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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 240, कुल 1049 में से

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पृष्ठ 240

अध्याय बौद्ध जातकसाहित्य की रामकथाओं पर विचार १६३ अनेक के साथ एक समय वैसा करना साहित्य के ही नहीं अपितु कामशास्त्र के भी विरुद्ध है। अनेकों की उपस्थिति में लज्जा स्वाभाविक है। जो कामोत्पत्ति की बाधिका है। अतः रमयामास का हमारा अर्थ ही ठीक है। तुलसी की कल्पना में कोई दम नहीं है और इसी के साथ दूसरा पद है— "अरुन्धत्या इवासीनो वसिष्ठ इव तेजसा।" ( वा० रा० ७।४२।२४ ) यहाँ परम पवित्र तेजस्वी दम्पती वसिष्ठ और अरुन्धती को चरित्र के पवित्रतार्थ ही उपमान रूप में प्रस्तुत किया गया है। राम भूल से भी परस्त्री का चिन्तन नहीं करते इसे भी 'कच्चिन्न परदारान् वा राजपुत्रोऽभिमन्यते।' इत्यादि वचन स्पष्ट सिद्ध करते हैं और इसी कारण आनन्दरामायण विलास-काण्ड सर्ग ७ में राम की दिव्य घोषणा है— "अन्यत्सीतां विनाऽन्या स्त्री कौशल्यासदृशी मम । न क्रियते परा पत्नी मनसाऽपि न चिन्तये ॥" सीता के अतिरिक्त दूसरी स्त्री मेरे लिए माता कौशल्या के समान है—अन्य पत्नी करना तो दूर रहा मैं मन से भी ऐसा चिन्तन नहीं करता। ऐसे दिव्य वचनों के समक्ष राम पर बहुपत्नीपरिग्रह अथवा परस्त्री-रमण सर्वथा असम्भव ही नहीं है अपितु ऐसा मिथ्या आरोप करना अवश्य अपराध और घोर पाप है। यहाँ एक वचन और भी जो आचार्य तुलसी ने नहीं दिया, किन्तु कोई दूसरा सन्देह उत्पादक भाषा में दे सकता है, वह दिया जा रहा है— "मणिकाञ्चनकेयूरमुक्ताप्रवरभूषणैः । भुजैः परमनारीणामभिमृष्टमनेकधा ॥" ( वा० रा० ६।२।१३ ) श्रीराम का दिव्य अङ्ग अनेक बार मणि और सुवर्ण से भूषित परमनारियों की भुजाओं से परामृष्ट अर्थात् स्पर्श किया जाता था यहाँ भी श्रीनागेशभट्ट ने स्पष्ट कर दिया है। परमनारीणामेकदारव्रतत्वेनेतरस्त्रीप्रसंगाभावादुत्तमधात्रीजनानां भुजैरनेकधा स्नपनालङ्करणादिकालेऽभिमृष्टं स्पृष्टम् ।। अर्थात् 'परमनारी' का अर्थ एकपत्नीव्रत होने से परस्त्री के प्रसंग के अभाव में श्रीराम की उत्तम धात्रियाँ ही समझना चाहिये जो श्रीराम को स्नान कराने, आभूषण आदि से अलङ्कृत करने के समय अपनी दिव्य तथा अलङ्कृत भुजाओं से उनके शरीर का अनेक प्रकार से स्पर्श करती थीं। अतः एक बात स्पष्ट है कि वाल्मीकिरामायण में श्रीराम मानव मर्यादा के आदर्श हैं और एकपत्नीव्रत के आदर्श का पालन करते हैं— स्वापहेतुरनुपाश्रितोऽन्यया, राम की भुजा भूल कर भी परस्त्री के सिर के नीचे नहीं जा सकती। वैसे तो श्रीराम और सीता के सम्बन्ध में और दिव्य कल्पनाएँ शास्त्रों के आधार पर की जा सकती हैं पर वे सब यहाँ प्रसङ्ग प्राप्त नहीं। यहाँ केवल एकपत्नीव्रत और परपक्ष द्वारा उपस्थापित अंशों के अर्थ का स्पष्टीकरण ही इष्ट है। बौद्ध जातकसाहित्य की रामकथाओं पर विचार श्रीराम इतने अधिक लोकप्रिय थे कि उनकी गाथा पढ़ने और सुनने की इच्छा सबको होती थी ओर होती है। जो लोग बौद्ध या जैन बन जाते हैं। प्राचीन संस्कार वश उन्हें भी रामकथा आकृष्ट करती हैं। परन्तु बेद, उपनिषद्, रामायण आदि की कथाएँ रामचरित के साथ ही वेद-प्रामाण्य, यज्ञ-यागादि तथा ईश्वरवाद के भी संस्कार

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