भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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अध्याय बौद्ध जातकसाहित्य की रामकथाओं पर विचार १६७ श्याम, युवा, लोहिताक्ष, मत्तगज-पराक्रमी, आजानुबाहु, मनोज्ञमुख, सिंहस्कन्ध राम ग्यारह हजार वर्ष राज्य करके परम धाम गये । हरिवंश में— “दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च। अयोध्याधिपतिर्भूत्वा रामो राज्यमकारयत् ॥” ( १।४१।१५१ ) ग्यारह हजार वर्ष पर्यन्त राम ने अयोध्याधिपति होकर राज्य किया। इन उद्धरणों से स्पष्ट है कि पाली गाथा और संस्कृत श्लोकों का मूलस्रोत एक ही है। यह पाली गाथा दशरथ-जातक के समोधान में दी जाती है। यह समोधान, इस गाथा को छोड़कर, गद्य में ही लिखा गया है। इससे डा० याकोबी ठीक ही अनुमान करते हैं कि “यह गाथा कहीं से उद्धृत की गयी है। इस जातक की वर्तमान कथा में पोराण पण्डिता का उल्लेख है, अतः प्रस्तुत गाथा का मूलस्रोत कोई प्राचीन काव्य रहा होगा और बहुत सम्भव है कि यह वाल्मीकिरामायण ही हो ।१” बुल्के इसका आधार ब्राह्मण-धर्म के वातावरण में निर्मित प्राचीन आख्यान साहित्य में राम-सम्बन्धी प्राचीन गीतों को मानते हैं, क्योंकि उनकी दृष्टि में रामायण उनसे अर्वाचीन है। परन्तु यह उनका भ्रम है, क्योंकि यह वा० रा० १म काण्ड से सिद्ध है कि वाल्मीकिरामायण का निर्माण राम के समकाल में ही हुआ है, अतः डा० याकोबी का मत ही ठीक है। डा० वेबर के अनुसार दशरथजातक में रामकथा का पूर्वरूप रक्षित है। इसके अतिरिक्त वे पाँचवीं शताब्दी ई० की दो अन्य बौद्ध रचनाओंमें इस कथा के प्राचीनतम तत्त्व पाते हैं। पर यह उनकी कल्पनामात्र है। सो भी बिना प्रमाण की। धम्मपद की टीका में निम्नलिखित कहानी मिलती है। यह ज्यों की त्यों पाली जातकट्ठवण्णना में भी उद्धृत है। ( देवधम्म-जातक नं० ६ दे० ) । ( क ) वाराणसी के राजा के दो पुत्र थे महिसास ( क ) और चन्द्र । उनकी माता के मरने पर राजा ने फिर विवाह किया। नई महिषी के सूर्य नामक एक पुत्र उत्पन्न हुआ। इसी अवसर पर राजा से उसको एक वर भी मिला। जब सूर्य युवावस्था को प्राप्त हुआ तब रानी ने वर के बल पर अपने पुत्र के लिए राज्यसिंहासन का अधिकार माँगा। राजा ने स्पष्ट अस्वीकार किया। लेकिन महिषी के षड्यन्त्रों से भयभीत होकर उन्होंने अपने पुत्रों को यह कह कर वनवास दिया कि “मेरे मरने के बाद लौट कर राज्य पर अधिकार प्राप्त करना ।” सूर्य अपने दोनों भाइयों के साथ स्वेच्छा से वन चला गया। राजा के मरने के पश्चात् तीनों बनारस लौटते हैं। महिसास राजा बन जाते हैं, चन्द्र उपराजा और सूर्य सेनापति। ( ख ) डा० वेबर के अनुसार यह दशरथ-जातक का प्रथम रूप है। आगे चलकर वे बुद्धघोष की सुत्तनिपात-टीका में वर्णित शाक्य तथा कोलिय वंशों की उत्पत्ति की कथा में ( २, १३ ) दशरथ-जातक का द्वितीय रूप देखते हैं। १. रामकथा, पृष्ठ ८८ ।