भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 232

अध्याय जैनमत में रामकथा १५५ साहित्यदर्पण के अनुसार भी काव्यलक्षण— “सर्गबन्धो महाकाव्यं तत्रैको नायकः सुरः । सद्वंशः क्षत्रियो वापि धीरोदात्तगुणान्वितः ॥ एकावंशभवा भूपा कुलजा बहवोऽपि वा । शृङ्गारवीरशान्तानामेकोऽङ्गी रस इष्यते ॥ अङ्गानि सर्वेऽपि रसाः सर्वे नाटकसन्धयः । इतिहासोद्भवं वृत्तमन्यद् वा सज्जनाश्रयम् ॥ चत्वारस्तस्य वर्गाः स्युस्तेष्वेकं च फलं भवेत् ॥” सर्गबन्धयुक्त काव्य होता है । उसका एक नायक होता है । वह देवता हो या सद्वंशीय क्षत्रिय हो । वह धीरोदात्त एवं गुणयुक्त होना चाहिये । एक वंश में उद्भूत एवं कुलप्रसूत बहुत राजा भी नायक हो सकते हैं । इसमें शृङ्गार, वीर या शान्त कोई एक अङ्गी रस होना चाहिये और रसों का अङ्गरूप में संनिवेश होना चाहिए । इस दृष्टि से काव्य और नाटक के नाम पर भी कोई मानमाने अप्रामाणिक मिथ्या कथानकों का उल्लेख नहीं कर सकता है । श्रीकामिल बुल्के ने आदि कवि वाल्मीकि को अपनी रामकथा समर्पित करते हुए कहा है कि जिनकी प्रतिभा ने रामकथा को भारत तथा निकटवर्ती देशों के साहित्य में एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान दिलाया है और भारतीय संस्कृति का एक उज्ज्वल प्रतीक बना दिया, उन आदि कवि वाल्मीकि को रामकथा की दिग्विजय का प्रस्तुत विवरण सश्रद्ध समर्पित है । “त्वदीयं वस्तु वाल्मीके तुभ्यमेव समर्प्यते ।” जैनकथा की सारी विशेषता का वर्णन करते हुए बुल्के ने दिखाया है कि उनमें प्रारम्भ से ही उन लौकिक ग्रन्थों का उल्लेख मिलता है जिनमें राम का शिकार करना, रावण आदि का मांसाहारी होना, कुम्भकर्ण की ६ महीने की निद्रा, रावण के राक्षस तथा सुग्रीव के वानर होने आदि की असत्य कथाएँ पायी जाती हैं । इससे स्पष्ट है कि जैन-रामकथा वाल्मीकिरामायण के बाद उत्पन्न हुई है । बुल्के यह भी मानते हैं कि विमलसूरि ने पउमचरिय लिखकर पहले पहल लोकप्रिय रामकथा को जैनधर्म के साँचे में ढालने का प्रयास किया है (पृ० ६७) । आगे वे कहते हैं कवि का कहना है कि यह पद्मचरित्र आचार्यों की परम्परा से चला आ रहा था और नामावलीबद्ध था । इसका अर्थ यह हो सकता है कि रामचरित केवल नामा- वली के रूप में रहा होगा अर्थात् उसमें कथा के प्रधान प्रधान पात्रों, उनके माता-पिताओं, स्थानों और भवान्तरों आदि के नाम ही होंगे । वह पल्लवित कथा के रूप में न होगा और इसी की विमलसूरि ने विस्तृत चरित के रूप में रचना की होगी (पृ० ६७) । बुल्के के अनुसार वाल्मीकिरामायण के पूर्व रामकथासम्बन्धी आख्यान प्रचलित थे । इसका आभास महाभारत द्रोणपर्व और शान्तिपर्व के संक्षिप्त रामचरित से तथा अन्य निर्देशों से मिलता है । वे आख्यान आजकल अप्राप्य हैं इस प्रकार वाल्मीकिकृत रामायण रामकथा की प्राचीनतम विस्तृत रचना सिद्ध होती है (पृ० २७) । वाल्मीकि के अनुसार सीता की अग्निशुद्धि श्रीराम ने स्वयं कहा है कि सीते, तुम्हारे चरित्र के सम्बन्ध में सन्देह है । तुम हमारे लिए वैसे ही प्रति- कूल प्रतीत होती हो जैसे नेत्ररोगी के लिए दीप-शिखा । कौन कुलीन पुरुष परगृहोषित नारी को अपने घर रखेगा । रावण के अङ्क में पड़ी हुई और उसके दुष्ट चक्षु से निरीक्षित तुम्हें पुनः कैसे ग्रहण किया जाय । दिव्यरूपा मनोहरा तुम्हें अपने गृह में प्राप्त करके रावण चिरकाल तक कैसे तुमसे दूर रह सका होगा—