भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 247

१७० रामायणमीमांसा पञ्चम हूँ । इससे यह ध्वनि निकलती है कि वनवास के समय राम और सीता का सम्बन्ध भाई-बहन का न होकर पति-पत्नी का था । अनामकजातक में भी रामकथा का विकसित रूप मिलता है; वह पीछे उद्धृत है । १इसके अतिरिक्त अश्वघोष, अभिधर्म महाविभाषा आदि प्राचीन बौद्ध-ग्रन्थों में वाल्मीकिरामायण के निर्देश मिलते हैं । अश्वघोषकृत बुद्धचरित महाकाव्य से स्पष्ट पता चलता है कि अश्वघोष (दूसरी शताब्दी ई० पूर्वार्द्ध) न केवल ब्राह्मण-रामकथा से लेकिन वाल्मीकिरामायण के पाठ से भी परिचित थे, और इससे अपनी सारी रचना में प्रभावित हुए हैं। राम का आज्ञापालन (९।२५), उनका वन से लौटना (९।६७), दशरथ का पुत्र वियोग के कारण शोक (८।७९, ८१), इन सब में रामकथा के किसी निश्चित रूप की ओर निर्देश नहीं है । लेकिन वनवासी राम से वामदेव की भेंट (९।९), वाल्मीकि (१।४८), तथा सारथि सुमन्त्र (६।३६; ८।८) का उल्लेख— यह रामायणीय रामकथा (विशेष करके अयोध्याकाण्ड) से सम्बन्ध रखता है। इसके अतिरिक्त अश्वघोष के सौन्दर- नन्द में वाल्मीकि का सीता के दोनों पुत्रों का शिक्षक होने का उल्लेख हुआ है। इससे यह ध्वनि निकलती है कि अश्वघोष उत्तरकाण्ड की कथावस्तु से भी अभिज्ञ थे । बुद्धचरित के अनेक स्थलों पर रामायण की कथावस्तु से बहुत कुछ समानता मिलती है। सिद्धार्थ के बिना छन्दक के कपिलवस्तु में लौटने का सारा वर्णन सुमन्त्र के प्रत्यागमन से प्रभावित हुआ है। कवि स्वयं दोनों वृत्तान्तों की तुलना करता है । “त्वामरण्ये परित्यज्य सुमन्त्र इव राघवम् ।” (६।२५) राम के वन से लौटने का भी एक उल्लेख मिलता है— “महीं विप्रकृतामनार्यैस्तपोवनादेत्य ररक्ष रामः ।” (९।५९) पृथिवी को अनार्यों से पीड़ित देखकर राम ने वन से लौटकर उसकी रक्षा की ।२ यह बात दशरथजातक में नहीं है । बुल्के का यह कहना कि “रामायण में इस कथा का रूप नहीं है;" सर्वथा असङ्गत है, क्योंकि रामायण के 'उत्तरकाण्ड' से लवण दैत्य के द्वारा मथुरा आदि की भूमि के विप्रकृत होने और राम से प्रेषित शत्रुघ्न के द्वारा उसकी रक्षा की जाने का उल्लेख है । रामायण और बुद्धचरित के कई स्थलों में बहुत समानता है। उदाहरणतः-“गजेन्द्रमृदिता फुल्ला लता इव महावने” (वा० रा० ५।९।४७) का उल्लेख है, “गजभग्ना इव कर्णिकारशाखा” (बुद्धचरित ५।५१) का उल्लेख है। ऐसे अनेक उदाहरण दिये जा सकते हैं। विंटरनित्स के अनुसार इसका मूल स्रोत बुद्धचरित है, रामायण में यह प्रक्षिप्त है। कीथ के मतानुसार अश्वघोष ने ही रामायण का अनुकरण किया है । वस्तुतः इस सम्बन्ध में कीथ का मत ही युक्तियुक्त है । “मुमोक्ष बाष्पं पथि नागरो जनः पुरा रथे दाशरथेरिवागते” (बु० च० ८।८) जैसी युक्ति गौतमी के विलाप (८।५१-५९) में राजमहल और वनवास का जो विरोध चित्रित है वह रामायण के दशरथ-विलाप (वा० रा० २।१२।९७-११०, २।५७-५९) और कौशल्या-विलाप (वा० रा० २।४३।१-२०) का स्मरण दिलाता है। दोनों ही वर्णनों में वनवासी पुत्र के पैदल जाने और भूमि पर शयन करने आदि का उल्लेख हुआ है । “प्रलम्बबाहुर्मृगराजविक्रमो महर्षभाक्षः कनकोज्ज्वलद्युतिः । विशालवक्षा घनदुन्दुभिस्वनस्तथाविधोऽप्याश्रमवासमर्हति ॥” (बु० च० ८।५३) १. रामकथा, पृष्ठ ९७, अनुच्छेद ८३ । २. वही, पृष्ठ ९३ ।