भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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१५४ रामायणमीमांसा पञ्चम काव्य तथा नाटक की कथा वस्तु प्रख्यात ( इतिहास-पुराण प्रसिद्ध ) होनी चाहिए और उसका नायक प्रख्यात एवं उदात्त होना चाहिये । राजर्षिवंश-चरित तथा दिव्य आश्रययुक्त, नाना विभूतियों से संयुक्त, विविध विलासों से युक्त अङ्कप्रवेश सहित नाटक होता है । दशरूपककार धनञ्जय के अनुसार भी— “प्रख्यातवंशो राजर्षिर्दिव्यो वा यत्र नायकः। तत्प्रख्यातं विधातव्यं वृत्तमत्राधिकारिकम् ॥ यत्तत्रानुचितं किञ्चिन्नायकस्य रसस्य वा। विरुद्धं तत्परित्याज्यमन्यथा वा प्रकल्पयेत् ॥” ( द० रू० ३।२३–२५ ) नाटक का प्रख्यात वंश का राजर्षि या कोई दिव्य पुरुष नायक होना चाहिए । नायक की आधिकारिक ( प्रधानभूत ) कथावस्तु प्रख्यात ( पुराणादि-प्रसिद्ध ) ही होनी चाहिये । कथा वस्तु में जो अंश नायक या रस के अनुचित या विरुद्ध हो उसका त्याग कर देना चाहिए अथवा उसकी रस के अनुगुण नवीन कल्पना कर लेनी चाहिए । साहित्यदर्पण के अनुसार भी नाटक का लक्षण— “नाटकं ख्यातवृत्तं स्यात्.................... । प्रख्यातवंशो राजर्षिर्धीरोदात्तः प्रतापवान् ॥ दिव्योऽथ दिव्यादिव्यो वा गुणवान्नायको मतः ॥” ( ६।७–९ ) नाटक प्रख्यातवृत्त ही होना चाहिये । प्रख्यात वंश का राजर्षि धीरोदात्त प्रतापवान् दिव्य या दिव्यादिव्य गुणवान् नायक होना चाहिये । आचार्यदण्डी के काव्यादर्श में महाकाव्य का लक्षण कहा गया है— “सर्गबन्धो महाकाव्यमुच्यते तस्य लक्षणम् । आशीर्नमस्क्रिया वस्तुनिर्देशो वाऽपि तन्मुखम् ॥ इतिहासकथोद्भूतमितरद्वा सदाश्रयम् । चतुर्वर्गफलोपेतं चतुरोदात्तनायकम् ॥ अलङ्कृतमसंक्षिप्तं रसभावनिरन्तरम् । सर्गैरनतिविस्तीर्णैः श्रव्यवृत्तैः सुसन्धिभिः ॥ सर्वत्र भिन्नवृत्तान्तैरुपेतं लोकरञ्जनम् । काव्यं कल्पान्तरस्थायि जायते सदलङ्कृति ॥” सर्गबन्धयुक्त चतुवर्ग फलोपेत काव्य ग्रन्थ होता है । उसमें आशीर्वादात्मक, नमस्कारात्मक अथवा वस्तु- निर्देशात्मक मङ्गल होना चाहिये । इतिहासकथोद्भूत या अन्य सदाश्रय चतुर तथा उदात्त काव्य का नायक होना चाहिये । वह अलङ्कारों से युक्त, विस्तृत तथा आद्योपान्त निरन्तर रसमय होना चाहिये । अनतिविस्तीर्ण सर्गों एवं सुश्लिष्ट भव्य वृत्तान्तों से युक्त होना चाहिये । विभिन्न प्रकार के वृत्तान्तों से युक्त तथा लोकरञ्जन समीचीन अलङ्कारोंवाला ग्रन्थ काव्य कल्पान्तर पर्यन्त रहता है । भामह तथा रुद्रट सर्गबन्ध नामक काव्य का लक्षण देते हैं, किन्तु वे यह नहीं लिखते हैं कि उस प्रकार के काव्य या उसकी कथा-वस्तु प्रख्यात या इतिहासप्रसिद्ध हो ।