश्वर नहीं मानता, राम को ईश्वरावतार नही मानता वही अपने जघन्य अपराधों को, मिथ्यावादों को शतकोटिप्रविस्तर रामायण में सम्मिलित करना चाहता है और स्वाभिमत किसी जैनी जीव को रामावतार बनाने की दुश्चेष्टा करता है और ऐसे दुष्कृत्य का ही तेरापन्थी तुलसी को शङ्कराचार्य एवं आचार्य विनोबा के समान परम प्रतिष्ठित घोषित करने का दुःसाहस करता है। अन्त में भी तेरापन्थी तुलसी परमेश्वरी श्रीसीता से जैन तीर्थङ्कर की वन्दना कराकर उसका अग्निप्रवेश वर्णन करते हैं— मंगल लोकोत्तम शरण विघ्नहरण है चार । अर्हद्वतनु मुनि धर्म को रटती बारम्बार ।। नमोकार मन्त्र जप करके हृद् था बना विशाल । जलती ज्वाला कुण्ड में कूद पड़ी तत्काल ।। (पृ० ९६५ ) और उसी मन्त्र के प्रभाव से अग्नि पानी हो गया और कुण्ड एक महान् पानी का सरोवर हो गया । “सरवर हो रहा तरङ्गाकुल खिल रहे कमल उत्पल शतदल ।” आगे सीता की महिमा का वर्णन किया है। परन्तु वह जैन दीक्षिता सीता की महिमा है वेदादि शास्त्रोक्त ईश्वरस्वरूप सीता की नहीं । अग्निपरीक्षा की भूमिका के लेखक महेन्द्रकुमार ने वाल्मीकि के राम को एक महामानव के रूप में प्रस्तुत किया है। आदि से अन्त तक राम एक मानव रहते हैं । वह कहते हैं उनमें ईश्वरता का आरोप कवि ने नहीं किया । पर यह सर्वथा मिथ्या है, क्योंकि प्रस्तुत लेख में ही मैंने वाल्मीकि के ही राम को परात्पर ब्रह्म बतलाने- वाले सैकड़ों वचन प्रस्तुत किये हैं। युद्धकाण्ड में ब्रह्मा ने स्वयं कहा है— “भवान्नारायणो देवः श्रीमांश्चक्रायुधः प्रभुः ॥” आप चक्रधारी संसार के आदिकर्ता नारायण देव हैं। आगे भूमिका में कहता है—‘आज के बुद्धिप्रधान युग में जैनरामायणें बुद्धिगम्यता की दिशा में अधिक प्रशस्त मानी गयी हैं। वहाँ अधिकांश घटनाएँ स्वाभाविक और सम्भवरूप में मिलती हैं। वैदिक रामायणों में रावण के दस मुख माने गये हैं। स्वयम्भूकृत पद्मचरित में वैदिक परम्परा में चलनेवाली असङ्गतियों को प्रस्तुत किया गया है। रावण के दस मुख और बीस हाथ कैसे, कुम्भकर्ण छः महीने कैसे सोता था, करोड़ों महिषों को कैसे खा जाता था। कूर्म ने पृथ्वी को कैसे पीठ पर धारण किया था। इस प्रकार अवतारवादिता और विविध अस्वाभावकताओं को लेकर जैन और वैदिक परम्पराओं में बहुत से भेद आते हैं। परन्तु भूमिका लेखक को यह बात समझ में क्यों नहीं आयी कि णमुक्कार मन्त्र जप कर सीता के अग्निकुण्ड में कूदने से अग्नि पानी कैसे हो गया ? अग्निकुण्ड महान् सरोवर कैसे हो गया ? उसमें विविध कमल कैसे खिल गये ? क्या यह सब महावीर या तेरापन्थी तुलसी के करिश्मे से हो गया ? धर्मान्ध साम्प्रदायिक अपने सम्प्रदाय की असम्भव बातों को भी सम्भव मानता है, परन्तु अन्य सम्प्रदाय की तर्कसङ्गत बातें भी उसे असङ्गत जँचती हैं। कहा जाता है “जब वैदिक रामायणों में भी कथाभेद है। किसी रामायण में यह वर्णित है कि सीता जिस पर्णशाला में रहती थीं