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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 248, कुल 1049 में से

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पृष्ठ 248

अध्याय बौद्ध जातकसाहित्य की रामकथाओं पर विचार १७१ “नागराजगतिर्वीरो महाबाहुर्धनुर्धरः । वनमाविशते नूनं सभार्यः सहलक्ष्मणः ॥” ( वा० रा० २।४३।६ ) “शुचौ शयित्वा शयने हिरण्मये प्रबोध्यमानो निशि तूर्यनिस्वनैः । कथं बत स्वप्स्यति सोद्य मे व्रती पटैकदेशान्तरिते महीतले ॥” (बु० च० ८।५८) “दुःखस्यानुचितो दुःखं सुमन्त्र शयनोचितः । भूमिपालात्मजो भूमौ शेते कथमनाथवत् ॥” ( वा० रा० २।५८।६ ) तीसरी शताब्दी ई० उत्तरार्द्ध की अभिधर्ममहाविभाषा में रामायण का उल्लेख किया गया है। यह रचना चीनी अनुवाद में सुरक्षित है। इसमें लिखा है—रामायण नामक ग्रन्थ में १२००० श्लोक हैं। श्लोक केवल दो विषयों से सम्बन्ध रखते हैं—(१) रावण द्वारा सीता का हरण, (२) राम द्वारा सीता की पुनः प्राप्ति तथा (अयोध्या में) प्रत्यागमन । इसके अतिरिक्त तीन बौद्ध रचनाएँ और मिलती हैं, जिनसे पता चलता है कि रामायण का बौद्धों में पर्याप्त प्रचार था। कुमारपालकृत कल्पनामण्डितिका में ( तीसरी शताब्दी ई० का अन्त ) महाभारत और रामायण का उल्लेख हुआ है। वसुबन्धु ( चौथी शताब्दी ई० ) की जीवनी में भी यह कहा गया है कि वसुबन्धु रामायण की कथा सुना करते थे। सद्धर्मस्मृत्युपस्थानसूत्र में रामायण का द्विवर्णन उद्धृत है। यह रचना पहली शताब्दी ई० की मानी जाती है। इसका छठी शताब्दी में चीनी भाषा में अनुवाद हुआ था। श्रीबुल्के के अनुसार “रामकथा का जो रूप पाली दशरथजातक में मिलता है वह या तो रामायण ही पर अथवा रामायण से मिलती जुलती किसी अन्य रामकथा पर निर्भर है। यह दशरथजातक की अन्तरङ्ग परीक्षा से सिद्ध होता है।” रामायण में कैकेयी ने वर के बल पर राम के लिए चौदह वर्ष तक वनवास माँग लिया था; अतः राम का दशरथ के मरने के बाद वन में रहना स्वाभाविक और अनिवार्य है। लेकिन दशरथजातक में इसके लिए कोई समीचीन कारण नहीं मिलता। इसके अनुसार दशरथ ने राम और लक्ष्मण से कहा था कि वे उनकी मृत्यु के पश्चात् लौटें। तब उन्होंने ज्योतिषियों से अपना अन्तकाल पूछा था। यह जानकर कि मैं बारह वर्ष तक जीवित रहूँगा तो उन्होंने अपने पुत्रों से इस अवधि के अन्त में आने के लिए कहा था। फिर दोनों पुत्रों को एक ही आदेश मिला था। तब लक्ष्मण क्यों नौ वर्ष के बाद लौटते हैं ? रामायण की कथा में सीता का अपने पति के साथ जाना स्वाभाविक है। दशरथजातक में इसके लिए कोई ऐसा कारण नहीं है। विमाता के षड्यन्त्रों की सीता को कोई आशंका नहीं थी। जातक में सीता दशरथ के मरने पर लक्ष्मण के साथ राजधानी को लौट आती है और राम तथा सीता का तीन वर्षों के वियोग के बाद विवाह हो जाता है। इसमें सम्भवतः रामायण के सीताहरण के पश्चात् दोनों का संयोग प्रतिबिम्बित है। अब प्रश्न यह उठता है कि यदि दशरथजातक ब्राह्मण-रामकथा पर निर्भर है तो दोनों में इतना अन्तर क्यों है ? इसके तीन मुख्य कारण स्पष्ट हैं। एक तो दशरथजातक का जो रूप जातकट्ठवण्णना में प्रस्तुत है, वह शताब्दियों तक अस्थिर रहने के बाद पाँचवीं शताब्दी ई० में लिपिबद्ध किया गया है। अतः इसमें परिवर्तन की सम्भावना रही है। विशेष कर दूर सिंहलद्वीप में जहाँ रामायण की कथा उस समय तक कम प्रचलित थी। दूसरे बौद्ध आदर्श और शैली का प्रभाव पड़ना अत्यन्त स्वाभाविक है। तीसरे दशरथजातक की वर्तमान कथा के अनुसार महात्मा बुद्ध ने पिता के मरण से शोकातुर पुत्र को धैर्य देने के लिए दशरथ के मरने पर राम के धैर्य का उदाहरण देकर यह जातक कहा था। इस उद्देश्य के लिए सीता-हरण का उल्लेख अनावश्यक था। इसके अतिरिक्त इस जातक

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