रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
१५६ रामायणमीमांसा पञ्चम "प्राप्तचारित्रसन्देहा मम प्रतिमुखे स्थिता । दीपो नेत्रातुरस्येव प्रतिकूलासि मे दृढा ॥ कः पुमांस्तु कुले जातः स्त्रियं परगृहोुषिताम् । तेजस्वी पुनरादद्यात् सुहृल्लोभेन चेतसा ॥ रावणाङ्कपरिक्लिष्टां दृष्टां दुष्टेन चक्षुषा । कथं त्वां पुनरादद्यां कुलं व्यपदिशन्महत् ॥ नहि त्वां रावणो दृष्ट्वा दिव्यरूपणां मनोरमाम् । मर्षयत्यचिरं सीते स्वगृहे पर्यवस्थिताम् ॥” (वा० रा० ६।११६।१७-२४) उक्त वचनों से श्रीसीता के चरित्र के सम्बन्ध में सन्देह प्रकट किया गया है। सर्वत्र ही सन्देह शुद्धि की भूमिका होती है । श्रीराम के ही वचनों द्वारा यह स्पष्ट है कि सीता के प्रति उनको कोई सन्देह नहीं था । केवल संसार को विश्वस्त करने की दृष्टि से ही उन्होंने सीता को अग्निपरीक्षा के लिए अवसर दिया था । सीता के प्रति कुछ अन्य लोगों को भी सन्देह हो सकता था, पर सन्देह भिन्न वस्तु है, मत या धारणा अन्य वस्तु है । ईश्वर नहीं है, धर्म नहीं है, वेदप्रामाण्य नहीं है, यह मत नास्तिकता का है । सीता दुश्चरित्रा थी यह मत भी नास्तिकता का है । रामराज्य में वैसा होना असम्भव था, ईश्वर है या नहीं, धर्म है या नहीं, वेदप्रामाण्य है या नहीं, सीता का लङ्का में शीलरक्षण कैसे सम्भव हुआ ? यह शङ्का का स्वरूप है। शङ्का से ही जिज्ञासा, विचार, प्रमाण, पर्येषण, तत्त्वज्ञान एवं संशय- निवृत्ति होती है । पूर्वोत्तरमीमांसा, खण्डनखण्डखाद्य, न्यायकुसुमाञ्जलि आदि ग्रन्थों में उसी रीति से तत्त्वनिर्णय किया गया है । 'को हि वेद यद्यमुष्मिँल्लोके अस्ति वा न वा' कौन जानता है परलोक में कुछ है या नहीं, 'वयं ब्राह्मणाः स्मो वा न वा' हम लोग ब्राह्मण हैं या नहीं । इस प्रकार की शङ्काएँ अर्थवादरूप में यज्ञ-मण्डप में अतीकाश ( वातायन ) रखने के लिए और प्रवरानुमन्त्रणा के लिए की गयी हैं। वस्तुतः परलोक में संशय हो तो यज्ञादि में प्रवृत्ति तथा ब्राह्मणत्व में संशय होने से ब्राह्मणत्वादिमूलक कर्मों में प्रवृत्ति नहीं बन सकेगी। निष्कर्ष यह है कि वाल्मीकिरामायण आदि में लङ्का में रहने के कारण सीता के शील में शङ्का व्यक्त की गयी है। वह भी शुद्धि की भूमिका के रूप में । परन्तु तेरापन्थी तुलसी की अग्निपरीक्षा में कैसा भौंडा लोक-मत वर्णित किया गया है। इसके अतिरिक्त अतीत घटनाओं के सम्बन्ध में प्रत्यक्ष या अनुमान की प्रवृत्ति नहीं होती । उनमें तो किसी सर्वज्ञ या योगज ऋतम्भरा प्रज्ञावाला परम आप्त ही प्रमाण हो सकता है, न कि कोई दूरस्थ तुकबन्दी करनेवाला । पूर्वोक्त कथनानुसार महर्षि वाल्मीकि ने योगजबल से जैसा दर्शन किया । उसके विपरीत किसी अन्य को कुछ भी कल्पना करने का किञ्चित् भी अधिकार नहीं है । अतः जिन दुराचारिणी या पतिता आदि शब्दों के प्रयोग में कोई प्रमाण नहीं है, उनका प्रयोग सर्वथा अनुचित ही है । माँ के लिए पिता द्वारा या विरोधी द्वारा दी गयी गालियों का पुत्र द्वारा अनुवाद भी पातक- जनक अत्यन्त ही अनुचित व्यवहार है । वैदिक आदर्शों के अनुसार ही वाल्मीकिरामायण में सीता के सामने आते ही राम ने वे शङ्काएँ व्यक्त की थीं जैसे कि कोई भी वैदिक पुरुष परगृहोषिता अपनी पत्नी के विषय में कर सकता था । श्रीसीता ने तत्काल ही अग्नि-प्रवेश कर अपने परम पवित्र चरित्र को प्रमाणित किया। ठीक इसके विपरीत तेरापन्थी तुलसी के जैन राम श्रीसीता के मिलने पर कुछ भी शङ्का नहीं करते। वे तो अयोध्या में राजगद्दी पर बैठने के बहुत दिनों बाद सीता के अन्तर्वत्नी होने के पश्चात् जनापवाद के द्वारा सीता को वनवास देने को प्रस्तुत होते हैं। जनापवाद भी वाल्मीकि के अनुसार बहुत मर्यादितरूप में आता है । सीता रावण द्वारा बलात् लङ्का ले जायी गयी । राक्षसों के पराधीन
अध्याय जैनमत में रामकथा १५७ अशोकवाटिका में रखी गयी । यदि राम ने ऐसी धर्षणा को सहन कर लिया तो अन्य लोगों के लिए भी वैसा सह्य हो सकेगा। पुरवासियों को लङ्का की अग्निपरीक्षा का ज्ञान नहीं था। राम चाहते तो उसी का प्रचार कराकर जन- भ्रम दूर कर सकते थे। पर वैसा करना एक सरकारी प्रचार ( प्रोपेगण्डा ) समझा जाता । सीता की शुद्धि का उल्लेख अब्भक्ष, वायुभक्ष, कन्दमूलफलाशी, वल्कलवसनधारी, परमाप्त, राज्यनिरपेक्ष स्वतन्त्र महर्षि के द्वारा होने में ही महत्त्व है। इसी दृष्टि से महर्षियों के आश्रमों के सन्निधान में सीता को छोड़ा गया । श्रीराम के इस कार्य से नीति में बहुमत का ही नहीं अल्पमत का भी आदर हुआ है । “सर्वजनसुखाय सर्वजनहिताय ।” भाई-भतीजावाद का अत्यन्त उन्मूलन हुआ है । श्रीराम ने एक हजार वर्ष अखण्ड ब्रह्मचर्यव्रत पालन- पूर्वक ब्रह्मात्मनिष्ठा के द्वारा परमार्थ तथा तपोवन में भावी सम्राट् के संस्कार, विद्या, शिक्षा-दीक्षा की व्यवस्था कर परमार्थ और स्वार्थ का समन्वय किया है । “नीति प्रीति परमारथ स्वारथ । कोउ न राम सम जान जथारथ ॥” ( रा० मा० २।२५३।३ ) श्रीराम ने एक पत्नीव्रत के अनुसार सीता के वनवास के पश्चात् भी अन्य पत्नी का वरण नहीं किया । यज्ञों में काञ्चनी सीता को ही रखा जाता था । “काञ्चनीं मम पत्नीं च दीक्षायां ज्ञांश्च कर्मणि । अग्रतो भरतः कृत्वा गच्छत्वग्रे महायशाः ॥” ( वा० रा० ७।९१।२५ ) यहाँ श्रीराम ने आदेश दिया है कि महायशस्वी भरत मेरी दीक्षानिमित्ता काञ्चनी पत्नी और कर्म के विषय में विज्ञ महर्षियों को लेकर आगे चलें । यहाँ यह भी विचार है, यह समझना चाहिए कि यज्ञों में पति और पत्नी दोनों का सहाधिकार होता है, अतः पति-पत्नी दोनों ही यजमान होते हैं । “स्वामिनोऽग्नेर्देवतायाश्चशब्दात् कर्मणश्च प्रतिनिधिर्निवृत्तः ।” इस आपस्तम्ब सूत्र के अनुसार स्वामी, अग्नि तथा देवता का प्रतिनिधि नहीं होता । ऐसी स्थिति में मुख्य पत्नी ही यज्ञ में अपेक्षित होती है । काञ्चनी प्रतिमा सीता का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकती । तथापि वचनान्तरों के अनुरोध से कई परिस्थितियों में पत्नी का प्रतिनिधि मान्य है । “यस्य भार्यान्यदेशस्था नेष्यते पतिनाथवा । अशक्ता प्रतिकूला वा तस्याः प्रतिनिधिक्रिया ॥” जिसकी भार्या अन्य देश में हो या पति को इष्ट न हो, असमर्थ या प्रतिकूल हो वहाँ पत्नी का प्रतिनिधि मान्य है। “अन्ये कुशमयीं पत्नीं कृत्वा तु गृहमेधिनः । अग्निहोत्रमुपासन्ते यावज्जीवमनुव्रताः ॥ सौवर्णीं वा षोडशपलैः माषकैः षोडशैरपि ।”
१५८ रामायणमीमांसा पञ्चम “मृतायामपि भार्यायां वैदिकीं न त्यजेद् द्विजः । उपाधिनापि तत्कर्म यावज्जीवं समापयेत् ॥” ( विष्णु स्मृ० ) इत्यादि वचनों के अनुसार कुशमयी, सौवर्णी या षोडशमाषमयी पत्नी प्रतिनिधि के रूप में धर्मशास्त्र- सम्मत है । विशेषतः प्रकृत में तो श्रीराम की सौवर्णी पत्नी प्रतिनिधि नहीं है किन्तु देवता प्रतिमाओं के समान उसमें सीताबुद्धि ही थी, सादृश्यबुद्धि नहीं । भगवान् के संकल्प से और ऋषियों के आवाहनसामर्थ्य से उसमें ठीक सीताबुद्धि का ही उदय हुआ था। और उसके द्वारा पूर्णरूप से आज्यावेक्षण आदि पत्नीकर्म की निष्पत्ति होती थी । यही बात अन्य सर्गों में उक्त है । श्रीराम ने सीता से व्यतिरिक्त भार्या का वरण नहीं किया । प्रत्येक यज्ञ में पत्नी का कार्य करने के लिए काञ्चनी जानकी ही राम की पत्नी होती थी। उसी काञ्चनी सीता के द्वारा श्रीराम दस सहस्र वर्ष पर्यन्त वाजि- मेध, वाजपेय, अग्निष्टोम, अतिरात्र आदि बहु सुवर्णादि दक्षिणावाले महाधनसमृद्ध यज्ञों का अनुष्ठान करते रहे । “न सीतायाः परां भार्या वव्रे स रघुनन्दनः । यज्ञे यज्ञे च पत्न्यर्थं जानकी काञ्चनी भवत् ॥ दशवर्षसहस्राणि वाजिमेधानथाकरोत् ॥” ( वा० रा० ७।९९।७-८ ) लोकवाद से भी राम को सीता के प्रति भ्रान्ति नहीं हुई । वे सर्वथा ही सीता को पवित्र मानते रहे हैं। लङ्का में अग्निपरीक्षा के प्रसङ्ग में श्रीराम ने कहा था कि रावण के अन्तःपुर में दीर्घ काल तक सीता रही थी, अतः सीता की अग्निशुद्धिरूप पवित्रता अपेक्षित थी । बिना शोधन किये सीता का ग्रहण करने में दशरथात्मज राम कामात्मा एवं बालिश हैं, यह साधारण लोग कह सकते थे । अतः अग्निशुद्धि के लिए सीता के अग्नि-प्रवेश की मैंने अनुमति दी थी । सीता अनन्यहृदया हैं, मेरे में ही नित्य स्थिर होने के कारण वह अपने शील की रक्षा कर सकती है, ऐसा मैं जानता हूँ । अपने तेज से ही सीता पूर्ण परिरक्षित है । सीता जैसे अग्नि को शीतल कर सकती है वैसे ही रावण को भस्म भी कर सकती थी । तभी तो सीता ने कहा था, राम का आदेश न होने एवं तपस्या-रक्षा की दृष्टि से दशग्रीव, मैं तुझे अपने तेज से भस्म नहीं करती हूँ— “असंदेशात्तु रामस्य तपसश्चानुपालनात् । न त्वां कुर्मि दशग्रीव भस्म भस्मार्हतेजसा ॥” ( वा० रा० ५।२२।२० ) महोदधि जैसे बेला का अतिक्रमण नहीं कर सकता वैसे ही रावण सीता के तेज का अतिक्रमण नहीं कर सकता था । दुष्टात्मा रावण अप्राप्य दीप्त अग्निशिखा के समान मैथिली का मन से भी प्रधर्षण नहीं कर सकता था। रावण के अन्तःपुर में रहकर भी वह वैक्लव्य कातर्य को नहीं प्राप्त हो सकती थी । भास्कर की प्रभा के समान सीता मुझसे अभिन्न है । सीता तीनों लोकों में विशुद्ध है । आत्मवान् जैसे कीर्ति से रहित नहीं हो सकता वैसे मैं सीता से वियुक्त नहीं हो सकता— “अवश्यं चापि लोकेषु सीता पावनमर्हति । दीर्घकालोषिता हीयं रावणान्तःपुरे शुभा ॥ बालिशो बत कामात्मा रामो दशरथात्मजः । इति वक्ष्यति मां लोको जानकीमविशोध्य हि ॥ अनन्यहृदयां सीतां मच्चित्तपरिरक्षिणीम् । अहमप्यवगच्छामि मैथिलीं जनकात्मजाम् ॥
अध्याय जैनमत में रामकथा १५९ इमामपि विशालाक्षीं रक्षितां स्वेन तेजसा । रावणो नातिवर्तेत वेलामिव महोदधिः ॥ न च शक्तः सुदुष्टात्मा मनसापि हि मैथिलीम् । प्रधर्षयितुमप्राप्यां दीप्तमग्निशिखामिव ।। नेयमर्हति वैक्लव्यं रावणान्तःपुरे सती । अनन्या हि मया सीता भास्करस्य प्रभा यथा ॥ विशुद्धा त्रिषु लोकेषु मैथिली जनकात्मजा । न विहातुं मया शक्या कीर्तिरात्मवता यथा ।।” ( वा० रा० ६।१२०।१३-१९ ) “प्रत्ययश्च पुरा वृत्तो वैदेह्याः सुरसन्निधौ । शपथश्च कृतस्तत्र तेन वेश्म प्रवेशिता ॥ लोकापवादो बलवान् येन त्यक्ता हि मैथिली । सेयं लोकभयाद् ब्रह्मन्नपापेत्यभिजानता ॥ परित्यक्ता मया सीता तद्भवान् क्षन्तुमर्हति ।” ( वा० रा० ७।९७।३,४ ) श्रीराम ने वाल्मीकि से कहा कि पहले ही लङ्का में देवताओं के सन्निधान में सीता का शपथ हो चुका है । तभी सीता राजभवन में प्रविष्ट हुई थी । फिर भी लोकापवाद के कारण, सीता निष्पाप है, यह समझते हुए भी, सीता का वन में त्याग किया गया है । आप क्षमा करें । रामायण से ही यह भी सिद्ध है कि रावण सीता के तेज का अतिक्रमण नहीं कर सकता था । उसे इस सम्बन्ध में अनेक प्रकार के शाप दिये गये थे कि यदि इतः परं किसी अकामा स्त्री का कामभाव से स्पर्श करेगा तो तत्क्षण भस्म हो जायगा । रावण ने कुबेर-पुत्र नलकूवर की निमन्त्रिता पत्नी रम्भा का बलात् घर्षण किया था । तभी नलकूवर ने शाप दिया था कि यदि किसी भी अकामा स्त्री को कामार्त होकर धर्षित करेगा तो उसी क्षण उसका मस्तक सप्तधा विशीर्ण हो जायगा— “उत्ससर्ज तदा शापं राक्षसेन्द्राय दारुणम् । तस्मात्स युवतीमन्यां नाकामामुपयास्यति ।। यदा ह्यकामां कामार्तो धर्षयिष्यति योषितम् । मूर्धा तु सप्तधा तस्य शकलीभविता तदा ॥ श्रुत्वा तु स दशग्रीवस्तं शापं रोमहर्षणम् । नारीषु मैथुनीभावं नाकामास्वभ्यरोचयत् ।।” (वा० रा० ७।२६।५५-५९) रावण ने भी कहा है एक बार पुञ्जिकस्थला अप्सरा पितामह के भवन जा रही थी । तब मैंने बलात् सम्भोग किया था । इसपर ब्रह्मा ने शाप दिया था कि आज से तुम यदि बलात् अन्य नारी का भोग करोगे तो तुम्हारे मूर्धा के सौ टुकड़े हो जायेंगे— “अद्यप्रभृति यामन्यां बलान्नारीं गमिष्यसि । तदा ते शतधा मूर्धा फलिष्यति न संशयः ॥
१६० रामायणमीमांसा पञ्चम इत्यहं तस्य शापस्य भीतः प्रसभमेव तां । नारोहये बलात् सीतां वैदेहीं शयने शुभे ॥” ( वा० रा० ६।१३।१४,१५ ) वैदिक रामकथा और अग्निपरीक्षा तेरापन्थी जैन आचार्य तुलसी की अग्निपरीक्षा नामक पुस्तक पर लगे प्रतिबन्ध को हटवाने हेतु जबलपुर उच्चन्यायालय में उपस्थापित याचिका में अनेक तर्क दिये गये हैं। किन्तु उनमें से एक भी तर्क ऐसा नहीं है जिससे यह सिद्ध हो सके कि जैन रामकथा वैदिक रामकथा के बाद की नहीं है और उसे अपने मत के लोकप्रचार के लिए रूपान्तरित नहीं किया गया है। उच्चन्यायालय में दायर अर्जी में यह स्वीकार किया गया है कि जैन रामकथा का सबसे प्राचीन ग्रन्थ विमलसूरि द्वारा प्राकृत में रचित पउमचरियं है। इसका रचनाकाल महावीर के स्वर्गवास के बाद ५३० वाँ वर्ष है। जो लगभग ईसवी सन् का आरम्भ काल है। स्वयं वादी ने भी इसे विक्रम संवत् ६० की कृति कहा है। वैदिक रामकथा का प्राचीनतम ग्रन्थ महर्षि वाल्मीकि रचित रामायण है। जिसे आधुनिक इतिहासकारों ने भी ईसा पूर्व छठी शती की रचना माना है। वैसे सत्य तो यह है कि यह राम की समकालीन कृति है और अत्यन्त प्राचीन है। यह कहा जा चुका है कि यह काव्य संस्कृत भाषा में है। इसका नाम पौलस्त्यवध और रामचरित है। किन्तु इसका प्रतिपाद्य सीताचरित ही है वाल्मीकिरामायण के ही— “काव्यं रामायणं कृत्स्नं सीतायाश्चरितं महत् । पौलस्त्यवधमित्येवं चकार चरितव्रतः ॥” ( वा० रा० १।४।७ ) इस पद्य से यह तथ्य स्पष्ट है। यह इसलिए भी मान्य है कि रामायण का निर्माण निर्वासित सीता के वाल्मीकि आश्रम पहुँचने के पश्चात् आरम्भ होता है और सीता के करुण क्रन्दन से जनित महर्षि का शोक ही क्रौञ्ची के करुण क्रन्दन से अधिक बढ़ जाता है और वही उच्छलित होकर निम्नलिखित श्लोक के रूप में प्रकट होता है— “मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः । यत्क्रौञ्चमथुनादेकमवधीः काममोहितम् ॥” स्वयं रामायण में कहा गया है— “शोकः श्लोकत्वमागतः ।” ( वा० रा० १।२।४० ) शोक ही श्लोक बन गया यह प्रक्षिप्त नहीं है, क्योंकि कालिदास और आनन्दवर्धन ने इस वाक्य को इसी रूप में अपनाया और उद्धृत किया है— “निषादविद्धाण्डजदर्शनोत्थः श्लोकत्वमापद्यत यस्य शोकः ।” ( रघु० १४।७० ) शोकः श्लोकत्वमागतः । ( ध्वन्यालोक ४।५ ) इस प्रकार भगवती सीता के विषय में भी यही रामायण भारतीय साहित्य का आदि स्रोत है। इसी दृष्टि से कालिदास ने इसे ‘कविप्रथमपद्धति’ बतलाया है। रघुवंश १५।३३ में इसे वेदों के साथ अध्येय बतलाया है। वाल्मीकीय रामायण की कथा और घटनाओं को वास्तविक और सब प्रकार से सत्य इतिहास भी स्वीकार किया गया है। ऋतम्भरा प्रज्ञा द्वारा प्रत्येक घटना का साक्षात्कार कर ही वाल्मीकि ने इसे लिखा है। इसलिए नैमिषारण्य में रामाश्वमेध के समय उपस्थित अयोध्या की जनता में रामायण का गान होने पर उसके अयोध्याकाण्ड की प्रत्येक घटना को प्रत्येक अयोध्यावासी ने सर्वथा यथार्थ माना है।
अध्याय वैदिक रामकथा और अग्निपरीक्षा १६१ “साङ्गं च वेदमध्याप्य किञ्चिदुत्क्रान्तशैशवौ । स्वकृतिं गापयामास कविप्रथमपद्धतिम् ॥” यही कारण है कि परवर्ती सभी वैदिक रामकथाएँ उस रामायण के अनुरूप रहने पर ही प्रामाणिक मानी जाती हैं । जहाँ कहीं आंशिक अन्तर उपस्थित हुआ है वहाँ उस अंश में इसी रामायण को प्रमाण माना गया है । महाभारत से लेकर पद्मपुराण तक रामकथा के विषय में इसी रामायण को मूलमन्त्र माना गया है और उनकी भिन्न योजनाओं की इसके अनुरूप ही व्याख्या की गयी है (नीलकण्ठ) । इस रामायण (वाल्मीकि) में राम को ईश्वर और महासती सीता को उनकी महाशक्ति स्वीकार किया गया है । युद्धकाण्ड की ब्रह्मा-स्तुति (सर्ग १२०) इसका स्पष्ट प्रमाण है । इसी आधार पर सनातन स्थान सर्वातिशायी है । जैन-परम्परा इन दोनों तथ्यों को स्वीकार नहीं करती । उसमें न ईश्वर का अस्तित्व स्वीकार किया जाता है और न यज्ञों पर ही कोई आस्था रखी जाती है । वे वेदों को प्रमाण नहीं मानते । वाल्मीकिरामायण में इन दोनों तथ्यों की प्रतिष्ठा देख उसकी कथा को जैन-सम्प्रदाय ने अपने अनुरूप गढ़ा और एक नवीन झूठी रामकथा को जन्म दिया । बौद्धों ने भी ऐसा ही किया । इस परिवर्तन को तबतक सहा जा सकता था जबतक इसमें अधिक्षेप और अपमान की भाषा का उपयोग नहीं हुआ था । किन्तु जब यह परिवर्तन इस निम्नस्तर पर जा पहुँचा तो सनातनधर्मवलम्बियों की भावनाओं को ठेस पहुँची । अग्निपरीक्षा इसका प्रमाण है । इसमें राम और सीता को जिस स्तर का बतलाया गया है वह उनका अपमान ही है । सीता को तो बाद में महासती बतलाया भी गया किन्तु राम को उनकी सनातनोचित प्रतिष्ठा इस ग्रन्थ में प्रदान नहीं की गयी । सीता को भी जिन शब्दों से सम्बोधित किया गया है वे शब्द पूर्वपक्ष के रूप में भी ग्राह्य और प्रयोगयोग्य नहीं हैं । प्राचीन जैनपुराणों ने भी ऐसा नहीं किया है। इस ग्रन्थ में राम और सीता को णमुक्कार मन्त्र का जप करते हुए जैनधर्म में दीक्षित बतलाया गया है। यह वैसा ही है जैसा महावीरस्वामी को वाममार्ग में दीक्षित बतलाया जाय या मुहम्मदसाहब को वैदिक धर्म में । निश्चित ही राम की महती प्रतिष्ठा का उपयोग जैन-सम्प्रदाय ने अपने पक्ष में करना चाहा है, किन्तु तेरापन्थी आचार्य तुलसी ने उससे आगे बढ़कर पूर्वपक्ष के रूप में राम और सीता की प्रतिष्ठा को सांकेतिक ढङ्ग से उसी प्रकार नीचे गिराना चाहा है जिस प्रकार रावणपन्थी कुछ कर रहे हैं । राम पर बहुपत्नीत्वाक्षेप सर्वथा निराधार आदि कवि महर्षि वाल्मीकि की रामायण ही श्रीराम-चरित्र के सम्बन्ध में परम प्रमाण है । भगवान् वेदव्यास द्वारा पुराणों में तथा अन्यान्य रामायण, आनन्दादि अन्य रामायणों तथा सम्प्रदायान्तर अथवा देशान्तर में प्राप्त राम-कथाओं को तथा हिन्दी में रचित रामायण और रामचरितमानस आदि ग्रन्थों को मूल आधार के रूप में वाल्मीकिरामायण का ही आश्रयण करना पड़ता है । जैनमुनि की अग्निपरीक्षा पुस्तक को देखने में पहले यह सन्देह होता था कि जैनमुनि ने उक्त पुस्तक में जगज्जननी सीता के लिए जिन अपशब्दों का प्रयोग किया है वे सब पूर्वपक्ष के विन्यासरूप हों आगे उनका उत्तर द्वारा खण्डन ही इष्ट हो । कानून में भी सन्देह का लाभ अभियुक्त को देना उचित है, अभियोक्ता को नहीं । इसी कारण जैन आचार्य तुलसी श्रीसीता के चरित्र के प्रति श्रद्धा और भक्ति से प्रेरित हो ऐसे दुर्वचनों का प्रयोग केवल उनके निराकरणार्थ ही करते हों ऐसा सन्देह हो सकता था और उसका लाभ उनको दिया जाना चाहिये था । किन्तु जब उनके आगे के प्रयास को देखा जिसमें उन्होंने अपनी स्थिति की पुष्टि के लिए वाल्मीकि- रामायण के आधार पर मर्यादापुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम को बहुपत्नीसम्पन्न अथवा परस्त्रीरमण करनेवाला सिद्ध करने
१६२ रामायणमीमांसा पञ्चम
का दुष्प्रयत्न किया तो उनकी स्थिति सन्दिग्ध नहीं रही । उनके कुत्सित प्रयास से कम से कम इतना स्पष्ट हो गया कि इनमें वैदिक हिन्दू-धर्म के सर्वस्वरूप भगवान् राम और अखिललोकजननी सीताजी के प्रति हार्दिक श्रद्धा और भक्ति का भाव नहीं है । केवल अपने मत के प्रचारार्थ वे हिन्दू देवी-देवताओं तथा भगवदवतारों में दोष दिखाने और छिद्रान्वेषण करने एवं उनके प्रदर्शन में प्रयत्नशील हैं । यद्यपि उनकी यह भावना केवल दुराशामात्र है, यह आगे दिखाया जायगा, किन्तु इतने मात्र से उनकी स्थिति स्पष्ट हो गयी । अतः आस्तिक, धार्मिक तथा रामभक्त जनता को इस सम्बन्ध में सन्देह में नहीं रहना चाहिये । वाल्मीकीय रामायण में एक बात डिण्डिमघोष से स्पष्ट है और वह है राम का अखण्ड एकपत्नीव्रत । “न सीतायाः परां भार्यां वव्रे स रघुनन्दनः । यज्ञे यज्ञे च पत्न्यर्थं जानकी काञ्चनी भवत् ॥ दश वर्षसहस्राणि वाजिमेधानथाकरोत् ॥” ( वा० रा० ७।९९।७, ८ ) यह निषेध-वचन सभी सामान्य वचनों से बलवान् है, इस कारण दूसरे सामान्य वचनों का समन्वय इसी के अनुसार करना होगा । सीता के अतिरिक्त श्रीरघुनन्दन ने किसी दूसरी भार्या का वरण नहीं किया । दस सहस्र वर्षों तक राम ने अश्वमेधादि यज्ञ किये और सभी यज्ञों में जानकी की स्वर्ण-प्रतिकृति ही पत्नी के स्थान में रहती रही । जैन आचार्य तुलसी के द्वारा प्रस्तुत— “हृष्टाः खलु भविष्यन्ति रामस्य परमाः स्त्रियः । अपहृष्टा भविष्यन्ति स्नुषास्ते भरतक्षये ॥” ( वा० रा० २।८।१२ ) राम की परम स्त्रियाँ ( परिचारिकाएँ ) प्रसन्न होंगी और भरत का प्रभाव नष्ट होने पर तुम्हारी पुत्रवधुएँ दुःखी होंगी । यह वचन मन्थरा ने कैकेयी से कहा है । यहाँ ‘परमाः स्त्रियः’ का अर्थ राम की पत्नियाँ नहीं, राम और सीता की उत्तम परिचारिकाएँ हैं । इसी अर्थ में रामाभिरामी टीकाकार श्रीनागेश भट्ट ने इम शब्द का अर्थ किया है ‘स्त्रियः इति बहुवचनेन सीदासख्य इत्यर्थः’ । आगे चलकर उत्तरकाण्ड ४२ वें सर्ग के दो श्लोक ( २२ और २३ ) दिये गये हैं— “उपानृत्यन्त काकुत्स्थं नृत्यगीतविशारदाः । मनोभिरामा रामास्ता रामो रमयतां वरः ॥ रमयामास धर्मात्मा नित्यं परमभूषिताः । स तया सीतया सार्धमासोनो विरराज ह ॥” ककुत्स्थनन्दन श्रीराम के समक्ष नृत्यगीत में निपुण दिव्य नर्तकियों ने नृत्य किया । प्रसन्न करनेवालों में सर्वश्रेष्ठ धर्मात्मा राम परम भूषित उन नर्तकियों को वस्त्र, भूषण आदि पुरस्कार से नित्य सन्तुष्ट करते थे । यहाँ राम श्रीसीताजी के साथ सिंहासन पर विराजते थे । यहाँ राम सीता के सान्निध्य में नर्तकियों के दिव्य नृत्य देखने और राम द्वारा भूषणाच्छादन प्रदान से उनको सन्तुष्ट करने का वर्णन है । जैन आचार्य तुलसी का रमयामास शब्द द्वारा पापभावना सिद्ध करने का दुष्प्रयास- मात्र है, क्योंकि उसी के साथ जुड़ा हुआ शब्द है धर्मात्मा । इसी लिए श्रीनागेशभट्ट ने भी यहाँ ‘रमयामास’ का अर्थ तोषयामास किया है । इसी प्रसंग में विशेष ध्यान देने योग्य अव्यवहित आगे का वाक्य है जिसमें राम को सीताजी के साथ राजासन पर आसीन कहा गया है । अतः ऐसे प्रसंग में ‘रमयामास’ शब्द की कोई पाप-कल्पना सर्वथा असम्भव और असंगत है । फिर क्रीडार्थक ‘रम’ धातु को ‘यभ’ समानार्थक समझना कामुकी मनोवृत्ति का ही द्योतक है ।
अध्याय बौद्ध जातकसाहित्य की रामकथाओं पर विचार १६३ अनेक के साथ एक समय वैसा करना साहित्य के ही नहीं अपितु कामशास्त्र के भी विरुद्ध है। अनेकों की उपस्थिति में लज्जा स्वाभाविक है। जो कामोत्पत्ति की बाधिका है। अतः रमयामास का हमारा अर्थ ही ठीक है। तुलसी की कल्पना में कोई दम नहीं है और इसी के साथ दूसरा पद है— "अरुन्धत्या इवासीनो वसिष्ठ इव तेजसा।" ( वा० रा० ७।४२।२४ ) यहाँ परम पवित्र तेजस्वी दम्पती वसिष्ठ और अरुन्धती को चरित्र के पवित्रतार्थ ही उपमान रूप में प्रस्तुत किया गया है। राम भूल से भी परस्त्री का चिन्तन नहीं करते इसे भी 'कच्चिन्न परदारान् वा राजपुत्रोऽभिमन्यते।' इत्यादि वचन स्पष्ट सिद्ध करते हैं और इसी कारण आनन्दरामायण विलास-काण्ड सर्ग ७ में राम की दिव्य घोषणा है— "अन्यत्सीतां विनाऽन्या स्त्री कौशल्यासदृशी मम । न क्रियते परा पत्नी मनसाऽपि न चिन्तये ॥" सीता के अतिरिक्त दूसरी स्त्री मेरे लिए माता कौशल्या के समान है—अन्य पत्नी करना तो दूर रहा मैं मन से भी ऐसा चिन्तन नहीं करता। ऐसे दिव्य वचनों के समक्ष राम पर बहुपत्नीपरिग्रह अथवा परस्त्री-रमण सर्वथा असम्भव ही नहीं है अपितु ऐसा मिथ्या आरोप करना अवश्य अपराध और घोर पाप है। यहाँ एक वचन और भी जो आचार्य तुलसी ने नहीं दिया, किन्तु कोई दूसरा सन्देह उत्पादक भाषा में दे सकता है, वह दिया जा रहा है— "मणिकाञ्चनकेयूरमुक्ताप्रवरभूषणैः । भुजैः परमनारीणामभिमृष्टमनेकधा ॥" ( वा० रा० ६।२।१३ ) श्रीराम का दिव्य अङ्ग अनेक बार मणि और सुवर्ण से भूषित परमनारियों की भुजाओं से परामृष्ट अर्थात् स्पर्श किया जाता था यहाँ भी श्रीनागेशभट्ट ने स्पष्ट कर दिया है। परमनारीणामेकदारव्रतत्वेनेतरस्त्रीप्रसंगाभावादुत्तमधात्रीजनानां भुजैरनेकधा स्नपनालङ्करणादिकालेऽभिमृष्टं स्पृष्टम् ।। अर्थात् 'परमनारी' का अर्थ एकपत्नीव्रत होने से परस्त्री के प्रसंग के अभाव में श्रीराम की उत्तम धात्रियाँ ही समझना चाहिये जो श्रीराम को स्नान कराने, आभूषण आदि से अलङ्कृत करने के समय अपनी दिव्य तथा अलङ्कृत भुजाओं से उनके शरीर का अनेक प्रकार से स्पर्श करती थीं। अतः एक बात स्पष्ट है कि वाल्मीकिरामायण में श्रीराम मानव मर्यादा के आदर्श हैं और एकपत्नीव्रत के आदर्श का पालन करते हैं— स्वापहेतुरनुपाश्रितोऽन्यया, राम की भुजा भूल कर भी परस्त्री के सिर के नीचे नहीं जा सकती। वैसे तो श्रीराम और सीता के सम्बन्ध में और दिव्य कल्पनाएँ शास्त्रों के आधार पर की जा सकती हैं पर वे सब यहाँ प्रसङ्ग प्राप्त नहीं। यहाँ केवल एकपत्नीव्रत और परपक्ष द्वारा उपस्थापित अंशों के अर्थ का स्पष्टीकरण ही इष्ट है। बौद्ध जातकसाहित्य की रामकथाओं पर विचार श्रीराम इतने अधिक लोकप्रिय थे कि उनकी गाथा पढ़ने और सुनने की इच्छा सबको होती थी ओर होती है। जो लोग बौद्ध या जैन बन जाते हैं। प्राचीन संस्कार वश उन्हें भी रामकथा आकृष्ट करती हैं। परन्तु बेद, उपनिषद्, रामायण आदि की कथाएँ रामचरित के साथ ही वेद-प्रामाण्य, यज्ञ-यागादि तथा ईश्वरवाद के भी संस्कार
पैदा करती हैं। अतः उनसे बचने की दृष्टि से ही बौद्धों एवं जैनों ने अपने ढङ्ग से उन्हें विकृत कर उनका वर्णन किया है। प्राचीनकाल से ही बौद्धों ने रामकथा अपनायी है और इसे जातकसाहित्य में स्थान दिया है। जातक- कथा के अनुसार महात्मा बुद्ध अपने असंख्य पूर्वजन्मों में मनुष्य, पशु आदि रूप में उत्पन्न होते हैं। इन जातकों में दशरथजातक प्रसिद्ध है। यह जातक जिस जातकट्ठवण्णना में पाया जाता है। वह पाँचवीं शताब्दी ई० की एक सिंहलीपुस्तक का पालीअनुवाद है। इसमें जो कथाएँ पायी जाती हैं वे प्राचीन पाली गाथाओं की टीकारूप में लिखी गयी हैं। प्रत्येक जातक में पहले वर्तमान कथा दी जाती है जिसमें यह बतलाया जाता है कि किस अवसर पर बुद्ध ने इसे कहा और उसके बाद अतीत कथा दी जाती है। फिर सामञ्जस्य प्रस्तुत किया जाता है अर्थात् व्यतीत तथा वर्तमान कथा के पात्रों की अभिन्नता कही जाती है। गाथाएँ प्रायः अतीत कथा में ही मिलती हैं। परन्तु कभी वर्तमान कथाओं एवं समोधान (सामञ्जस्य) में भी गाथाएँ होती हैं। इनका अर्थ करने के लिए टीका होती है। यह दशरथजातक जैतवन में किसी गृहस्थ के पिता के मर जाने पर उसके शोकवशीभूत हो कर्तव्य का पालन त्याग देने पर उससे बुद्ध ने कहा था। प्राचीन काल के पौराण पण्डिता (पण्डित लोग) पिता की मृत्यु होने पर किञ्चित् भी शोक नहीं करते थे ! इसके अनन्तर दशरथ के मरने पर राम के धैर्य का उदाहरण देने के लिए बुद्ध ने दशरथजातक सुनाया। डा० वेबर के अनुसार दशरथजातक की रामकथा रामायण का मूल है। डा० याकोबी ने इस पक्ष का खण्डन किया है। डा० वेबर के अनुसार पालिजातकट्ठवण्णना में दशरथजातक विद्यमान है, परन्तु उक्त ग्रन्थ की प्रामाणिकता विचारणीय है। बौद्ध त्रिपिटक (बौद्धधर्म ग्रन्थ) तीसरी शती ई० पू० मगध देश में पाली भाषा में लिखा गया था। इसके द्वितीय पिटक (सुत्तपिटक) के पाँचवे भाग का नाम खुद्दकनिकाय है। इसी खुद्दकनिकाय के अन्तर्गत जातकों की गाथाएँ दी गयी हैं और तीसरी शताब्दी ई० पू० से ही सुरक्षित हैं। इन गाथाओं के साथ-साथ प्रारम्भ से ही गद्य की टीका भी प्रचलित हुई होगी, क्योंकि इसके बिना बहुत सी गाथाएँ अपूर्ण और अबोधगम्य हैं। वर्तमान पाली जातकट्ठवण्णना पाँचवीं शताब्दी ई० की एक सिंहली पुस्तक का अनुवाद है। मूल सिंहली पुस्तक, जिसमें केवल गाथाएँ पाली में दी गयी थीं, आजकल अप्राप्य है। इसके अज्ञात लेखक का कहना है कि मैंने अनुराधपुर की परम्परा के आधार पर अपनी रचना की है। उपर्युक्त परिचय से स्पष्ट हो जाता है कि गाथाओं की अपेक्षा जातकों का गद्य बहुत कम महत्वपूर्ण और प्रामाणिक है। ये कथाएँ पाँचवीं शताब्दी ई० में परम्परा के आधार पर लिपिबद्ध की गयी हैं। शताब्दियों तक अस्थिर रहने के कारण इनमें परिवर्तन और परिवर्द्धन की सम्भावना रही है। इस गद्य को तीसरी शताब्दी ई० पू० की अखण्ड परम्परा मानना और इसके आधार पर रामायण के मूलरूप के सम्बन्ध में किसी सिद्धान्त का प्रतिपादन करना अवैज्ञानिक है। वास्तव में जातकट्ठवण्णना में अनेक स्थलों पर गाथाओं और गद्य में विरोध और असङ्गति दिखलायी पड़ती है।¹ बुल्के के अनुसार ही दशरथजातक में जो कथाएँ मिलती हैं वे रामायणीय कथा की विकृति रूप मानी जानी चाहिये ।² साथ ही इस जातक की गाथाएँ गद्य में ही हैं। प्राचीन गाथाओं से उनका कोई विशेष सम्बन्ध नहीं है। १. रामकथा, पृष्ठ ८२। २. वही।
अध्याय बौद्ध जातकसाहित्य की रामकथाओं पर विचार १६५ जल-क्रिया (गाथा १) “एथ लक्खण सीता च उभो ओतरथोकं । एवायं भरतो आह राजा दशरथ मतो ॥”१॥ लक्ष्मण और सीता दोनों जल में उतरे क्योंकि भरत कहते हैं—राजा दशरथ मर गये । यह पहली गाथा स्पष्टतया रामायण में वर्णित जलक्रिया से सम्बन्ध रखती है। रामायण के निम्नाङ्कित श्लोक प्रस्तुत गाथा से मिलते जुलते हैं । राम लक्ष्मण से कहते हैं— “भरतो दुःखमाचष्टे स्वर्गतिं पृथिवीपतेः । जलक्रियार्थं तातस्य गमिष्यामि महात्मनः ॥ सीता पुरस्ताद् व्रजतु त्वमेनामभितो व्रज । अहं पश्चाद् गमिष्यामि गतिर्ह्येषा सुदारुणा ॥” (वा० रा० २।१०५।१५,२०) पाली जातकट्ठवण्णना में इस गाथा को एक भिन्न अर्थ देने का प्रयत्न किया गया है ।१ गाथा (२-१२) में यह उल्लेख है कि राम से पूछा गया कि हे राम ! शोक का कारण रहते हुए भी आप किस धैर्य के आधार पर शोक नहीं करते ? पिता का देहान्त सुन कर भी आप दुःख के वशीभूत नहीं हैं ? “केन राम प्पभावेन सोचितव्वं न सोचसि । पितरं कालकतं सुत्वा तं पसहते दुखं ॥ (२) राम उत्तर देते हैं “बहुत विलाप करने पर भी जो रखा नहीं जा सकता । उसके लिए बुद्धिमान् शोक नहीं करता ।” जिस तरह पके फलों के गिरने का नित्य भय बना रहता है उसी तरह जन्म लिये हुए मनुष्यों के मरण का भय सदा ही बना रहता है— फलानमिव पक्कानं निच्चं पपतना भयं । एवं जातानं मच्चानं निच्चं मरणतो भयं ॥” इस उपदेश की प्रथम गाथा में राम से उपर्युक्त प्रश्न किया गया है, तदनन्तर अन्य गाथाओं में शोक की व्यर्थता को दर्शानेवाले उपदेश उद्धृत हैं । जातक के गद्य के अनुसार वे राम के वचन कहे जाते हैं । परन्तु इन सम्पूर्ण उपदेशों के अन्तर्गत रामकथाओं का किञ्चित् सङ्केत भी प्राप्त नहीं होता । डा० विंटरनित्स का कहना है कि वाल्मीकिरामायण के उल्लेखानुसार राम अपने पिता के देहान्त का समाचार सुनकर अत्यन्त शोक करते हैं (वा० रा० २।१०३।१ आदि) और भरत को सान्त्वना भी देते हैं (वा० रा० २।१०५।१५-५२), परन्तु जातक के राम किञ्चित् भी शोक नहीं करते, इससे बौद्ध प्रभाव स्पष्ट हो जाता है । उनका अनुमान है कि प्राचीन गाथाओं में श्रीराम को अत्यन्त शोकातुर दिखाया गया था, परन्तु बौद्धों ने इन गाथाओं को नया रूप दिया और शोक-सम्बन्ध का उल्लेख करनेवाली गाथाएँ छोड़ दी गयी हैं । केवल इसी आधार पर गाथाओं के वर्तमान रूप को बौद्धों द्वारा निर्मित मानना निराधार है । महाभारत के अनेक स्थलों में भी शोकापनोदन के प्रकरण आते हैं । जातक गाथाओं की शिक्षा बौद्धों की अपनी नहीं है । जलक्रिया गाथा की ही तरह ये गाथाएँ भी बौद्धों द्वारा ज्यों की त्यों अपना ली गयी होंगी । १. रामकथा, पृष्ठ ८३; वही, पृ० ८७ ।
१६६ रामायणमीमांसा पञ्चम इन गाथाओं में से केवल एक— "यथा फलानां पक्वानां नान्यत्र पतनाद् भयम्। एवं नरस्य जातस्य नान्यत्र मरणाद् भयम् ॥" गाथा रामायण से मिलती है। बुल्के का यह मत कि "जातक की गाथाएँ वाल्मीकिरामायण पर निर्भर नहीं हैं : इनका मूल स्रोत कोई प्राचीन आख्यान ही रहा होगा," ठीक नहीं है; क्योंकि यह प्रमाणसिद्ध है कि उप- निषदों में भी रामकथा मिलती है और वाल्मीकिरामायण ग्रन्थ तो राम के समकाल का ही है, अतः उपस्थित रामायण से भिन्न अन्य किन्हीं अप्रसिद्ध आख्यानों की कल्पना भी निराधार ही है। डा० याकोबी का यह अनुमान ठीक है कि "प्रस्तुत गाथा का मूल स्रोत कोई काव्य रहा होगा और बहुत सम्भव है कि वह वाल्मीकिरामायण ही हो।" बुल्के का यह कथन कि "बौद्ध-साहित्य से भिन्न ब्राह्मण-धर्म के वातावरण में निर्मित रामसम्बन्धी प्राचीन गीतों में इसका मूल स्रोत खोजा जाना चाहिये," अत्यन्त विचित्र ही है। ब्राह्मण-धर्म के प्रसिद्ध ग्रन्थ रामायण, महाभारत, पुराण, संहिता आदि को इन बौद्ध कथाओं का आधार न मान कर किन्हीं अज्ञात, अप्रसिद्ध एवं अप्रामा- णिक गीतों में उनका आधार ढूंढ़ना कहाँ तक युक्ति-युक्त होगा, यह विचारणीय है। कुछ लेखक रामराज्य की तुलना करते हुए रामायण एवं बौद्ध रामकथा का सम्बन्ध जोड़ते हैं। रामराज्य का काल गाथा १३ में निम्नोक्त है— "दस वस्ससहस्सानि सट्ठि वस्ससतानि च। कंबुगीव महावाहु रामो रज्जमकारयि ॥" "कम्बुग्रीव महाबाहु राम ने सोलह सहस्र वर्ष तक राज्य किया। वाल्मीकिरामायण, महाभारत और हरिवंश तीनों में इस गाथा का संस्कृत रूप पाया जाता है। रामायण में— "दशवर्षसहस्राणि दश वर्षशतानि च। भ्रातृभिः सहितः श्रीमान् रामो राज्यमकारयत् ॥" (वा० रा० ६।१३१।१०६) श्रीराम ने भ्राताओं के साथ ग्यारह हजार वर्ष राज्य किया। "दशवर्षसहस्राणि दशवर्ष शतानि च। रामो राज्यमुपासित्वा ब्रह्मलोकं प्रयास्यति ॥" (बा० रा० १।१।९७ अन्य पाठ) ग्यारह हजार वर्ष तक राज्य करके राम ब्रह्म (परब्रह्म) लोक में जायेंगे। महाभारत में— "दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च। राज्यं कारितवान् रामस्ततः स्वभवनं गतः ॥" ( ३।१४८।१९ ) "श्यामो युवा लोहिताक्षो मातङ्ग इव यूथपः। आजानुबाहुः सुमुखः सिंहस्कन्धो महाभुजः ॥ दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च। अयोध्याधिपतिर्भूत्वा रामो राज्यमकारयत् ।। (म० भा० १२।२९।६०, ६१ )
अध्याय बौद्ध जातकसाहित्य की रामकथाओं पर विचार १६७ श्याम, युवा, लोहिताक्ष, मत्तगज-पराक्रमी, आजानुबाहु, मनोज्ञमुख, सिंहस्कन्ध राम ग्यारह हजार वर्ष राज्य करके परम धाम गये । हरिवंश में— “दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च। अयोध्याधिपतिर्भूत्वा रामो राज्यमकारयत् ॥” ( १।४१।१५१ ) ग्यारह हजार वर्ष पर्यन्त राम ने अयोध्याधिपति होकर राज्य किया। इन उद्धरणों से स्पष्ट है कि पाली गाथा और संस्कृत श्लोकों का मूलस्रोत एक ही है। यह पाली गाथा दशरथ-जातक के समोधान में दी जाती है। यह समोधान, इस गाथा को छोड़कर, गद्य में ही लिखा गया है। इससे डा० याकोबी ठीक ही अनुमान करते हैं कि “यह गाथा कहीं से उद्धृत की गयी है। इस जातक की वर्तमान कथा में पोराण पण्डिता का उल्लेख है, अतः प्रस्तुत गाथा का मूलस्रोत कोई प्राचीन काव्य रहा होगा और बहुत सम्भव है कि यह वाल्मीकिरामायण ही हो ।१” बुल्के इसका आधार ब्राह्मण-धर्म के वातावरण में निर्मित प्राचीन आख्यान साहित्य में राम-सम्बन्धी प्राचीन गीतों को मानते हैं, क्योंकि उनकी दृष्टि में रामायण उनसे अर्वाचीन है। परन्तु यह उनका भ्रम है, क्योंकि यह वा० रा० १म काण्ड से सिद्ध है कि वाल्मीकिरामायण का निर्माण राम के समकाल में ही हुआ है, अतः डा० याकोबी का मत ही ठीक है। डा० वेबर के अनुसार दशरथजातक में रामकथा का पूर्वरूप रक्षित है। इसके अतिरिक्त वे पाँचवीं शताब्दी ई० की दो अन्य बौद्ध रचनाओंमें इस कथा के प्राचीनतम तत्त्व पाते हैं। पर यह उनकी कल्पनामात्र है। सो भी बिना प्रमाण की। धम्मपद की टीका में निम्नलिखित कहानी मिलती है। यह ज्यों की त्यों पाली जातकट्ठवण्णना में भी उद्धृत है। ( देवधम्म-जातक नं० ६ दे० ) । ( क ) वाराणसी के राजा के दो पुत्र थे महिसास ( क ) और चन्द्र । उनकी माता के मरने पर राजा ने फिर विवाह किया। नई महिषी के सूर्य नामक एक पुत्र उत्पन्न हुआ। इसी अवसर पर राजा से उसको एक वर भी मिला। जब सूर्य युवावस्था को प्राप्त हुआ तब रानी ने वर के बल पर अपने पुत्र के लिए राज्यसिंहासन का अधिकार माँगा। राजा ने स्पष्ट अस्वीकार किया। लेकिन महिषी के षड्यन्त्रों से भयभीत होकर उन्होंने अपने पुत्रों को यह कह कर वनवास दिया कि “मेरे मरने के बाद लौट कर राज्य पर अधिकार प्राप्त करना ।” सूर्य अपने दोनों भाइयों के साथ स्वेच्छा से वन चला गया। राजा के मरने के पश्चात् तीनों बनारस लौटते हैं। महिसास राजा बन जाते हैं, चन्द्र उपराजा और सूर्य सेनापति। ( ख ) डा० वेबर के अनुसार यह दशरथ-जातक का प्रथम रूप है। आगे चलकर वे बुद्धघोष की सुत्तनिपात-टीका में वर्णित शाक्य तथा कोलिय वंशों की उत्पत्ति की कथा में ( २, १३ ) दशरथ-जातक का द्वितीय रूप देखते हैं। १. रामकथा, पृष्ठ ८८ ।
१६८ रामायणमीमांसा पञ्चम शाक्यों की उत्पत्ति वाराणसी की पटरानी की नौ सन्तानें थीं—चार पुत्र और पाँच पुत्रियाँ । उसके मर जाने के बाद अंबट्ठ राजा ने नया विवाह किया और अपनी युवती पत्नी को पटरानी बनाया—( अग्गमहेसि ट्ठाने ठपसि ) । नई पटरानी के पुत्र उत्पन्न होने पर राजा ने उसको एक वर दिया और उसने उस वर के बल पर अपने पुत्र के लिए राज्यसिंहासन माँगा । राजा ने पहले अस्वीकार किया। फिर भी उसने अपने नौ पुत्र-पुत्रियों को यह कह कर वनवास दे दिया “मेरी मृत्यु के पश्चात् आओ और राज्य पर अधिकार प्राप्त करो ।” बहुत लोग उनके साथ चल दिये और सबों ने वन में एक नगर बसाया । नगर को 'कपिलवस्तु' नाम दिया गया, क्योंकि उसी स्थान पर कपिल नामक तपस्वी तपस्या करते थे । राजसन्तान से विवाह करने योग्य वन में कोई नहीं था, अतः चारों राजकुमार अपनी बहनों से विवाह करने के लिए बाध्य हुए । ज्येष्ठा कन्या पिया अविवाहित रह कर सबों की माता मानी जाने लगी यही शाक्यों की उत्पत्ति की कथा है । कोलियों की उत्पत्ति कुछ समय बाद अविवाहिता पिया को कुछ रोग हो गया । इस कारण वह वन के किसी एकान्त स्थान पर छोड़ दी गयी । उसी वन में राम नामक एक राजा रहते थे । कुछ रोग के कारण राजा राम भी; अपने पुत्र को राज्य देकर वन में आये थे और औषधीय पौधों का सेवन कर स्वस्थ हो गये थे । उन्हीं पौधों द्वारा पिया की चिकित्सा कर के राम ने उससे विवाह किया और ३२ पुत्र उत्पन्न किये (१६ यमल) इसके बाद उसने वन में कोलनगर बसाया और शाक्य राजकुमारियों से अपने पुत्रों का विवाह कराया । शाक्य तथा कोलिय प्रत्येक वंश के २५० राजकुमार भिक्षु बन गये थे । वे अपने वैराग्य में दृढ़ न रह कर लौटने की अभिलाषा करते हैं । तब महात्मा बुद्ध उनको महाकुणाल-जातक सुनाकर उनकी संसार में आसक्ति दूर करते हैं । डा० वेबर के अनुसार रामकथा का विकास इस प्रकार हुआ । धम्मपद और सुत्तनिपात की टीकाओं में विमाता की ईर्ष्या के कारण राजसन्तति को वनवास दिया जाता है, भाई-बहन का विवाह होता है और राम के के नाम का भी उल्लेख होता है । दशरथजातक में विमाता के कारण वनवास और भाई-बहन के विवाह के साथ-साथ दशरथ, लक्ष्मण, भरत और सीता, ये नाम मिलते हैं और राम पराये न होकर राजकुमारों के ज्येष्ठ भाई बन जाते हैं । रामायण में राजकुमारों की राजधानी वाराणसी से अयोध्या बन जाती है । वनवास का स्थान हिमालय से दण्डकारण्य में बदल जाता है और राम तथा सीता भाई-बहन न होकर प्रारम्भ से ही विवाहित होते हैं । इन परिवर्तनों के अतिरिक्त सीता-हरण और रावण-वध ये नये वृत्तान्त भी जोड़े गये हैं । रामायण में सीता के वनवास के अन्त तक कोई सन्तान नहीं होती, यह डा० वेबर के अनुसार दशरथ- जातक की कथा का प्रभाव है जिसमें वनवास के बाद ही उनका विवाह होता है । वाराणसी का अयोध्या बनना भी बौद्ध कथाओं के कारण हुआ । शाक्य और कोलिय वंशो की राजधानियाँ क्रमश: कपिलवस्तु और कोलनगर दोनों थीं, दोनों नगर अयोध्या के पड़ोस में थे । वनवास का स्थान इसलिए बदल गया कि सीता-हरण और रावण-वध का वृतान्त जोड़ना था । अन्तिम विषय का आधार यूनानी कवि होमर की रचना है जिसमें पैरिस द्वारा हेलेन का हरण है और लङ्का से जो युद्ध हुआ उसका आधार सम्भवतः यूनानी सेना द्वारा त्राय का अवरोध है। श्रीदिनेशचन्द्र सेन भी दशरथजातक में रामकथा का आधार और पूर्वरूप देखते हैं । रामायण में एकाध पाली गाथाओं का संस्कृत अनुवाद पाते हैं और अन्तरङ्ग प्रमाण भी देते हैं—रामायण और बौद्धकथा की तुलना
करने पर स्पष्ट है कि विश्वकवि वाल्मीकि ने कितने कौशल से इस अपरिष्कृत बौद्ध कथा को उत्कर्ष की सीमा तक पहुँचाया है । बुल्के के अनुसार "इस तर्क का प्रत्युत्तर यह है कि रामायण तथा बौद्धकथा की तुलना करने पर स्पष्ट है कि बौद्धों ने रामायण के कारुणिक कथानक को शोक की व्यर्थता के एक उपदेश मात्र में बदल दिया है । इससे सिद्ध होता है कि रामायण बौद्धकथा का मूल एवं प्राचीन है ।” बुल्के यह कहते हैं कि “डा० वेबर और दिनेशचन्द्र गाथाओं और गद्य इन दोनों की प्रामाणिकता में कोई भेद नहीं मानते । यद्यपि दोनों के रचनाकाल में शताब्दियों का अन्तर है । यह तर्क दशरथजातक के विषय में विशेष महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें प्रायः समस्त कथा गद्य में दी गयी है । पहली गाथा का जो प्रसङ्ग दशरथजातक में दिया गया है वह मौलिक नहीं है । अन्य गाथाओं का मूल स्रोत भी रामायण से मिलता-जुलता कोई पुराना उपाख्यान रहा होगा, यह सम्भवतः गाथाओं के उपर्युक्त विश्लेषण से स्पष्ट हो गया है ।”१ वस्तुतः बुल्के आदि पाश्चात्य विद्वानों द्वारा किया गया उपनिषदों और वाल्मीकिरामायण का काल-निर्णय ही भ्रान्तिपूर्ण है । यदि तत्सम्बन्धी हमारा विवेचन उनकी समझ में आ जाय तो वे भी मानने लगेंगे कि जैन-रामकथा की भाँति ही बौद्धरामकथा भी वाल्मीकिरामायण का ही विकृत रूप है । विभिन्न दुरभिसन्धियों से जैनों और बौद्धों ने रामकथा को अपने धार्मिक विश्वासों के साँचे में ढालने का प्रयास किया है । स्वयं बुल्के का कथन है कि “दशरथजातक में प्राप्त रामकथा की अन्तरङ्ग समीक्षा करने पर वह रामायणकथा का विकृत रूपमात्र ही सिद्ध होती है२ ।” साथ ही डा० वेबर का मत इस धारणा पर निर्मित प्रतीत होता है, जिस कथा में अपेक्षाकृत कम पात्र, कम घटनाएँ, कम तत्त्व मिलते हैं वह निस्सन्देह पूर्वकृत होगी । ऐसी धारणा निर्मूल है। इसका प्रमाण दशरथकथानम् में मिल जाता है । यह कथा एक सङ्ग्रह में पायी जाती है जिसकी रचना दूसरी शताब्दी ई० के बाद हुई थी । इस दशरथकथानम् में सीता का या किसी राजकुमारी का उल्लेख नहीं है । रामकथा का यह रूप दूसरी शताब्दी ई० के बाद भी बौद्ध जगत् के किसी प्रदेश में प्रचलित रहा होगा । दशरथकथानम् के रचना-काल में वाल्मीकिरामायण ग्रन्थ भारतवर्ष में प्रसिद्ध हो चुका था, फिर डा० वेबर की युक्ति के अनुसार दशरथकथानम् के वृत्तान्त में इन सब रचनाओं के पहले की रामकथा का रूप विद्यमान है ।३ अस्तु, उनकी यह उक्ति सर्वथा निस्तत्त्व है । वस्तुतः रामकथा का विकसित रूप जो वाल्मीकिरामायण में पाया जाता है वह प्राचीनकाल में ही बौद्धों में प्रचलित था। इसके सङ्केत पाली जातकट्ठवण्णना की अन्य गाथाओं से मिलते हैं । जयद्दिशजातक (नं० ५१३) की गाथा १७ के अनुसार राम का वनवास हिमालय प्रदेश में न होकर दण्डकारण्य में है । एक माता अपने पुत्र से कहती है । जिस तरह दण्डकारण्यवासी राम की सुन्दर माता ने (अपने पुण्य द्वारा पुत्र का) कल्याण किया है, इस तरह मैं तेरा कल्याण ( सोत्थानं स्वस्त्ययन ) करती हूँ । यं दण्डकारण्णगतस्स माता रामस्स सोत्थानं सुगत्ता तं ते अहं सोत्थानं करोमि । दशरथजातक के अनुसार राम के निर्वासन के समय उनकी माता का देहान्त हो गया था । वेस्संन्तरजातक (नं० ५४७) मद्दी, वेस्संन्तर की पत्नी, कहती है, "मैं एक प्रतापवान् निर्वासित राज- कुमार की भार्या हूँ । अनुगामिनी सीता जिस तरह से राम का आदर करती थीं, उसी तरह मैं इनका आदर करती १. रामकथा, पृष्ठ ९१ पर्यन्त । २. वही, अनुच्छेद-७७१ । ३. वही, पृष्ठ ९२ । २२
१७० रामायणमीमांसा पञ्चम हूँ । इससे यह ध्वनि निकलती है कि वनवास के समय राम और सीता का सम्बन्ध भाई-बहन का न होकर पति-पत्नी का था । अनामकजातक में भी रामकथा का विकसित रूप मिलता है; वह पीछे उद्धृत है । १इसके अतिरिक्त अश्वघोष, अभिधर्म महाविभाषा आदि प्राचीन बौद्ध-ग्रन्थों में वाल्मीकिरामायण के निर्देश मिलते हैं । अश्वघोषकृत बुद्धचरित महाकाव्य से स्पष्ट पता चलता है कि अश्वघोष (दूसरी शताब्दी ई० पूर्वार्द्ध) न केवल ब्राह्मण-रामकथा से लेकिन वाल्मीकिरामायण के पाठ से भी परिचित थे, और इससे अपनी सारी रचना में प्रभावित हुए हैं। राम का आज्ञापालन (९।२५), उनका वन से लौटना (९।६७), दशरथ का पुत्र वियोग के कारण शोक (८।७९, ८१), इन सब में रामकथा के किसी निश्चित रूप की ओर निर्देश नहीं है । लेकिन वनवासी राम से वामदेव की भेंट (९।९), वाल्मीकि (१।४८), तथा सारथि सुमन्त्र (६।३६; ८।८) का उल्लेख— यह रामायणीय रामकथा (विशेष करके अयोध्याकाण्ड) से सम्बन्ध रखता है। इसके अतिरिक्त अश्वघोष के सौन्दर- नन्द में वाल्मीकि का सीता के दोनों पुत्रों का शिक्षक होने का उल्लेख हुआ है। इससे यह ध्वनि निकलती है कि अश्वघोष उत्तरकाण्ड की कथावस्तु से भी अभिज्ञ थे । बुद्धचरित के अनेक स्थलों पर रामायण की कथावस्तु से बहुत कुछ समानता मिलती है। सिद्धार्थ के बिना छन्दक के कपिलवस्तु में लौटने का सारा वर्णन सुमन्त्र के प्रत्यागमन से प्रभावित हुआ है। कवि स्वयं दोनों वृत्तान्तों की तुलना करता है । “त्वामरण्ये परित्यज्य सुमन्त्र इव राघवम् ।” (६।२५) राम के वन से लौटने का भी एक उल्लेख मिलता है— “महीं विप्रकृतामनार्यैस्तपोवनादेत्य ररक्ष रामः ।” (९।५९) पृथिवी को अनार्यों से पीड़ित देखकर राम ने वन से लौटकर उसकी रक्षा की ।२ यह बात दशरथजातक में नहीं है । बुल्के का यह कहना कि “रामायण में इस कथा का रूप नहीं है;" सर्वथा असङ्गत है, क्योंकि रामायण के 'उत्तरकाण्ड' से लवण दैत्य के द्वारा मथुरा आदि की भूमि के विप्रकृत होने और राम से प्रेषित शत्रुघ्न के द्वारा उसकी रक्षा की जाने का उल्लेख है । रामायण और बुद्धचरित के कई स्थलों में बहुत समानता है। उदाहरणतः-“गजेन्द्रमृदिता फुल्ला लता इव महावने” (वा० रा० ५।९।४७) का उल्लेख है, “गजभग्ना इव कर्णिकारशाखा” (बुद्धचरित ५।५१) का उल्लेख है। ऐसे अनेक उदाहरण दिये जा सकते हैं। विंटरनित्स के अनुसार इसका मूल स्रोत बुद्धचरित है, रामायण में यह प्रक्षिप्त है। कीथ के मतानुसार अश्वघोष ने ही रामायण का अनुकरण किया है । वस्तुतः इस सम्बन्ध में कीथ का मत ही युक्तियुक्त है । “मुमोक्ष बाष्पं पथि नागरो जनः पुरा रथे दाशरथेरिवागते” (बु० च० ८।८) जैसी युक्ति गौतमी के विलाप (८।५१-५९) में राजमहल और वनवास का जो विरोध चित्रित है वह रामायण के दशरथ-विलाप (वा० रा० २।१२।९७-११०, २।५७-५९) और कौशल्या-विलाप (वा० रा० २।४३।१-२०) का स्मरण दिलाता है। दोनों ही वर्णनों में वनवासी पुत्र के पैदल जाने और भूमि पर शयन करने आदि का उल्लेख हुआ है । “प्रलम्बबाहुर्मृगराजविक्रमो महर्षभाक्षः कनकोज्ज्वलद्युतिः । विशालवक्षा घनदुन्दुभिस्वनस्तथाविधोऽप्याश्रमवासमर्हति ॥” (बु० च० ८।५३) १. रामकथा, पृष्ठ ९७, अनुच्छेद ८३ । २. वही, पृष्ठ ९३ ।
अध्याय बौद्ध जातकसाहित्य की रामकथाओं पर विचार १७१ “नागराजगतिर्वीरो महाबाहुर्धनुर्धरः । वनमाविशते नूनं सभार्यः सहलक्ष्मणः ॥” ( वा० रा० २।४३।६ ) “शुचौ शयित्वा शयने हिरण्मये प्रबोध्यमानो निशि तूर्यनिस्वनैः । कथं बत स्वप्स्यति सोद्य मे व्रती पटैकदेशान्तरिते महीतले ॥” (बु० च० ८।५८) “दुःखस्यानुचितो दुःखं सुमन्त्र शयनोचितः । भूमिपालात्मजो भूमौ शेते कथमनाथवत् ॥” ( वा० रा० २।५८।६ ) तीसरी शताब्दी ई० उत्तरार्द्ध की अभिधर्ममहाविभाषा में रामायण का उल्लेख किया गया है। यह रचना चीनी अनुवाद में सुरक्षित है। इसमें लिखा है—रामायण नामक ग्रन्थ में १२००० श्लोक हैं। श्लोक केवल दो विषयों से सम्बन्ध रखते हैं—(१) रावण द्वारा सीता का हरण, (२) राम द्वारा सीता की पुनः प्राप्ति तथा (अयोध्या में) प्रत्यागमन । इसके अतिरिक्त तीन बौद्ध रचनाएँ और मिलती हैं, जिनसे पता चलता है कि रामायण का बौद्धों में पर्याप्त प्रचार था। कुमारपालकृत कल्पनामण्डितिका में ( तीसरी शताब्दी ई० का अन्त ) महाभारत और रामायण का उल्लेख हुआ है। वसुबन्धु ( चौथी शताब्दी ई० ) की जीवनी में भी यह कहा गया है कि वसुबन्धु रामायण की कथा सुना करते थे। सद्धर्मस्मृत्युपस्थानसूत्र में रामायण का द्विवर्णन उद्धृत है। यह रचना पहली शताब्दी ई० की मानी जाती है। इसका छठी शताब्दी में चीनी भाषा में अनुवाद हुआ था। श्रीबुल्के के अनुसार “रामकथा का जो रूप पाली दशरथजातक में मिलता है वह या तो रामायण ही पर अथवा रामायण से मिलती जुलती किसी अन्य रामकथा पर निर्भर है। यह दशरथजातक की अन्तरङ्ग परीक्षा से सिद्ध होता है।” रामायण में कैकेयी ने वर के बल पर राम के लिए चौदह वर्ष तक वनवास माँग लिया था; अतः राम का दशरथ के मरने के बाद वन में रहना स्वाभाविक और अनिवार्य है। लेकिन दशरथजातक में इसके लिए कोई समीचीन कारण नहीं मिलता। इसके अनुसार दशरथ ने राम और लक्ष्मण से कहा था कि वे उनकी मृत्यु के पश्चात् लौटें। तब उन्होंने ज्योतिषियों से अपना अन्तकाल पूछा था। यह जानकर कि मैं बारह वर्ष तक जीवित रहूँगा तो उन्होंने अपने पुत्रों से इस अवधि के अन्त में आने के लिए कहा था। फिर दोनों पुत्रों को एक ही आदेश मिला था। तब लक्ष्मण क्यों नौ वर्ष के बाद लौटते हैं ? रामायण की कथा में सीता का अपने पति के साथ जाना स्वाभाविक है। दशरथजातक में इसके लिए कोई ऐसा कारण नहीं है। विमाता के षड्यन्त्रों की सीता को कोई आशंका नहीं थी। जातक में सीता दशरथ के मरने पर लक्ष्मण के साथ राजधानी को लौट आती है और राम तथा सीता का तीन वर्षों के वियोग के बाद विवाह हो जाता है। इसमें सम्भवतः रामायण के सीताहरण के पश्चात् दोनों का संयोग प्रतिबिम्बित है। अब प्रश्न यह उठता है कि यदि दशरथजातक ब्राह्मण-रामकथा पर निर्भर है तो दोनों में इतना अन्तर क्यों है ? इसके तीन मुख्य कारण स्पष्ट हैं। एक तो दशरथजातक का जो रूप जातकट्ठवण्णना में प्रस्तुत है, वह शताब्दियों तक अस्थिर रहने के बाद पाँचवीं शताब्दी ई० में लिपिबद्ध किया गया है। अतः इसमें परिवर्तन की सम्भावना रही है। विशेष कर दूर सिंहलद्वीप में जहाँ रामायण की कथा उस समय तक कम प्रचलित थी। दूसरे बौद्ध आदर्श और शैली का प्रभाव पड़ना अत्यन्त स्वाभाविक है। तीसरे दशरथजातक की वर्तमान कथा के अनुसार महात्मा बुद्ध ने पिता के मरण से शोकातुर पुत्र को धैर्य देने के लिए दशरथ के मरने पर राम के धैर्य का उदाहरण देकर यह जातक कहा था। इस उद्देश्य के लिए सीता-हरण का उल्लेख अनावश्यक था। इसके अतिरिक्त इस जातक
के अनुसार महात्मा बुद्ध ही अपने पूर्व जन्म में राम पण्डित थे। अतः बौद्ध आदर्श के प्रतिकूल होने के कारण रावणवध का अभाव स्वाभाविक है । बौद्ध जातकों की शैली के अनुसार राजधानी अयोध्या न होकर वाराणसी है। वनवास का स्थान हिमालय है जो बौद्ध कथाओं में अत्यन्त लोकप्रिय है और जिसका उल्लेख जातकों में निरन्तर होता रहता है । वनवास का कारण विमाता के षड्यन्त्रों का भय है जो अनेक बौद्ध कथाओं में भी मिलता है। राम और सीता, भाई-बहन का विवाह महत्त्वपूर्ण परिवर्तन कहा जा सकता है। लेकिन इसके लिए भी बौद्धसाहित्य में कई उदाहरण प्रस्तुत हैं। दशरथ के अन्तकाल के विषय में ज्योतिषियों का कथन असत्य सिद्ध होता है। इसमें भी चिन्तामणिवैद्य बौद्ध-प्रभाव देखते हैं। बौद्धों की ज्योतिषियों में जो अरुचि थी वह इस भूल में प्रगट की गयी है। सारांश यह है कि दशरथजातक में जो आन्तरिक असङ्गति मिलती है वह वाल्मीकीय कथा को इस जातक का आधार होना सिद्ध करती है । दूसरी ओर जातक तथा रामायण में जो अन्तर पाये जाते हैं वे भी उपर्युक्त कारणों से स्वाभाविक प्रतीत होते हैं। बौद्ध साहित्य में जो रामकथासम्बन्धी सामग्री मिलती है, उसके विश्लेषण से सिद्ध होता है कि दशरथ- जातक के गद्य में जो वृत्तान्त प्रस्तुत हुआ है वह तो वाल्मीकीय कथा का विकृत रूप है ही, किन्तु इस जातक की गाथाओं का भी मूल स्रोत बौद्ध नहीं है। फिर भी इनका आधार प्रचलित वाल्मीकिरामायण भी नहीं हो सकता, अतः ये गाथाएँ पुराने आख्यान काव्य पर निर्भर होंगी ।”१ बुल्के का उपर्युक्त कथन तब सत्य होता जब कि वेद, उपनिषद् तथा वाल्मीकिरामायण जैसे ग्रन्थों की बौद्धग्रन्थों से अतिप्राचीनता सिद्ध न होती । वेद, उपनिषद् अनादि हैं और रामायण राम के समकाल की रचना है। यह बात वा० रा० १म काण्ड तथा तर्कों द्वारा सिद्ध की जा चुकी है, अतः रामायण को ही उन गाथाओं का मूल स्रोत मानना उचित है । जयद्दिसजातक और वेस्संतरजातक की कथाएँ वाल्मीकिरामायण की प्रतिच्छाया हैं, यह भी कहा जा चुका है । सामजातक (सं० ५४०) का वृत्तान्त रामायण की अंधमुनि-पुत्रवधसम्बन्धी कथा का अन्य रूप है। बौद्ध जगत् मे इस जातक की लोकप्रियता का प्रमाण यह है कि साँची और अमरावती के स्तूपों पर तत्सम्बन्धी चित्र अङ्कित किये गये हैं। अन्ध मुनि के पुत्र की कथा रघुवंश नवें सर्ग में भी मिलती है पर ये वृत्तान्त रामायण की तत्सम्बन्धी कथा पर निर्भर हैं; और सामजातक से कोई सीधा सम्बन्ध नही रखते । सामजातक का संक्षिप्त वृत्तान्त इस प्रकार है--निषादों के कुल में उत्पन्न दुकूलक छोर पारिका हिमालय प्रदेश के किसी आश्रम में तपोमय जीवन बिताते हैं। विवाहित होकर भी वे ब्रह्मचारी ही रहते हैं। बोधिसत्व अलौकिक रीति से पारिका के गर्भ से जन्म लेते हैं और साम कहलाते हैं। साम के १६ नर्ष में दुकूलक और पारिका दोनों को एक सर्प अन्धा कर देता है। उसी समय से साम अपने माता-पिता की सेवा-शुश्रूषा करने लगता है। एक दिन साम पानी लेने किसी नदी पर जाता है और वहीं काशीराज के विष-दिग्ध बाण से विद्ध हो जाता है। राजा उसके पास जाता है ! साम को किञ्चित्मात्र भी क्रोध नहीं होता, परन्तु वह अपने माता-पिता के भाग्य पर फूट-फूट कर रोता है। राजा उसके माता-पिता के पास जाकर उसके वध का समाचार सुनाता है। समाचार सुनकर दोनों विलाप करने लगते हैं। तदनुसार उनके कहने पर राजा उनको मृत पुत्र के पास ले जाते हैं। वहाँ पहुँचने पर १. रामकथा, पृ० ९४-९६ ।
अध्याय बौद्ध जातकसाहित्य की रामकथाओं पर विचार १७३ मर्मस्पर्शी विलाप करते हुए शपथ करते हैं। पारिका कहती है कि "यदि मेरा पुत्र माता-पिता का सच्चा भक्त था तो विष लुप्त हो जाय" दुकूलक भी अपने और अपनी पत्नी के नाम पर शपथ करता है। वनदेवी भी उन्हीं की तरह शपथ करती है। साम उठ बैठता है और राजा का स्वागत करते हुए कहता है कि मैं मूर्च्छित हुआ था, जो माता- पिता की सेवा करता है वह दोनों लोकों में सुख पाता है। तदनन्तर साम राजा पिलियक को राजधर्म का उपदेश देता है। रामायण की कथा में आहत मुनि-पुत्र उत्तेजित हो जाता है, उसके माता-पिता का विलाप भी अत्यन्त कारुणिक एवं अधिक हृदय-स्पर्शी है और वह पुनः जीवित भी नहीं होता इन अन्तरों के रहते हुए भी दोनों वृत्तान्तों का पारस्परिक सम्बन्ध सन्दिग्ध नहीं कहा जा सकता। रामायण और गाथा की कथाओं में शाब्दिक साम्य भी हैं। उदाहरणतः - "इयमेकपदी राजन् ।” (वा० रा० २।६३।४४) "अयं एकपदी राज।" (गाथा २९) "वृद्धौ च मातापितरावाहं चैकेषुणा हतः ।” (वा० रा० २।६३।३२ ) "अदूसक पितापुत्ता तयो एकेसूना हता।" (गाथा ३९ ) "कन्दमूलफल हृत्वा यो मां प्रियमिवातिथिम् । भोजयिष्यत्यकर्मण्यमप्रग्रहमनायकम् ॥” (वा० रा० २।६४।३४) "को दानि भुजयिस्सति वनमूलफलानि च । सामो अयं कालकतो अंधानं परिचारक ॥" (गाथा ८५) बुल्के के कथनानुसार "सामजातक के सरल वृत्तान्त में इस रामकथा का प्राचीन रूप सुरक्षित है। यह वृत्तान्त रामकथा से स्वतन्त्ररूप में भी प्रचलित था और कालान्तर में रामायण की कथा में उसे एक नया और काव्यात्मक रूप मिला।" बुल्के की यह मान्यता असङ्गत है, क्योंकि वाल्मीकिरामायण की प्राचीनता सिद्ध है। इतना ही नहीं, इस स्थिति में यही युक्तिसङ्गत प्रतीत होता है कि कथा के इस अंश को भी बौद्धों ने वाल्मीकिरामायण से लेकर अपने साँचे में ढाल लिया है। यदि रामायण में बौद्ध-कथा का अनुकरण किया गया होता तो मुनि-पुत्र के क्रोध न करने और माता-पिता के शपथ से उसके जी उठने जैसे अंश भी अवश्य ही अनुकृत होते । जैसे इतर प्राकृत संस्कृत का अपभ्रंश है वैसे ही उक्त प्राकृत गाथाएँ भी संस्कृत रामायण का ही अपभ्रंश एवं विकृत रूप हैं। 'प्रकृतिः संस्कृतं तस्माद्भवं प्राकृतम्' इस प्राकृत नियम के अनुसार संस्कृत प्रकृति है उससे उत्पन्न होनेवाली भाषा प्राकृत है। वेस्सन्तर जातक यह जातक बौद्ध जगत् में सबसे प्रसिद्ध और लोकप्रिय था। इसकी ७८६ गाथाओं में राजकुमार वेस्सन्तर की दानवीरता का चित्रण हुआ है। कथावस्तु इस प्रकार है। राजकुमार वेस्सन्तर ने प्रतिज्ञा की थी कि मैं किसी भी माँगी हुई वस्तु के देने से इनकार नहीं करूँगा। देश की भलाई का ध्यान न रखते हुए उसने एक अलौकिक हाथी दान में दे दिया। दण्डस्वरूप उसको वनवास दिया गया। उसकी पतिभक्त पत्नी मद्दी और दो पुत्र उसके साथ गये। वह चार घोड़ों के रथ में चले। पथ में एक ब्राह्मण भिखारी ने रथ माँग लिया। वेस्सन्तर ने उसे
१७४ रामायणमीमांसा पञ्चम निःसङ्कोच रथ दे दिया। अन्त में चारों एक कुटी में पहुँचकर वहाँ निवास करने लगे। तब सक्क (शक्र) एक कुरूप ब्राह्मण के वेश में दिखायी पड़े और उन्होंने वेस्सन्तर के दोनों पुत्रों को दास के रूप में माँगा और प्राप्त किया। तत्पश्चात् ब्राह्मण ने पत्नी को भी माँग लिया। इसपर ब्राह्मण अपना परिचय देता है और कथा आनन्दपूर्वक समाप्त होती है। मद्दी कहती है— 'अवरुद्धस्सहं भरिया राजपुत्तस्य सिरीमतो। तं चाहं नातिमण्णामि रामनि सीता वनुब्बता॥' (गाथा ५४१) मैं एक प्रतापवान् निर्वासित राजकुमार की भार्या हूँ। अनुगामिनी सीता जिस तरह राम का आदर करती थी इस तरह मैं इनका आदर करती हूँ। इस जातक में अनेक स्थलों पर रामकथा से मिलते-जुलते प्रसङ्ग मिलते हैं। राम के समान वेस्सन्तर का वनवास के पहले दान देना, कौशल्या तथा वेस्सन्तर की माता का विलाप, वन और कुटी का वर्णन। मद्दी और सीता दोनों अपने पति के साथ वन जाने का अनुरोध करती हैं। 'अग्गिं निज्जालायित्वान एकजालसमाहितम्। तत्थ मे मरणं सेय्यो यं चे जीवे तया विना॥' (गाथा ७३) "यदि मां दुःखितामेवं वनं नेतुं न चेच्छसि। विषमग्नि जलं वाहमास्थास्ये मृत्युकारणात्॥" (वा० रा० २।२९।२१) पूर्वोद्धृत गाथा में मद्दी ने तो स्पष्टतः सीता का उल्लेख किया है।२ बुल्के कहते हैं "वेस्सन्तर जातक का रचयिता रामकथा से परिचित था, लेकिन वह रामायण भी जानता था, इसके लिए वेस्सन्तर जातक में कोई आधार नहीं मिलता।"३ वस्तुतः रामायण की कथावस्तु का ज्ञान रामायण से ही हो सकता हूँ। उससे भिन्न अनुपलब्ध एवं अश्रुत उपाख्यानों एवं गीतों को गाथाओं का आधार मानना सर्वथा निर्मूल है। उपस्थित का परित्याग कर अनुपस्थित की कल्पना ही युक्ति-रहित एवं अमान्य है— "उपस्थितं परित्यज्यानुपस्थितकल्पने मानाभावात्।" संबुला जातक इस 'जातक' की गाथा रामायण की कथा से कुछ मिलती है। गाथा (५१९) में पतिभक्त संबुला का वृत्तान्त दिया गया है। अपने कुष्ठरोगी पति राजकुमार सोत्थिसेन के साथ वनवासी बन कर उसकी सेवा में अपना जीवन बिताती है। किसी दिन दानव संबुला को वन में देखता है और उसे अपनी पत्नी बनाना चाहता है। संबुला अस्वीकार करती है और सक्क (शक्र) द्वारा बचायी जाती है। इस घटना का वृत्तान्त सुनकर सोत्थिसेन अपनी पत्नी के सतीत्व पर सन्देह करता है। यह देख कर संबुला एक 'सच्चकिरियम् (सत्यक्रिया) द्वारा अपने पति को नीरोग कर देती है। "तथा मं सच्चं पालेतु पालयिस्सति चे ममं। यथानं नाभिजानामि अञ्जं पियतरं तया॥ रतेन सच्चवज्जेन व्याधि ते वूपसम्मति (उपशमति)।" (गाथा २७) १. रामकथा—पृष्ठ ९९-१००। २. "तं चाहं नातिमण्णामि रामनि सीता वनुब्बता।" (५४१) ३. 'रामकथा' पृ० १००।
अध्याय बौद्ध जातकसाहित्य की रामकथाओं पर विचार १७५ इसके बाद दोनों राजधानी लौटते हैं। कृतघ्न सोत्थिसैन अन्य स्त्रियों के साथ विलास करके अपनी पत्नी को दुःख देता है। अन्त में अपने पिता के कहने पर वह संबुला से क्षमा माँगता है और दोनों का जीवन सुखमय बन जाता है। संबुला और सीता दोनों वनवासी पति की सेवा करती हैं। संबुला की सच्चक्रिया सीता की अग्निपरीक्षा के समय की शपथ का स्मरण दिलाती है। दानव और रावण दोनों की धमकी में भी शाब्दिक समानता मिलती है। “यदि तुम मेरी महिषी बनने के लिए सहमत न हुई तो तुम मेरा प्रातः का भोजन (पातराशाय—प्रातराश) बन जाओगी। “नो चे तुवं महेसेय्यं संबुले कारयिस्ससि । अलं त्वं पातरासाय मज्जे भक्खा भविस्ससि ॥” ( गाथा १० ) "द्वाभ्यामूर्ध्वं तु मासाभ्यां भर्तारं मामनिच्छतीम् । मम त्वां प्रातराशार्थे सूदाश्छेत्स्यन्ति खण्डशः ॥”१ ( वा० रा० ५।२२।९ ) यह कथा भी परम प्रसिद्ध एवं व्यापक रामायण की रामकथा के अंश का सङ्कलन ही प्रतीत होती है। इन कथाओं को रामकथा का मूल मानना उपहासास्पद है । महासुतसोम जातक इस जातक की गाथा (नं० ५३७) भी अत्यन्त एकदेशीय है। 'महासत्तो' (बोधिसत्त्व) एक 'पोरिसाद' (पुरुषाद) को भर्त्सना देकर कहता है— “पञ्च पञ्चनखा भक्खा खत्तियेन पजानता । अभक्खं राजा भक्खेसि ततमा अधम्मिको तुव ॥ ( गाथा ५८ ) यह राम के प्रति वाली की उक्ति का स्मरण दिलाता है— “पञ्च पञ्चनखा भक्ष्या ब्रह्मक्षत्रेण राघव ।” ( वा० रा० ४।१७।३९ ) श्वाविधं शल्यकं गोधां खड्गकूर्मशशांस्तथा । भक्ष्यान् पञ्चनखेष्वाहुः” ( मनु० ५।१८ ) दिनेशचन्द्र सेन का अनुमान है कि “जातकों के साहित्य से वाल्मीकि ने अपनी सामग्री प्राप्त की है और इसे अपनी अमर रचना के नये साँचे में ढाला है।” किन्तु यह मत प्रमाणशून्य है। जातकों में रामकथा से सीधा सम्बन्ध रखनेवाली सामग्री इस प्रकार है— 'शोकापनोदन' का एक छोटा सा भाषण, जलक्रिया के विषय में एक गाथा, राम के राज्यकाल के विषय में एक गाथा, राम का दण्डकारण्य में वनवास का उल्लेख और सीता का अपने पति के साथ वन गमन का उल्लेख । इसके अतिरिक्त वेस्संतरजातक की कथावस्तु रामायण के वृत्तान्त से कुछ मिलती जुलती है । संबुला तथा महासुतसोम जातक में एक गाथा पायी जाती है। जिसका रूपान्तर रामायण में भी मिलता है। सामजातक का वृत्तान्त सम्भवतः दशरथ द्वारा अन्धमुनिपुत्र के वध की कथा का आधार माना जा सकता है। १. रामकथा, पृष्ठः १०१ ।