रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय | जैनमत में रामकथा | १४१
शिवजी पार्वतीजी से कहते हैं कि तुमने जो शङ्का के रूप में यह कहा है कि श्रीराम वेदवेद्य एवं योगीन्द्र मुनीन्द्र ध्येय परमात्मा नहीं हैं, किन्तु परमेश्वर से भिन्न कोई और ही हैं, वह ठीक नहीं, क्योंकि ऐसा तो अधम लोग ही कहते सुनते हैं । जो मोह-पिशाच से ग्रस्त होते हैं । ऐसे लोग पाखण्डी तथा हरिपदविमुख हैं । वे क्या सत्य है क्या मिथ्या है कुछ भो नहीं जानते । वे अज्ञानी, मूर्ख और अभागे हैं । उनके मनरूपी दर्पण में विषयमयी काई लगी है, अतः वे राम को नहीं जान पाते । लम्पट कपटी कुटिल लोग जिन्होंने कभी सन्त-सभा नहीं देखी है, वे ही लोग वेद-असम्मत वाणी बोलते हैं । उनको वास्तविक हानि, लाभ का कुछ ज्ञान नहीं होता । जिनका मनरूप दर्पण मलिन है और जिनके पास वेदादि-शास्त्ररूप नेत्र नहीं हैं वे रामरूप को जान भी कैसे सकते हैं ? ऐसे लोग वातुल एवं भूतविवश मतवाले हैं । वे बिना विचार बोलते रहते हैं । जिन्होंने महामोहरूप मदिरा पी रखी है उनकी बातों पर ध्यान नहीं देना चाहिये । आधुनिक जैन लेखकों को गम्भीरता से सोचना चाहिये कि क्या श्रीतुलसीदासजी श्रीसीताराम को परब्रह्म परमेश्वर नहीं मानते ! अवश्य मानते हैं । और जो मानते हैं कि श्रीराम ने दुःखी होकर जैनमन्त्र की दीक्षा ली उनकी राम-कथा का तुलसीदास के रामचरितमानस के द्वारा समर्थन हो सकता है ? तुलसीदास स्वयं कपीश्वर हनुमान् से भी प्रथम वाल्मीकि की वन्दना करते हैं । “वन्दे विशुद्धविज्ञानौ कवीश्वरकपीश्वरौ ।” वे स्पष्ट कहते हैं जैसे कोई राजा बड़ी नदी पर सेतु निर्माण करता है और चींटी भी उसी पर चढ़कर श्रम के बिना नदी पार कर जाती है, वैसे ही महर्षि वाल्मीकि आदि मुनियों ने जो रामायण का निर्माण किया है वही रामचरित महासरिता-सेतु है । उसी मार्ग पर चलने में हम लोगों को सुगमता है— “मुनिन्ह प्रथम हरिकीरति गाई। तेहि मग चलत सुगम मोहिं भाई ॥” (रा० मा० १।१३) “अति अपार जे सरितबर जौं नृप सेतु कराहिं । चढ़ि पिपीलिकउ परम लघु बिनु श्रम पारहि जाहिं ॥” (रा० मा० १।१३) इसी तरह बिना समझे साधकजी ने 'एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति" वेदवाक्य को छेड़ा है । उनके जैना- चार्यों को वेद का प्रामाण्य मान्य ही नहीं है और उस मन्त्र का अर्थ उनके अनुकूल नहीं है । उसके द्वारा यह कहा गया है 'विप्र लोग उस एक ही सर्वाधिष्ठान स्वप्रकाश ब्रह्म का सोपाधिकरूप से अग्नि, यम, मित्र, वरुण, गरुत्मान् आदि अनेक रूपों में वर्णन करते हैं।' मन्त्र का यह अर्थ नहीं है कि वही वेदान्तियों का ब्रह्म है, वही जैनों का पुद्गल तथा मध्यम परिमाण आत्मा है और वही बौद्धों का क्षणभङ्ग विज्ञान है। जो राम को अनन्त मानते हैं, राम को गुणगणधाम मानते हैं तथा उस एक ही अनन्त राम का कल्पभेद से अवतार मानते हैं एवं तदनुसार राम की कल्प- भेद से कथा का भेद मानते हैं वे विमल विचारवाले लोग कल्प-भेद सम्बन्धी कथाभेद सुनकर आश्चर्य नहीं मानते। यह है आपके उद्धृत— राम अनंत अनंत गुन, अमित कथा बिस्तार । सुनि आचरजु न मानिहहिं जिनके बिमल विचार ॥ (रा० मा० १।३३) दोहे का अभिप्राय । कहिये, क्या आप या आपके जैनाचार्य श्रीराम को अनन्त मानते हैं या मध्यम परिमाण ? श्रीराम को अनन्तगुण परमेश्वर मानते हैं ? यदि नहीं, तो इस प्रकार के वचनों को उद्धृत करके लोगों की आँख में धूल क्यों डालते हैं ? धर्मान्ध लेखक के उद्धृत—