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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 245, कुल 1049 में से

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पृष्ठ 245

१६८ रामायणमीमांसा पञ्चम शाक्यों की उत्पत्ति वाराणसी की पटरानी की नौ सन्तानें थीं—चार पुत्र और पाँच पुत्रियाँ । उसके मर जाने के बाद अंबट्ठ राजा ने नया विवाह किया और अपनी युवती पत्नी को पटरानी बनाया—( अग्गमहेसि ट्ठाने ठपसि ) । नई पटरानी के पुत्र उत्पन्न होने पर राजा ने उसको एक वर दिया और उसने उस वर के बल पर अपने पुत्र के लिए राज्यसिंहासन माँगा । राजा ने पहले अस्वीकार किया। फिर भी उसने अपने नौ पुत्र-पुत्रियों को यह कह कर वनवास दे दिया “मेरी मृत्यु के पश्चात् आओ और राज्य पर अधिकार प्राप्त करो ।” बहुत लोग उनके साथ चल दिये और सबों ने वन में एक नगर बसाया । नगर को 'कपिलवस्तु' नाम दिया गया, क्योंकि उसी स्थान पर कपिल नामक तपस्वी तपस्या करते थे । राजसन्तान से विवाह करने योग्य वन में कोई नहीं था, अतः चारों राजकुमार अपनी बहनों से विवाह करने के लिए बाध्य हुए । ज्येष्ठा कन्या पिया अविवाहित रह कर सबों की माता मानी जाने लगी यही शाक्यों की उत्पत्ति की कथा है । कोलियों की उत्पत्ति कुछ समय बाद अविवाहिता पिया को कुछ रोग हो गया । इस कारण वह वन के किसी एकान्त स्थान पर छोड़ दी गयी । उसी वन में राम नामक एक राजा रहते थे । कुछ रोग के कारण राजा राम भी; अपने पुत्र को राज्य देकर वन में आये थे और औषधीय पौधों का सेवन कर स्वस्थ हो गये थे । उन्हीं पौधों द्वारा पिया की चिकित्सा कर के राम ने उससे विवाह किया और ३२ पुत्र उत्पन्न किये (१६ यमल) इसके बाद उसने वन में कोलनगर बसाया और शाक्य राजकुमारियों से अपने पुत्रों का विवाह कराया । शाक्य तथा कोलिय प्रत्येक वंश के २५० राजकुमार भिक्षु बन गये थे । वे अपने वैराग्य में दृढ़ न रह कर लौटने की अभिलाषा करते हैं । तब महात्मा बुद्ध उनको महाकुणाल-जातक सुनाकर उनकी संसार में आसक्ति दूर करते हैं । डा० वेबर के अनुसार रामकथा का विकास इस प्रकार हुआ । धम्मपद और सुत्तनिपात की टीकाओं में विमाता की ईर्ष्या के कारण राजसन्तति को वनवास दिया जाता है, भाई-बहन का विवाह होता है और राम के के नाम का भी उल्लेख होता है । दशरथजातक में विमाता के कारण वनवास और भाई-बहन के विवाह के साथ-साथ दशरथ, लक्ष्मण, भरत और सीता, ये नाम मिलते हैं और राम पराये न होकर राजकुमारों के ज्येष्ठ भाई बन जाते हैं । रामायण में राजकुमारों की राजधानी वाराणसी से अयोध्या बन जाती है । वनवास का स्थान हिमालय से दण्डकारण्य में बदल जाता है और राम तथा सीता भाई-बहन न होकर प्रारम्भ से ही विवाहित होते हैं । इन परिवर्तनों के अतिरिक्त सीता-हरण और रावण-वध ये नये वृत्तान्त भी जोड़े गये हैं । रामायण में सीता के वनवास के अन्त तक कोई सन्तान नहीं होती, यह डा० वेबर के अनुसार दशरथ- जातक की कथा का प्रभाव है जिसमें वनवास के बाद ही उनका विवाह होता है । वाराणसी का अयोध्या बनना भी बौद्ध कथाओं के कारण हुआ । शाक्य और कोलिय वंशो की राजधानियाँ क्रमश: कपिलवस्तु और कोलनगर दोनों थीं, दोनों नगर अयोध्या के पड़ोस में थे । वनवास का स्थान इसलिए बदल गया कि सीता-हरण और रावण-वध का वृतान्त जोड़ना था । अन्तिम विषय का आधार यूनानी कवि होमर की रचना है जिसमें पैरिस द्वारा हेलेन का हरण है और लङ्का से जो युद्ध हुआ उसका आधार सम्भवतः यूनानी सेना द्वारा त्राय का अवरोध है। श्रीदिनेशचन्द्र सेन भी दशरथजातक में रामकथा का आधार और पूर्वरूप देखते हैं । रामायण में एकाध पाली गाथाओं का संस्कृत अनुवाद पाते हैं और अन्तरङ्ग प्रमाण भी देते हैं—रामायण और बौद्धकथा की तुलना

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