भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 229, कुल 1049 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 229

१५२ रामायणमीमांसा पञ्चम रावण वहाँ की जमीन सहित पर्णशाला को ही लङ्का ले गया था। फिर जैन रामकथा का भेद क्यों अनुचित कहा जाय । प्रत्येक रचयिता प्रायः कुछ न कुछ अपनी ओर से जोड़ता ही है। कवि इसे अपना मौलिक अधिकार मानता है।' परन्तु यह बात भी उचित नहीं, क्योंकि वैदिक रामकथाओं के भेद में कल्पभेद से तथा अवतारभेद से कथाओं का भेद सम्भव होता है— कल्प भेद हरि चरित सुहाये । भांति अनेक मुनीसन गाये ॥ (रा० मा० १।३२।४) अतः भेद समूल हो सकते हैं परन्तु जिनके मतानुसार ईश्वर एवं अवतारवाद मान्य नहीं है, उनके यहाँ कथाभेद भूमिका-लेख के अनुसार कवि की अपनी ही कल्पना हो सकती है, जो वस्तुस्थिति से विरुद्ध होती है। हां, मूल कथावस्तु को ही सजाने और रोचक बनाने में शब्दालङ्कार आदि की योजना में कवियों की स्वतन्त्रता अवश्य मान्य होनी चाहिये । अन्यथा जैसे गल्प, उपन्यास आदि का कोई श्रद्धा से पाठ नहीं करता वैसे ही रामायण का भी पाठ नहीं कर सकेगा। ऐसे ही अप्रामाणिक तथा मिथ्याकल्पनापूर्ण वर्णनों को धार्मिक ग्रन्थ तो कहा ही नहीं जा सकता । नागेश के अनुसार वाल्मीकि ने नारद से भगवान् राम के गुणवर्णन का श्रवण किया और स्वयं भी राम- गुणवर्णन की इच्छा की। श्रीराम का गुण करुणरसमय है, अतः अतिकरुण व्यक्ति का ही रामायण-वर्णन में अधिकार है। अतः मुनि के चित्त में कारुण्य जानने के लिए और भृगुदत्त शाप का ही वाल्मीकि द्वारा दृढ़ीकरणार्थ श्रीराम ने ही मुनि के देखते देखते निषाद रूप धारण कर राक्षसवशेषरूप क्रौञ्च को मार दिया। अन्तर्यामी श्रीराम के इच्छानुसार ही उनकी प्रेरणा से ही इसने महान् अधर्म किया, इस क्रोध से महर्षि ने कहा पापबुद्धे जो तू ने काम- मोहित क्रौञ्च जोड़े के एक क्रौञ्च को मारा है अतः तू भी आयुःशेषभूत बहुत वर्षों तक प्रतिष्ठा—स्त्रीसहित होनेवाली सुख-शान्ति—न प्राप्त करेगा, किन्तु अल्पकाल ही सुख पावेगा। पद्मपुराण के अनुसार स्पष्ट विदित होता है। कोई एक दुर्वृत्त व्यक्ति ही ऐसा था जिसने सीता की निन्दा की थी। रामाभिरामी टीकाकार नागेशभट्ट के अनुसार पद्मपुराण में शिवशिवा-संवाद में कहा है— “ततो जानपदः कश्चित् पामरः काष्ठविक्रयी । स्ववधूगर्हणद्वारा रावणस्य गृहोषिताम् ॥ गर्हयामास वैदेहीं दुर्वृत्तो लोकनिन्दकः । तच्छ्रुत्वा देवि चारेभ्यो भीतो लोकापवादतः ॥ आहूय लक्ष्मणं प्राह रामो राजीवलोचनः । शृणु मे वचनं गुह्यं सीतासन्त्यागकारणम् ॥ वाल्मीकिनाथ भृगुणा शप्तोऽस्मि किल लक्ष्मण । तस्मादेनां त्यजाम्यद्य जनो नैवात्र कारणम् ॥” (वा० रा० १।२।१५ की टीका) किसी काष्ठविक्रयी दुर्वृत्त लोकनिन्दक ने अपनी स्त्री की निन्दा करते हुए रावणगृहोषिता वैदेही जानकी की निन्दा की थी। गुप्तचरों द्वारा यह सुनकर लोकापवादभय से राजीवलोचन राम ने लक्ष्मण को बुलाकर बतलाया कि वाल्मीकि और भृगु ने मुझे पत्नीवियोगदुःख का शाप दे रखा है। इसलिए साधारण आदमी इसका कारण नहीं है। जानकी का त्याग करना ही है। शाप के द्वारा अर्थात् शापप्राय श्लोक के मुख से निकलने से अकल्मष प्राचेतस मुनि सन्तप्त हो रहे थे। ब्रह्माजी ने वहाँ आकर महर्षि से सत्कृत होकर महर्षि से कहा—'वह निषाद नहीं था, किन्तु श्रीराम ही थे।