भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 238

अध्याय वैदिक रामकथा और अग्निपरीक्षा १६१ “साङ्गं च वेदमध्याप्य किञ्चिदुत्क्रान्तशैशवौ । स्वकृतिं गापयामास कविप्रथमपद्धतिम् ॥” यही कारण है कि परवर्ती सभी वैदिक रामकथाएँ उस रामायण के अनुरूप रहने पर ही प्रामाणिक मानी जाती हैं । जहाँ कहीं आंशिक अन्तर उपस्थित हुआ है वहाँ उस अंश में इसी रामायण को प्रमाण माना गया है । महाभारत से लेकर पद्मपुराण तक रामकथा के विषय में इसी रामायण को मूलमन्त्र माना गया है और उनकी भिन्न योजनाओं की इसके अनुरूप ही व्याख्या की गयी है (नीलकण्ठ) । इस रामायण (वाल्मीकि) में राम को ईश्वर और महासती सीता को उनकी महाशक्ति स्वीकार किया गया है । युद्धकाण्ड की ब्रह्मा-स्तुति (सर्ग १२०) इसका स्पष्ट प्रमाण है । इसी आधार पर सनातन स्थान सर्वातिशायी है । जैन-परम्परा इन दोनों तथ्यों को स्वीकार नहीं करती । उसमें न ईश्वर का अस्तित्व स्वीकार किया जाता है और न यज्ञों पर ही कोई आस्था रखी जाती है । वे वेदों को प्रमाण नहीं मानते । वाल्मीकिरामायण में इन दोनों तथ्यों की प्रतिष्ठा देख उसकी कथा को जैन-सम्प्रदाय ने अपने अनुरूप गढ़ा और एक नवीन झूठी रामकथा को जन्म दिया । बौद्धों ने भी ऐसा ही किया । इस परिवर्तन को तबतक सहा जा सकता था जबतक इसमें अधिक्षेप और अपमान की भाषा का उपयोग नहीं हुआ था । किन्तु जब यह परिवर्तन इस निम्नस्तर पर जा पहुँचा तो सनातनधर्मवलम्बियों की भावनाओं को ठेस पहुँची । अग्निपरीक्षा इसका प्रमाण है । इसमें राम और सीता को जिस स्तर का बतलाया गया है वह उनका अपमान ही है । सीता को तो बाद में महासती बतलाया भी गया किन्तु राम को उनकी सनातनोचित प्रतिष्ठा इस ग्रन्थ में प्रदान नहीं की गयी । सीता को भी जिन शब्दों से सम्बोधित किया गया है वे शब्द पूर्वपक्ष के रूप में भी ग्राह्य और प्रयोगयोग्य नहीं हैं । प्राचीन जैनपुराणों ने भी ऐसा नहीं किया है। इस ग्रन्थ में राम और सीता को णमुक्कार मन्त्र का जप करते हुए जैनधर्म में दीक्षित बतलाया गया है। यह वैसा ही है जैसा महावीरस्वामी को वाममार्ग में दीक्षित बतलाया जाय या मुहम्मदसाहब को वैदिक धर्म में । निश्चित ही राम की महती प्रतिष्ठा का उपयोग जैन-सम्प्रदाय ने अपने पक्ष में करना चाहा है, किन्तु तेरापन्थी आचार्य तुलसी ने उससे आगे बढ़कर पूर्वपक्ष के रूप में राम और सीता की प्रतिष्ठा को सांकेतिक ढङ्ग से उसी प्रकार नीचे गिराना चाहा है जिस प्रकार रावणपन्थी कुछ कर रहे हैं । राम पर बहुपत्नीत्वाक्षेप सर्वथा निराधार आदि कवि महर्षि वाल्मीकि की रामायण ही श्रीराम-चरित्र के सम्बन्ध में परम प्रमाण है । भगवान् वेदव्यास द्वारा पुराणों में तथा अन्यान्य रामायण, आनन्दादि अन्य रामायणों तथा सम्प्रदायान्तर अथवा देशान्तर में प्राप्त राम-कथाओं को तथा हिन्दी में रचित रामायण और रामचरितमानस आदि ग्रन्थों को मूल आधार के रूप में वाल्मीकिरामायण का ही आश्रयण करना पड़ता है । जैनमुनि की अग्निपरीक्षा पुस्तक को देखने में पहले यह सन्देह होता था कि जैनमुनि ने उक्त पुस्तक में जगज्जननी सीता के लिए जिन अपशब्दों का प्रयोग किया है वे सब पूर्वपक्ष के विन्यासरूप हों आगे उनका उत्तर द्वारा खण्डन ही इष्ट हो । कानून में भी सन्देह का लाभ अभियुक्त को देना उचित है, अभियोक्ता को नहीं । इसी कारण जैन आचार्य तुलसी श्रीसीता के चरित्र के प्रति श्रद्धा और भक्ति से प्रेरित हो ऐसे दुर्वचनों का प्रयोग केवल उनके निराकरणार्थ ही करते हों ऐसा सन्देह हो सकता था और उसका लाभ उनको दिया जाना चाहिये था । किन्तु जब उनके आगे के प्रयास को देखा जिसमें उन्होंने अपनी स्थिति की पुष्टि के लिए वाल्मीकि- रामायण के आधार पर मर्यादापुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम को बहुपत्नीसम्पन्न अथवा परस्त्रीरमण करनेवाला सिद्ध करने