भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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१६० रामायणमीमांसा पञ्चम इत्यहं तस्य शापस्य भीतः प्रसभमेव तां । नारोहये बलात् सीतां वैदेहीं शयने शुभे ॥” ( वा० रा० ६।१३।१४,१५ ) वैदिक रामकथा और अग्निपरीक्षा तेरापन्थी जैन आचार्य तुलसी की अग्निपरीक्षा नामक पुस्तक पर लगे प्रतिबन्ध को हटवाने हेतु जबलपुर उच्चन्यायालय में उपस्थापित याचिका में अनेक तर्क दिये गये हैं। किन्तु उनमें से एक भी तर्क ऐसा नहीं है जिससे यह सिद्ध हो सके कि जैन रामकथा वैदिक रामकथा के बाद की नहीं है और उसे अपने मत के लोकप्रचार के लिए रूपान्तरित नहीं किया गया है। उच्चन्यायालय में दायर अर्जी में यह स्वीकार किया गया है कि जैन रामकथा का सबसे प्राचीन ग्रन्थ विमलसूरि द्वारा प्राकृत में रचित पउमचरियं है। इसका रचनाकाल महावीर के स्वर्गवास के बाद ५३० वाँ वर्ष है। जो लगभग ईसवी सन् का आरम्भ काल है। स्वयं वादी ने भी इसे विक्रम संवत् ६० की कृति कहा है। वैदिक रामकथा का प्राचीनतम ग्रन्थ महर्षि वाल्मीकि रचित रामायण है। जिसे आधुनिक इतिहासकारों ने भी ईसा पूर्व छठी शती की रचना माना है। वैसे सत्य तो यह है कि यह राम की समकालीन कृति है और अत्यन्त प्राचीन है। यह कहा जा चुका है कि यह काव्य संस्कृत भाषा में है। इसका नाम पौलस्त्यवध और रामचरित है। किन्तु इसका प्रतिपाद्य सीताचरित ही है वाल्मीकिरामायण के ही— “काव्यं रामायणं कृत्स्नं सीतायाश्चरितं महत् । पौलस्त्यवधमित्येवं चकार चरितव्रतः ॥” ( वा० रा० १।४।७ ) इस पद्य से यह तथ्य स्पष्ट है। यह इसलिए भी मान्य है कि रामायण का निर्माण निर्वासित सीता के वाल्मीकि आश्रम पहुँचने के पश्चात् आरम्भ होता है और सीता के करुण क्रन्दन से जनित महर्षि का शोक ही क्रौञ्ची के करुण क्रन्दन से अधिक बढ़ जाता है और वही उच्छलित होकर निम्नलिखित श्लोक के रूप में प्रकट होता है— “मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः । यत्क्रौञ्चमथुनादेकमवधीः काममोहितम् ॥” स्वयं रामायण में कहा गया है— “शोकः श्लोकत्वमागतः ।” ( वा० रा० १।२।४० ) शोक ही श्लोक बन गया यह प्रक्षिप्त नहीं है, क्योंकि कालिदास और आनन्दवर्धन ने इस वाक्य को इसी रूप में अपनाया और उद्धृत किया है— “निषादविद्धाण्डजदर्शनोत्थः श्लोकत्वमापद्यत यस्य शोकः ।” ( रघु० १४।७० ) शोकः श्लोकत्वमागतः । ( ध्वन्यालोक ४।५ ) इस प्रकार भगवती सीता के विषय में भी यही रामायण भारतीय साहित्य का आदि स्रोत है। इसी दृष्टि से कालिदास ने इसे ‘कविप्रथमपद्धति’ बतलाया है। रघुवंश १५।३३ में इसे वेदों के साथ अध्येय बतलाया है। वाल्मीकीय रामायण की कथा और घटनाओं को वास्तविक और सब प्रकार से सत्य इतिहास भी स्वीकार किया गया है। ऋतम्भरा प्रज्ञा द्वारा प्रत्येक घटना का साक्षात्कार कर ही वाल्मीकि ने इसे लिखा है। इसलिए नैमिषारण्य में रामाश्वमेध के समय उपस्थित अयोध्या की जनता में रामायण का गान होने पर उसके अयोध्याकाण्ड की प्रत्येक घटना को प्रत्येक अयोध्यावासी ने सर्वथा यथार्थ माना है।