भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 241, कुल 1049 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 241

पैदा करती हैं। अतः उनसे बचने की दृष्टि से ही बौद्धों एवं जैनों ने अपने ढङ्ग से उन्हें विकृत कर उनका वर्णन किया है। प्राचीनकाल से ही बौद्धों ने रामकथा अपनायी है और इसे जातकसाहित्य में स्थान दिया है। जातक- कथा के अनुसार महात्मा बुद्ध अपने असंख्य पूर्वजन्मों में मनुष्य, पशु आदि रूप में उत्पन्न होते हैं। इन जातकों में दशरथजातक प्रसिद्ध है। यह जातक जिस जातकट्ठवण्णना में पाया जाता है। वह पाँचवीं शताब्दी ई० की एक सिंहलीपुस्तक का पालीअनुवाद है। इसमें जो कथाएँ पायी जाती हैं वे प्राचीन पाली गाथाओं की टीकारूप में लिखी गयी हैं। प्रत्येक जातक में पहले वर्तमान कथा दी जाती है जिसमें यह बतलाया जाता है कि किस अवसर पर बुद्ध ने इसे कहा और उसके बाद अतीत कथा दी जाती है। फिर सामञ्जस्य प्रस्तुत किया जाता है अर्थात् व्यतीत तथा वर्तमान कथा के पात्रों की अभिन्नता कही जाती है। गाथाएँ प्रायः अतीत कथा में ही मिलती हैं। परन्तु कभी वर्तमान कथाओं एवं समोधान (सामञ्जस्य) में भी गाथाएँ होती हैं। इनका अर्थ करने के लिए टीका होती है। यह दशरथजातक जैतवन में किसी गृहस्थ के पिता के मर जाने पर उसके शोकवशीभूत हो कर्तव्य का पालन त्याग देने पर उससे बुद्ध ने कहा था। प्राचीन काल के पौराण पण्डिता (पण्डित लोग) पिता की मृत्यु होने पर किञ्चित् भी शोक नहीं करते थे ! इसके अनन्तर दशरथ के मरने पर राम के धैर्य का उदाहरण देने के लिए बुद्ध ने दशरथजातक सुनाया। डा० वेबर के अनुसार दशरथजातक की रामकथा रामायण का मूल है। डा० याकोबी ने इस पक्ष का खण्डन किया है। डा० वेबर के अनुसार पालिजातकट्ठवण्णना में दशरथजातक विद्यमान है, परन्तु उक्त ग्रन्थ की प्रामाणिकता विचारणीय है। बौद्ध त्रिपिटक (बौद्धधर्म ग्रन्थ) तीसरी शती ई० पू० मगध देश में पाली भाषा में लिखा गया था। इसके द्वितीय पिटक (सुत्तपिटक) के पाँचवे भाग का नाम खुद्दकनिकाय है। इसी खुद्दकनिकाय के अन्तर्गत जातकों की गाथाएँ दी गयी हैं और तीसरी शताब्दी ई० पू० से ही सुरक्षित हैं। इन गाथाओं के साथ-साथ प्रारम्भ से ही गद्य की टीका भी प्रचलित हुई होगी, क्योंकि इसके बिना बहुत सी गाथाएँ अपूर्ण और अबोधगम्य हैं। वर्तमान पाली जातकट्ठवण्णना पाँचवीं शताब्दी ई० की एक सिंहली पुस्तक का अनुवाद है। मूल सिंहली पुस्तक, जिसमें केवल गाथाएँ पाली में दी गयी थीं, आजकल अप्राप्य है। इसके अज्ञात लेखक का कहना है कि मैंने अनुराधपुर की परम्परा के आधार पर अपनी रचना की है। उपर्युक्त परिचय से स्पष्ट हो जाता है कि गाथाओं की अपेक्षा जातकों का गद्य बहुत कम महत्वपूर्ण और प्रामाणिक है। ये कथाएँ पाँचवीं शताब्दी ई० में परम्परा के आधार पर लिपिबद्ध की गयी हैं। शताब्दियों तक अस्थिर रहने के कारण इनमें परिवर्तन और परिवर्द्धन की सम्भावना रही है। इस गद्य को तीसरी शताब्दी ई० पू० की अखण्ड परम्परा मानना और इसके आधार पर रामायण के मूलरूप के सम्बन्ध में किसी सिद्धान्त का प्रतिपादन करना अवैज्ञानिक है। वास्तव में जातकट्ठवण्णना में अनेक स्थलों पर गाथाओं और गद्य में विरोध और असङ्गति दिखलायी पड़ती है।¹ बुल्के के अनुसार ही दशरथजातक में जो कथाएँ मिलती हैं वे रामायणीय कथा की विकृति रूप मानी जानी चाहिये ।² साथ ही इस जातक की गाथाएँ गद्य में ही हैं। प्राचीन गाथाओं से उनका कोई विशेष सम्बन्ध नहीं है। १. रामकथा, पृष्ठ ८२। २. वही।