रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 246, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंकरने पर स्पष्ट है कि विश्वकवि वाल्मीकि ने कितने कौशल से इस अपरिष्कृत बौद्ध कथा को उत्कर्ष की सीमा तक पहुँचाया है । बुल्के के अनुसार "इस तर्क का प्रत्युत्तर यह है कि रामायण तथा बौद्धकथा की तुलना करने पर स्पष्ट है कि बौद्धों ने रामायण के कारुणिक कथानक को शोक की व्यर्थता के एक उपदेश मात्र में बदल दिया है । इससे सिद्ध होता है कि रामायण बौद्धकथा का मूल एवं प्राचीन है ।” बुल्के यह कहते हैं कि “डा० वेबर और दिनेशचन्द्र गाथाओं और गद्य इन दोनों की प्रामाणिकता में कोई भेद नहीं मानते । यद्यपि दोनों के रचनाकाल में शताब्दियों का अन्तर है । यह तर्क दशरथजातक के विषय में विशेष महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें प्रायः समस्त कथा गद्य में दी गयी है । पहली गाथा का जो प्रसङ्ग दशरथजातक में दिया गया है वह मौलिक नहीं है । अन्य गाथाओं का मूल स्रोत भी रामायण से मिलता-जुलता कोई पुराना उपाख्यान रहा होगा, यह सम्भवतः गाथाओं के उपर्युक्त विश्लेषण से स्पष्ट हो गया है ।”१ वस्तुतः बुल्के आदि पाश्चात्य विद्वानों द्वारा किया गया उपनिषदों और वाल्मीकिरामायण का काल-निर्णय ही भ्रान्तिपूर्ण है । यदि तत्सम्बन्धी हमारा विवेचन उनकी समझ में आ जाय तो वे भी मानने लगेंगे कि जैन-रामकथा की भाँति ही बौद्धरामकथा भी वाल्मीकिरामायण का ही विकृत रूप है । विभिन्न दुरभिसन्धियों से जैनों और बौद्धों ने रामकथा को अपने धार्मिक विश्वासों के साँचे में ढालने का प्रयास किया है । स्वयं बुल्के का कथन है कि “दशरथजातक में प्राप्त रामकथा की अन्तरङ्ग समीक्षा करने पर वह रामायणकथा का विकृत रूपमात्र ही सिद्ध होती है२ ।” साथ ही डा० वेबर का मत इस धारणा पर निर्मित प्रतीत होता है, जिस कथा में अपेक्षाकृत कम पात्र, कम घटनाएँ, कम तत्त्व मिलते हैं वह निस्सन्देह पूर्वकृत होगी । ऐसी धारणा निर्मूल है। इसका प्रमाण दशरथकथानम् में मिल जाता है । यह कथा एक सङ्ग्रह में पायी जाती है जिसकी रचना दूसरी शताब्दी ई० के बाद हुई थी । इस दशरथकथानम् में सीता का या किसी राजकुमारी का उल्लेख नहीं है । रामकथा का यह रूप दूसरी शताब्दी ई० के बाद भी बौद्ध जगत् के किसी प्रदेश में प्रचलित रहा होगा । दशरथकथानम् के रचना-काल में वाल्मीकिरामायण ग्रन्थ भारतवर्ष में प्रसिद्ध हो चुका था, फिर डा० वेबर की युक्ति के अनुसार दशरथकथानम् के वृत्तान्त में इन सब रचनाओं के पहले की रामकथा का रूप विद्यमान है ।३ अस्तु, उनकी यह उक्ति सर्वथा निस्तत्त्व है । वस्तुतः रामकथा का विकसित रूप जो वाल्मीकिरामायण में पाया जाता है वह प्राचीनकाल में ही बौद्धों में प्रचलित था। इसके सङ्केत पाली जातकट्ठवण्णना की अन्य गाथाओं से मिलते हैं । जयद्दिशजातक (नं० ५१३) की गाथा १७ के अनुसार राम का वनवास हिमालय प्रदेश में न होकर दण्डकारण्य में है । एक माता अपने पुत्र से कहती है । जिस तरह दण्डकारण्यवासी राम की सुन्दर माता ने (अपने पुण्य द्वारा पुत्र का) कल्याण किया है, इस तरह मैं तेरा कल्याण ( सोत्थानं स्वस्त्ययन ) करती हूँ । यं दण्डकारण्णगतस्स माता रामस्स सोत्थानं सुगत्ता तं ते अहं सोत्थानं करोमि । दशरथजातक के अनुसार राम के निर्वासन के समय उनकी माता का देहान्त हो गया था । वेस्संन्तरजातक (नं० ५४७) मद्दी, वेस्संन्तर की पत्नी, कहती है, "मैं एक प्रतापवान् निर्वासित राज- कुमार की भार्या हूँ । अनुगामिनी सीता जिस तरह से राम का आदर करती थीं, उसी तरह मैं इनका आदर करती १. रामकथा, पृष्ठ ९१ पर्यन्त । २. वही, अनुच्छेद-७७१ । ३. वही, पृष्ठ ९२ । २२