रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४० रामायणमीमांसा पञ्चम बल्कि खेतों में काम करनेवाले किसान और नाव चलानेवाले नाविक लोग भी उनसे अप्रभावित नहीं रहे, जो उनके गीतों को गुनगुनाते हुए अपनी थकावट भूल जाते हैं । निःसन्देह वाल्मीकि की लेखनी ने मानवमात्र पर जिस सम्पूर्णता से प्रभाव डाला है वैसा प्रभाव और किसी कवि की लेखनी डालने में सफल नहीं हुई । रामकीति के रचयिता छठे राम राजा ने रामकीति के मूल का पता लगाया है । उनके पाण्डित्यपूर्ण विश्लेषण से मूल रामायण के रचयिता वाल्मीकि के बारे में ज्ञात हुआ है ।” यद्यपि रामकीर्ति की मूलकथा रामायण की मुख्य कथा से पूरा मेल खाती है, तथापि विस्तार में वह मूलकथा से एकदम भिन्न है । रामकीर्ति में भी राम को नारायण का अवतार माना गया है, अन्य अनेक पात्रों के नामों में भेद है । उसके प्राक्कथन के अनुसार थाईलैंड में रामायण भिन्न-भिन्न देशों एवं भिन्न-भिन्न मार्गों से आयी हुई प्रतीत होती है । इसी लिए उसमें अनेक अंशों में भिन्नता पायी जाती है । यहाँ ध्यान देने योग्य यह है कि जब भारत से दूर-दूर प्रदेशों में पहुँची हुई रामकथाओं का आधार वाल्मीकिरामायण है तब भारत में ही विकसित जैनरामकथा का आधार वाल्मीकिरामायण को छोड़कर अन्य क्या हो सकता है ? आधुनिक वैज्ञानिकों का भी इसी भाव से मेल खाता है । समान ज्ञान या समान कला कृतियों का विभिन्न देशों में स्वतन्त्ररूप से विकास मानने की अपेक्षा एक देश से किसी सूत्र द्वारा उसका अन्यत्र पहुँचना ही संभव और उचित माना जाता है; अतः रामकथा का भी स्वतन्त्ररूप से सर्वत्र विकास मानना तर्कशून्य ही है । ऐसी स्थिति में वेद, उपनिषद्, वाल्मीकिरामायण आदि ही उसके विकास के भी स्रोत हैं । अतएव मूल के अविरुद्ध कल्पनाएँ क्षम्य हो सकती हैं, पर सिद्धान्त एवं आदर्शविरुद्ध कल्पनाएँ सर्वथा अक्षम्य ही हैं । तुलसीदास के “राम अनंत अनंत गुन अमित”’ ( रा० मा० १।३३ ) के अनुसार रामकथा के सम्बन्ध में मनमानी या अराजकता का समर्थन नहीं किया जा सकता । उनका तात्पर्य तो वेद, वाल्मीकिरामायण एवं अध्यात्मरामायण आदि के अविरुद्ध ही रामकथाओं के समन्वय में है । जैन कथाओं में राम को ईश्वर न मानकर मनुष्य माना गया है; पर उसका जोरदार शब्दों में श्री- तुलसीदासजी खण्डन करते हैं । “रामु मनुज कस रे सठ बंगा । धन्वी कामु नदी पुनि गंगा ॥” (रा० मा० ६।२५।३) रे शठ अड़वङ्ग रावण, क्या राम मनुष्य हैं ? क्या काम कोई साधारण धन्वी है ? क्या गङ्गा कोई नदी है ? अब कहिये क्या तुलसीदास की इन बातों को लेखक मानेंगे । श्रीराम परमात्मा या परमेश्वर नहीं हैं, वे एक महापुरुष मनुष्य हैं—ऐसा माननेवाले के प्रति तुलसीदासजी की भर्त्सना सुनिये— “तुम्ह जो कहा राम कोउ आना । जेहि श्रुति गाव धरहिं मुनि ध्याना ॥” (रा० मा० १।११३।४) “कहहिं सुनहिं अस अधम नर, ग्रसे जे मोह पिसाच । पाखंडी हरिपद बिमुख, जानहिं झूठ न साच ॥” ( रा० मा० १।११४ ) “अज्ञ अकोविद अंध अभागी । काई विषय मुकुर मन लागी ॥ लंपट कपटी कुटिल बिसेषी । सपनेहुँ संतसभा नहिं देखी ॥ कहहिं ते वेद असंमत बानी । जिन्हके सूझ लाभ नहिं हानी ॥ मुकुर मलिन पुनि नयन बिहीना । रामरूप देखहिं किमि दीना ॥ बातुल भूत बिबश मतवारे । ते नहिं बोलहिं बचन बिचारे ॥ जिन्ह कृत महामोह मद पाना । तिन्हकर कहा करिअ नहिं काना ॥” ( रा० मा० १।११४।१-४)