भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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१६२ रामायणमीमांसा पञ्चम

का दुष्प्रयत्न किया तो उनकी स्थिति सन्दिग्ध नहीं रही । उनके कुत्सित प्रयास से कम से कम इतना स्पष्ट हो गया कि इनमें वैदिक हिन्दू-धर्म के सर्वस्वरूप भगवान् राम और अखिललोकजननी सीताजी के प्रति हार्दिक श्रद्धा और भक्ति का भाव नहीं है । केवल अपने मत के प्रचारार्थ वे हिन्दू देवी-देवताओं तथा भगवदवतारों में दोष दिखाने और छिद्रान्वेषण करने एवं उनके प्रदर्शन में प्रयत्नशील हैं । यद्यपि उनकी यह भावना केवल दुराशामात्र है, यह आगे दिखाया जायगा, किन्तु इतने मात्र से उनकी स्थिति स्पष्ट हो गयी । अतः आस्तिक, धार्मिक तथा रामभक्त जनता को इस सम्बन्ध में सन्देह में नहीं रहना चाहिये । वाल्मीकीय रामायण में एक बात डिण्डिमघोष से स्पष्ट है और वह है राम का अखण्ड एकपत्नीव्रत । “न सीतायाः परां भार्यां वव्रे स रघुनन्दनः । यज्ञे यज्ञे च पत्न्यर्थं जानकी काञ्चनी भवत् ॥ दश वर्षसहस्राणि वाजिमेधानथाकरोत् ॥” ( वा० रा० ७।९९।७, ८ ) यह निषेध-वचन सभी सामान्य वचनों से बलवान् है, इस कारण दूसरे सामान्य वचनों का समन्वय इसी के अनुसार करना होगा । सीता के अतिरिक्त श्रीरघुनन्दन ने किसी दूसरी भार्या का वरण नहीं किया । दस सहस्र वर्षों तक राम ने अश्वमेधादि यज्ञ किये और सभी यज्ञों में जानकी की स्वर्ण-प्रतिकृति ही पत्नी के स्थान में रहती रही । जैन आचार्य तुलसी के द्वारा प्रस्तुत— “हृष्टाः खलु भविष्यन्ति रामस्य परमाः स्त्रियः । अपहृष्टा भविष्यन्ति स्नुषास्ते भरतक्षये ॥” ( वा० रा० २।८।१२ ) राम की परम स्त्रियाँ ( परिचारिकाएँ ) प्रसन्न होंगी और भरत का प्रभाव नष्ट होने पर तुम्हारी पुत्रवधुएँ दुःखी होंगी । यह वचन मन्थरा ने कैकेयी से कहा है । यहाँ ‘परमाः स्त्रियः’ का अर्थ राम की पत्नियाँ नहीं, राम और सीता की उत्तम परिचारिकाएँ हैं । इसी अर्थ में रामाभिरामी टीकाकार श्रीनागेश भट्ट ने इम शब्द का अर्थ किया है ‘स्त्रियः इति बहुवचनेन सीदासख्य इत्यर्थः’ । आगे चलकर उत्तरकाण्ड ४२ वें सर्ग के दो श्लोक ( २२ और २३ ) दिये गये हैं— “उपानृत्यन्त काकुत्स्थं नृत्यगीतविशारदाः । मनोभिरामा रामास्ता रामो रमयतां वरः ॥ रमयामास धर्मात्मा नित्यं परमभूषिताः । स तया सीतया सार्धमासोनो विरराज ह ॥” ककुत्स्थनन्दन श्रीराम के समक्ष नृत्यगीत में निपुण दिव्य नर्तकियों ने नृत्य किया । प्रसन्न करनेवालों में सर्वश्रेष्ठ धर्मात्मा राम परम भूषित उन नर्तकियों को वस्त्र, भूषण आदि पुरस्कार से नित्य सन्तुष्ट करते थे । यहाँ राम श्रीसीताजी के साथ सिंहासन पर विराजते थे । यहाँ राम सीता के सान्निध्य में नर्तकियों के दिव्य नृत्य देखने और राम द्वारा भूषणाच्छादन प्रदान से उनको सन्तुष्ट करने का वर्णन है । जैन आचार्य तुलसी का रमयामास शब्द द्वारा पापभावना सिद्ध करने का दुष्प्रयास- मात्र है, क्योंकि उसी के साथ जुड़ा हुआ शब्द है धर्मात्मा । इसी लिए श्रीनागेशभट्ट ने भी यहाँ ‘रमयामास’ का अर्थ तोषयामास किया है । इसी प्रसंग में विशेष ध्यान देने योग्य अव्यवहित आगे का वाक्य है जिसमें राम को सीताजी के साथ राजासन पर आसीन कहा गया है । अतः ऐसे प्रसंग में ‘रमयामास’ शब्द की कोई पाप-कल्पना सर्वथा असम्भव और असंगत है । फिर क्रीडार्थक ‘रम’ धातु को ‘यभ’ समानार्थक समझना कामुकी मनोवृत्ति का ही द्योतक है ।

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