भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 230, कुल 1049 में से

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पृष्ठ 230

मृगया के लिए आये थे । तुम रामचन्द्र का यश वर्णन करने से ही संसार में सुश्लोक्य (प्रशंसनीय) होगे ।' यह कह कर ब्रह्मा ब्रह्मलोक चले गये । तब वाल्मीकि ने कोटि-कोटि ग्रन्थों (श्लोकों) द्वारा राम का वर्णन किया । यह स्कन्दपुराण पातालखण्ड की बात है— “शापोक्त्या हृदि सन्तप्तं प्राचेतसमकल्मषम् । प्रोवाच वचनं ब्रह्मा तत्रागत्य सुसत्कृतः ॥ न निषादः स वै रामः मृगयां चर्तुमागतः । तस्य संवर्णनेनैव सुश्लोक्यस्त्वं भविष्यसि ॥ ततः स वर्णयामास राघवं ग्रन्थकोटिभिः ॥” कोटिभिः का अर्थ है शतकोटिभिः, क्योंकि “चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम्” यह अन्यत्र (पद्मपुराण ५।१।२४ में) उक्त है और वह सब ब्रह्मलोक में है। यह ऐतिह्य है। मनुष्यलोक में तो कुश और लव के लिए २४ हजार श्लोकोंवाला रामायण ग्रन्थ है । वाल्मीकि ब्रह्मा के अंशभूत थे । उन्होंने नारद के अनुग्रह से निश्शेष रामचरित को जानकर भूलोकवर्ती चार वर्णों के तापत्रय-विमोचन के लिए स्वकृत शतकोटिप्रविस्तर रामायण का सार चतुर्विंशत्यक्षरा गायत्रीरूप ब्रह्मविद्या के विलासभूत चौबीस हजार श्लोकों के रूप में लव और कुश को पढ़ाया । श्रीराम के अवतार और पत्नीवियोगजन्य दुःख के कारण और भी बहुत से पुराणों तथा योगवासिष्ठ में उक्त हैं । यद्यप्येतत्सर्वं वाल्मीकिकृतमेव तथापि कुशलवगेयतयास्य काव्यस्य करणात्तदुक्तितयैवमुक्तिः । अन्यथा स्वचिन्तायाः स्वापरोक्षत्वाद् बभूवेति लिड्संगतिः स्यात् । (वा० रा० १।४।२१ की टीका) प्रथम सर्ग से ही सम्पूर्ण वाल्मीकिरामायण वाल्मीकिकृत ही है । तथापि वह कुश एवं लव के द्वारा गेयरूप से निर्मित है, अतएव इसमें कुश-लव के द्वारा ही वाल्मीकि वृत्तान्त भी वर्णित किया गया है । ‘मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः’ ( वा० रा० १।२।१५ ) इत्यादि श्लोक उच्चारण के बाद महर्षि के हृदय में चिन्ता हुई । यहाँ ‘बभूव’ लिट्लकार का प्रयोग सङ्गत है । अन्यथा अपनी चिन्ता अपने को प्रत्यक्ष ही होती है, अतः परोक्ष निर्देश सङ्गत न होता । “त्यक्त्वा जीर्णदुकूलवद्वसुमतीं बद्धोऽम्बुधिर्बिन्दुवद् बाणाग्रेण जरत्कपोतक इव व्यापादितो रावणः । लङ्का कापि विभीषणाय सहसा मुद्रेव हस्तेऽर्पिता श्रुत्वैवं रघुनायकस्य चरितं को वा नरो नाञ्चति ॥” (वा० रा० १।२।१५ की टीका) श्रीरघुनाथजी ने जीर्ण वस्त्र के समान पृथ्वी का राज्य पिता के आज्ञानुसार त्याग दिया । बिन्दु के तुल्य समुद्र को बाँध दिया, बाणाग्र से बूढ़े कबूतर के समान रावण को मार डाला एवं साधारण मुद्रा के समान लङ्का विभीषण को प्रदान कर दी । ऐसे राम के अलौकिक चरित्र को सुनकर कौन मनुष्य उनकी पूजा न करेगा । नाट्याचार्य भरतमुनि ने काव्य, नाटकों के सम्बन्ध में कुछ निर्देश दिये हैं— “अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि काव्यबन्धविकल्पनम् । प्रख्यातवस्तुविषयं प्रख्यातोदात्तनायकं चैव ॥ राजर्षिवंशचरितं तथा दिव्याश्रयोपेतम् । नानाविभूतिसंयुतमृद्धिविलासादिभिर्गुणैश्चापि ॥ अङ्कप्रवेशकाव्यं भवति हि तन्नाटकं नाम ।” ( ना० शा० २०।९-११ )

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